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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

चौथा पुतला



    स बार दशहरे के अवसर पर स्त्रियों से पीड़ित पुरुषों की इच्छा है कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के साथ रावण का स्त्री स्वरूप एक चौथा पुतला भी दहन के लिए खड़ा किया जाए। 

इस पुतले का दसवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसे उसके पति ने अपनी जमापूंजी खर्च करके खूब पढ़ाया-लिखाया हो और उसके बाद वह इस काबिल हो गई कि किसी सरकारी विभाग में अफसर चुनी गई हो और अफसर बनते ही अपने पति को लात मारकर किसी अफसर के साथ ही प्यार की पींगे बढ़ा रही हो।

इस पुतले का नौंवा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसका शादी से पहले ही किसी और पुरुष से पक्का वाला याराना चल रहा हो और मा-बाप के द्वारा विवशता में शादी करने के बाद जो अपने पति को पहाड़ों पर हनीमून मनाने के बहाने ले जाकर किसी ऊंचे पहाड़ से उसको धक्का देकर उसका राम नाम सत्य कर चुकी हो।

इस पुतले का आठवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने त्रिया चरित्र को नया आयाम देकर अपने पति को इतना अधिक परेशान कर उसका जीना मुश्किल कर चुकी हो, कि अंततः उसे वीडियो बनाकर अपनी दुःख भरी आपबीती बताने के बाद आत्महत्या करने के लिए विवश कर चुकी हो।

इस पुतले का सातवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो पतिव्रता का अभिनय करने में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की दावेदारी करे और पति के घर से बाहर होने पर पराए मर्दों संग प्रेम का नया अध्याय लिखे। या यूं कहें कि ऐसी स्त्री जो सबके सामने सती सावित्री बनने का ढोंग करे और अपने कर्मों से नगर वधुओं को मात दे।

इस पुतले का छठा सिर ऐसी स्त्री का हो जो यौन शोषण के झूठे आरोप लगा कर अधिक से अधिक पुरुषों के जीवन की नैया डुबो चुकी हो।

इस पुतले का पांचवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों को धीमा विष खिलाते हुए पुण्य कमाने के उपक्रम में लगी हुई हो।

इस पुतले का चौथा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो दहेज मांगने का झूठा आरोप लगा शादी के मंडप पर पुलिस को बुला कर दूल्हे और उसके परिवार वालों को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान की यात्रा पर भिजवा कर अपने बॉय फ्रेंड संग गुलछर्रे उड़ाए।

इस पुतले का तीसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो स्वयं को चोटिल करके पुलिस वालों को नियमित रूप से अपने ससुराल में चाय पीने का अवसर प्रदान कर ससुराल पक्ष की ढंग से इज्जत उतरवाए।

इस पुतले का दूसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसने केवल इस उद्देश्य से शादी की हो कि कुछ दिनों बाद अपने पति से तलाक़ लेकर उससे अच्छी खासी संपत्ति एल्युमनी के रूप झटक कर अपना बाकी जीवन अय्याशी से व्यतीत करे।

इस पुतले का पहला अर्थात मुख्य सिर प्रतीक रूप में किसी ऐसी स्त्री का हो जो मां, बहन या सहेली की भूमिका निभाते हुए उपरोक्त वर्णित स्त्रियों को उनके पुरुष मिटाओ पावन अभियान में भरपूर सहयोग करे।

रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले पर अग्नि बाण चलाने का सौभाग्य किसी ऐसे पुरुष को प्रदान किया जाए जो किसी स्त्री द्वारा झूठे आरोप में फंसाए जाने के बाद वर्षों तक जेल में रहने का सुख भोग कर आया हो। इस पुतले के थोड़ी दूरी पर एक डांस फ्लोर भी बनवाया जाए ताकि जब रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले का दहन किया जाए तो स्त्रियों द्वारा पीड़ित पुरुष नाचते हुए "सियापति रामचंद्र की जय!" का जयकारा पूरी उमंग व जोश के साथ लगा सकें।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह 

चित्र - Meta AI से साभार 

गुरुवार, 6 जून 2024

नटबंधन का दौर


    लोकतंत्र के महाभारत की समाप्ति हो चुकी है। अब समय है गठजोड़ कर सरकार बनाने का। किसी भी राजनैतिक दल को जनता ने इतनी शक्ति प्रदान नहीं की कि वो केवल अपने दम पर सरकार बना सके। अब सरकार बनाने का पथ उस रस्सी का रूप धर चुका है जिस पर मुख्य राजनीतिक दल को नट बनकर करतब दिखाते हुए लोकतंत्र की चाबी हासिल करने जाना है। दूसरे राजनीतिक दल भी नट बनकर उस रस्सी पर करतब दिखाना चाहते हैं। किंतु ये तभी संभव है जब रस्सी पर पहले से करतब दिखा रहा नट अपना संतुलन खोकर नीचे आ गिरे। इसके लिए रस्सी के दोनों ओर खड़े छोटे नटों को प्रलोभन दिया जाता है कि वह बड़े नट को दिए गए अपने वचन से नट जाएं तो उन्हें सुनहरा अवसर प्रदान किया जाएगा। छोटे नट विचारमग्न हो अपने नफे-नुकसान का गुणा-भाग करने में व्यस्त हो जाते हैं कि कहीं सबसे बड़े नट का साथ छोड़कर कम बड़े नट के साथ मिल गए और वहां उतना सम्मान नहीं मिला तो उनके नटने के परिणामस्वरूप उनके राजनीतिक भविष्य की तो खाट ही खड़ी हो जाएगी। छोटे नटों के उत्तर की प्रतीक्षा में कम बड़े नट रस्सी पर चल रहे सबसे बड़े नट के साथ-साथ नीचे ही इस आस के साथ करतब दिखाना आरंभ कर देते हैं कि कब उनके भाग्य का छींका टूटे और सबसे बड़ा नट अपने-आप ही रस्सी से फिसल कर नीचे धरती पर ऐसा गिरे कि भविष्य में उठकर अपने पैरों पर चल ही न पाए। फिर तो रस्सी भी उनकी होगी और छोटे नटों का साथ भी रहेगा। जनता दर्शक बनी उन नटों के करतबों को देखकर सोचने लगती कि देश में अब गठबंधन की अपेक्षा नटबंधन का दौर आ चुका है।

रचना तिथि - 6 जून, 2024

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

कार्टून - श्याम जगोता

 

रविवार, 23 जुलाई 2023

पबजी वाला प्यार


      मय के साथ-साथ प्यार करने के अंदाज ने भी काफी प्रगति कर ली है। अब पेड़ों के इर्द-गिर्द घूमते हुए प्यार का इजहार करने वाला दौर नहीं रहा और न ही अब अपने प्यार को जताने के लिए सालों-साल तक अपने प्रेमी या प्रेमिका के गली-मोहल्ले या कूचे में भटकते रहने का समय रहा। अब तो पबजी वाले प्यार का ज़माना आ गया है। पबजी पर ऑनलाइन खेल खेलते हुए कब खेल-खेल में प्यार हो जाए पता ही नहीं चल पाता है। प्यार भी ऐसा होता है कि उसकी बाधा बनने वाली देश की सीमाएं भी तोड़ दी जाती हैं। हालांकि पुराने वाले प्यार की तरह पबजी वाला प्यार भी जाति, धर्म या समुदाय को स्वीकार नहीं करता, लेकिन इस नए-नवेले प्यार के रुप ने प्यार के लिए हर उल्टा-सीधा उपाय आजमाने की नीति अपनाई है। इश्क़ और जंग में सब जायज़ है मुहावरे को सही मायने में चरितार्थ इस पबजी वाले प्यार ने ही किया है।
     कई साल पहले एक फिल्म आई थी जिसमें नायक अपनी प्रेमिका को वापिस अपने देश में लाने के लिए पड़ोसी देश में जाकर प्यार के दुश्मनों से भिड़ जाता है और यहां तक कि गुस्से में उनका हैंडपंप तक उखाड़ डालता है। इधर मामला दूसरे टाइप का है। पबजी वाले प्यार में किसी से भिड़ने के बजाय खेल-खेल में बड़ा लंबा खेल खेलते हुए ऑफलाइन प्रेमी को दुलत्ती जड़कर और उसका सबकुछ बेचकर ऑनलाइन प्रेमी से प्यार की पींगें बढ़ाने के लिए रफूचक्कर हो प्रेमिका द्वारा पड़ोसी देश में अपने प्रेमी के यहां पहुंचने का शातिर खेल खेला जाता है। इस शातिर खेल को देखकर पड़ोसी देश का मीडिया और जन परेशान नहीं होते, बल्कि इसमें अपना गौरव और जीत का अनुभव करते हैं। मजे की बात ये है कि कुछ साल पहले जिस देश में पबजी खेल को प्रतिबंधित कर दिया गया था, उस देश में पबजी वाला प्यार कुलांचें भर रहा है। 
    देश का मीडिया अपने टीआरपी वाले प्यार में डूबकर मदहोश हो पबजी वाले प्यार की गाथा सुबह-शाम, दिन-रात सुना-सुना कर देश की जनता का भेजा खाली कर डालता है। सोशल मीडिया पर लिखाड़ू वीर पबजी वाले प्यार के पक्ष-विपक्ष में धड़ाधड़ लेख लिखकर सोशल मीडिया की कमर तोड़ने के लिए कमर कस लेते हैं। कोई इस पबजी वाले प्यार को देश की जीत मानता है तो कोई धर्म या समुदाय की। इस जीत के उत्सव में पूरा देश प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से डूब जाता है। इस बीच इस देश की सीमा एक पल को पबजी वाले प्यार की प्रेमिका की धूर्तता और चतुराई की सीमा को देखती है और दूसरे पल को देशवासियों की मूर्खता की सीमा को।

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

बिनोद हमारे दिलों में है


      ये ज़माना ट्रेंडिंग का है। सोशल मीडिया पर कब क्या ट्रेंड हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इन दिनों ट्विटर पर ट्रेंडिंग की जिम्मेवारी बिनोद ने संभाल रखी है। देश की अधिकांश ट्विटरी जनता इस बात को जानने की इच्छुक है कि आखिकार बिनोद को क्यों ट्रेंड किया जा रहा है।

असल मे यह सब एक यू-ट्यूब चैनल Slayy Point से शुरू हुआ, जब उसके क्रिएटर अभ्युदय और गौतमी ने अपने वीडियो पर आने वाले कमेंट पर एक वीडियो बनाने का सोचा। 15 जुलाई को उन्होंने अपने चैनल पर ‘Why Indian Comments Section is Garbage (BINOD)’ नाम से एक वीडियो शेयर किया। जिसमें उन्होंने लोगों के कुछ अजीबोगरीब कमेंट्स दिखाए। इस वीडियो में बिनोद थारू नाम के एक शख्स ने हर कमेंट में सिर्फ बिनोद लिखा था। वीडियो के सामने आने के बाद से ही लोगों ने हर यू-ट्यूब वीडियो पर कमेंट में बिनोद लिखना शुरू कर दिया।

जल्द ही यह ट्रेंड Twitter पर भी लोकप्रिय हो गया। विचारणीय प्रश्न ये है कि बिनोद थारू नामक व्यक्ति क्यों सभी जगह बिनोद लिखता फिरता है।

यदि हम इस विचारणीय प्रश्न पर विचार न भी करें तो भी बिनोद के इस बिनोदी व्यवहार का कारण समझा जा सकता है। इस संसार में हर इंसान अपनी रोटी, कपड़ा और मकान इत्यादि आवश्यकताओं के पूरा होने बाद अपने दिल में एक सपना पालना शुरू करता है। उस सपने का नाम है 'जग में नाम कमाना'। नाम कमाने के लिए लोग दान देते हैं, लोगों की सहायता करते हैं और स्कूल, धर्मशाला इत्यादि का निर्माण करते हैं। जो ये सब नहीं कर पाते हैं वे अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल मीडिया पर बैठ जाते हैं। शायद इसी सपने को साकार करने के लिए बिनोद ने अपना बिनोदी अभियान शुरू किया होगा।

बहरहाल बिनोद को अपने परिश्रम का लाभ मिला और फुरसतिया यूट्यूबरों, ट्विटराओं और ट्विटरियों ने बिनोद को ट्रेंड करना शुरू कर दिया। ये ट्रेंड धीरे-धीरे पूरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर फैल चुका है। अब लोग बिनोद को खोज रहे हैं। कुछ लोग उसके ट्रेंड होने का कारण ढूँढ़ रहे हैं।

ऐसा करते हुए लोग ये भूल जाते हैं कि जिस बिनोद की तलाश में वे सब लगे हुए हैं वह तो हम सभी के दिलों में पैठ बनाकर बैठा हुआ है। नाम कमाने की इच्छा रखने वाला हर वो इंसान बिनोद है जो समाज सेवा करके, दान-दक्षिणा देकर या फिर कोई अच्छा और भला कार्य करने के बजाय उल्टे-सीधे और अजीबोगरीब तरीके आजमा कर अपना नाम कामना  चाहता है।

बहरहाल बिनोद का मिशन सफल हो चुका है। अब हर कोई बिनोद की चर्चा में व्यस्त है। कई फर्जी बिनोद इसका क्रेडिट लूटने के लिए सोशल मीडिया पर प्रकट हो चुके हैं। पर असली बिनोद इन सब घटनाओं को देखकर मंद-मंद मुस्कुराता हुए ट्विटराओं के ट्वीटों में, फेसबुक पोस्ट में या फिर यूट्यूब के वीडियो पर कमेंट के रूप में अपना नाम बिनोद दर्ज करने में मस्त हो रखा है।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

पाप भरी सेल्फ़ी


     सके पास स्मार्ट फोन नहीं था, वरना वह भी एक अदद सेल्फ़ी तो ले ही लेता। पर उसका सामर्थ्य स्मार्ट फोन लेने का होता तब न। वह तो भूखा था। शायद कई दिनों से भूखा होगा बेचारा। हो सकता है भूख उसके संग सेल्फ़ी ले-लेकर ऊब गई होगी। इसलिए भूख ने भी तंग होकर उसे दुत्कार दिया होगा, सो विवश होकर वह भोजन के कुछ टुकड़ों की आस में इधर-उधर बेचैन हो भटक रहा था। जब भटकाव को मंजिल हासिल नहीं हुई तो अपने भूख से तड़पते हुए पेट के लिए उसने कुछ चावल चुरा लिए और वह बिना तजुर्बे का चोर झट से पकड़ लिया गया। 
वैसे भी अपने देश की विशेषता है कि यहाँ चोर और उसके द्वारा किस स्तर पर चोरी की गई है ये देखकर उससे उसी के अनुसार बर्ताव  किया जाता है। सो उस भूखे-नंगे चोर ने कुछेक चावल चुराकर इतना बड़ा पाप किया था कि वो माफी के लायक ही नहीं था। अगर वह करोड़ों-अरबों घोटाला करता तो सालों-साल कोर्ट में उस पर घोटाला के आरोप को साबित करने में बीत जाते। उम्र के आखिरी पड़ाव में अगर उसके जेल जाने की नौबत आती भी तो वह जेल में निश्चिंत होकर चैन की बंशी यह सोचते हुए बजाता कि बेशक वह जेल में है लेकिन उसने अपने परिवार को इस योग्य बना डाला कि उसकी कई पीढ़ियाँ बैठे-बैठे हलवा-पूरी खायेंगीं। 
अगर वह किसी बैंक के करोड़ो-अरबों रुपयों का गबन करता तो सरकारी तंत्र उसके क़दमों में फूल बिछाकर उसकी अगवानी करते हुए विदेश भागने में निष्ठापूर्वक उसकी हर संभव सहायता करता। विदेश में अरबों-करोड़ों रुपयों से खेलते हुए ऐशो-आराम से उसकी बाकी जिंदगी कटती और वह कभी मुड़कर भी इस देश की ओर नहीं झाँकता। फिर उसके खिलाफ बेशक चाहे जितनी जाँच कमेटियाँ गठित कर दी जातीं या  फिर उसको धर-पकड़ने के लिए अभियान  चलाये जाते। वह विदेश में बैठे-बैठे ही ठेंगा दिखाता और सरकार बेचारी साँप के निकल जाने पर लकीर को पीटती रहती।
सोचिए कि अगर वह घोटाला करता या फिर बैंक का धन हड़पता तो रातों-रात खबरपिपासु मीडिया द्वारा स्टार बना दिया जाता। टी.आर.पी. सुंदरी उसकी सेवा-सुश्रुषा करते हुए उसे अपनी बाहों में भर लेती और दिन-रात उसके क़दमों में ही पड़ी रहती। पर वह ऐसा कुछ न कर सका। उस मैले-कुचैले और अधनंगे इंसान ने अपनी औकात के हिसाब से ही चोरी करने के बारे में सोचा। उसने धृष्टता की और जैसे चूहा रोटी लगाकर रखे हुए पिंजरे में अचानक फँसकर कैद कर लिया जाता है, वैसे ही उस भूखे चोर को भी इंसानों के वेश में धरती पर टहलते हुए शैतानों ने पकड़कर अपने शैतानी शिकंजे में जकड़ लिया। उसे उसके उस घोर पाप के लिए बन्धक बनाकर मारा-पीटा गया। उसे पीटते-पीटते उन शैतानों द्वारा अपने उस वीरतापूर्ण कार्य को यादगार बनाने के लिए पाप भरी सेल्फ़ी ली गई। 
पिटते-पिटते भूख से अधमरा वो पापी चोर बिलकुल ही मर गया। उसके मरने के बाद केवल बाकी बची शैतानों द्वारा खींची गई उसकी वो पाप भरी सेल्फ़ी, जिसे देखकर धरती माँ का दुःख और पीड़ा के मारे कलेजा फट गया और मानवता शर्मसार हो अपनी छाती पीट-पीटकर रोयी। पर उस चोर की आत्मा अपने भूख से कंकाल बन चुके निर्जीव शरीर को देखकर इस बात से प्रसन्न थी कि कम से कम अब तो उसे भूख से यूँ बार-बार नहीं मरना पड़ेगा। 
लेखक - सुमित प्रताप सिंह 


सोमवार, 4 दिसंबर 2017

हास्य व्यंग्य : मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा


     ससुराल की सेवा और मेवा का सुख लेने के बाद मैं सपत्नीक अपने मायके के लिये रवाना हो लिया। कहीं जीजा जी दीदी संग रेलवे स्टेशन से वापस न लौट आयें इस डर से साले रेलवे स्टेशन तक हमें छोड़ने हमारे साथ ही आये। रेलवे स्टेशन पहुँचकर हम ये सोचते हुये भागे-भागे रेलवे प्लेटफार्म पर गये कि कहीं हमारी ट्रेन समय से पहले पहुँचकर हमारी प्रतीक्षा करने का दुःख न झेल रही हो, लेकिन ये हमारी एक बहुत ही हसीन भूल थी। हमारी ट्रेन पूरे ढाई घंटे लेट थी। बहरहाल हम सरकार के स्वच्छता मिशन को जीभ चिढ़ाते इटावा स्टेशन के प्रतीक्षालय में बेहाल हो अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा में लगे रहे। हमारी ट्रेन लेट पर लेट होकर हमारे सब्र का इम्तिहान लिये जा रही थी। खैर रेलवे विभाग की कर्मठता  और सक्षमता के फलस्वरूप साढ़े पाँच घंटे की कड़ी परीक्षा लेने के बाद सुबह 3.45 बजे जाकर ऊँचाहार एक्सप्रेस, जिसका नामकरण परेशान होकर मैंने नीचाहार एक्सप्रेस कर दिया था, में चढ़ने का सौभाग्य मिल पाया। पहले तो डिब्बे के अटेंडेंट को ढूँढने में काफी परिश्रम करना पड़ा, आखिरकार टी.टी. के बताए हुए ठिकाने पर जाकर अटेंडेंट को झकझोर कर जगाया और उससे सीट पर बिछाने के लिए चादरें माँगी तथा जितना जल्दी हो सका सीट पर चादर बिछाकर सोने की कोशिश करने लगा। मैंने देखा कि थकान होने के कारण पत्नी सो चुकी थी और मैं पूरे दिन की थकान होने के बावजूद अपने बगलवाली सीट पर पसरे इंसान के जोरदार खर्राटों से बेहाल हो जागने को विवश होता हुआ गहरी नींद में डूबने के स्वप्न देख रहा था। मैंने उसके खर्राटे बंद करने के लिये उसका कंबल कई खींचा, ताकि वो गहरी नींद से बाहर आ अपने खर्राटों पर पूर्ण विराम लगाये, लेकिन मेरी इस आशा पर उसने खर्राटे मारते रहकर फुल स्टॉप लगा दिया। अब मैंने पानी की बोतल उसके ऊपर फेंकने का दुस्साहसी विचार किया, लेकिन उस विचार को कुछ सोचकर अमल में नहीं लाया और जोर-जोर से कंबल खींचने की प्रक्रिया ही जारी रखी। पर वो इंसान शायद कुम्भकर्ण की पीढ़ी से था, सो उसे कुछ भी असर न हुआ और उसके घनघोर खर्राटे लगातार चालू रहे। मैंने अनुभव किया कि वो शायद कोई बुज़ुर्ग आदमी है, जो अधिक थकान होने के कारण खर्राटे युक्त होकर सो रहा था। मैं दुःखी हो करवट बदलते हुए सोच रहा था कि जाने किस मनहूस घड़ी में दुगुना दाम चुकाकर उस कथित सुविधासंपन्न ऊँचाहार एक्सप्रेस का तत्काल टिकट लेने की महान भूल की थी। मैं लेटे-लेटे ट्विटर पर ट्वीट क्रिया करते हुये प्रार्थना करने लगा कि हे प्रभु इस खर्राटेवाले दैत्य को कुछ देर के लिए कुम्भकर्णी मुद्रा से निकाल बाहर करो ताकि निंद्रा मेरे नैनों में एंट्री मार सके। फिर अचानक मुझे याद आया कि प्रभु तो इस्तीफा दे चुके थे सो मैंने उनके उत्तराधिकारी का स्मरण करना आरंभ कर दिया। जाने वो प्रार्थना का प्रभाव था या फिर मेरे कंबल खींचने का फल जो उसके खर्राटे अचानक बंद हो गये। मैंने इस मौके का फायदा उठाया और झट से नींद के आगोश में खो गया। एक-दो घंटे की नींद  खींचने के बाद किसी बच्चे की आवाज से मेरी आँख खुल गई। आँख खुलते ही सामने की सीट पर खर्राटे लेकर नींद का सत्यानाश करनेवाले इंसान को देखने का सौभाग्य हासिल किया। ये एक महिला थी जो अपने बतोले बेटे के ढेर सारे जवाब देने में मस्त थी। मैं मन ही मन उसकी खर्राटा शक्ति को नमन करते हुये शुक्र मनाने लगा कि अच्छा हुआ जो रात को मैंने उस महिला के ऊपर बोतल फैंककर नहीं मारी वर्ना आई.पी.सी. की छेड़छाड़ की धारा 354 मुझसे गले मिल रही होती।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार


गुरुवार, 23 नवंबर 2017

हास्य व्यंग्य : गोल्डन फीलिंगवाले सम्राट


    जबसे उन्होंने आलू से सोना बनाने की मशीन के बारे में घोषणा की है, तबसे आलू ने और अधिक भाव खाना शुरू कर दिया है। वैसे तो आलू पहले से ही सब्जियों का राजा था, लेकिन उसके भीतर हर सब्जी के साथ मिल-जुलकर पकने की भावना ने ही उसे सब्जियों का राजा बनाया था। एक तरह से वह खास होते हुये भी आम सब्जी की तरह व्यवहार करता था। पर जबसे आलू को सोने में परिवर्तित करनेवाली मशीन की खबर मीडिया में वायरल हुई है, तबसे ही आलू के मन में गोल्डन फीलिंग होने लगी है और वो खुद को सब्जियों के राजा से भी बढ़कर समझने लगा है। अपनी इस गोल्डन फीलिंग के कारण वो सब्जियों के साथ गठबंधन समाप्त कर एकांत प्रेमी हो गया है। आलू का जिगरी दोस्त समोसा भी आलू से जुदाई का दुःख झेल रहा है। समोसे में आलू की उपस्थिति तक खुद भी सत्ता से चिपके रहने का दावा करनेवाले भी आलू की ओर अपने जलते हुये नेत्रों से देख रहे हैं पर आलू इन सब बातों से बेपरवाह हो अपनी ही मस्ती में खोया हुआ है। अब वो भारतीय रसोई में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष की दोहरी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। जैसे किसी कार्यक्रम में वक्ता माइक पकड़कर सर्वप्रथम भीतरी मन से कोसते हुये और ऊपरी मन से मुख्य अतिथि और अध्यक्ष के सम्मान में कसीदे पढ़ने के बाद अपने वक्तव्य को आरंभ करता है, ठीक वैसे ही हरेक सब्जी पकने से पहले गोल्डन फीलिंगवाले सम्राट आलू को प्रणाम करती है।
इतना सब होने के बावजूद भी मैं आलू को आलू जितना ही महत्व देता हूँ। इस बात से आलू के मन को भारी ठेस पहुँचती है। उदास आलू को देखकर मैं मंद-मंद मुस्कुराता हूँ और अपनी प्राणों से प्यारी पत्नी से  बड़े ही प्यार से कहता हूँ, " प्रिये आज तुम्हें जो भी चाहिये उसे माँग लो।" पत्नी एक पल को शरमा जाती है और फिर दूसरे ही पल मुस्कुराकर अपनी डिमांड प्रस्तुत करती है, " मेरे लिये केवल एक बोरा आलू मँगवा दीजिये।" मैं हैरान होकर एक पल  को अपनी पत्नी को देखता और दूसरे ही पल में आलू पर निगाह डालता हूँ। अब मुझे देखकर आलू खिलखिलाता है और अपनी आँखें मींचकर आलू से सोना निर्मित करनेवाली मशीन का अविष्कार करनेवाले महान वैज्ञानिक को श्रद्धापूर्वक मन ही मन नमन करने लगता है।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


कार्टून गूगल से साभार

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : युवराज का सपना


कई दशकों तक देश की कथित रूप से सेवा करने का दम भरनेवाले राजनैतिक दल के लाड़ले युवराज ने विदेशी धरती से देश में 2019 ईसवी में होनेवाले लोकसभा चुनावों का बिगुल अभी से फूँक दिया है। ये निर्णय उन्होंने बहुत सोच-समझकर लिया है। भारतीय धरती से उन्होंने बहुत प्रयास कर लिया, लेकिन सफलता ने उनके पास फटकना भी मंजूर नहीं किया है। क्या-क्या नहीं किया उन्होंने। अपने लाव-लश्कर के संग दलित के घर में आधी रात को जा धमके और वहाँ बाकायदा मीडिया की मौजूदगी में दलित के हाथों से अपना भोग लगवाया। भोग लगवाने के उपरांत अपनी सहृदयता के गीत गाकर उस दलित परिवार को सपनों का झुनझुना पकड़ाया और वहाँ से रफूचक्कर हो लिए। वो बेचारा दलित परिवार अभी भी सपनों में खोकर झुनझुना बजा रहा है और युवराज सपनों के सौदागर बनकर इत-उत डोलने में मस्त हैं। युवराज ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खाट पंचायत का बड़े स्तर पर आयोजन किया। ये आयोजन इतने बड़े स्तर का था, कि आसपास के गाँववालों की अपने-अपने घरों के लिए टूटी खाटों की जगह नई खाटों को लाने की समस्या चुटकियों में हल हो गई। वे सब खाट पंचायत से नई और मजबूत खाटें लूटकर ले गए और अब उन खाटों पर बैठकर हुक्का फूँकते हुए खाट पंचायत की जोर शोर से ठहाका लगाते हुए चर्चा करते रहते हैं। वहाँ वो सभी खाट पर बैठे-बैठे हुक्का फूँकते हैं और यहाँ कलेजा फुंकता है युवराज का। युवराज इस कृत्य के लिए विरोधियों को जिम्मेवार ठहरा उन्हें पानी पी-पीकर कोसते हुए गरियाते रहते हैं। युवराज ने समय-समय पर अपने कुर्ते की बाजुएँ ऊपर चढ़ाकर सत्ता को सीधी चुनौती भी दी है। वो और उनके दलीय चमचे आए दिन सुंदर और सुशील गालियों से सत्ता पक्ष को सुशोभित करते हुए अपने विपक्षी होने का हक अदा करते रहते हैं। चाहे महागठबंधन की रैलियाँ हों या ‘देश के टुकड़े होंगे हजार’ जैसे नारे लगानेवाले कथित देशप्रेमियों का प्रदर्शन हो या फिर खुद ही दंगा करके खुद ही को पीड़ित दर्शानेवाले शांतिप्रिय समुदाय की विरोध सभा हो युवराज हर जगह पूरी तत्परता से और सबसे पहले उपस्थित मिलते हैं। पर उनकी इस योग्यता से बैर रखनेवाले उन्हें सत्तापक्ष का एजेंट करार देते हैं और उनपर आरोप मढ़ते रहते हैं, कि सत्ता पक्ष के इशारों पर काम करते हुए वो अपनी देश के सबसे ईमानदार राजनैतिक दल की नैया डुबोने में लगे हुए हैं। ऐसे वचन सुनकर युवराज का चेहरा गुस्से के मारे तिलमिला उठता है और उनकी बाजुएँ फडकने लगती हैं। वो क्रोध में अपने कुर्ते की बाजुओं को ऊपर चढ़ाते हैं और वंशवाद के रथ पर सवार हो अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर भोंथरे बाण से लोकसभा चुनाव-2019 रुपी मछली पर निशाना साधने को तैयार होते हैं, कि तभी कोई उनकी कमर पर गदे से जोरदार प्रहार करता है और युवराज उस अप्रत्याशित आक्रमण से घायल हो रथ से नीचे गिर जाते हैं। अचानक उनकी आँख खुल जाती है और वो खुद को औंधे मुँह बिस्तर से जमीन पर गिरा हुआ पाते हैं। वो अपना सिर उठाकर सामने देखते हैं तो सामने राजमाता दुखी और उदास होकर खड़ी हो अपना माथा पीट रही होती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

व्यंग्य : असहिष्णु देश के दीवाने लोग


    पना भारत देश बहुत ही असहिष्णु देश है। ये इतना असहिष्णु देश है कि आए दिन इस देश में असहिष्णुता से परेशान बेचारों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना पड़ता है, कि ये देश कितना अधिक असहिष्णु है। इस देश के बहुसंख्यक असहिष्णु समुदाय के सहारे अपना सफल फिल्मी कैरियर बनानेवाले अभिनेता को सालों बाद अचानक ये अहसास होता है कि ये देश तो बड़ा असहिष्णु है। वो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ये घोषित करते हैं कि इस देश में इतनी ज्यादा असहिष्णुता बढ़ चुकी है कि यहाँ रहने में उन्हें और उनकी बीबी को बहुत डर लगने लगा है। हालाँकि इतना ज्यादा डरा हुआ होने के बावजूद भी वो इस असहिष्णु देश को छोड़कर कहीं और बसने का विचार भी नहीं करते। हमारे देश के असहिष्णु जीवों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है और वे उन अभिनेता को फिल्मी दंगल में पटखनी देने के बजाय जीत दिलवाकर अपने असहिष्णु होने का ठोस सबूत देते हैं। अभिनेता के शुभचिंतक भी अवसर का लाभ उठाते हुए असहिष्णुता का विरोध करते हुए अपने धूल जम चुके पुरस्कारों और सम्मानों को लगे हाथों लौटाकर विरोध के साथ-साथ अपने आपको गुमनामी से निकालने का प्रयास कर एक तीर से दो शिकार कर डालते हैं और वो भी इस देश को छोड़ने की बजाय इसकी छाती पर ही मूँग दलते  रहते हैं।
बीते दिनों कई साल संविधान के उच्च पद पर बैठकर मलाई खाने के बाद एक बेचारे जाते-जाते असहिष्णुता का रोना रो गए और देश में असहिष्णुता का भोंपू फिर से बजने लगा। वो इतने सालों तक मलाई खाते रहें, लेकिन इस दौरान उन्हें असहिष्णुता के बिल्कुल भी दर्शन नहीं हुए, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उनका मलाई खाना अब बंद होनेवाला है, उन्होंने असहिष्णुता का शिगूफा छोड़ दिया और जाते-जाते इस असहिष्णु देश में इतनी इज्जत कमा गए कि अब उन्हें लोगों को अपना मुँह दिखाने में भी सोच-विचार करना पड़ रहा है। बहरहाल अपने देश के इतने असहिष्णु होने के बावजूद भी आए दिन कोई न कोई  मुँह उठाए इसमें बसने के लिए चला आता है। ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से चल रहा है। बाहर से यहाँ आ धमकने के बाद लोग यहीं डेरा डाल लेते हैं और जब लगता है कि इनका डेरा उखड़ने का खतरा नहीं रहा तो फिर ये असहिष्णुता का राग अलापने लगते हैं। अपना देश कोई देश न होकर धर्मशाला का प्रमाणपत्र पानेवाला है। पहले ही यहाँ नेपालियों और बांग्लादेशियों ने डेरा जमाकर उत्पात मचा रखा है और अब रोहिंग्या भी अपना रोना रोते हुए बोरिया-बिस्तर लादकर आ धमक रहे हैं। उन्हें कोई ये क्यों नहीं बताता कि उन्हें ऐसे असहिष्णु देश में न बसकर बांग्लादेश, पाकिस्तान या फिर अरब के किसी सहिष्णु देश में जाकर पनाह मांगनी चाहिए। पर ये बात शायद उन्हें समझ में नहीं आनेवाली। हमारे असहिष्णु देश के दीवानों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी लगता है कि आने समय में देश के इन बाहरी दीवानों के आगे के हम असहिष्णु बहुसंख्यकों की संख्या लुप्तप्राय न हो जाए।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : ढीले लंगोटवाले बाबा


“महाराज आप कौन हैं?”
“हम बाबा हैं।“
“कौन से बाबा?”
“हम कलियुग के बाबा हैं।“
“आप करते क्या हैं?”
“हम लोगों के दुःख और परेशानी दूर करते हैं।“
“क्या वास्तव में आप लोगों के दुःख व परेशानी दूर करते हैं?”
“अब अगर शक हैं तो हमारे भक्तों से जाकर पूछ लो। हम क्या बताएँ।“
“आपके भक्त इस देश की जनता के ही अंग हैं और क्या आपको लगता है कि जनता वाकई में कुछ बताने लायक है। फिर उससे पूछने से फायदा क्या? वैसे आप ही क्यों नहीं बता देते?”
“देखो बालक भक्तों के दुःख और परेशानी दूर हुए हों या न भी हुए हों लेकिन वे सब इस बात में यकीन करते हैं कि इनका खात्मा एक न एक दिन अवश्य होगा। ये आस ही उनमें ऊर्जा का संचार करती है और वे आनंद व प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं।“
“और एक दिन इसी आस में भक्तों का राम नाम सत्य हो जाएगा लेकिन शायद उनके कष्ट दूर नहीं हो पाएँगे।“
“बालक ऐसी निराशावादी सोच से उबरो।“
“निराशावादी सोच नहीं बल्कि हकीक़त है। आप झूठे संसार में अपने भक्तों को रखकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं।“
“बालक हम खिलवाड़ नहीं बल्कि हमारे और हमारे भक्तों के जीने का जुगाड़ कर रहे हैं।“
“वो भला कैसे?”
“बालक इस संसार में इतने कष्ट हैं कि किसी भी व्यक्ति का जीना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए हम अपने भक्तों को इस संसार से दूर स्वप्नों के संसार में जीने का तरीका सिखाते हैं।“
“हाँ और इसके बदले आपके मूर्ख भक्त आपकी झोली भरके आपको मालामाल कर देते हैं।“
“बालक ये तुम गलत कह रहे हो।“
“तो फिर सही बात क्या है?”
“सही बात ये है कि हम बाबा होने का फर्ज निभाते हुए अपने भक्तों को मोहमाया के बंधन से मुक्त करते हैं।“
“और अपनी मोहमाया के जाल में अपने भक्तों को क़ैद कर लेते हैं। बाबा वैसे आप किस धर्म के हैं?”
“बालक कार्ल मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम है और हम किसी भी नशे के खिलाफ हैं इसलिए हम किसी भी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वैसे तुम हमारा पंथ, संप्रदाय अथवा धर्म बाबागीरी ही मान सकते हो।“
“मतलब आप अफीम की बजाय भक्तों को बाबागीरी नाम की चरस पिला रहे हैं।“
“बालक हम भक्तों को चरस नहीं बल्कि प्रेमरस पिला रहे हैं, जिससे विश्व में बंधुत्व की भावना का विकास हो सके।“
“खैर छोड़िए आप ये बताइए कि आपका असली नाम क्या है?”
“बालक सच कहें तो हमें हमारा असली नाम याद ही नहीं रहा है। अब तो हमें लंगोटवाले बाबा के नाम से ही जाना जाता है।“
“अच्छा बाबा एक बात और बताएँ।“
“अब बाकी बातें फिर कभी करेंगे फ़िलहाल हम अपने भक्तों को आशीर्वाद देने जा रहे हैं।“
यह कह बाबा बहुत ही अधीर हो कुछ समय पहले ही वहाँ पधारीं महिला भक्तों की ओर चलने को हुए। उनकी ऐसी हालत देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “बाबा आपने तो अपना नाम लंगोटवाले बाबा बताया था पर आप तो लंगोट के ढीले लगते हैं।”
बाबा आँख मारके मुस्कुराते हुए बोले, “बालक नाम तो हमारा ढीले लंगोटवाले बाबा ही है, लेकिन बोलने में ढीले शब्द साइलेंट हो जाता है।”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
* कार्टून गूगल से साभार 

बुधवार, 30 अगस्त 2017

हास्य व्यंग्य : मुल्ला जी और शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी


मुल्ला जी अपना सिर पकड़े बैठे हुए थे। उनके दिमाग में बार-बार ‘तलाक़ तलाक़ तलाक़’ की तेज आवाज गूँज रही थी। जब उनसे बर्दाश्त न हुआ तो अपने दोनों हाथों को आसमान की ओर उठाकर चीखते हुए बोले, “या अल्लाह अब हमारे क़ौमी मसले का फैसला ये मुआँ कोर्ट करेगा। जो पाक काम 1400 साल से होता चला रहा था उसपर कोर्ट का यूँ कानून हथौड़ा चला देना कहाँ का इंसाफ है?” “सही कह रह रहे हो भाई जान! ये सुप्रीम कोर्ट की सरासर नाइंसाफी है।” मुल्ला जी ने अपनी दाढ़ी को खुजाते हुए सामने नज़र डाली तो देखा कि उनके सामने उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी खड़े हुए थे। लल्ला जी दूसरे मजहब के होने के कारण मुल्ला जी की नज़रों में हमेशा काफ़िर ही रहे लेकिन काफ़िर होकर वो भी उनके हर सुख-दुःख में हमेशा संग रहे। चाहे तलाक़ का मसला हो या हलाला हो या फिर मुताह का मामला हो काफ़िर लल्ला जी ने हर बात में मुल्ला जी और उनकी क़ौम का दिलोजान से समर्थन किया। असल में काफ़िर लल्ला जी अपने दल के प्रति बड़े वफादार हैं और उनका दल मुल्ला जी और उनकी क़ौम के सहारे ही देश की सत्ता सुख भोगता रहा है। अपने दल की कृपा से लल्ला जी भी जीवन के सारे सुख और आराम लेते हुए जीने का मजा लेते रहे हैं। काफ़िर लल्ला जी को सामने देख मुल्ला जी एक पल को खुश होते हैं और अचानक ही दुःख के मारे माँ-बहिन की गालियों की खेप निकलना शुरू कर देते हैं। काफ़िर लल्ला जी समझ जाते हैं कि मुल्ला जी इतनी मनमोहक गालियाँ किसको समर्पित कर रहे हैं। वो उनके पास आते हैं और उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर उन्हें सांत्वना देते हुए समझाते हैं कि जो भी हुआ बहुत गलत हुआ तथा उन्हें सुझाव देते कि इस गलत फैसले के खिलाफ पूरी क़ौम को अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। मुल्ला जी को काफ़िर लल्ला जी की बातें सुनकर अचानक जोश आ जाता है और उनका खून गुस्से के मारे उबाल मारने लगता है। वो बुलंद आवाज में ‘हमारी क़ौम हमारा कानून’ का नारा लगाते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी उनका साथ देते हैं तथा इस गलत फैसले का समर्थन देने के लिए अपने धर्मवालों का मजाक उड़ाते हैं और उनपर कटाक्ष से भरे हुए अनेकों जुमले उछालते हैं। उधर मुल्ला जी की अम्मी और बहिनें उन्हें समझाती हैं कि इस फैसले से उनके परिवार और क़ौम की औरतों का भी भला होगा और उनकी जिंदगी नर्क नहीं बन पाएगी। मुल्ला जी ये सुनकर अपनी टोपी उतारकर अपने सिर पर हाथ फेरते हुए गहरी सोच में डूब जाते हैं। सोचते-सोचते वो एक पल को बुर्के के भीतर मुँह छिपाए हँस रहीं अपनी बेगम को झल्लाहट में देखते हैं और दूसरे ही पल पड़ोस में रहनेवाली हुश्न में हूर को भी मात देनेवाली रेशमा को हसरत भरी निगाहों से देखते हुए ठंडी-ठंडी आहें भरने लगते हैं। रेशमा के लिए लार टपकाते मुल्ला जी को उनके मोहल्ले में रहनेवाले उनकी क़ौमवाले समझदार लोग भी उन्हें कोर्ट के फैसले के फायदे गिनाने लगते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी भी बहती हवा का रुख भाँपकर और अपने-आपको एकदम से उसके अनुसार ढालकर मुल्ला जी को कोर्ट के फैसले के उजले पक्ष के बारे में विस्तार से बताने लगते हैं। ये देख मुल्ला जी अपने मुँह में भरी पान की पीक एक ओर थूकते हैं और अपना सिर खुजाते हुए काफ़िर लल्ला जी को घूरकर देखते हुए सोचने लगते हैं, “ये साला लल्ला जी हमारा शुभचिंतक है या फिर खुदचिंतक?”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

व्यंग्य : जीना इसी को कहते हैं

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?
भाई सारी जमा पूंजी लगाकर एक धंधा शुरू किया था पर वो जमा नहीं। सारा पैसा डूब गया। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।
तो इसमें इतना निराश क्यों होता हैथोड़ी कोशिश और मेहनत कर सब ठीक हो जाएगा।
भाई अगर तू मेरी जगह होता तो अब तक किसी पेड़ पर लटक चुका होता 
- भाई इतना भी सिरफिरा नहीं हूँ, जो पेड़ पर लटककर अपनी कीमती जान दे दूँ और न ही मैं उन लोगों जितना महान नहीं हूँ, जो आए दिन जरा सी परेशानी या मुसीबत आनेपर इस अनमोल जीवन का राम नाम सत्य कर डालते हैं। मेरा मानना है कि कई योनियों के बाद नसीब हुआ ये मानव जीवन यूँ एक पल में गँवाने के लिए नहीं है जब तक कि इसके पीछे कोई नेक उद्देश्य न हो।
- नफे तू भी कहाँ मेरे और मेरे जैसे लोगों के दुखों को सुन भावुक हो उठा। खैर तू मेरी छोड़ अपनी सुना। आज तेरे चेहरे पर बड़ी रौनक लग रही है। कहाँ से आ रहा है?
भाई आज इंडिया गेट की सैर करके आ रहा हूँ।
अरे वाह तो क्या-क्या देखा वहाँ?
वहाँ अंग्रेजों की सेवा करते हुए प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्धों में मारे गए 90,000 अंग्रेज भक्त भारतीय सैनिकों की याद में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया युद्ध स्मारक रुपी इंडिया गेट देखाइसकी मेहराब के नीचे स्थित आजादी के बाद स्थापित की गई अमर जवान ज्योति को सादर नमन कियाइंडिया गेट के इर्द-गिर्द घूमते हुए पानी पूरी खायी और जिले सिंह से मुलाकात की।
अरे भाई मैं वहाँ कहाँ मिल गया जबकि मैं तो कल दुखी हो अपना सिर पकड़े हुए घर पर ही पड़ा रहा।
भाई वो जिले सिंह कोई और था। हमें देखते ही पुकारकर अपने पास बुला लिया। गुब्बारे बेच रहा था। अब से कुछ साल पहले नाई का काम करता था। दिल्ली के एंड्रूज गंज इलाके में मालिक सनी की दुकान में जिले सिंह नौकर नहीं बल्कि मालिक की तरह काम करता था। बहुत ही हाजिर जवाब था। अपने ग्राहक के बालों को काटते हुए उनका खूब मनोरंजन करता रहता था और साथ ही साथ अपने मालिक सनी की खिंचाई भी करता रहता था।
फिर वो गुब्बारे क्यों बेचने लगा?
उसके मालिक को रोज शराब पीने की बुरी आदत थी। जिले ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं माना। सनी भी उन भले लोगों में से एक था जो नेक सलाह को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। और एक दिन वो भी आया जब शराबखोरी ने सनी का एक्सीडेंट करवा दिया और सनी अपने परिवारअपनी दुकान और जिले सिंह को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।
- ओहो ये तो बहुत दुखद हुआ। अच्छा फिर जिले का क्या हुआ?
- जिले अच्छा कारीगर था पर उसे कहीं काम नहीं मिला।
- क्यों भई अच्छे कारीगर को तो काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
- भाई जिले सिंह खरी बात कहनेवाला खरा इंसान ठहरा और आज के जमाने में खरी-खरी कहनेवालों को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता। और फिर उसकी उम्र और बालों में आ रही सफेदी भी उसके काम मिलने के आड़े आ गयी।
और वो बेचारा इंडिया गेट पर गुब्बारे बेचने लगा।
हाँ पर वो निराश नहीं था। उसके भीतर जिंदगी को जीने का जज्बा दिखाई दे रहा था। वो और लोगों की तरह निराशा से अपना जीवन बर्बाद करने की बजाय मेहनत करके अपने और अपने परिवार की गुजर-बसर करने के लिए प्रयासरत है और कुला मिलाकर खुश है। वैसे दोस्त एक बात कहूँ जीना इसी को कहते हैं।
बात तो तू ठीक कह रहा है भाई। उस जिले सिंह ने इस जिले सिंह को सबक दिया है। जिले सिंह को ये तेरा दोस्त अपनी प्रेरणा बनाएगा और जिंदगी को पूरी हिम्मत से लड़ते हुए जिएगा।
अब आया न लाइन पर।
हाँ भाई बेशक देर से आया पर दुरुस्त आया।  है कि नहीं?
बिलकुल भाई!

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

व्यंग्य : मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं


   कूंचे, गलियां और मोहल्ले फिर से गुलज़ार होने लगे हैं। वो फिर से टोली बनाकर दरवाजे-दरवाजे जाकर अपनी हाजिरी दर्ज करवा रहे हैं। पाँच साल पहले चोट खाए हुए लोग नज़रें उठाकर खोज रहें हैं कि शायद कोई जाना-पहचाना चेहरा मिल जाए तो उसे कुछ पलों के लिए गरियाकर अपने दिल की भड़ास निकाल लें। पर उन्हें जाना-पहचाना कोई चेहरा नहीं दिखता बल्कि उन्हें दीखता है एक बिलकुल ताज़ा-तरीन चेहरा जो न तोड़नेवाले अनेकों वादे अपने संग लिए हुए नमस्कार मुद्रा में सामने खड़ा हुआ है। पहली बार तो नज़र उठाकर उसे एक पल को देखा तो वो चेहरा अनजाना सा लगा था लेकिन फिर गौर से देखने पर उनकी सूरत कुछ जानी-पहचानी सी लगने लगती है। अचानक याद आता है कि ये सूरत तो उनसे मिलती-जुलती है जिन्होंने पाँच साल पहले इसी प्रकार अपने दिव्य दर्शन दिए थे और उसके बाद ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। पाँच सालों तक उन्होंने ‘उल्लू बनाओ अभियान’ को सुचारू रूप से चलाया। इस बार जब उन्हें इस अभियान की कमान नहीं सौंपी गई तो वे अपने भतीजेभांजे या फिर कुछ दूर के रिश्तेदार के माध्यम से इस अभियान को सुचारू रूप से चालू रखने के लिए लोगों के बीच फिर से मौजूद हैं। ‘उल्लू बनाओ अभियान’ का वर्तमान प्रतिनिधि और उनके सगे-संबंधी काफी जुझारू हैं। ये उनका जुझारूपन ही जो इतने सिर-फुटव्वल के बाद भी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का जुगाड़ कर लिया । हम उन्हें सम्मानपूर्वक ‘जुगाड़ी’ शब्द से भी सुशोभित कर सकते हैं। वो लुटे-पिटे जनों की चरण वंदना कर उनको देव होने की फिर से अनुभूति कराते हैं और इस अनुभूति के बदले में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रखते हैं। जब उन्हें लगता है कि इस बार देव हठ करने पर उतारू हैं तो वो उनके समक्ष सुरा सहित विभिन्न मनभावन उपहार चढ़ावे के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इतना सब पाकर देव एकदम से खिल उठते हैं। वो आशा और विश्वास के साथ मुस्कुराते हैं। उनके संग कूंचों, गली-मोहल्लों और नाले-नालियों के इर्द-गिर्द सड़ांध मारता हुआ कूड़ा-करकट भी मुस्कुराता है। मच्छर और मक्खियाँ झूमते हुए नृत्य करते हैं। बीमारियाँ उम्मीद भरी निगाहों संग अंगड़ाई लेते हुए मुस्कुराती हैं। आस-पास का वातावरण भी गंधाते हुए मुस्कुराता है। तभी बिजली कड़कती है और आसमान से लखनवी अंदाज में आवाज गूँजती है 'मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं।" 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

व्यंग्य : रोमियो तुम कब आओगे




     जकल बहुत परेशान हैं वो और काफी नाराज भी। वो चिंता में डूबकर विचार कर रहे हैं कि आखिर क्यों उन्हें शिकार बनाकर उन पर शिकंजा कसा रहा है। अभी तक तो कितने निश्चिन्त थे वे सब। न कोई रोक-टोक थी और न ही कोई बंधन था। बस उनकी मनमर्जी चलती थी। प्यार के नाम पर एक तो अय्याशी करने का मौका मिलता था ऊपर से ये सब करने के बदले जन्नत का दरवाजा खुलने का वादा भी। इस नेक काम में उन्हें बड़े-बड़ों का पूरा समर्थन और संरक्षण भी प्राप्त था। जिंदगी कितने मजे से बीत रही थी और अचानक यूँ मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उन्हें रोमियो बता उनके खिलाफ बाकायदा अभियान चलाकर उनके प्रेम के धंधे को दफ़न करने की गहरी साजिश रची गयी। इस बार उनके आकाओं की चिल्ल-पौं भी कुछ काम न आ सकी। उनके शुभचिंतक चीखते रहे, चिल्लाते रहे और वो रोमियो को अपने  जाल में फँसाते रहे। वैसे तो ये लोग पश्चिमी संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं, पर अभियान चलाया तो पश्चिम के प्रेमी रोमियो के नाम पर। क्या मजनू और राँझे के प्यार में कोई कमी थी? क्या उन्होंने प्यार की खातिर क़ुरबानी नहीं दी थी? कम से कम मजनू और राँझे के नाम पर अभियान चलता तो उन पर सांप्रदायिक होने का दोष तो मढ़ा जा सकता था। पर नहीं उनके आदर्श तो पश्चिमवाले जो ठहरे। ये सोचते हुए वो अपने माथे पर चन्दन का तिलक लगाते हैं, अपने हाथों में पवित्र कलावा बाँधते हैं, हिन्दू देवी-देवताओं के लॉकेट गले में टाँगते हैं और पूरी तैयारी के साथ मँहगे कपड़े पहनकर अपनी फंडेड चमचमाती बाइक पर किक मारकर अपने इश्क़ मिशन पर रवाना हो जाते हैं। ये देखकर रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू, हीर-राँझा प्रेम में क़ुर्बान हुए बाकी प्रेमी-प्रेमिकाओं संग मुस्कुराते हैं। पर उनकी मुस्कराहट में दुःख भरी उदासी है। वो आधुनिक रोमियो को धिक्कार रहे हैं। पर आधुनिक रोमियो इन सब बातों से बेपरवाह हैं। उन्हें तो बस उनके प्यार में फँसी हुईं मुर्गियाँ दिखाई दे रही हैं जिनको हलाल करना ही उनका मकसद है। उनका इंतज़ार उनके मकड़जाल  में फँसी हुईं अकलमंद आधुनिक जुलियटें पलकें बिछाकर कर रही हैं। उनके संग-संग अपने-अपने लट्ठ को तेल पिलाकर तैयार कर रोमियो की राह तकते हुए एंटी रोमियो स्क्वैड के सभी जवान बार-बार एक ही सवाल कर रहे हैं 'रोमियो! तुम कब आओगे?"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 18 मार्च 2017

व्यंग्य : इन दिनों


    न दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही उसके द्वारा कर्मठता से किए गए कार्यों से पूरे विश्व में देश की चर्चा हुई। उन विशेष कार्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो इसके द्वारा अल्पसंख्यकों पर इतनी कृपा की गयी कि वो वोट बैंक बनने से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पाए। इस वोट बैंक के सहारे उसने खूब मजे काटे पर इन दिनों इस परंपरागत वोट बैंक ने भी इसका बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के संसाधनों का सदुपयोग करते हुए घोटालों की जमकर खेती की गयी और फसल से जो आय हुई उसे स्विस बैंक के चरणों में अर्पित कर दिया गया। देश के विकास का नारा देते-देते अपने परिवार की वंशबेल में पानी देकर पोषित किया जाता रहा। पर वो कहते हैं न कि किसी भी बात की होती है तो हद पार हुई और उसी वंशबेल से एक अनुपयोगी पौधा उपज गया जिसने अपने पुरखों के परिश्रम का राम नाम सत्य कर डाला। उस पौधे की संगत में आकर कुछ नए पौधे, जो जोश में आकर खुद को वटवृक्ष समझकर उछल रहे थे, वो भी अपना तिया-पाँचा करवा बैठे। अब क्या करें इन दिनों देश में ऐसी आंधी चल रही है जो देश के लिए अनुपयोगी पौधों व वृक्षों को जड़ से हिलाकर अपनी अंतिम साँसे गिनते हुए अपना शेष जीवन बिताने को विवश किए हुए है। इस आँधी ने सिर्फ राजनीति की वंशबेल को ही बेजान नहीं किया, बल्कि इसके परमप्रिय समर्थकों, जिन्हें लोग भूलवश चमचा समझ लेते हैं, का भविष्य भी दाँव पर लगा दिया। बीते दिनों इन परमप्रिय समर्थकों ने असहिष्णुता राग गाते हुए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया था ताकि इस माध्यम द्वारा ही उस आँधी को रोका जा सके और उनके पापी पेट पर लात न पड़े। पर आँधी इतनी बेरहम निकली कि उसकी रफ़्तार के आगे उन परमप्रिय समर्थकों की भी कुछ न चली। फलस्वरूप इन दिनों परमप्रिय समर्थक अपने भविष्य को अंधकारमय पाते हुए सुबकने को विवश हैं। ऐसे गर्म माहौल में भी एक ये सर्दी है जो जाने का नाम नहीं ले रही। लगता है कि सर्दी ने भी ये सोच रखा है कि ये इन दिनों आँधी के मारे उन बेचारों को सर्द-गर्म की सौगात देकर उनके अंजर-पंजर ढीले करते हुए ही रवाना होगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

व्यंग्य : चिट्ठी आई है



    चिट्ठी आई है। किसी के घर में नहीं बल्कि मीडिया में आई है। किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा के महानायक ने इसे लिखा है। इसलिए ये चिट्ठी स्वतः ही चिट्ठियों की महानायिका बन गई और मीडिया ने इसे हाथों-हाथ ले लिया। इसमें वास्तविक जीवन में नाना-दादा का डबल रोल कर रहे महानायक की भावनाओं का समंदर भरा हुआ है। एक जमाना था जब नाना और दादा के रूप में बुजुर्गों को नाती-पोते निष्ठा और आदर से सुनते थे पर अब इतना समय नाती-पोतों के पास है ही कहाँ जो वो अपने खूसट नाना या दादा की फालतू बातें सुन सकें। और यहाँ तो खुद नाना/दादा ही महाव्यस्त हैं। हालाँकि महानायक अपने अति व्यस्त समय में से कुछ पल निकालकर अपनी नातिन व पोती को बिना चिट्ठी लिखे भी जीवन के फलसफे समझा सकते थे, लेकिन वो महानायक जो ठहरे। सो कोई भी कार्य करेंगे भी तो महानायकीय अंदाज में। इसलिए उन्होंने चिट्ठी लिखकर समझाने का फैसला किया। पर उन्होंने चिट्ठी लिखकर सीधे नातिन और पोती को क्यों नहीं दी? कहीं उन्हें ये अंदेशा तो नहीं था कि वो दोनों चिट्ठी का हवाई जहाज बनाकर हवा-हवाई न कर दें। सोचिए ऐसा होने से महानायक के दिल को कितनी ठेस पहुँचती? इसीलिए शायद उन्होंने ये रिस्क नहीं उठाया। वैसे भी बड़े और चर्चित व्यक्ति कोई कार्य करें और दुनिया को पता न चले तो धिक्कार है उनके बड़े और चर्चित होने पर। जैसे घर की मुर्गी दाल बराबर होती है वैसे ही ऐसा भी हो सकता था कि ‘घर की चिट्ठी बेकार पर्ची बराबर’ जैसा कोई नया मुहावरा ईजाद हो जाता और चिट्ठी अपनी बेकद्री पर आँसू बहाती रहती। इसलिए शायद चिट्ठी ने ही अपने रचयिता के सम्मान में ये फैसला लिया हो कि नातिन या पोती के पास जाने से पहले दुनिया की सैर कर ली जाए और अपने रचयिता के महानायकीय सम्मान में थोड़ी और वृद्धि कर ली जाए। इधर चिट्ठी घुमक्कड़ बन मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर घूमने-फिरने में मस्त है और उधर बेचारी नातिन और पोती पलकें बिछाए चिट्ठी के आने की राह तक रही हैं। महानायक भी सोच रहे हैं कि चिट्ठी को तब तक व्यस्त रहने दो जब तक कि इसे दुनिया की हर नातिन और पोती न पढ़ ले। अपनी नातिन और पोती का क्या है उनके लिए कोई दूसरी चिट्ठी लिख दी जाएगी। पर क्या वास्तव में नातिन और पोती उस चिट्ठी को पढ़ना चाहेंगीं? फ़िलहाल तो यह एक यक्ष प्रश्न है।   

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

एक पत्र शहीद सिपाही आनंद सिंह के नाम



प्यारे भाई आनंद सिंह 
सादर दिवंगतस्ते!
बहुत ही दुखी और उदास मन से तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ कलम चलते-चलते अचानक रुक सी जाती है, लेकिन तुम जैसे बहादुर पुलिस के सिपाही को पत्र लिखने में ये कलम भी गौरव का अनुभव करते हुए रुक-रूककर एकदम से चल पड़ती है कुछ रोज पहले तुम अद्भुत शौर्य दिखाते हुए एक गरीब रेहड़ीवाली महिला को लुटने से बचाते हुए उन तीन बदमाशों से जाकर भिड़ गए और बदमाश की गोली खाकर भी तुमने तब तक उनका पीछा किया जब तक कि तुम निढाल होकर धरती पर गिर नहीं पड़े आसपास मौजूद कथित बहादुर जनता ने ये सब देखा, लेकिन उसकी कथित बहादुरी ने उसे उन बदमाशों को रोकने को प्रेरित नहीं किया, फलस्वरूप तुम्हें इस संसार को छोड़कर विदा होना पड़ा वैसे तुम तो इस बात को भली-भांति जानते और समझते थे कि देश का दिल कहे जानेवाले इस महानगर दिल्ली का माहौल कितना ख़राब हो रखा है और यहाँ लोगों के दिलों में दिल जैसी कोई चीज अब सलामत ही नहीं रही है ये तुम कैसे भूल गए कि यह महानगर अराजकता के शिकंजे में किस कदर जकड चुका है क्या तुम बीते दिनों की उन घटनाओं को भूल गए थे कि कैसे सरेआम जनता के वेश में छिपे अपराधियों द्वारा पुलिसकर्मियों को समय-समय पर सरेआम पीटा गया, जरा-जरा सी बात पर पुलिस थानों और चौकियों को घेरकर नारेबाजी और पत्थरबाजी करते हुए उन्हें जलाने तक कोशिश की गई और जाने कितने पुलिसकर्मियों को बिना गलती और बिना सुनवाई के जेल में ठूँस दिया गया कम से कम तुम्हें इतनी सावधानी तो बरतनी ही चाहिए थी कि अपने साथ सुरक्षा के लिए सरकारी पिस्तौल ही रखते पर फिर एक बार को ख्याल आता है कि सरकारी पिस्तौल को रखने का फायदा भी क्या होता? अगर तुम्हारी सरकारी पिस्तौल से कोई बदमाश मारा भी जाता तो जाने कितने संगठन तुम्हारे खिलाफ मोर्चा लेने को खड़े हो जाते तथा मानवाधिकार की दुहाई देते हुए तुम्हारे पुतले फूँक रहे होते और तुम्हें बिना समय गँवाए जेल में डाल दिया जाता समाचार चैनलों पर कथित बुद्धिजीवी तुम्हारे हाथों मारे गए अपराधी को संत घोषित करते हुए तुम्हें रावण या कंस का अवतार सिद्ध कर रहे होते और कलियुग के राजा हरीश चंद्र मारे गए अपराधी को शौर्य पदक देने की सिफारिश करते हुए उसके परिवार को गोद लेने की तैयारी में अब तक लग चुके होते पर चूँकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और किसी लुच्चे-बदमाश की बजाय एक पुलिस का जवान मारा गया इसलिए अख़बारों ने भी इस खबर को पहले पन्ने पर स्थान देने में भी शर्म महसूस की मानवाधिकार प्रेमी शांत हैं और किसी दानव के मारे जाने पर सक्रिय होने के लिए वचनबद्ध हैं तथा कथित बुद्धिजीवी अपनी बुद्धि को धार लगते हुए उचित अवसर की ताक में हैं कम से कम इस बात की संतुष्टि है कि तुम्हें शहीद का दर्जा है दिया गया है और तुम्हारे परिवार को नौकरी और एक करोड़ रुपए देने की घोषणा कर दी गई हैहालाँकि इन सबसे शायद ही तुम्हारी भरपाई हो सके अंत में हम सभी पुलिस के भाई-बंधु तुम्हारे परिवार संग तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए इस उम्मीद के साथ प्रार्थना करते हैं कि हृदयविहीन इस महानगर के हालात सुधरें और फिर कोई आनंद कुमार यूँ बेमौत न मारा जाए

तुम्हें अंतिम विदाई देते हुए वीरतामय नमस्कार

तुम्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देता हुआ

तुम्हारा एक विभागीय भाई     

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

व्यंग्य : देवी का अट्टहास



   देवी अत्यधिक क्रोध में हैं। अपने महल में चहल-कदमी करते हुए वो कुछ बुदबुदा रही हैं। ध्यान से सुनने पर ज्ञात होता है कि वो 'तिलकतराजू और तलवार/इनके मारो जूते चारनामक अपने साम्राज्य के पवित्र मन्त्र का बेचैनी से जाप कर रही हैं। उनके हाथ में टंगे भारी-भरकम बटुए में पाँच पैसेदस पैसेबीस पैसेचवन्नी व अठन्नी के रूप में उनके मातहत देवों ने उछल-कूद करते हुए आसमान सिर पर उठा रखा है। यह देख देवी एक पल को मुस्कुराती हैं और अगले पल फिर से उस पावन मन्त्र को जपना आरम्भ कर देती हैं।

अचानक देवी के बटुए से पाँच पैसे की तेज आवाज गूँजती है "पेश करो पेश करो अपनी बेटी करो।" पाँच पैसे का समर्थन उनके मातहत देवों का पूरा दल पूरे जोर-शोर से करता है। देवी गर्वित मुस्कान के साथ पाँच पैसे को देखती हैं और उसे शाबासी देती हैं। देवी की शाबासी पाकर पाँच पैसा आनंदित हो नृत्य करने लगता है और वह अपनी माँग को फिर से चीख-चीखकर उठाना आरम्भ कर देता है। पाँच पैसे के संग पूरा दल भी मस्ती में नाचते हुए गाने लगता है "पेश करो पेश करो अपनी बेटी करो।" गाने को सुनकर देवी भी आनंदित हो झूमने लगती हैं। यह देख एक चवन्नी अत्यधिक उत्साहित हो जीभ काटने के बदले 50 लाख का ईनाम घोषित कर डालती है। चवन्नी की घोषणा सुन एक पल को तो देवी अचंभित हो जाती हैं फिर अगले ही क्षण वो चवन्नी को उठाकर उसे प्यार से चूम लेती हैं। अब चवन्नी ख़ुशी के मारे झूमने लगती है। उसके साथ पूरा दल भी झूमना शुरू कर देता है।

उधर दूसरी ओरजिस बेटी को पेश करने की माँग करते हुए देवी और उनके मातहत देवों ने हल्ला मचा रखा थाउसकी माँ देवी से पूछती है कि उसकी बेटी को कैसे पेश किया जाएउसे दिग्विजयी कल्पना के अनुसार पेश किया जाए या फिर शरदीय चाहत के अनुसारउसे आज़मीय पसंद के अनुसार सजाकर प्रस्तुत किया जाए या लालुई स्वप्न के स्टाइल मेंइसके अलावा बेटी की माँ देवी से ये भी पूछती है कि उनके मातहत देवों से गलती से कोई गलती तो नहीं होगी?

बेटी की माँ के प्रश्नों को सुनकर देवी अट्टहास करने लगती हैं। उनके संग-संग उनके बटुए में चिल्लर के रूप में मौजूद उनके मातहत देव भी अट्टहास करना आरम्भ कर देते हैं। उनके अट्टहास के फलस्वरूप उनका महल अचानक जोर-जोर से हिलने लगता है। यह देख देवी और उनके मातहत देव घबरा जाते हैं। देवी को कुछ-कुछ आभास होने लगता है कि शायद उनके स्वनिर्मित दैवीय तिलिस्म के चकनाचूर होने का निश्चित समय आ गया है।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 17 जुलाई 2016

व्यंग्य : चाँद-सीढ़ी का खेल


   चाँदनी रात में आसमान में खिले चाँद को देखकर फुटपाथ पर फटी चादर पर लेटे हुए जिले ने नफे से कहा ,"भाई नफे देख दुनिया चाँद तक पहुँच गयी और एक हम हैं जो इस फुटपाथ से ऊपर न उठ सके।"

जिले के बगल में मैली-कुचैली चादर पर करवट बदलकर सोने की कोशिश करते हुए नफे ने जब यह बात सुनी तो मंद-मंद मुस्कुराने लगा।

यह देख जिले ने पूछा, "भाई तू मेरी बात पर कुछ कहने की बजाय मुस्कुरा क्यों रहा है?"

नफे बोला, "जिले तू जब भी देसी ठर्रा चढ़ाता है, तो अक्सर ये ही सवाल पूछता है और मैं तुझे वही जवाब देता हूँ जिसे तू हर बार भूल जाता है।"
जिले ने बिना चाँद से नज़र हटाए कहा, "भाई पूरे दिन की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद एक ये देसी ठर्रा ही तो एक सहारा बचता है वर्ना रात को जाने नींद आए भी कि नहीं। खैर तू मेरे सवाल का जवाब दे।"
नफे ने मुस्कुराते हुए बताया, "दुनिया चाँद पर नहीं पहुँची बल्कि दुनिया के कुछ चुनिंदा लोग चाँद पर पहुँचे हैं। वो भी इसलिए क्योंकि उन सबको चाँद तक पहुँचने की सीढ़ी मिली और उस सीढ़ी को पकड़कर सँभालनेवाले अपने कुछ लोग भी, जिन्होंने अपने लोगों के चढ़ते समय सीढ़ी को तब तक कसकर पकड़े रखा जब तक कि वो अपने मनमाफिक चाँद पर पहुँच नहीं गए। जब किसी और ने उस सीढ़ी के सहारे अपने मनमर्जी के चाँद पर चढ़कर पहुँचने का विचार किया तो या तो सीढ़ी को कहीं छुपा दिया गया या फिर उन बेचारों के आधी सीढ़ी तक पहुँचने पर सीढ़ी वापस खींच ली गयी और उनको बीच अधर में ही लटकने को छोड़ दिया गया।"
"भाई मैंने तो तेरे से सीधा सा सवाल पूछा था लेकिन तूने तो ऐसा जवाब दिया कि दिमाग घूमने लगा। लगता है तू आज जल्दी उतार देगा।" जिले अपना सिर सहलाते हुए बोला।
नफे हँस दिया, "भाई मैंने जवाब तो सीधा सा दिया है। दुनिया के कुछ गिने-चुने लोग चाँद-सीढ़ी का खेल खेलते हुए सीढ़ी चढ़कर अपने-अपने चाँद तक पहुँच गए और बाकी या तो जिंदगी की भाग-दौड़ में फँसे पड़े हैं या फिर इस चाँदनी रात में सड़क के किनारे के किसी फुटपाथ पर हम दोनों की तरह फटेहाल पड़े हैं।"
जिले उठकर घुटनों के बल बैठा और अपना माथा पीटते हुए बोला, "हे भगवान तूने दोस्त भी दिया तो कैसा दिया? साले को बिना पिए चढ़ गयी है और बहकी-बहकी बातें कर रहा है। यहाँ पूरे दिन रिक्शा खींचकर एक अदद ठर्रे का जुगाड़ कर कुछ पल के लिए शांति पाने की सोची थी वो भी इसकी सिर घुमाऊ बातों ने हासिल न करने दी।" 
नफे ने अपनी मैली-कुचैली चादर को समेटा और जिले से बोला, "ओ शांति के चाहनेवाले जिले अपना माथा बाद में पीट लियो, फ़िलहाल तो जल्दी से यहाँ से बिस्तर गोल कर ले वर्ना जिंदगी गोल होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा।"
"क्यों क्या बात हो गयी?" जिले ने सिर खुजाते हुए पूछा।
नफे ने सड़क की ओर इशारा करते हुए बोला, "स्पीड और रोमांच के शौक़ीन सड़कों पर उतर चुके हैं। न जाने कौन सी कार का दिल फुटपाथ पर आ जाए और हमारा राम नाम सत्य हो जाए।"
घबराकर जिले ने भी अपनी चादर समेटी और नफे के संग हो लिया, "भाई ये स्पीड और रोमांच के दीवाने आज इतने मस्ताने क्यों हो रखे हैं?"
नफे ने जिले के कंधे पर हाथ रखते हुए समझाया, "भाई ये लोग पवित्र काम को पूरा करने के लिए इतने मस्ताने हो रखे हैं।“

"भाई ऐसा कौन सा पवित्र काम है जो ये पूरा करना चाहते हैं?" जिले ने उबासी लेते हुए पूछा।

नफे ने एक पल को नींद से अपनी आँखें मलते हुए जिले को देखा फिर मुस्कुराते हुए बोला, "हम जैसे दुखियारों को बिना सीढ़ी के चाँद पर पहुँचाने का पवित्र काम।"

"फिर से चाँद और सीढ़ी! आज मैं तुझे भी बिना सीढ़ी के चाँद पर पहुँचाकर रहूँगा।" इतना कहकर जिले नफे के पीछे भागा।

नफे आगे-आगे और जिले उसके पीछे-पीछे भागा जा रहा था। आसमान में चाँद उन दोनों को देखकर मुस्कुराते हुए अगले पहर में छुपने की तैयारी कर रहा था। सूरज अंगड़ाई लेते हुए दुनिया को रौशन करने के लिए अपनी कमर कस रहा था। जिले और नफे के रिक्शे एक-दूसरे को मुस्कुराकर देखते हुए अपने-अपने सारथी की राह तकते हुए एक और दिन को जीते हुए जीवन संघर्ष की एक और नई सीढ़ी चढ़ने को तत्पर हो रहे थे।

कुछ क्षण ही बीते थे कि जिले-नफे आसमान में टहलते हुए दिखाई दिए। वे दोनों नीचे धरती पर अपने-अपने मृत शरीरों को पुलिस द्वारा शव वाहन में डाले जाने की क्रिया देख रहे थे।

"भाई नफे!" जिले उदासी से बोला।

नफे ने जिले के कंधे पर हाथ रखा और बोला, "हाँ बोल भाई जिले!"

"तेरी बात सच निकली। हम बिना सीढ़ी के ही यहाँ पहुँच गए। हमने बचने की कोशिश तो बहुत की लेकिन रफ़्तार और रोमांच के शौकीनों ने हमें दूसरे फुटपाथ पर भी नहीं छोड़ा। जरा सी आँख लगते ही उन्होंने हमें यहाँ पहुँचा दिया।" जिले ने एक पल को अपने मृत शरीर और फिर कुछ दूर पर विस्मित चाँद को देखते हुए कहा। 
नफे मुस्कुराया, "दुःखी मत हो बल्कि उन शौकीनों को धन्यवाद दे जिनकी कृपा से हमें सारी परेशानियों एवं दिक्कतों से एक पल में ही मुक्ति मिल गयी।"
"वो तो ठीक है भाई पर मुझे हम दोनों के रिक्शों की चिंता सता रही है। न जाने अब उनका क्या होगा?" जिले चिंता में डूबता हुआ बोला।
नफे ने समझाया, "उन्हें चलानेवाले और कोई जिले-नफे मिल जायेंगे।"
"और फिर किसी दिन वो भी हम दोनों की तरह किसी फुटपाथ से बिना सीढ़ी के सीधे चाँद पर आएँगे।" कहकर जिले ने ठहाका लगाया।
जिले के साथ नफे भी खिलखिलाकर हँसने लगा। जब चाँद ने यह देखा तो वह भी अपने पास आ रहे नए अतिथियों का स्वागत करते हुए खिलखिलाने लगा। 
कुछ क्षणों के पश्चात् नया दिन उग आया और उस नए दिन के साथ फिर से आरम्भ हो गया चाँद पर सीढ़ी लगा उसपर पहुँचने के लिए चाँद-सीढ़ी का खेल।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
* चित्र गूगल से साभार 
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