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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

चौथा पुतला



    स बार दशहरे के अवसर पर स्त्रियों से पीड़ित पुरुषों की इच्छा है कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के साथ रावण का स्त्री स्वरूप एक चौथा पुतला भी दहन के लिए खड़ा किया जाए। 

इस पुतले का दसवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसे उसके पति ने अपनी जमापूंजी खर्च करके खूब पढ़ाया-लिखाया हो और उसके बाद वह इस काबिल हो गई कि किसी सरकारी विभाग में अफसर चुनी गई हो और अफसर बनते ही अपने पति को लात मारकर किसी अफसर के साथ ही प्यार की पींगे बढ़ा रही हो।

इस पुतले का नौंवा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसका शादी से पहले ही किसी और पुरुष से पक्का वाला याराना चल रहा हो और मा-बाप के द्वारा विवशता में शादी करने के बाद जो अपने पति को पहाड़ों पर हनीमून मनाने के बहाने ले जाकर किसी ऊंचे पहाड़ से उसको धक्का देकर उसका राम नाम सत्य कर चुकी हो।

इस पुतले का आठवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने त्रिया चरित्र को नया आयाम देकर अपने पति को इतना अधिक परेशान कर उसका जीना मुश्किल कर चुकी हो, कि अंततः उसे वीडियो बनाकर अपनी दुःख भरी आपबीती बताने के बाद आत्महत्या करने के लिए विवश कर चुकी हो।

इस पुतले का सातवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो पतिव्रता का अभिनय करने में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की दावेदारी करे और पति के घर से बाहर होने पर पराए मर्दों संग प्रेम का नया अध्याय लिखे। या यूं कहें कि ऐसी स्त्री जो सबके सामने सती सावित्री बनने का ढोंग करे और अपने कर्मों से नगर वधुओं को मात दे।

इस पुतले का छठा सिर ऐसी स्त्री का हो जो यौन शोषण के झूठे आरोप लगा कर अधिक से अधिक पुरुषों के जीवन की नैया डुबो चुकी हो।

इस पुतले का पांचवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों को धीमा विष खिलाते हुए पुण्य कमाने के उपक्रम में लगी हुई हो।

इस पुतले का चौथा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो दहेज मांगने का झूठा आरोप लगा शादी के मंडप पर पुलिस को बुला कर दूल्हे और उसके परिवार वालों को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान की यात्रा पर भिजवा कर अपने बॉय फ्रेंड संग गुलछर्रे उड़ाए।

इस पुतले का तीसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो स्वयं को चोटिल करके पुलिस वालों को नियमित रूप से अपने ससुराल में चाय पीने का अवसर प्रदान कर ससुराल पक्ष की ढंग से इज्जत उतरवाए।

इस पुतले का दूसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसने केवल इस उद्देश्य से शादी की हो कि कुछ दिनों बाद अपने पति से तलाक़ लेकर उससे अच्छी खासी संपत्ति एल्युमनी के रूप झटक कर अपना बाकी जीवन अय्याशी से व्यतीत करे।

इस पुतले का पहला अर्थात मुख्य सिर प्रतीक रूप में किसी ऐसी स्त्री का हो जो मां, बहन या सहेली की भूमिका निभाते हुए उपरोक्त वर्णित स्त्रियों को उनके पुरुष मिटाओ पावन अभियान में भरपूर सहयोग करे।

रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले पर अग्नि बाण चलाने का सौभाग्य किसी ऐसे पुरुष को प्रदान किया जाए जो किसी स्त्री द्वारा झूठे आरोप में फंसाए जाने के बाद वर्षों तक जेल में रहने का सुख भोग कर आया हो। इस पुतले के थोड़ी दूरी पर एक डांस फ्लोर भी बनवाया जाए ताकि जब रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले का दहन किया जाए तो स्त्रियों द्वारा पीड़ित पुरुष नाचते हुए "सियापति रामचंद्र की जय!" का जयकारा पूरी उमंग व जोश के साथ लगा सकें।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह 

चित्र - Meta AI से साभार 

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

भुतहा सरकारी मकान

     जैसे एक आम आदमी के लिए सरकारी नौकरी पाने की तीव्र इच्छा होती है वैसे ही सरकारी नौकरी वाले जीव को सरकारी मकान पाने की दिली चाहत होती है। अब चूंकि सरकारी वेतन उसको और उसके परिवार को पालने में ही दम तोड़ देता है इसलिए निजी मकान के सपने देखना छोड़ सरकारी मकान को खोजना उसकी विवशता हो जाती है। वैसे देखा जाए तो सरकारी जीव के लिए सरकारी मकान अलॉट करवाना आसमान से तारे तोड़ कर लाने जितना ही आसान होता है। इस आसान काम को बहुत आसानी से पूरा करने के बाद जब उस बेचारे को इस बात का पता चलता है, कि जिस सरकारी मकान को उसने दुनिया भर के आसान उपायों को आजमा कर हासिल किया है वह तो भुतहा है तो उसका हाल धोबी के कुत्ते की भांति हो जाता है। सरकारी मकान अलॉट होने के बाद वह सरकारी जीव जिस मकान में किराए पर रह रहा होता है उसके मालिक को जल्द से जल्द मकान खाली कर सरकारी मकान में जाने की बात कह कर वह उसे धमकाते हुए एडवांस किराया देने से साफ इंकार कर चुका होता है। फलस्वरूप उसके मकान का मालिक अपने मकान को दूसरे किरायेदार से एडवांस लेकर उसके लिए बुक कर चुका होता है। अब उस सरकारी जीव के सामने केवल दो ही परिस्थितियां होती हैं कि या तो वह उस भुतहा सरकारी मकान में बस कर भूतों से दो – दो हाथ करे या फिर दूसरा किराए का मकान तलाशने के लिए जूते घिसे।

इससे पहले कि सरकारी जीव दोनों परिस्थितियों में से किसी एक का चुनाव करे आइए हम सरकारी मकान के भुतहा बनने की प्रक्रिया पर दृष्टि डाल लेते हैं।

सरकारी मकान जब कई सालों तक खाली रहता है तो उसके दो परिणाम होते हैं। पहला परिणाम होता है कि वह आसपड़ोस के लिए बहुत ही काम की वस्तु हो जाता है। पहले परिणाम के स्वरुप दूसरा परिणाम ये होता है, कि वह मकान आसपड़ोस वालों के अतिरिक्त बाकी कॉलोनी वासियों के लिए भुतहा घोषित हो जाता है।

उस भुतहा मकान में अंधेरा होते ही अजीबोगरीब आवाजें आने लगती हैं, जिनके बारे में ये बताया जाता है कि वो भूतों की आवाजें हैं। जबकि उस मकान में कभी आसपड़ोस के बेवड़े नशे में धुत्त होने के बाद लड़ते हुए कुटने-कूटने की ध्वनि उत्पन्न करते हैं तो कभी अगल–बगल के प्रेमी युगल जिगर से बीड़ी जलाने के उपक्रम में जुट कर रोमांटिक ध्वनियों के उत्सर्जन में अपना पावन योगदान देते हैं। पड़ोस के मकानों का आलतू–फालतू सामान उस भुतहा पड़े मकान की शोभा बढ़ाता है। रात में पड़ोस की भली नारियां अपना फालतू सामान भुतहा मकान में धरने के दौरान कभी–कभार जब फिसल कर धम्म से फर्श पर गिरती हैं तो गिरने के परिणामस्वरूप निकलीं उनकी चीखों को चुड़ैल की चीखें मान कर कॉलोनी के वीर निवासियों द्वारा उस स्थान से निकलने से बिलकुल परहेज कर लिया जाता है। आसपड़ोस के घरों के सामान रूपी कचरे की अधिकता से जब वायुदेव उस मकान से आवागमन करने को तिलांजलि दे देते हैं तो उस भुतहा मकान में सड़ांध के व्यवसाय में बहुत तेजी से वृद्धि होने लगती है।

अब चूंकि सरकारी जीव सरकारी कार्यालय और आम जीवन में जीवित भूतों से निरंतर जूझते हुए ही जीवन व्यतीत कर रहा होता है, इसलिए वह पहली परिस्थिति को ही स्वीकार कर सरकारी मकान में आने का निश्चय कर लेता है। उसे उस भुतहा सरकारी मकान के आसपड़ोस के भले लोगों द्वारा बहुत समझाया जाता है, लेकिन वह सरकारी जीव अपने निर्णय पर अटल रहता है। उसके अटल निर्णय के परिणामस्वरूप उस सरकारी मकान से भुतहा आवाजें आनी धीमे–धीमे बंद हो जाती हैं और उस सरकारी जीव व उसके परिवार द्वारा उस सरकारी मकान में गृह प्रवेश करने के साथ ही भुतहा आवाजें वहां से अपना बोरिया–बिस्तर समेटकर किसी अन्य खाली सरकारी मकान में जाकर डेरा डाल लेती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

चित्र गूगल से साभार 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

व्यंग्य की कढ़ाही चढ़ाते रामस्वरूप दीक्षित

    त्तर प्रदेश के महोबा जिले में जन्मे रामस्वरूप दीक्षित रीवा विश्वविद्यालय से कला स्नातक हैं। वह देश के विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में अपनी साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ - साथ लगभग एक दर्जन साझा संग्रहों के सहभागी बन चुके हैं तथा अपनी तीन स्वतंत्र पुस्तकों का सृजन कर रचनाकर्म में निरन्तर रत रहते हुए इन दिनों वह समकालीन व्यंग्य व्हाट्सएप समूह में वरिष्ठ व्यंग्यकारों के साथ बैठकर व्यंग्य की कढ़ाई चढ़ा उसमें रचना रुपी जलेबियां तलने में मग्न हैं। विसंगतियां, विद्रूता, भ्रष्टाचार, अश्लीलता इत्यादि सामाजिक बुराइयां जलेबियों का वेश धर व्यंग्य की कढ़ाही में इस दुर्भावना से कूदने को आतुर हैं, कि वे सब मिलकर उस कढ़ाही का राम नाम सत्य कर डालें, किंतु रामस्वरूप दीक्षित व उनके साथियों के साथ देश - विदेश के लेखक - साहित्यकार उनकी इस कुत्सित योजना के फलीभूत होने से पहले ही उन सबको तलकर करारी जलेबी के रूप में साहित्य प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं। रामस्वरूप दीक्षित से हमने व्यंग्य की कढ़ाही में जलेबियां तलने से थोड़ी देर के लिए विराम लेकर हमारे कुछ प्रश्नों का समाधान करने का आग्रह किया, ताकि पाठक जन उनकी जलेबी तलने की यात्रा अर्थात साहित्यिक यात्रा को जानने का सुख प्राप्त कर सकें।

आपको जलेबी तलने माफ कीजिए लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रामस्वरूप दीक्षित - लेखन को मैं रोग नहीं, रोगों का इलाज मानता हूं। 1984 से लेखन के क्षेत्र में हूं। देश और समाज में हर क्षेत्र में मनुष्य या व्यवस्था निर्मित करुणाजनक व त्रासद स्थितियों में वांछित बदलाव के प्रति लोगों में चेतना जाग्रत करने के उद्देश्य से कुछ करने के विचार ने लेखन में प्रवृत्त किया। सफर जारी है और शरीर में शक्ति रहने तक जारी रहेगा।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रामस्वरूप दीक्षित - लेखन को अगर आप सोद्देश्य कर रहे हैं तो इसका प्रभाव आप या पाठकों पर सकारात्मक ही होता है। मेरे लेखन ने मुझे एक बेहतर व चेतनासम्पन्न मनुष्य बनने में मदद की।  अपने पूर्वाग्रहों से हमें हमारा लेखन ही मुक्त करता है। लेखन खुद से भी मुक्ति का मार्ग है। अपने व्यक्ति से परे जाकर ही आप ईमानदार लेखन कर पाते हैं। लेखन आपके भीतर साहस और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की ताकत पैदा करता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

रामस्वरूप दीक्षित - निश्चित ही लगता है। अगर यह न लगे तो लिखना व्यर्थ है। समाज में आज तक जो भी अच्छे बदलाव आए वे लेखन की वजह से ही। लेखन बदलाव का सबसे कारगर उपाय है। यद्यपि बदलाव की गति बहुत बार दिखाई नहीं देती क्योंकि वह , बाहरी न होकर अंतर्निहित चेतना के स्तर पर होता है , जिसका बहुत स्थूल रूप से पता लगाना संभव नहीं हो पाता। समय जैसे जैसे बीतता है , यह बदलाव साफ दिखाई देने लगता है। जरूरी नहीं कि लेखक अपने जीवन में अपने लिखे से होने वाले परिवर्तन को देख पाए। यह बात प्रतिबद्ध और ईमानदार लेखन के संदर्भ में ही कही जा रही है, क्योंकि प्रतिगामी व यथास्थितिवादी लेखन भी हर काल में होता रहा है, आज भी हो रहा है।

आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रामस्वरूप दीक्षित - मैं अपनी हर रचना से बराबर प्रेम करता हूं । रचना हमारी संतान की तरह है जिसे जन्म देने में रचनाकार को , चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, गहरी और पीड़ादाई प्रसव वेदना सहन करनी होती है। फिर जन्म लेने वाली संतान कुरूप या विकलांग ही क्यों न हो उससे वैसा ही प्रेम जन्मदाता का होता है जैसा सुंदर ,सुडौल व ताकतवर संतान से। तमाम रचनाओं में से किसी एक रचना का प्रिय होना रचनाकार का खुद की अन्य रचनाओं को अप्रिय सिद्ध करना है। हर रचना की अपनी अलग पहचान, अलग व्यक्तित्व और अलग प्रभाव और रूतवा होता है। बहुत बार कोई रचना अपने रचयिता से भी बड़ी हो जाती है। किसी लेखक की सबसे प्रिय रचना उसके पाठक जी बेहतर बता सकते हैं और उसकी सबसे ताकतवर रचना के बारे में आलोचक।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

रामस्वरूप दीक्षित - वही जो मेरी रचनाओं में सन्निहित है। लेखक जो भी संदेश समाज को देना चाहता है वह उसकी प्रायः हर रचना में अंतर्निहित होता है। अलग से दिया जाने वाला संदेश , संदेश न होकर उपदेश होता है और मेरे अपने विचार से किसी भी लेखक को उपदेशक की भूमिका से खुद को बचाए रखना चाहिए।उ पदेशकों ने समाज का जाने, अनजाने बहुत अहित किया है और अभी भी कर रहे हैं।ले खक समाज को उपदेश या संदेश न देकर उससे सीधा संवाद करता है। उसकी हर रचना लोक को ही संबोधित होती है।

शनिवार, 18 जून 2022

आसमां छूने का जोश जगाते सुयश कुमार द्विवेदी

 

      त्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सुयश कुमार द्विवेदी पेशे से सहायक लोक अभियोजन अधिकारी हैं, लेकिन हृदय से रचनाकार हैं। अब तक दो पुस्तकें लिख चुके सुयश अपनी कलम पाठकों में उत्साह बढ़ाने के लिए चला रहे हैं। इनकी पहली पुस्तक 'सपनों को अपने जी ले रे' जहाँ आपको अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित करेगी, वहीं शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही इनकी दूसरी पुस्तक 'छू ले आसमां' आपके भीतर ऊंचाइयों का आकाश छूने का जोश जगाएगी। सुयश की रचनाएँ विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा लेखन के लिए शोभना सम्मान-2020 समेत अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

सुयश कुमार द्विवेदी -  मुझे हिंदी साहित्य पढ़ने का शौक बचपन से ही है। जब मैं कक्षा चौथी में था, तभी से मेरी दिलचस्पी कहानियों, कविताओं एवं नाटकों के प्रति काफी गहरी हो गयी। जब मैं कोई भी कहानी या काव्य की पुस्तक पाता तो उसे एक बार में पढ़ कर ही साँस लेता था। पढ़ते-पढ़ते कब मैंने लिखना शुरू कर दिया, मुझे ठीक से याद नहीं है। जहाँ तक मुझे याद है मैंने आठवीं कक्षा में अपनी  पहली कविता 'प्रेरणा' की रचना की थी।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

 सुयश कुमार द्विवेदी - लेखन से मेरे जीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मुझे यह लगता है कि व्यक्ति के जीवन में सबसे अच्छा दोस्त कोई होता है, तो वो होती है पुस्तकें। मैंने अपने अब तक जीवन में सैकड़ों कहानियां, कविताएँ एवं दर्जनों उपन्यासों को पढ़ा है। आत्मकथा, यात्रा वृतांत, लघुकथाएं एवं नाटकों की कोई गिनती नहीं है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी की सहजता और सरलता का मैं कायल रहा हूं। लेखन से व्यक्ति के जीवन में नए-नए विषयों के अध्ययन की जिज्ञासा, चिंतन की गुणवत्ता, व्यक्तित्व का निखार, समय की पाबंदी, आत्म अनुशासन एवं सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है और ऐसा मैंने अनुभव भी किया है। 

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

सुयश कुमार द्विवेदी - कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेखन से समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है। हर काल में समाज के चिंतकों, मनीषियों, ऋषियों, लेखकों एवं कवियों ने अपने लेखन के माध्यम से समाज को जागृत करने का पुरजोर यत्न किया है और वे काफी हद तक समाज में व्यापक परिवर्तन लाने में सफल रहे। जब-जब समाज को जरूरत पड़ी, इन लोगों ने समाज का मार्ग प्रशस्त किया है एवं अपनी लेखनी चलाकर समाज को दर्पण दिखाया है। संत कबीर का लेखन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

सुयश कुमार द्विवेदी - मैंने अब तक दो सौ से अधिक कविताओं और गीतों की रचना की है। मुझे मेरी सभी रचनाएँ पसंद हैं, क्योंकि मैं रचनाएँ व्यवसाय के लिए नहीं अपितु आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे लिखना पसंद है। मेरी सबसे प्रिय रचना 'सुबह का अखबार' है। इस रचना के लिए मुझे गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रथम पुरस्कार भी मिल चुका है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

सुयश कुमार द्विवेदी - सच कहूँ तो मैं अपने लेखन से समाज से कोई संदेश अभी नहीं दे सकता, क्योंकि मैं अपने आपको इस योग्य ही नहीं समझता। समाज को संदेश देने का कार्य बड़े लेखकों एवं कवियों का है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि मैं आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ और अगर मेरे लेखन से यदि कोई व्यक्ति प्रेरणा पा सके तो यह मेरे लिए गौरव का विषय होगा।

शनिवार, 4 जून 2022

साहित्य की संदूकची भरतीं रुपाली सक्सेना

      ध्यप्रदेश के भोपाल के हर्षवर्धन नगर क्षेत्र की रुपाली सक्सेना की हिंदी साहित्य से भेंट एक पाठक के रूप में हुई थी। पेशे से वस्त्र सज्जाकार रूपाली सक्सेना का साहित्य से इतना लगाव हो गया, कि एक दिन इन्होंने लिखना भी आरंभ कर दिया। इनकी लेखन यात्रा का शुभारंभ इतना धुंआधार हुआ, कि इनकी रचनाएं देश भर के समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाने लगीं। इनके द्वारा किए गए साहित्यिक परिश्रम के फलस्वरूप इनकी पहली पुस्तक 'स्नेह की संदूकची' प्रकाशित हुई व कुछ साझा संकलनों में भी इनकी रचनाओं ने अपनी दमदार भागीदारी सुनिश्चित की। अब तक रुपाली सक्सेना अपने लेखन के लिए कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त कर चुकीं हैं तथा अपनी साहित्य की संदूकची में नित प्रतिदिन नई-नई रचनाओं एवं सम्मान व पुरस्कारों को भरने में रत हैं। हमने इनसे कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रुपाली सक्सेना - मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि साहित्यिक है अतः साहित्य से मेरा जुड़ाव बचपन से ही था। स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी मैं साहित्यिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया करती थी। मैं लिखती तो थी, लेकिन अपने मन के उद्गारों को लिखकर मैं अपनी डायरी में छिपा दिया करती थी। विवाह होने के कई वर्षों के बाद अपनी बड़ी बहनों के प्रोत्साहन के बाद मैंने फिर से लिखना आरंभ कर दिया।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रुपाली सक्सेना - लेखन से मुझ पर बुरा नहीं बल्कि हमेशा की तरह सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। जिंदगी जीने का और उसे समझने का एक नया दृष्टिकोण मुझे लेखन से ही मिलता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन से समाज में कुछ बदलाव लाया जा सकता है?

रुपाली सक्सेना - जी बिल्कुल, मेरा विश्वास है कि लेखनी में जो शक्ति होती है वो किसी और में नहीं होती है।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रुपाली सक्सेना - 'आसान नहीं है औरतों के लिए कविता ग़ज़ल या गीत लिखना' मेरी सबसे प्रिय रचना है। मेरी यह रचना उन सभी गृहणियों को समर्पित है, जो अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर सृजन कार्य कर रहीं हैं।

आप अपने लेखन से पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगीं?

रुपाली सक्सेना - मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपने लेखन से समाज में व्याप्त कुरीतियों और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता का संचार करूँ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

बिनोद हमारे दिलों में है


      ये ज़माना ट्रेंडिंग का है। सोशल मीडिया पर कब क्या ट्रेंड हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इन दिनों ट्विटर पर ट्रेंडिंग की जिम्मेवारी बिनोद ने संभाल रखी है। देश की अधिकांश ट्विटरी जनता इस बात को जानने की इच्छुक है कि आखिकार बिनोद को क्यों ट्रेंड किया जा रहा है।

असल मे यह सब एक यू-ट्यूब चैनल Slayy Point से शुरू हुआ, जब उसके क्रिएटर अभ्युदय और गौतमी ने अपने वीडियो पर आने वाले कमेंट पर एक वीडियो बनाने का सोचा। 15 जुलाई को उन्होंने अपने चैनल पर ‘Why Indian Comments Section is Garbage (BINOD)’ नाम से एक वीडियो शेयर किया। जिसमें उन्होंने लोगों के कुछ अजीबोगरीब कमेंट्स दिखाए। इस वीडियो में बिनोद थारू नाम के एक शख्स ने हर कमेंट में सिर्फ बिनोद लिखा था। वीडियो के सामने आने के बाद से ही लोगों ने हर यू-ट्यूब वीडियो पर कमेंट में बिनोद लिखना शुरू कर दिया।

जल्द ही यह ट्रेंड Twitter पर भी लोकप्रिय हो गया। विचारणीय प्रश्न ये है कि बिनोद थारू नामक व्यक्ति क्यों सभी जगह बिनोद लिखता फिरता है।

यदि हम इस विचारणीय प्रश्न पर विचार न भी करें तो भी बिनोद के इस बिनोदी व्यवहार का कारण समझा जा सकता है। इस संसार में हर इंसान अपनी रोटी, कपड़ा और मकान इत्यादि आवश्यकताओं के पूरा होने बाद अपने दिल में एक सपना पालना शुरू करता है। उस सपने का नाम है 'जग में नाम कमाना'। नाम कमाने के लिए लोग दान देते हैं, लोगों की सहायता करते हैं और स्कूल, धर्मशाला इत्यादि का निर्माण करते हैं। जो ये सब नहीं कर पाते हैं वे अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल मीडिया पर बैठ जाते हैं। शायद इसी सपने को साकार करने के लिए बिनोद ने अपना बिनोदी अभियान शुरू किया होगा।

बहरहाल बिनोद को अपने परिश्रम का लाभ मिला और फुरसतिया यूट्यूबरों, ट्विटराओं और ट्विटरियों ने बिनोद को ट्रेंड करना शुरू कर दिया। ये ट्रेंड धीरे-धीरे पूरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर फैल चुका है। अब लोग बिनोद को खोज रहे हैं। कुछ लोग उसके ट्रेंड होने का कारण ढूँढ़ रहे हैं।

ऐसा करते हुए लोग ये भूल जाते हैं कि जिस बिनोद की तलाश में वे सब लगे हुए हैं वह तो हम सभी के दिलों में पैठ बनाकर बैठा हुआ है। नाम कमाने की इच्छा रखने वाला हर वो इंसान बिनोद है जो समाज सेवा करके, दान-दक्षिणा देकर या फिर कोई अच्छा और भला कार्य करने के बजाय उल्टे-सीधे और अजीबोगरीब तरीके आजमा कर अपना नाम कामना  चाहता है।

बहरहाल बिनोद का मिशन सफल हो चुका है। अब हर कोई बिनोद की चर्चा में व्यस्त है। कई फर्जी बिनोद इसका क्रेडिट लूटने के लिए सोशल मीडिया पर प्रकट हो चुके हैं। पर असली बिनोद इन सब घटनाओं को देखकर मंद-मंद मुस्कुराता हुए ट्विटराओं के ट्वीटों में, फेसबुक पोस्ट में या फिर यूट्यूब के वीडियो पर कमेंट के रूप में अपना नाम बिनोद दर्ज करने में मस्त हो रखा है।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 25 मार्च 2018

व्यंग्य : श्रीराम की चिंता


        राम का नाम भारत के जन-जन में और कण-कण में बसा हुआ है। ये उनके नाम का ही प्रभाव माने कि किसी को विरोध करना हो, अपनी माँगों को मजबूती से रखना या फिर अपनी राजनीति की नैया पार लगवानी हो तो राम ही याद आते हैं। अभी कुछ दिन ही तो बीते हैं जब एक समूह राम के चित्रों को जूते मारते हुए मार्च कर रहे थे। उस महान मार्च को सुरक्षित निकलवाने के लिए उस क्षेत्र के वीर पुलिसकर्मी कमर कसे हुए थे। मार्च निकालने वाले जनसमूह के समर्थक और शुभचिंतक सोशल मीडिया पर प्रसन्नतापूर्वक इस मार्च के वीडियो व चित्रों को शेयर करते हुए गर्वित हो रहे थे। इस सारे घटनाक्रम को तिरपाल में बैठे राम लला गुमसुम हो देख रहे थे। हो सकता है कि राम लला सोच रहे हों कि उस तिरपाल से मुक्ति मिले तो कुछ किया जाए। पर वो कहावत है न कि 'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' सो राम लला को कुछ करने के लिए शायद अभी वर्षों तक और प्रतीक्षा करनी पड़े। वैसे भी उन्हें अब आदत हो गई है इन सबको सहने की। कोई पहले उनके अस्तित्व को नकारता है और फिर आवश्यकता पड़ने पर उनके चरणों में ही जाकर अपनी नाक रगड़ता है, कोई उन्हें पहले तो खूब गरियाता है फिर अचानक स्वार्थ सिद्धि के लिए उनका जयघोष करने लगता है तो कोई उन्हें अत्याचारी घोषित कर उनके लिए अभद्रता की हदें पार करने को उतारू हो जाता है। ये सब देखकर राम लला एकपल को उदास हो जाते हैं फिर कुछ पल बाद मुस्कुराते हैं। कुछ क्षण मुस्कुराने के पश्चात वो उठकर केवट मल्लाह को हृदय से लगाते हैं, फिर शबरी के झूठे बेरों से अपनी भूख मिटाते हैं और फिर महर्षि बाल्मीकि को प्रणाम कर चिंता करते हुए मन ही मन बुदबुदाते हैं, 'ये लंकापति रावण मृत्यु से पहले भारत भूमि में किन-किन स्थानों पर अपने बीज रोप गया था?'
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

पाप भरी सेल्फ़ी


     सके पास स्मार्ट फोन नहीं था, वरना वह भी एक अदद सेल्फ़ी तो ले ही लेता। पर उसका सामर्थ्य स्मार्ट फोन लेने का होता तब न। वह तो भूखा था। शायद कई दिनों से भूखा होगा बेचारा। हो सकता है भूख उसके संग सेल्फ़ी ले-लेकर ऊब गई होगी। इसलिए भूख ने भी तंग होकर उसे दुत्कार दिया होगा, सो विवश होकर वह भोजन के कुछ टुकड़ों की आस में इधर-उधर बेचैन हो भटक रहा था। जब भटकाव को मंजिल हासिल नहीं हुई तो अपने भूख से तड़पते हुए पेट के लिए उसने कुछ चावल चुरा लिए और वह बिना तजुर्बे का चोर झट से पकड़ लिया गया। 
वैसे भी अपने देश की विशेषता है कि यहाँ चोर और उसके द्वारा किस स्तर पर चोरी की गई है ये देखकर उससे उसी के अनुसार बर्ताव  किया जाता है। सो उस भूखे-नंगे चोर ने कुछेक चावल चुराकर इतना बड़ा पाप किया था कि वो माफी के लायक ही नहीं था। अगर वह करोड़ों-अरबों घोटाला करता तो सालों-साल कोर्ट में उस पर घोटाला के आरोप को साबित करने में बीत जाते। उम्र के आखिरी पड़ाव में अगर उसके जेल जाने की नौबत आती भी तो वह जेल में निश्चिंत होकर चैन की बंशी यह सोचते हुए बजाता कि बेशक वह जेल में है लेकिन उसने अपने परिवार को इस योग्य बना डाला कि उसकी कई पीढ़ियाँ बैठे-बैठे हलवा-पूरी खायेंगीं। 
अगर वह किसी बैंक के करोड़ो-अरबों रुपयों का गबन करता तो सरकारी तंत्र उसके क़दमों में फूल बिछाकर उसकी अगवानी करते हुए विदेश भागने में निष्ठापूर्वक उसकी हर संभव सहायता करता। विदेश में अरबों-करोड़ों रुपयों से खेलते हुए ऐशो-आराम से उसकी बाकी जिंदगी कटती और वह कभी मुड़कर भी इस देश की ओर नहीं झाँकता। फिर उसके खिलाफ बेशक चाहे जितनी जाँच कमेटियाँ गठित कर दी जातीं या  फिर उसको धर-पकड़ने के लिए अभियान  चलाये जाते। वह विदेश में बैठे-बैठे ही ठेंगा दिखाता और सरकार बेचारी साँप के निकल जाने पर लकीर को पीटती रहती।
सोचिए कि अगर वह घोटाला करता या फिर बैंक का धन हड़पता तो रातों-रात खबरपिपासु मीडिया द्वारा स्टार बना दिया जाता। टी.आर.पी. सुंदरी उसकी सेवा-सुश्रुषा करते हुए उसे अपनी बाहों में भर लेती और दिन-रात उसके क़दमों में ही पड़ी रहती। पर वह ऐसा कुछ न कर सका। उस मैले-कुचैले और अधनंगे इंसान ने अपनी औकात के हिसाब से ही चोरी करने के बारे में सोचा। उसने धृष्टता की और जैसे चूहा रोटी लगाकर रखे हुए पिंजरे में अचानक फँसकर कैद कर लिया जाता है, वैसे ही उस भूखे चोर को भी इंसानों के वेश में धरती पर टहलते हुए शैतानों ने पकड़कर अपने शैतानी शिकंजे में जकड़ लिया। उसे उसके उस घोर पाप के लिए बन्धक बनाकर मारा-पीटा गया। उसे पीटते-पीटते उन शैतानों द्वारा अपने उस वीरतापूर्ण कार्य को यादगार बनाने के लिए पाप भरी सेल्फ़ी ली गई। 
पिटते-पिटते भूख से अधमरा वो पापी चोर बिलकुल ही मर गया। उसके मरने के बाद केवल बाकी बची शैतानों द्वारा खींची गई उसकी वो पाप भरी सेल्फ़ी, जिसे देखकर धरती माँ का दुःख और पीड़ा के मारे कलेजा फट गया और मानवता शर्मसार हो अपनी छाती पीट-पीटकर रोयी। पर उस चोर की आत्मा अपने भूख से कंकाल बन चुके निर्जीव शरीर को देखकर इस बात से प्रसन्न थी कि कम से कम अब तो उसे भूख से यूँ बार-बार नहीं मरना पड़ेगा। 
लेखक - सुमित प्रताप सिंह 


सोमवार, 4 दिसंबर 2017

हास्य व्यंग्य : मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा


     ससुराल की सेवा और मेवा का सुख लेने के बाद मैं सपत्नीक अपने मायके के लिये रवाना हो लिया। कहीं जीजा जी दीदी संग रेलवे स्टेशन से वापस न लौट आयें इस डर से साले रेलवे स्टेशन तक हमें छोड़ने हमारे साथ ही आये। रेलवे स्टेशन पहुँचकर हम ये सोचते हुये भागे-भागे रेलवे प्लेटफार्म पर गये कि कहीं हमारी ट्रेन समय से पहले पहुँचकर हमारी प्रतीक्षा करने का दुःख न झेल रही हो, लेकिन ये हमारी एक बहुत ही हसीन भूल थी। हमारी ट्रेन पूरे ढाई घंटे लेट थी। बहरहाल हम सरकार के स्वच्छता मिशन को जीभ चिढ़ाते इटावा स्टेशन के प्रतीक्षालय में बेहाल हो अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा में लगे रहे। हमारी ट्रेन लेट पर लेट होकर हमारे सब्र का इम्तिहान लिये जा रही थी। खैर रेलवे विभाग की कर्मठता  और सक्षमता के फलस्वरूप साढ़े पाँच घंटे की कड़ी परीक्षा लेने के बाद सुबह 3.45 बजे जाकर ऊँचाहार एक्सप्रेस, जिसका नामकरण परेशान होकर मैंने नीचाहार एक्सप्रेस कर दिया था, में चढ़ने का सौभाग्य मिल पाया। पहले तो डिब्बे के अटेंडेंट को ढूँढने में काफी परिश्रम करना पड़ा, आखिरकार टी.टी. के बताए हुए ठिकाने पर जाकर अटेंडेंट को झकझोर कर जगाया और उससे सीट पर बिछाने के लिए चादरें माँगी तथा जितना जल्दी हो सका सीट पर चादर बिछाकर सोने की कोशिश करने लगा। मैंने देखा कि थकान होने के कारण पत्नी सो चुकी थी और मैं पूरे दिन की थकान होने के बावजूद अपने बगलवाली सीट पर पसरे इंसान के जोरदार खर्राटों से बेहाल हो जागने को विवश होता हुआ गहरी नींद में डूबने के स्वप्न देख रहा था। मैंने उसके खर्राटे बंद करने के लिये उसका कंबल कई खींचा, ताकि वो गहरी नींद से बाहर आ अपने खर्राटों पर पूर्ण विराम लगाये, लेकिन मेरी इस आशा पर उसने खर्राटे मारते रहकर फुल स्टॉप लगा दिया। अब मैंने पानी की बोतल उसके ऊपर फेंकने का दुस्साहसी विचार किया, लेकिन उस विचार को कुछ सोचकर अमल में नहीं लाया और जोर-जोर से कंबल खींचने की प्रक्रिया ही जारी रखी। पर वो इंसान शायद कुम्भकर्ण की पीढ़ी से था, सो उसे कुछ भी असर न हुआ और उसके घनघोर खर्राटे लगातार चालू रहे। मैंने अनुभव किया कि वो शायद कोई बुज़ुर्ग आदमी है, जो अधिक थकान होने के कारण खर्राटे युक्त होकर सो रहा था। मैं दुःखी हो करवट बदलते हुए सोच रहा था कि जाने किस मनहूस घड़ी में दुगुना दाम चुकाकर उस कथित सुविधासंपन्न ऊँचाहार एक्सप्रेस का तत्काल टिकट लेने की महान भूल की थी। मैं लेटे-लेटे ट्विटर पर ट्वीट क्रिया करते हुये प्रार्थना करने लगा कि हे प्रभु इस खर्राटेवाले दैत्य को कुछ देर के लिए कुम्भकर्णी मुद्रा से निकाल बाहर करो ताकि निंद्रा मेरे नैनों में एंट्री मार सके। फिर अचानक मुझे याद आया कि प्रभु तो इस्तीफा दे चुके थे सो मैंने उनके उत्तराधिकारी का स्मरण करना आरंभ कर दिया। जाने वो प्रार्थना का प्रभाव था या फिर मेरे कंबल खींचने का फल जो उसके खर्राटे अचानक बंद हो गये। मैंने इस मौके का फायदा उठाया और झट से नींद के आगोश में खो गया। एक-दो घंटे की नींद  खींचने के बाद किसी बच्चे की आवाज से मेरी आँख खुल गई। आँख खुलते ही सामने की सीट पर खर्राटे लेकर नींद का सत्यानाश करनेवाले इंसान को देखने का सौभाग्य हासिल किया। ये एक महिला थी जो अपने बतोले बेटे के ढेर सारे जवाब देने में मस्त थी। मैं मन ही मन उसकी खर्राटा शक्ति को नमन करते हुये शुक्र मनाने लगा कि अच्छा हुआ जो रात को मैंने उस महिला के ऊपर बोतल फैंककर नहीं मारी वर्ना आई.पी.सी. की छेड़छाड़ की धारा 354 मुझसे गले मिल रही होती।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार


गुरुवार, 23 नवंबर 2017

हास्य व्यंग्य : गोल्डन फीलिंगवाले सम्राट


    जबसे उन्होंने आलू से सोना बनाने की मशीन के बारे में घोषणा की है, तबसे आलू ने और अधिक भाव खाना शुरू कर दिया है। वैसे तो आलू पहले से ही सब्जियों का राजा था, लेकिन उसके भीतर हर सब्जी के साथ मिल-जुलकर पकने की भावना ने ही उसे सब्जियों का राजा बनाया था। एक तरह से वह खास होते हुये भी आम सब्जी की तरह व्यवहार करता था। पर जबसे आलू को सोने में परिवर्तित करनेवाली मशीन की खबर मीडिया में वायरल हुई है, तबसे ही आलू के मन में गोल्डन फीलिंग होने लगी है और वो खुद को सब्जियों के राजा से भी बढ़कर समझने लगा है। अपनी इस गोल्डन फीलिंग के कारण वो सब्जियों के साथ गठबंधन समाप्त कर एकांत प्रेमी हो गया है। आलू का जिगरी दोस्त समोसा भी आलू से जुदाई का दुःख झेल रहा है। समोसे में आलू की उपस्थिति तक खुद भी सत्ता से चिपके रहने का दावा करनेवाले भी आलू की ओर अपने जलते हुये नेत्रों से देख रहे हैं पर आलू इन सब बातों से बेपरवाह हो अपनी ही मस्ती में खोया हुआ है। अब वो भारतीय रसोई में मुख्य अतिथि और अध्यक्ष की दोहरी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। जैसे किसी कार्यक्रम में वक्ता माइक पकड़कर सर्वप्रथम भीतरी मन से कोसते हुये और ऊपरी मन से मुख्य अतिथि और अध्यक्ष के सम्मान में कसीदे पढ़ने के बाद अपने वक्तव्य को आरंभ करता है, ठीक वैसे ही हरेक सब्जी पकने से पहले गोल्डन फीलिंगवाले सम्राट आलू को प्रणाम करती है।
इतना सब होने के बावजूद भी मैं आलू को आलू जितना ही महत्व देता हूँ। इस बात से आलू के मन को भारी ठेस पहुँचती है। उदास आलू को देखकर मैं मंद-मंद मुस्कुराता हूँ और अपनी प्राणों से प्यारी पत्नी से  बड़े ही प्यार से कहता हूँ, " प्रिये आज तुम्हें जो भी चाहिये उसे माँग लो।" पत्नी एक पल को शरमा जाती है और फिर दूसरे ही पल मुस्कुराकर अपनी डिमांड प्रस्तुत करती है, " मेरे लिये केवल एक बोरा आलू मँगवा दीजिये।" मैं हैरान होकर एक पल  को अपनी पत्नी को देखता और दूसरे ही पल में आलू पर निगाह डालता हूँ। अब मुझे देखकर आलू खिलखिलाता है और अपनी आँखें मींचकर आलू से सोना निर्मित करनेवाली मशीन का अविष्कार करनेवाले महान वैज्ञानिक को श्रद्धापूर्वक मन ही मन नमन करने लगता है।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


कार्टून गूगल से साभार

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

...तो ये मुल्क़ बंट जाएगा


   न राजपूत किसी पंडित, जाट या गूजर को गाली देता है न पंडित, जाट अथवा गूजर किसी राजपूत को गाली देता है। न सवर्ण किसी दलित को गाली देता है और न दलित किसी सवर्ण को गाली देता है। परोक्ष और अपरोक्ष युद्ध में मुँह की खाने के बाद पड़ोसी दुश्मन देश ने अब सोशल मीडिया के माध्यम से भारत से युद्ध के लिए कमर कसी है और अपने कथित वीर सिपाहियों को हमारे देश के भाईचारे को खंडित करने के लिए सोशल मीडिया पर तैनात कर दिया है। ये कथित वीर सिपाही स्वयं को किसी न किसी जाति के नेता व हितेषी घोषित कर दूसरी जातियों के बारे में घृणित व अपमानजनक शब्द लिखकर हमारे आपसी सद्भाव को नष्ट करने की कोशिश में जी-जान से लगातार जुटे हुए हैं। कम पढ़े-लिखे व अल्पबुद्धि के लोग उनके प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं और उनकी कठपुतली बनकर अपने जाति बंधुओं के बीच इस घृणा को फैलाने में माध्यम बनने का कार्य करते हैं। विभिन्न जातियों के देवताओं व महापुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए लेख व चित्र सोशल मीडिया पर डालकर जातियों को आपस में उलझाने की निरंतर साजिश रची जा रही है। इस साजिश के परिणामस्वरूप लोग एक-दूसरे के जानी दुश्मन तक बनते जा रहे हैं और ये लोग भावनाओं में अंधे होकर हत्या तक करने से नहीं चूक रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुश्मन देश अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब होता दिख रहा है। इससे पहले कि  जातियों के बीच आपसी वैमनस्यता इतनी अधिक बढ़ जाए कि अपने देश में गृह युध्द की नौबत आ जाए और ये देश खंडित होने के कगार पर पहुँच जाए हम देशवासियों को जागना होगा। सोशल मीडिया पर जो भी व्यक्ति किसी जाति के देवता अथवा महापुरुष के विषय में कोई अभद्र टिप्पणी, लेख अथवा चित्र पोस्ट करे तो उसके बारे में सोशल मीडिया के उस प्लेटफार्म के प्रबंधन समूह को सूचना देकर आपत्ति दर्ज करवाई जाए। यदि ऐसा घृणित कार्य करनेवाला आपके आस-पास ही रहता है तो इस संबंध में निकटवर्ती थाने में लिखित शिकायत दी जाए। यदि आप उससे अपरिचित हैं तो साइबर क्राइम सेल को ई मेल द्वारा इसकी शिकायत भेजी जाए। आपका कोई मित्र घृणा फैलानेवाले ऐसे किसी संदेश को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उसे प्रेमपूर्वक समझाया जाए। यदि वह आपकी बात नहीं मानता है तो उसे अपनी मित्र मंडली से तड़ीपार कर अपने मित्र समूह को इस संबंध में पोस्ट के माध्यम से बाकायदा सूचित करते हुए जानकारी दी जाए। सोशल मीडिया को निरंतर प्रयोग में लानेवाले अपने मित्रों व संबधियों को दुश्मन देश के षड़यंत्र के बारे में बताया जाए।
ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे प्रयासों से हम अपने प्यारे देश भारत की अखंडता व संप्रभुता की रक्षा कर सकते हैं। इस बात को हम हमेशा याद रखें कि हर जाति के लिए उसके देवता व महापुरुष आदरणीय और वंदनीय हैं और हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम उनके देवताओं अथवा महापुरुषों के विषय में कुछ भी उल-जलूल लिखकर या फिर इस तरह की बातों को शेयर करके उनकी भावनाओं को ठेस पहुचाएं।

नफरत का ये नाग 
चैन-ओ-अमन को डस जाएगा
तू अब भी न जागा 
तो ये मुल्क़ बंट जाएगा।

याद रखिए यदि हमने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो ये अपना देश कई टुकड़ों में बंट जाएगा और कोई भी देशप्रेमी कभी भी  नहीं चाहेगा कि इस देश का कोई भी हिस्सा इससे अलग हो।
जय हिंद!
वंदे मातरम!
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कविता : घर में बुजुर्ग होने का अर्थ


('अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस' पर विशेष कविता)

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
जीवन की एक विशेष पाठशाला का होना
जिसमें मिल सकते हैं हमको
नित्य नए-नए सबक

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
तजुर्बों को अपने मस्तिष्क में संजोए हुए
एक तजुर्बेकार व्यक्तित्व की उपस्थिति
जो सिखा सकता है हमें
गलत और सही में सच्चा फर्क

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपनी जिम्मेवारियों को
बखूबी निभा लेने के बाद भी
जिम्मेवारियों का बोझ उठाए हुए
एक बहुत ही खास शख्सियत

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपने हृदय में
स्नेह का सागर भरे हुए
एक प्यारी सी मानव कृति

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
हमारे परिवार के चारों ओर
एक मजबूत चारदीवारी का होना
जो करती है सुरक्षा
हर असंभावित खतरे से

इसलिए बुजुर्ग आदणीय हैं, वंदनीय हैं
और हमारे घर के अभिन्न अंग हैं
यदि बुजुर्गों का आशीष हमारे संग है
तो फिर इस जीवन में उमंग ही उमंग है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : युवराज का सपना


कई दशकों तक देश की कथित रूप से सेवा करने का दम भरनेवाले राजनैतिक दल के लाड़ले युवराज ने विदेशी धरती से देश में 2019 ईसवी में होनेवाले लोकसभा चुनावों का बिगुल अभी से फूँक दिया है। ये निर्णय उन्होंने बहुत सोच-समझकर लिया है। भारतीय धरती से उन्होंने बहुत प्रयास कर लिया, लेकिन सफलता ने उनके पास फटकना भी मंजूर नहीं किया है। क्या-क्या नहीं किया उन्होंने। अपने लाव-लश्कर के संग दलित के घर में आधी रात को जा धमके और वहाँ बाकायदा मीडिया की मौजूदगी में दलित के हाथों से अपना भोग लगवाया। भोग लगवाने के उपरांत अपनी सहृदयता के गीत गाकर उस दलित परिवार को सपनों का झुनझुना पकड़ाया और वहाँ से रफूचक्कर हो लिए। वो बेचारा दलित परिवार अभी भी सपनों में खोकर झुनझुना बजा रहा है और युवराज सपनों के सौदागर बनकर इत-उत डोलने में मस्त हैं। युवराज ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खाट पंचायत का बड़े स्तर पर आयोजन किया। ये आयोजन इतने बड़े स्तर का था, कि आसपास के गाँववालों की अपने-अपने घरों के लिए टूटी खाटों की जगह नई खाटों को लाने की समस्या चुटकियों में हल हो गई। वे सब खाट पंचायत से नई और मजबूत खाटें लूटकर ले गए और अब उन खाटों पर बैठकर हुक्का फूँकते हुए खाट पंचायत की जोर शोर से ठहाका लगाते हुए चर्चा करते रहते हैं। वहाँ वो सभी खाट पर बैठे-बैठे हुक्का फूँकते हैं और यहाँ कलेजा फुंकता है युवराज का। युवराज इस कृत्य के लिए विरोधियों को जिम्मेवार ठहरा उन्हें पानी पी-पीकर कोसते हुए गरियाते रहते हैं। युवराज ने समय-समय पर अपने कुर्ते की बाजुएँ ऊपर चढ़ाकर सत्ता को सीधी चुनौती भी दी है। वो और उनके दलीय चमचे आए दिन सुंदर और सुशील गालियों से सत्ता पक्ष को सुशोभित करते हुए अपने विपक्षी होने का हक अदा करते रहते हैं। चाहे महागठबंधन की रैलियाँ हों या ‘देश के टुकड़े होंगे हजार’ जैसे नारे लगानेवाले कथित देशप्रेमियों का प्रदर्शन हो या फिर खुद ही दंगा करके खुद ही को पीड़ित दर्शानेवाले शांतिप्रिय समुदाय की विरोध सभा हो युवराज हर जगह पूरी तत्परता से और सबसे पहले उपस्थित मिलते हैं। पर उनकी इस योग्यता से बैर रखनेवाले उन्हें सत्तापक्ष का एजेंट करार देते हैं और उनपर आरोप मढ़ते रहते हैं, कि सत्ता पक्ष के इशारों पर काम करते हुए वो अपनी देश के सबसे ईमानदार राजनैतिक दल की नैया डुबोने में लगे हुए हैं। ऐसे वचन सुनकर युवराज का चेहरा गुस्से के मारे तिलमिला उठता है और उनकी बाजुएँ फडकने लगती हैं। वो क्रोध में अपने कुर्ते की बाजुओं को ऊपर चढ़ाते हैं और वंशवाद के रथ पर सवार हो अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर भोंथरे बाण से लोकसभा चुनाव-2019 रुपी मछली पर निशाना साधने को तैयार होते हैं, कि तभी कोई उनकी कमर पर गदे से जोरदार प्रहार करता है और युवराज उस अप्रत्याशित आक्रमण से घायल हो रथ से नीचे गिर जाते हैं। अचानक उनकी आँख खुल जाती है और वो खुद को औंधे मुँह बिस्तर से जमीन पर गिरा हुआ पाते हैं। वो अपना सिर उठाकर सामने देखते हैं तो सामने राजमाता दुखी और उदास होकर खड़ी हो अपना माथा पीट रही होती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

व्यंग्य : असहिष्णु देश के दीवाने लोग


    पना भारत देश बहुत ही असहिष्णु देश है। ये इतना असहिष्णु देश है कि आए दिन इस देश में असहिष्णुता से परेशान बेचारों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना पड़ता है, कि ये देश कितना अधिक असहिष्णु है। इस देश के बहुसंख्यक असहिष्णु समुदाय के सहारे अपना सफल फिल्मी कैरियर बनानेवाले अभिनेता को सालों बाद अचानक ये अहसास होता है कि ये देश तो बड़ा असहिष्णु है। वो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ये घोषित करते हैं कि इस देश में इतनी ज्यादा असहिष्णुता बढ़ चुकी है कि यहाँ रहने में उन्हें और उनकी बीबी को बहुत डर लगने लगा है। हालाँकि इतना ज्यादा डरा हुआ होने के बावजूद भी वो इस असहिष्णु देश को छोड़कर कहीं और बसने का विचार भी नहीं करते। हमारे देश के असहिष्णु जीवों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है और वे उन अभिनेता को फिल्मी दंगल में पटखनी देने के बजाय जीत दिलवाकर अपने असहिष्णु होने का ठोस सबूत देते हैं। अभिनेता के शुभचिंतक भी अवसर का लाभ उठाते हुए असहिष्णुता का विरोध करते हुए अपने धूल जम चुके पुरस्कारों और सम्मानों को लगे हाथों लौटाकर विरोध के साथ-साथ अपने आपको गुमनामी से निकालने का प्रयास कर एक तीर से दो शिकार कर डालते हैं और वो भी इस देश को छोड़ने की बजाय इसकी छाती पर ही मूँग दलते  रहते हैं।
बीते दिनों कई साल संविधान के उच्च पद पर बैठकर मलाई खाने के बाद एक बेचारे जाते-जाते असहिष्णुता का रोना रो गए और देश में असहिष्णुता का भोंपू फिर से बजने लगा। वो इतने सालों तक मलाई खाते रहें, लेकिन इस दौरान उन्हें असहिष्णुता के बिल्कुल भी दर्शन नहीं हुए, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उनका मलाई खाना अब बंद होनेवाला है, उन्होंने असहिष्णुता का शिगूफा छोड़ दिया और जाते-जाते इस असहिष्णु देश में इतनी इज्जत कमा गए कि अब उन्हें लोगों को अपना मुँह दिखाने में भी सोच-विचार करना पड़ रहा है। बहरहाल अपने देश के इतने असहिष्णु होने के बावजूद भी आए दिन कोई न कोई  मुँह उठाए इसमें बसने के लिए चला आता है। ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से चल रहा है। बाहर से यहाँ आ धमकने के बाद लोग यहीं डेरा डाल लेते हैं और जब लगता है कि इनका डेरा उखड़ने का खतरा नहीं रहा तो फिर ये असहिष्णुता का राग अलापने लगते हैं। अपना देश कोई देश न होकर धर्मशाला का प्रमाणपत्र पानेवाला है। पहले ही यहाँ नेपालियों और बांग्लादेशियों ने डेरा जमाकर उत्पात मचा रखा है और अब रोहिंग्या भी अपना रोना रोते हुए बोरिया-बिस्तर लादकर आ धमक रहे हैं। उन्हें कोई ये क्यों नहीं बताता कि उन्हें ऐसे असहिष्णु देश में न बसकर बांग्लादेश, पाकिस्तान या फिर अरब के किसी सहिष्णु देश में जाकर पनाह मांगनी चाहिए। पर ये बात शायद उन्हें समझ में नहीं आनेवाली। हमारे असहिष्णु देश के दीवानों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी लगता है कि आने समय में देश के इन बाहरी दीवानों के आगे के हम असहिष्णु बहुसंख्यकों की संख्या लुप्तप्राय न हो जाए।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार 

रविवार, 17 सितंबर 2017

लघुकथा : कागौर


   श्राद्धों में कौओं को कागौर खिलाने के बाद भेदा कमरे में बने मंदिर के आगे हाथ जोड़कर बोला, "हे भगवान हमाई अम्मा को स्वर्ग में आराम और चैन से रखियो।"
तभी कमरे में टँगी भेदा की अम्मा की तस्वीर फर्श पर आ गिरी।
भेदा ने तस्वीर को ध्यान से देखा तो उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अम्मा उससे कह रही हों, "लला अगर बहू की बातन में न आयकै हमाओ समय से इलाज करवाय देते तो आज तुम्हाये संगें हमऊ कागौर खिलाय रहीं होतीं।"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : ढीले लंगोटवाले बाबा


“महाराज आप कौन हैं?”
“हम बाबा हैं।“
“कौन से बाबा?”
“हम कलियुग के बाबा हैं।“
“आप करते क्या हैं?”
“हम लोगों के दुःख और परेशानी दूर करते हैं।“
“क्या वास्तव में आप लोगों के दुःख व परेशानी दूर करते हैं?”
“अब अगर शक हैं तो हमारे भक्तों से जाकर पूछ लो। हम क्या बताएँ।“
“आपके भक्त इस देश की जनता के ही अंग हैं और क्या आपको लगता है कि जनता वाकई में कुछ बताने लायक है। फिर उससे पूछने से फायदा क्या? वैसे आप ही क्यों नहीं बता देते?”
“देखो बालक भक्तों के दुःख और परेशानी दूर हुए हों या न भी हुए हों लेकिन वे सब इस बात में यकीन करते हैं कि इनका खात्मा एक न एक दिन अवश्य होगा। ये आस ही उनमें ऊर्जा का संचार करती है और वे आनंद व प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं।“
“और एक दिन इसी आस में भक्तों का राम नाम सत्य हो जाएगा लेकिन शायद उनके कष्ट दूर नहीं हो पाएँगे।“
“बालक ऐसी निराशावादी सोच से उबरो।“
“निराशावादी सोच नहीं बल्कि हकीक़त है। आप झूठे संसार में अपने भक्तों को रखकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं।“
“बालक हम खिलवाड़ नहीं बल्कि हमारे और हमारे भक्तों के जीने का जुगाड़ कर रहे हैं।“
“वो भला कैसे?”
“बालक इस संसार में इतने कष्ट हैं कि किसी भी व्यक्ति का जीना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए हम अपने भक्तों को इस संसार से दूर स्वप्नों के संसार में जीने का तरीका सिखाते हैं।“
“हाँ और इसके बदले आपके मूर्ख भक्त आपकी झोली भरके आपको मालामाल कर देते हैं।“
“बालक ये तुम गलत कह रहे हो।“
“तो फिर सही बात क्या है?”
“सही बात ये है कि हम बाबा होने का फर्ज निभाते हुए अपने भक्तों को मोहमाया के बंधन से मुक्त करते हैं।“
“और अपनी मोहमाया के जाल में अपने भक्तों को क़ैद कर लेते हैं। बाबा वैसे आप किस धर्म के हैं?”
“बालक कार्ल मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम है और हम किसी भी नशे के खिलाफ हैं इसलिए हम किसी भी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वैसे तुम हमारा पंथ, संप्रदाय अथवा धर्म बाबागीरी ही मान सकते हो।“
“मतलब आप अफीम की बजाय भक्तों को बाबागीरी नाम की चरस पिला रहे हैं।“
“बालक हम भक्तों को चरस नहीं बल्कि प्रेमरस पिला रहे हैं, जिससे विश्व में बंधुत्व की भावना का विकास हो सके।“
“खैर छोड़िए आप ये बताइए कि आपका असली नाम क्या है?”
“बालक सच कहें तो हमें हमारा असली नाम याद ही नहीं रहा है। अब तो हमें लंगोटवाले बाबा के नाम से ही जाना जाता है।“
“अच्छा बाबा एक बात और बताएँ।“
“अब बाकी बातें फिर कभी करेंगे फ़िलहाल हम अपने भक्तों को आशीर्वाद देने जा रहे हैं।“
यह कह बाबा बहुत ही अधीर हो कुछ समय पहले ही वहाँ पधारीं महिला भक्तों की ओर चलने को हुए। उनकी ऐसी हालत देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “बाबा आपने तो अपना नाम लंगोटवाले बाबा बताया था पर आप तो लंगोट के ढीले लगते हैं।”
बाबा आँख मारके मुस्कुराते हुए बोले, “बालक नाम तो हमारा ढीले लंगोटवाले बाबा ही है, लेकिन बोलने में ढीले शब्द साइलेंट हो जाता है।”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
* कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 2 सितंबर 2017

लघुकथा : बाहरी


  रीबा समुद्र के किनारे बैठा देख रहा था, कि लोग बारी-बारी से गणेश जी की विभिन्न आकर की प्रतिमाएँ लाते और उन्हें समुद्र मैं विसर्जित करके नाचते-गाते हुए वहाँ से अपने-अपने घर की ओर चले जाते।

गरीबा बहुत देर तक यह सब देखता रहा।

फिर अचानक ही वह बुदबुदाया, "ये और हम लोग गणपति बप्पा को बरोबर पूजता है, लेकिन ये महाराष्ट्र का लोग हम उत्तर भारतीयों  को भैया बोलता है और हमसे बहुत बुरा व्यवहार करता है। हम लोग कई पीढ़ी से यहाँ रह रहा है, फिर भी ये लोग हमको बाहरी ही मानता है।"

गरीबा ने बीड़ी जलाकर एक लंबा सा कश खींचा और बड़बड़ाया, "गणपति बप्पा को ये लोग अपना सबसे बड़ा देवता मानता है, तो वो भी तो उत्तर भारत के हिमालय परबत पर जन्म लिया था। फिर तो अपना गणपति बप्पा भी बाहरी हुआ न?"

फिर अचानक गरीबा जोर से खिलखिलाया, "या फिर हो सकता है, कि इन लोगों का हिमालय परबत महाराष्ट्र में ही किसी जगह पर हो?"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 30 अगस्त 2017

हास्य व्यंग्य : मुल्ला जी और शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी


मुल्ला जी अपना सिर पकड़े बैठे हुए थे। उनके दिमाग में बार-बार ‘तलाक़ तलाक़ तलाक़’ की तेज आवाज गूँज रही थी। जब उनसे बर्दाश्त न हुआ तो अपने दोनों हाथों को आसमान की ओर उठाकर चीखते हुए बोले, “या अल्लाह अब हमारे क़ौमी मसले का फैसला ये मुआँ कोर्ट करेगा। जो पाक काम 1400 साल से होता चला रहा था उसपर कोर्ट का यूँ कानून हथौड़ा चला देना कहाँ का इंसाफ है?” “सही कह रह रहे हो भाई जान! ये सुप्रीम कोर्ट की सरासर नाइंसाफी है।” मुल्ला जी ने अपनी दाढ़ी को खुजाते हुए सामने नज़र डाली तो देखा कि उनके सामने उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी खड़े हुए थे। लल्ला जी दूसरे मजहब के होने के कारण मुल्ला जी की नज़रों में हमेशा काफ़िर ही रहे लेकिन काफ़िर होकर वो भी उनके हर सुख-दुःख में हमेशा संग रहे। चाहे तलाक़ का मसला हो या हलाला हो या फिर मुताह का मामला हो काफ़िर लल्ला जी ने हर बात में मुल्ला जी और उनकी क़ौम का दिलोजान से समर्थन किया। असल में काफ़िर लल्ला जी अपने दल के प्रति बड़े वफादार हैं और उनका दल मुल्ला जी और उनकी क़ौम के सहारे ही देश की सत्ता सुख भोगता रहा है। अपने दल की कृपा से लल्ला जी भी जीवन के सारे सुख और आराम लेते हुए जीने का मजा लेते रहे हैं। काफ़िर लल्ला जी को सामने देख मुल्ला जी एक पल को खुश होते हैं और अचानक ही दुःख के मारे माँ-बहिन की गालियों की खेप निकलना शुरू कर देते हैं। काफ़िर लल्ला जी समझ जाते हैं कि मुल्ला जी इतनी मनमोहक गालियाँ किसको समर्पित कर रहे हैं। वो उनके पास आते हैं और उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर उन्हें सांत्वना देते हुए समझाते हैं कि जो भी हुआ बहुत गलत हुआ तथा उन्हें सुझाव देते कि इस गलत फैसले के खिलाफ पूरी क़ौम को अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। मुल्ला जी को काफ़िर लल्ला जी की बातें सुनकर अचानक जोश आ जाता है और उनका खून गुस्से के मारे उबाल मारने लगता है। वो बुलंद आवाज में ‘हमारी क़ौम हमारा कानून’ का नारा लगाते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी उनका साथ देते हैं तथा इस गलत फैसले का समर्थन देने के लिए अपने धर्मवालों का मजाक उड़ाते हैं और उनपर कटाक्ष से भरे हुए अनेकों जुमले उछालते हैं। उधर मुल्ला जी की अम्मी और बहिनें उन्हें समझाती हैं कि इस फैसले से उनके परिवार और क़ौम की औरतों का भी भला होगा और उनकी जिंदगी नर्क नहीं बन पाएगी। मुल्ला जी ये सुनकर अपनी टोपी उतारकर अपने सिर पर हाथ फेरते हुए गहरी सोच में डूब जाते हैं। सोचते-सोचते वो एक पल को बुर्के के भीतर मुँह छिपाए हँस रहीं अपनी बेगम को झल्लाहट में देखते हैं और दूसरे ही पल पड़ोस में रहनेवाली हुश्न में हूर को भी मात देनेवाली रेशमा को हसरत भरी निगाहों से देखते हुए ठंडी-ठंडी आहें भरने लगते हैं। रेशमा के लिए लार टपकाते मुल्ला जी को उनके मोहल्ले में रहनेवाले उनकी क़ौमवाले समझदार लोग भी उन्हें कोर्ट के फैसले के फायदे गिनाने लगते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी भी बहती हवा का रुख भाँपकर और अपने-आपको एकदम से उसके अनुसार ढालकर मुल्ला जी को कोर्ट के फैसले के उजले पक्ष के बारे में विस्तार से बताने लगते हैं। ये देख मुल्ला जी अपने मुँह में भरी पान की पीक एक ओर थूकते हैं और अपना सिर खुजाते हुए काफ़िर लल्ला जी को घूरकर देखते हुए सोचने लगते हैं, “ये साला लल्ला जी हमारा शुभचिंतक है या फिर खुदचिंतक?”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

व्यंग्य : जीना इसी को कहते हैं

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?
भाई सारी जमा पूंजी लगाकर एक धंधा शुरू किया था पर वो जमा नहीं। सारा पैसा डूब गया। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।
तो इसमें इतना निराश क्यों होता हैथोड़ी कोशिश और मेहनत कर सब ठीक हो जाएगा।
भाई अगर तू मेरी जगह होता तो अब तक किसी पेड़ पर लटक चुका होता 
- भाई इतना भी सिरफिरा नहीं हूँ, जो पेड़ पर लटककर अपनी कीमती जान दे दूँ और न ही मैं उन लोगों जितना महान नहीं हूँ, जो आए दिन जरा सी परेशानी या मुसीबत आनेपर इस अनमोल जीवन का राम नाम सत्य कर डालते हैं। मेरा मानना है कि कई योनियों के बाद नसीब हुआ ये मानव जीवन यूँ एक पल में गँवाने के लिए नहीं है जब तक कि इसके पीछे कोई नेक उद्देश्य न हो।
- नफे तू भी कहाँ मेरे और मेरे जैसे लोगों के दुखों को सुन भावुक हो उठा। खैर तू मेरी छोड़ अपनी सुना। आज तेरे चेहरे पर बड़ी रौनक लग रही है। कहाँ से आ रहा है?
भाई आज इंडिया गेट की सैर करके आ रहा हूँ।
अरे वाह तो क्या-क्या देखा वहाँ?
वहाँ अंग्रेजों की सेवा करते हुए प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्धों में मारे गए 90,000 अंग्रेज भक्त भारतीय सैनिकों की याद में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया युद्ध स्मारक रुपी इंडिया गेट देखाइसकी मेहराब के नीचे स्थित आजादी के बाद स्थापित की गई अमर जवान ज्योति को सादर नमन कियाइंडिया गेट के इर्द-गिर्द घूमते हुए पानी पूरी खायी और जिले सिंह से मुलाकात की।
अरे भाई मैं वहाँ कहाँ मिल गया जबकि मैं तो कल दुखी हो अपना सिर पकड़े हुए घर पर ही पड़ा रहा।
भाई वो जिले सिंह कोई और था। हमें देखते ही पुकारकर अपने पास बुला लिया। गुब्बारे बेच रहा था। अब से कुछ साल पहले नाई का काम करता था। दिल्ली के एंड्रूज गंज इलाके में मालिक सनी की दुकान में जिले सिंह नौकर नहीं बल्कि मालिक की तरह काम करता था। बहुत ही हाजिर जवाब था। अपने ग्राहक के बालों को काटते हुए उनका खूब मनोरंजन करता रहता था और साथ ही साथ अपने मालिक सनी की खिंचाई भी करता रहता था।
फिर वो गुब्बारे क्यों बेचने लगा?
उसके मालिक को रोज शराब पीने की बुरी आदत थी। जिले ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं माना। सनी भी उन भले लोगों में से एक था जो नेक सलाह को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। और एक दिन वो भी आया जब शराबखोरी ने सनी का एक्सीडेंट करवा दिया और सनी अपने परिवारअपनी दुकान और जिले सिंह को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।
- ओहो ये तो बहुत दुखद हुआ। अच्छा फिर जिले का क्या हुआ?
- जिले अच्छा कारीगर था पर उसे कहीं काम नहीं मिला।
- क्यों भई अच्छे कारीगर को तो काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
- भाई जिले सिंह खरी बात कहनेवाला खरा इंसान ठहरा और आज के जमाने में खरी-खरी कहनेवालों को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता। और फिर उसकी उम्र और बालों में आ रही सफेदी भी उसके काम मिलने के आड़े आ गयी।
और वो बेचारा इंडिया गेट पर गुब्बारे बेचने लगा।
हाँ पर वो निराश नहीं था। उसके भीतर जिंदगी को जीने का जज्बा दिखाई दे रहा था। वो और लोगों की तरह निराशा से अपना जीवन बर्बाद करने की बजाय मेहनत करके अपने और अपने परिवार की गुजर-बसर करने के लिए प्रयासरत है और कुला मिलाकर खुश है। वैसे दोस्त एक बात कहूँ जीना इसी को कहते हैं।
बात तो तू ठीक कह रहा है भाई। उस जिले सिंह ने इस जिले सिंह को सबक दिया है। जिले सिंह को ये तेरा दोस्त अपनी प्रेरणा बनाएगा और जिंदगी को पूरी हिम्मत से लड़ते हुए जिएगा।
अब आया न लाइन पर।
हाँ भाई बेशक देर से आया पर दुरुस्त आया।  है कि नहीं?
बिलकुल भाई!

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

व्यंग्य : मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं


   कूंचे, गलियां और मोहल्ले फिर से गुलज़ार होने लगे हैं। वो फिर से टोली बनाकर दरवाजे-दरवाजे जाकर अपनी हाजिरी दर्ज करवा रहे हैं। पाँच साल पहले चोट खाए हुए लोग नज़रें उठाकर खोज रहें हैं कि शायद कोई जाना-पहचाना चेहरा मिल जाए तो उसे कुछ पलों के लिए गरियाकर अपने दिल की भड़ास निकाल लें। पर उन्हें जाना-पहचाना कोई चेहरा नहीं दिखता बल्कि उन्हें दीखता है एक बिलकुल ताज़ा-तरीन चेहरा जो न तोड़नेवाले अनेकों वादे अपने संग लिए हुए नमस्कार मुद्रा में सामने खड़ा हुआ है। पहली बार तो नज़र उठाकर उसे एक पल को देखा तो वो चेहरा अनजाना सा लगा था लेकिन फिर गौर से देखने पर उनकी सूरत कुछ जानी-पहचानी सी लगने लगती है। अचानक याद आता है कि ये सूरत तो उनसे मिलती-जुलती है जिन्होंने पाँच साल पहले इसी प्रकार अपने दिव्य दर्शन दिए थे और उसके बाद ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। पाँच सालों तक उन्होंने ‘उल्लू बनाओ अभियान’ को सुचारू रूप से चलाया। इस बार जब उन्हें इस अभियान की कमान नहीं सौंपी गई तो वे अपने भतीजेभांजे या फिर कुछ दूर के रिश्तेदार के माध्यम से इस अभियान को सुचारू रूप से चालू रखने के लिए लोगों के बीच फिर से मौजूद हैं। ‘उल्लू बनाओ अभियान’ का वर्तमान प्रतिनिधि और उनके सगे-संबंधी काफी जुझारू हैं। ये उनका जुझारूपन ही जो इतने सिर-फुटव्वल के बाद भी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का जुगाड़ कर लिया । हम उन्हें सम्मानपूर्वक ‘जुगाड़ी’ शब्द से भी सुशोभित कर सकते हैं। वो लुटे-पिटे जनों की चरण वंदना कर उनको देव होने की फिर से अनुभूति कराते हैं और इस अनुभूति के बदले में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रखते हैं। जब उन्हें लगता है कि इस बार देव हठ करने पर उतारू हैं तो वो उनके समक्ष सुरा सहित विभिन्न मनभावन उपहार चढ़ावे के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इतना सब पाकर देव एकदम से खिल उठते हैं। वो आशा और विश्वास के साथ मुस्कुराते हैं। उनके संग कूंचों, गली-मोहल्लों और नाले-नालियों के इर्द-गिर्द सड़ांध मारता हुआ कूड़ा-करकट भी मुस्कुराता है। मच्छर और मक्खियाँ झूमते हुए नृत्य करते हैं। बीमारियाँ उम्मीद भरी निगाहों संग अंगड़ाई लेते हुए मुस्कुराती हैं। आस-पास का वातावरण भी गंधाते हुए मुस्कुराता है। तभी बिजली कड़कती है और आसमान से लखनवी अंदाज में आवाज गूँजती है 'मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं।" 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


कार्टून गूगल से साभार 

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