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मंगलवार, 10 मार्च 2026

एक छोटी सी भय स्टोरी


जिले - भाई नफे! 

नफे - हां बोल भाई जिले! 

जिले - आज बड़ी बोरियत हो रही है। कोई बढ़िया सी स्टोरी सुना दे।

नफे - जो हुकुम मेरे आका!

जिले - भाई, ड्रामा करना छोड़ और स्टोरी सुना।

नफे - चल तो तेरी ये इच्छा भी पूरी कर देता हूं। 

जिले - हाँ भाई, अब जल्दी से सुना दे कोई बढ़िया सी स्टोरी।

नफे - तो सुन स्टोरी।  एक छोटी मासूम सी बच्ची के हाथ से छूटा पानी का गुब्बारा राह भटक गया और एक मोहतरमा के चरण छूने की कोशिश में उनके पास गिर कर फट गया। फटते ही उसके चीथड़े-चीथड़े उड़ गए। उसके कुछ अवशेष छींटों के रूप में उन मोहतरमा पर गिर गए। ये उस गुब्बारे का बहुत बड़ा गुनाह था और इस गुनाह में बराबर की जिम्मेदार थी वो मासूम बच्ची जिसने गुब्बारे को नीचे फेंक कर उससे ये गुनाह करवाया था। हालांकि गुनाह उस बच्ची का नहीं बल्कि होली के त्यौहार के खुमार का था, जिसमें डूब कर उसने इस गुनाह को अंजाम दिया था। 

जिले - भाई, इसमें गुनाह क्या हो गया? होली पर रंग, गुलाल और पानी के गुब्बारे तो चलते ही हैं।

नफे - तेरे लिए ये होली पर नॉर्मल बात है लेकिन उन मोहतरमा के लिए नहीं थी। 

जिले - अच्छा तो आगे की स्टोरी सुना।

नफे - वैसे देखा जाए तो होली के खुमार का भी दोष नहीं था, बल्कि दोष तो इस भारतीय संस्कृति को दिया जाना चाहिए जो किसी भी धर्म व समुदाय में भेद करना नहीं सिखाती। भारतीय संस्कृति की इसी खूबी को उस बच्ची ने अपने माता-पिता व घर के बुजुर्गों से ग्रहण किया होगा और उसने बिना भेद किए गुब्बारे को मोहतरमा को समर्पित कर होली की शुभकामनाएं देनी चाही होंगी। 

जिले - हद है भाई, भारतीय संस्कृति भला क्यों दोषी हुई? हमारी भारतीय संस्कृति आपसी सद्भाव और भाईचारे को 

सिखाती है और भला इसमें गलत क्या है?

नफे - भारतीय संस्कृति की ये खूबी तुझ जैसे और मुझ जैसे लोगों को भाती है, लेकिन उन मोहतरमा को शायद ये पसंद न हो।

जिले - बड़ी अजीब मोहतरमा है। खैर तू आगे की स्टोरी सुना।

नफे - अपनी-अपनी सोच है। अब देखा जाए तो असल में दोष भारतीय संस्कृति का ही है इसलिए भारतीय संस्कृति को स्वयं को दोषी मानते हुए ये स्वीकार करना चाहिए कि उसके कारण ही गुब्बारे ने ये गुनाह किया जिसकी परिणति एक तरुण की तरुणाई के कारुणिक अंत के साथ हुई। 

जिले - बताओ मोहतरमा पर जरा से पानी के छींटे गिरने का परिणाम एक युवा के जीवन की हानि से हुआ। देखा जाए तो ये बहुत ही दुःखद और शर्मनाक घटना है।

नफे - तेरे लिए ये भले ही दुःखद और शर्मनाक घटना हो, लेकिन हो सकता है कि उन मोहतरमा के कलेजे को इस घटना से ठंडक का अहसास हुआ हो? बहरहाल उन मोहतरमा के सगे-संबंधियों और शुभचिंतकों द्वारा तरुण को इस जीवन-मरण के चक्र से असमय मुक्त किए जाने से कुंभकर्णी निंद्रा में सोये हुए दंगे के जिन्न को जगाने का कार्य किया है। इस समाचार ने सामाजिक सद्भाव व भाईचारे के भीतर भय उत्पन्न कर दिया है। 

जिले - भाई, मैने तो सोचा था कि तू कोई मनोरंजक स्टोरी सुनाएगा, लेकिन तू तो भयभीत करने वाली स्टोरी सुनाने लगा।

नफे - बिलकुल ठीक समझा। ये आज की एक छोटी सी भय स्टोरी ही थी और संभवतः इस छोटी सी भय स्टोरी का अंत इसके विराट और भयंकर रूप लेने के बाद ही समाप्त होगा।

जिले - भाई मैं तो चला।

नफे - यूँ अचानक कहाँ चल दिया।

जिले - सद्भावना और भाईचारे को साथ लेकर समाज में प्रेम और सद्भाव को फैलाने, ताकि तेरे द्वारा सुनायी गयी ये छोटी सी भय स्टोरी विराट और भयंकर रूप को धारण न कर सके।

नफे - अगर ऐसा हो सका तो देश और समाज के लिए बहुत अच्छा होगा। चल मैं भी तेरे साथ चलता हूं।

(रचना तिथि - 8 मार्च, 2026) 

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

कार्टून ChatGPT से साभार 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

थाना जातिपुरम


    त्तर प्रदेश के एक थाने में एक अपराधी के संबंध में आमद करवाने गया तो रोचनामचा मुंशी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ही निकले। मैने उनसे वहां के थानाध्यक्ष के बारे में पूछा तो मुंशी जी ने बताया कि वे फलानी जाति के हैं। उस इलाके में ढिमकानी जातियों का बाहुल्य होने के कारण उन जातियों के थानाध्यक्ष उस थाने में नहीं लगाए जाते हैं। सरकार को शायद इस बात का डर रहता है कि कहीं उन जातियों के थानाध्यक्ष विपक्षी दल वालों का सहयोग न करने लगें और चुनाव में सरकार का समीकरण बिगड़ जाए। मुंशी, जो अलानी जाति से था, ने बताया कि उस थाने में चूंकि थानाध्यक्ष फलानी जाति के हैं तो वहां फलानी जाति के पुलिस कर्मियों की बहुलता है और चलती भी उन्हीं की है। मैंने हंसकर कहा कि इसका मतलब है कि अलानी जाति वाले पुलिस कर्मी इस थाने में अल्पसंख्यक हैं तो उसने हंसकर कहा कि हम ही अल्पसंख्यक नहीं हैं बल्कि और जाति वाले भी अल्पसंख्यक की भूमिका में हैं। तभी मुंशी के फोन पर किसी अन्य पुलिस कर्मी का फोन आया और वह मुंशी से फोन पर बहस करने में लग गया। फोन कटने पर मैंने उससे पूछा कि क्या बात हो गई तो वह हंसते हुए बोला कि महाशिवरात्रि के इंतज़ाम में फलानी जाति के पुलिस कर्मियों को छोड़ कर बाकी सभी पुलिस कर्मियों की ड्यूटी लगा दी गई थी। कल पास की नहर में एक आदमी डूब गया। उस डूबते हुए आदमी को बचाने के लिए पुलिस ने गांव के एक तैराक को नहर में कुदवाया पर बदकिस्मती से वह तैराक भी नहर में डूब गया। अब आसपास के गांव वाले दूसरे आदमी के डूबने का दोष पुलिस पर मढ़ रहे हैं। इस आपातकालीन स्थिति से बचने के लिए पुलिस की एक टुकड़ी चाहिए जिसमें बचे हुए थानाध्यक्ष की जाति के सारे पुलिसकर्मी भाइयों का नाम शामिल है इसी कारण फोन पर वह साथी मुझसे बहस करने में लगा हुआ था। थाने से बाहर निकला तो मुंशी जी के ही जाति भाई मिल गए। उन्होंने बताया कि थानाध्यक्ष भले आदमी हैं। वे यदि साठ प्रतिशत अपनी जाति के पुलिसकर्मियों के लिए करते हैं तो पचास प्रतिशत बाकी जाति के पुलिस कर्मियों के लिए भी करते हैं। अब हर जाति वालों को कम से कम अपनी जाति के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से इतनी आस तो रखनी ही चाहिए और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का भी ये कर्तव्य है कि वह अपनी जाति वाले कनिष्ठ पुलिस अधिकारियों की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखे। मैंने उस पुलिस कर्मी और उस थाना जातिपुरम को प्रणाम किया और वापिस अपने घर की राह पकड़ ली। वैसे ध्यान देने वाली बात ये है कि इस देश में ये इकलौता जातिपुरम थाना नहीं है। इस देश में ऐसे जातिपुरम थानों की संख्या भरपूर मात्रा में उपलब्ध है।

रचना तिथि - 16.02.2026

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

चौथा पुतला



    स बार दशहरे के अवसर पर स्त्रियों से पीड़ित पुरुषों की इच्छा है कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के साथ रावण का स्त्री स्वरूप एक चौथा पुतला भी दहन के लिए खड़ा किया जाए। 

इस पुतले का दसवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसे उसके पति ने अपनी जमापूंजी खर्च करके खूब पढ़ाया-लिखाया हो और उसके बाद वह इस काबिल हो गई कि किसी सरकारी विभाग में अफसर चुनी गई हो और अफसर बनते ही अपने पति को लात मारकर किसी अफसर के साथ ही प्यार की पींगे बढ़ा रही हो।

इस पुतले का नौंवा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसका शादी से पहले ही किसी और पुरुष से पक्का वाला याराना चल रहा हो और मा-बाप के द्वारा विवशता में शादी करने के बाद जो अपने पति को पहाड़ों पर हनीमून मनाने के बहाने ले जाकर किसी ऊंचे पहाड़ से उसको धक्का देकर उसका राम नाम सत्य कर चुकी हो।

इस पुतले का आठवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने त्रिया चरित्र को नया आयाम देकर अपने पति को इतना अधिक परेशान कर उसका जीना मुश्किल कर चुकी हो, कि अंततः उसे वीडियो बनाकर अपनी दुःख भरी आपबीती बताने के बाद आत्महत्या करने के लिए विवश कर चुकी हो।

इस पुतले का सातवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो पतिव्रता का अभिनय करने में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की दावेदारी करे और पति के घर से बाहर होने पर पराए मर्दों संग प्रेम का नया अध्याय लिखे। या यूं कहें कि ऐसी स्त्री जो सबके सामने सती सावित्री बनने का ढोंग करे और अपने कर्मों से नगर वधुओं को मात दे।

इस पुतले का छठा सिर ऐसी स्त्री का हो जो यौन शोषण के झूठे आरोप लगा कर अधिक से अधिक पुरुषों के जीवन की नैया डुबो चुकी हो।

इस पुतले का पांचवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों को धीमा विष खिलाते हुए पुण्य कमाने के उपक्रम में लगी हुई हो।

इस पुतले का चौथा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो दहेज मांगने का झूठा आरोप लगा शादी के मंडप पर पुलिस को बुला कर दूल्हे और उसके परिवार वालों को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान की यात्रा पर भिजवा कर अपने बॉय फ्रेंड संग गुलछर्रे उड़ाए।

इस पुतले का तीसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो स्वयं को चोटिल करके पुलिस वालों को नियमित रूप से अपने ससुराल में चाय पीने का अवसर प्रदान कर ससुराल पक्ष की ढंग से इज्जत उतरवाए।

इस पुतले का दूसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसने केवल इस उद्देश्य से शादी की हो कि कुछ दिनों बाद अपने पति से तलाक़ लेकर उससे अच्छी खासी संपत्ति एल्युमनी के रूप झटक कर अपना बाकी जीवन अय्याशी से व्यतीत करे।

इस पुतले का पहला अर्थात मुख्य सिर प्रतीक रूप में किसी ऐसी स्त्री का हो जो मां, बहन या सहेली की भूमिका निभाते हुए उपरोक्त वर्णित स्त्रियों को उनके पुरुष मिटाओ पावन अभियान में भरपूर सहयोग करे।

रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले पर अग्नि बाण चलाने का सौभाग्य किसी ऐसे पुरुष को प्रदान किया जाए जो किसी स्त्री द्वारा झूठे आरोप में फंसाए जाने के बाद वर्षों तक जेल में रहने का सुख भोग कर आया हो। इस पुतले के थोड़ी दूरी पर एक डांस फ्लोर भी बनवाया जाए ताकि जब रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले का दहन किया जाए तो स्त्रियों द्वारा पीड़ित पुरुष नाचते हुए "सियापति रामचंद्र की जय!" का जयकारा पूरी उमंग व जोश के साथ लगा सकें।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह 

चित्र - Meta AI से साभार 

सोमवार, 2 सितंबर 2024

साहित्य के शूर विनय विक्रम सिंह

     त्तर प्रदेश के जिले कानपुर में जन्मे, कक्षा पाँच के बाद, पिताजी का ट्रान्सफर लखनऊ होने पर, विनय विक्रम सिंह की आगे की शिक्षा-दीक्षा, नफ़ासत और अदब के शहर लखनऊ में हुई। इन्होंने कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ से स्नातक किया है तथा हिन्दी, अंग्रेजी, अवधी एवं मराठी भाषाओं में पारंगत हैं तथा वर्तमान में स्वयं स्थापित "ट्विनब्रेन्स" एक सीजीआई स्टूडियो में चीफ क्रिएटिव ऑफिसर के तौर पर एनीमेशन,आर्ट व गेम डिज़ाइन के क्षेत्र में कार्यरत हैं। 

विनय विक्रम सिंह ने भारत के एनिमेशन के पितामह पद्म श्री स्व. राम मोहन के साथ कई एनिमेशन फिल्म्स का दिग्दर्शन और क्रियान्वयन किया है। इन्होंने यूनिसेफ की मीना और मिट्ठू सीरीज़ का एनिमेशन (भारत के लिये), सारा की एनिमेशन सीरीज (अफ्रीका के लिये) एवं 100 से भी अधिक अंतरराष्ट्रीय एनिमेशन धारावाहिकों का एनिमेशन और निर्देशन, स्क्रिप्ट और क्रियान्वयन भी किया है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका, जापान और फ्रांस आदि देशों में गेम डेवलपमेंट के कई प्रोजेक्ट पर कार्य किया है।

       साहित्यिक अभिरुचि व लेखन के बीज इनके मन में सातवीं-आठवीं कक्षा से पड़ने लगे थे। तब रिज़र्व बैंक ऑफ इण्डिया में कार्यरत, इनके पिताजी लाइब्रेरी से उपन्यास लेकर आते थे। गम्भीर साहित्य के पठन-पाठन ने चिन्तन और रचनाशीलता के द्वार खोल दिये। समय के साथ-साथ चलते हुए, स्वाध्याय के द्वारा छंदाधारित कविता, गीत, कहानी एवं लघुकथा इत्यादि विधाओं में अपनी कलम को चलाते चले आ रहे हैं। इन्हें कला एवं लेखन के क्षेत्र में अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। तीस वर्षों के अनुभवकाल में, कला के क्षेत्र में इन्हें 40 से अधिक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान के साथ, इन्हें विश्वख्यात "कान्स लायन्स" भी प्राप्त हुआ। विनय विक्रम सिंह अवधी के प्रचार-प्रसार को समर्पित संस्था बैसवाड़ा अवधी संस्थान के संस्थापक भी हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से साहित्य के शूर विनय विक्रम सिंह की साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

सुमित प्रताप सिंह - आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

विनय विक्रम सिंह - मैं इसे रुचि का नाम देना पसन्द करूँगा। स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिये वार्त्ता का गुण सबके पास है किन्तु, काव्य के द्वारा अभिव्यक्ति रचनात्मकता है। काव्य कथ्य का शृङ्गार है। पद्य में जनस्पर्श है, दीर्घजीविता है। मेरा लेखन हाईस्कूल (1987-88) के समय प्रारम्भ हुआ था। तब मेरा लेखन छन्दमुक्त होता था।

सुमित प्रताप सिंह - लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?   

विनय विक्रम सिंह - कोई भी रचनात्मक गतिविधि या रुचि सदैव सकारात्मक गुण उत्पन्न करती है। मेरा संबंध कला क्षेत्र से है। लेखन भी एक रचनात्मक विधा है। कला व लेखन दोनों ही मुझे स्वयं से साक्षात्कार कराते हैं, विविध भाव और कल्पनाओं के द्वारा मुझसे रचना करवाते हैं। यह अनुभव सदैव ही सन्तुष्टि प्रदान करता है, मुझे और भी उत्तरदायी व परिपक्व बनाता है। 

सुमित प्रताप सिंह - क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

विनय विक्रम सिंह - जी, लेखन बदलाव लाता है और लाता रहेगा। यदि सामाजिक चेतना सुप्त है तो उसे जगाने का कार्य लेखन कर सकता है। लेख, निबन्ध, कविता, कहानी आदि तमाम विधाएँ हैं, जो जनमानस को उद्वेलित कर सकने में सक्षम हैं। किसी भी राष्ट्र की जनचेतना, उसकी संस्कृति और साहित्यिक नींव पर निर्भर होती है।

सुमित प्रताप सिंह - आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों? 

विनय विक्रम सिंह - मुझे अपने अवधी निर्गुण दोहे और उलटबाँसियाँ प्रिय हैं। वे चिन्तन को परिपूर्ण करते हैं, चित्त में आध्यात्मिक और तात्विक विमर्श को पुष्ट करते हैं।

सुमित प्रताप सिंह - आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

विनय विक्रम सिंह - मैं अपने लेखन से समाज के उन विषयों को सामने लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर लिखने से अधिकांशतः रचनाकार कतराते हैं। हर लेखनी प्रखर हो, मुखर हो, क्षणिक स्वार्थ से परे होकर और सत्य लिखे, यही मेरा समाज को सन्देश है।

रविवार, 24 जुलाई 2022

गधों का फैसला

जब एक इंसान ने 

दूसरे इंसान को गधा कहा 

तो एक गधे से 

ये सहा न गया 

गधा नाराज हो बोला

बेशक हम खोता है

पर अपुन फैंकता नहीं

बल्कि कुछ न कुछ ढोता है

इंसानी फितरत को 

एक मासूम गधे पे मढ़ते हो

पक्का तुम सब इंसान 

हम गधों से जलते हो

तुम सब हम गधों का

गिराना चाहते हो हौसला

तो गधा बिरादरी भी 

करती है ये फैसला

अबकी बार किसी गधे से

कोई भूल हुई तो हम

ये नेक काम करेंगे

उस गधे को डांटेंगे-फटकारेंगें

दो-चार दुलत्ती मारेंगे

फिर उसे बेइज्जत कर

बेवकूफ इंसान कहेंगे।

* चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

लघुकथा : क़ुरबानी


    रफ़ीक़ असलम के कान में फुसफुसाया - "भाई जान सामने देखो सलमा आ रही है। क्यों न आज इस गली के सूनेपन का फायदा उठा लिया जाये?"
असलम रफ़ीक के गाल पर जोरदार झापड़ मारते हुए गुस्से में बोला - "हरामखोर आज के पाक दिन ऐसी बात सोचना भी हराम है।"
रफ़ीक़ अपना गाल सहलाते हुए बोला- "माफ़ करना भाई जान गलती हो गयी।"
असलम ने रफ़ीक़ के कंधे पर हाथ धरकर मुस्कुराते हुए कहा - "आज बकरीद पर अल्लाह को बकरे की क़ुरबानी दे आते हैं फिर किसी और रोज हम दोनों इस हसीना की क़ुरबानी ले लेंगे।" 
"हा हा हा भाई जान आईडिया अच्छा है।" रफ़ीक़ खिलखिलाया। और दोनों मस्जिद की ओर बढ़ चले।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 25 जुलाई 2015

व्यंग्य : विकास गया तेल लेने

        
        देश की जनता इन दिनों हल्ला मचाये हुए है कि विकास कहाँ गयाएक साल हो गया पर विकास क्यों नहीं आयाअब पगली जनता को कौन समझाए कि विकास तो यहाँ है ही नहीं। अरे वो तो तेल लेने गया है। हर साल ही तो जाता है। 67 साल हो गए जाते-जाते फिर 68वें साल में भला क्यों रुकता। इसलिए इस साल भी चला गया। हालाँकि हर पाँचवें साल ये सपना दिखाया गया कि विकास कहीं नहीं जाएगा बल्कि यहीं रहेगा, लेकिन सपना केवल सपना ही बनकर रह गया और साल दर साल विकास जाता रहा तेल लेने। वैसे तो विकास हर साल ही तेल लेने जाता हैपर जाने क्यों इस साल ही इतना हो-हल्ला मचा हुआ है कि विकास को तेल लेने जाने से क्यों नहीं रोका गया। पर जब इतने सालों से विकास को जाने से कोई रोक नहीं पाया तो भला इस बार वो कैसे रुक पाता। वैसे एक बात तो है कि ये ससुरा विकास कुछ ज्यादा ही घुमक्कड़ हो गया है। अपने देश में कभी रुकता ही नहीं। इधर-उधर घूमता रहता है और हम देशवासी इसकी वापसी की राह पलकें बिछाए देखते रहते हैं। ऐसी बात नहीं है कि विकास अपने देश में नहीं रहता। वह बेशक बाहर घूमता फिरे लेकिन सरकारी फाइलों में वह सदैव विराजमान रहता है। इसलिए जब भी जनता पूछती है कि विकास कहाँ है उसके होने का सबूत दिखाओ तो सरकारी बाबू अपनी विशेष ईमानदारी से विकसित की गयी भारी-भरकम तोंद पर फाइल रखकर उसे खोलकर लल्लू जनता को फाइल में मुस्कुराते हुए विकास को दिखाकर झट से फाइल को बंद कर लेता है और बेचारी जनता इस सोच-विचार में खो जाती है कि वो तो नाहक ही परेशान थी कि देश में विकास नहीं रहता। अब उस भोली जनता को कौन समझाए कि जैसे श्रीराम माता सीता के शरीर को एक गुफा में छोड़कर उनकी छाया को अपने साथ ले गए थे कुछ वैसा ही कारनामा विकास ने भी किया है। अब ये और बात है विकास अपने असली रूप में तो तेल लेने चला गया और सरकारी फाइलों में अपना छाया वाला रूप छोड़ गया। जैसे लंकापति रावण सीता माता की छाया का अपहरण करके प्रसन्न रहता था वैसे भारत की जनता भी सरकारी फाइल में विकास के छाया रूप को देखकर मस्त रहती है। अब सोचनेवाली बात ये है कि विकास तेल लेने तो गया है पर वो कौन सा तेल लाएगाअब इसमें भी सोचने की बात है। हर बार ही तो लाता है भांति-भांति प्रकार के तेलक्योंकि अलग-अलग लोगों को भिन्न-भिन्न प्रकार के तेल की आवश्यकता होती है। सो विकास हर बार की तरह इस बार भी कई प्रकार के तेल लाएगा। विकास चमेली का तेल लाएगा उन लोगों के लिए जो हमेशा इसकी खुशबू में खोकर आनंदित रहते हैं और उन्हें दीन-दुनिया की न तो कोई खबर रहती है और न ही कोई मतलब। वह हर साल की तरह इस साल भी उन माननीय महोदयों के सिर में चमेली का तेल लगाएगा और वे सब चमेली के तेल के प्रेमी चमेली बाई बनकर विकास के आजू-बाजू ही नाचेंगे। विकास के देश में न रहने को दिन-रात कोसनेवाले महानुभावों के लिए वह सरसों का तेल लाएगा। पहले तो उन महानुभावों की हड्डियों को चटकाकर उनकी मरम्मत करते हुए उन्हें भाव विहीन बनाया जाएगा फिर प्रेमपूर्वक सरसों के तेल से उनके शरीर की मालिश की जायेगी। सरसों के तेल से इनके शरीर की मालिश होने से उनकी सारी थकान जाती रहेगी और उनकी विकास के न रहने की शिकायत भी ख़त्म हो जायेगी। हो सकता है कि शिकायत दूर होने का कारण फिर से हड्डियाँ चटकाए जाने का डर ही हो। विकास धतूरे का तेल उन लोगों के लिए लाएगा जो विकास का नाम ले-लेकर सरकार को आये दिन आँखें दिखाते रहते हैं। धतूरे के बीजों के तेल को दिव्य तेल बताकर दिया जाएगा तथा इसमें तेजाब मिलाकर इसे और दिव्य बनाया जाएगा। इस दिव्य तेल को सरकार को आँखें दिखाने की धृष्टता करनेवालों की आँखों में डालकर न रहेगा बाँसन बजेगी बाँसुरी’ की कहावत को चरितार्थ किया जाएगा। विकास द्वारा बादाम का तेल उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को भेंट स्वरुप दिया जाएगाजिनकी तीव्र बुद्धि सदा यह सिद्द करने को तत्पर रहती है कि विकास तो देश में थाहै और सदैव रहेगा। बादाम का तेल उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि में और अधिक वृद्धि करेगा। विकास द्वारा मिट्टी का तेल उन लोगों के लिए लाया जाएगा जो लोकतंत्र के प्रहरी होने का दावा करते हैं और चौथे खंबे की शक्ति प्रदर्शित करते हुए सत्ता के गलत कार्यों के विरुद्ध लिखते हुए लोकतंत्र की भावना को जीवित रखने को प्रयासरत रहते हैं। ऐसे लोगों को मिट्टी का तेल डालकर सरेआम जला दिया जाएगा। उनके साथ लोकतंत्र भी तड़प-तड़पकर मर रहा होगालेकिन डर के मारे देश की बहादुर जनता कुछ भी नहीं कहेगीबल्कि एक स्वर में बोलेगी कि अपना देश तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और विकास है इसका मस्तक। जबकि असल में लोकतंत्र तो मृत्युशैया पर पड़ा हुआ अपनी अंतिम साँसें गिन रहा होगा। और विकास वो तो चला जाएगा फिर से तेल लेने। 
लेखक: सुमित प्रताप सिंह

ई-1/4, डिफेन्स कॉलोनी पुलिस फ्लैट्स,
नई दिल्ली- 110049
कार्टूनिस्ट : श्री राम जनम सिंह भदौरिया 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

व्यंग्य : कागा अब बोले नहीं मुंडेर पे


   हुत दिन गुज़र गए पर अपनी मुंडेर पर कोई कागा अर्थात कौआ काँव-काँव करते नहीं दिखा। एक वो भी दिन थे जब अक्सर कौए काँव-काँव करते मुंडेर पर दिख जाते थे और हम बालक चीखते हुए उनसे कहते थे ‘उड़ जा कौआ चाचा आते हों’ या फिर ‘उड़ जा कौआ मामा आते हों’। सच कहें बेशक हम इतने बड़े हो गए लेकिन बचपन दिल में अभी भी जीवित है और ये बचपन अक्सर जिद करता है कि हमारी मुंडेर पर कोई कौआ आकर बैठे और जोर से काँव-काँव करे और फिर हम चीखकर बोलें ‘उड़ जा कौआ कोई अपना आता हो’। पर दिल की बात दिल में ही रह जाती है और कोई कौआ मुंडेर की ओर मुंह भी नहीं मारता और ये बचपन दिल के भीतर ही बैठा हुआ तड़पता रहता है। आजकल कौए भी ईद के चाँद बन चुके हैं वो साल में दो बार दिख भी जाता है लेकिन ये कौए तो साल में एक ही बार दीखते हैं वो भी श्राद्धों में। आखिर कौओं ने घर पर आना और आकर मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने की परम्परा का त्याग क्यों कर दिया? कहीं उन्हें भी कलियुगी संस्कृति ने अपनी छत्रछाया में जगह तो नहीं दे दी जो वो दूत बनना छोड़कर यूँ अचानक लापता हो गए। फिर मन सोचता है कि कौए बेचारे भी क्या करें आज के युग में बेटा बाप का नहीं रहा, भाई को भाई फूटी आँख नहीं सुहाता तो रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदारों को सीधी आँख भला कैसे देख सकते हैं? जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोगों की आशाएँ विशाल और ह्रदय सिकुड़कर छोटे होते जा रहे हैं और उन सिकुड़ते हृदयों में रिश्तेदार तो कभी रह ही नहीं सकते। पहले रिश्तेदार एक दूसरे के सुख-दुःख के साथी होते थे। मुसीबत के समय अपने रिश्तेदार के कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हो जाना सच्चे रिश्तेदार की निशानी होती थी। पर समय के कोल्हू ने रिश्तेदारी को ऐसा पेरा कि न तो सच्ची रिश्तेदारी सलामत बची और न ही सच्चे रिश्तेदार। छोटे-छोटे स्वार्थ की खातिर रिश्तेदार का राम नाम सत्य तक कर देने को तत्पर रिश्तेदारों को रिश्तेदारी का र भी ठीक ज्ञात नहीं रहा हो तो कौए बेचारे क्या करें? वो कैसे पता लगायें कि घर आनेवाला वाकई में रिश्तेदार है क्योंकि उसके हृदय में तो रिश्तेदारी नामक तत्व पहले ही तार-तार हो चुका मिलता है। शायद इसीलिए कोई कौआ भूले-भटके घर की मुंडेर पर बैठ भी जाए तो किसी रिश्तेदार के आने की सूचना देने को काँव-काँव नहीं करता। असल में उसे रिश्तेदार के दिल में वो पुराना प्रेम व स्नेह दिखाई ही नहीं देता इसलिए उसके भीतर काँव-काँव कर ख़ुशी मनाने की भावना भी दम तोड़ देती है। इसलिए कौओं ने अब काँव-काँव करना छोड़ दिया है। शहरों में बड़े-बड़े मकानों और संकुचित दिलों वाले भले लोग भी भला कहाँ कामना करते हैं कि कोई कौआ काँव-काँव करे और कोई रिश्तेदार आ टपके तथा उनकी व्यस्तता में खलल डाल दे। इसलिए उन्होंने अपने घर की मुंडेर पर काँच या लोहे के कंटीले तार लगाकर कौओं को वहाँ बैठने से अवरुद्ध कर दिया। अब कौओं को भी मुंडेर पर काँव-काँव कर मेहमान या रिश्तेदार के आने का संदेशा देने का चाव नहीं रहा है। अब वे अपना समय या तो किसी लाश का माँस नोंचने में व्यतीत करते हैं या फिर मनुष्य का वेश धरकर किसी सदन में जाकर काँव-काँव करने लगते हैं।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह  

कार्टून गूगल बाबा से साभार 

सोमवार, 29 जून 2015

लघु कथा : तमाशबीन



   पुलिस जिप्सी ने जैसे ही सड़क पर यू टर्न लिया, गलत दिशा से आ रही एक मोटरसाइकिल उससे टकरा गयी और उसपर सवार आदमी उछलकर कुछ दूर जा गिरा। पुलिस जिप्सी का ड्राइवर सूबे और उसका साथी हवलदार फत्ते झट से जिप्सी से नीचे उतरे और उस आदमी को सड़क से उठाकर उसे सड़क के एक किनारे बिठाकर उसे फर्स्ट ऐड देकर उसके सामान्य होने की प्रतीक्षा करने लगे। तभी सूबे ने देखा कि एक व्यक्ति अपने मोबाइल से उनकी रिकॉर्डिंग कर रहा है। यह देख सूबे को बीते दिनों मोबाइल से फ़िल्म बनाने और उसे तोड़-मरोड़कर अपने हिसाब से पुलिसवालों के खिलाफ इस्तेमाल करने की घटनाएँ ताज़ा हो गयीं। अपनी नौकरी खतरे में देख सूबे उस व्यक्ति से मोबाइल छीनने को उसपर झपटा, लेकिन वह व्यक्ति पलक झपकते ही वहाँ से उड़न छू हो गया। तभी वहाँ से गुज़र रहे एक पहलवान ने सूबे को टोककर उससे पूछा, "उस आदमी के पीछे क्यों भाग रहे थे? कौन था वो और उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ दिया जो उसे पकड़ने की इतनी जरुरत पड़ गयी?"

तभी मोटरसाइकिल सवार कराहते हुए उठा और पहलवान से बोला, "भाई साहब वह तमाशबीन था और ये तमाशबीन किसी की मदद करने के बजाय अपने मोबाइल से फ़िल्म बनाकर और उसे सब जगह भेजकर किसी न किसी बेचारे का दुनियाभर में तमाशा बनाते हैं। गलती मेरी थी जो मैं गलत साइड से जल्दबाजी में मोटरसाइकिल चलाकर जा रहा था। शुक्र है कि मेरे साथ कोई अनहोनी नहीं हुयी और भला हो इन पुलिसवाले भाइयों का जो इन्होंने समय पर सहायता देकर मुझे बचा लिया।"

तभी पहलवान ने अपनी कनखियों से अपने अगल-बगल में देखा तो पाया कि वहाँ मौजूद बाकी तमाशबीन भी वहाँ से खिसक चुके थे।


मंगलवार, 5 मई 2015

लघु कथा : अपना-अपना प्रेम


  क उत्साही पत्रकार दूर-दराज गाँव में अपने न्यूज़ चैनल पर लाइव टेलीकास्ट के माध्यम से मौजूद था
पत्रकार – “जी हाँ इस समय आप देख रहे हैं कि हमारे बगल में एक खेत किसान अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी लगाने को तैयार खड़ा हुआ है आइये हम किसान से ही पूछते हैं कि आखिर ऐसा खतरनाक कदम उठाने के लिए ये क्यों विवश हुआ”?
पत्रकार किसान के मुँह पर माइक सटा देता है – “हाँ तो पपुआ क्या आप हमारे चैनल को बताएँगे कि आप अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी क्यों लगाने जा रहे हैं”?
पपुआ – “प्रेम के कारण”
पत्रकार – “प्रेम के कारण। क्या बकवास कर रहे हो? तुम तो कह रहे थे कि फसल बर्बाद होने की वजह से फाँसी लगाने जा रहे हो। 
पपुआ – “साब हम अपने खेतों और ज़मीन को अपनी माँ मानते हैं और जितना आपको अपने चैनल की टी.आर.पी. से प्रेम है उससे कहीं ज्यादा प्रेम हम इस माँ से करते हैं फसल बर्बाद होने की वजह से हमारे ऊपर इतना कर्ज़ा चढ़ गया है कि हमारी माँ के नीलाम होने की नौबत आ गयी है और यही हमसे नहीं देखा जाएगा इसलिए हमने फैसला किया था अपनी धरती माँ से बिछुड़कर घुट-घुटके मरने की बजाय फाँसी लगाकर एक बार में ही अपने सारे कष्टों से मुक्त हो जायें

सोमवार, 16 मार्च 2015

सबसे बड़े साहब


     र सरकारी कार्यालय में एक बड़े साहब होते हैं और बाकी उनके अंतर्गत कार्य करनेवाले छोटे-मोटे प्राणी। बड़े साहब के निर्देशन में पूरा कार्यालय और कार्यालय के कर्मचारी कर्मठता और विवशता से जुटे रहते हैं। कार्यालय में बड़े साहब से भी बड़े एक साहब विराजमान होते हैं और वो होते हैं सबसे बड़े साहब। कहने को तो वो बड़े साहब के अंतर्गत उनकी सेवा में नियुक्त एक सरकारी कर्मचारी मात्र होते हैं लेकिन असल में जो दिखता है वो होता नहीं है और जो होता नहीं है वो न दिखकर भी देखना पड़ता है। इसलिए बड़े साहब बेशक बड़े दीखते हों लेकिन असल में वो सबसे बड़े साहब नहीं होते या यूँ कहें कि उनमें सबसे बड़े साहब बनने का सामर्थ्य ही नहीं होता।
कार्यालय के अल्प बुद्धि धारक कर्मचारी सबसे बड़े साहब को बड़े साहब का मात्र मातहत कर्मचारी मानकर उनको छोटा समझने की भूल अक्सर करते रहते हैं। यही भूल उनकी कठिनाइयों का सबसे बड़ा कारण होती है। सबसे बड़े साहब बड़े साहब की सेवा में दिन भर रत रहते हैं और उनकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं। उनका कर्तव्य होता है ऐसा प्रत्येक कार्य करना जो हम आम जीवों के वश के बाहर की बात हो और जो बड़े साहब को तन और मन का सुख प्रदान कर सके तथा सबसे बड़े साहब को सबसे बड़ा बना रहने में सहायक बना रहे। हम कमअक्लों को ये कार्य शायद छोटे लगते हों लेकिन ये छोटी सोच ही हमें छोटा बनाये रखती है और जो इस छोटी सोच से ऊपर उठकर कार्य करता है वो बनता है सबसे बड़ा साहब।
    बड़े साहब के इर्द-गिर्द लगभग पाँच वर्ग मीटर का घेरा होता है जिसमें तैनात रहते हैं सबसे बड़े साब। दूसरे शब्दों में कहें तो यह घेरा सबसे बड़े साहब का साम्राज्य होता है जिसके वो अघोषित सम्राट होते हैं। आदमी तो आदमी किसी पंछी की भी मजाल है जो इस घेरे में पर भी मार जाये। बड़े साब के कानों के आस-पास ही सबसे बड़े साहब का मुख रहता है और उस मुख से दफ्तर की हर टुच्ची से टुच्ची बात बड़े साहब के कानों से होती हुई उनके मस्तिष्क में सप्लाई होती रहती है।
   बड़े साहब बेशक थोड़ा-बहुत नाराज भी हो जाएँ तो कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन अगर सबसे बड़े साहब हमसे नाराज हो गए तो समझो कि भैंस गई पानी में। हमारे इस डर को सबसे बड़े साहब भी बखूबी जानते हैं इसलिए वो अक्सर हमें डराए रखते हुए हमारे डर को अपने फायदे में इस्तेमाल करते रहते हैं और हम सभी भोंदू बनकर इस्तेमाल होते रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
   सबसे बड़े साहब के मातहत भी कुछ जीव कार्यरत होते हैं। उन्हें हम बहुत बड़े साहब कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सबसे बड़े साहब को सबसे बड़ा बनाए रखने में इन बहुत बड़े साहबों का भरपूर योगदान होता है। जहाँ सबसे बड़े साहब का कर्मक्षेत्र बड़े साहब के इर्द-गिर्द ही होता है वहीं इन बहुत बड़े साहबों का कर्मक्षेत्र पूरा कार्यालय होता है। कार्यालय की हर छोटी-बड़ी खबर बहुत बड़े साहबों से प्राप्त कर सबसे बड़े साहब अपने बड़े साहब के चरणों में प्रस्तुत करते रहते हैं। परिणामस्वरुप आये दिन कार्यालय के किसी न किसी बेचारे कर्मचारी पर गाज गिरती रहती है। कार्यालय के कर्मचारी सबसे बड़े साहब के अत्याचारों से तंग आकर दिन-रात उन्हें गरियाते रहते हैं और श्राप देते रहते हैं। एक दिन ऐसा भी आता है जब दुखी कर्मचारियों द्वारा दुखी मन से दिया गया श्राप सिद्ध हो जाता है और बड़े साहब जरा सी गलती होने पर सबसे बड़े साहब से इतना नाराज हो जाते हैं कि सबसे बड़े साहब को सबसे छोटा साहब बनने में अधिक समय नहीं लगता।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

विश्व पुस्तक मेले में हुआ सुमित की 'नो कमेंट' का लोकार्पण



   शोभना वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान में दिनाँक 19.02.2015 को विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर दिल्ली व इटावा गान के रचयिता सुमित प्रताप सिंह की तीसरी पुस्तक 'नो कमेंटका लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही पुलिस काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गयाजिसमें दिल्ली पुलिस के कवियों ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं ग़ज़लकार डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल ने की। युवा गीतकार डॉ. हरीश अरोड़ा एवं नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक डॉ. लालित्य ललित विशिष्ट अतिथि की भूमिका में मंच पर मौजूद थे। संचालन का भार सुमित प्रताप सिंह ने उठाया तथा कार्यक्रम का संयोजन किया शोभना वेलफेयर सोसाइटी के प्रतिनिधि सुरेश सिंह तोमर ने। कार्यक्रम का शुभारम्भ 'नो कमेंटके लोकार्पण से हुआ। इसके उपरांत पुलिस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की शुरुआत दिल्ली पुलिस के युवा कवि मनीष 'मधुकरकी रचनाओं से हुई। उन्होंने अपने मुक्तकों से श्रोताओं का मनोरंजन किया। इसके बाद दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर हरबोला रमेश ने कविता पाठ किया। उनकी कविता को उनके साथी इंस्पेक्टर पद्मेंद्र रावत ने गाकर सुनायाजिसे वहाँ उपस्थित जनसमूह ने बहुत सराहा। दिल्ली पुलिस के चर्चित ग़ज़लकार प्रमोद शर्मा 'असरने सुमित को उनकी पुस्तक 'नो कमेंटके लिए बधाई दी और अपनी ग़ज़लों से सबको वाह-वाह करने को मज़बूर कर दिया। सुमित प्रताप सिंह ने अपनी चिर-परिचित शैली में अपनी कविता 'अच्छा है बकरापनसुनाकर साम्प्रदायिकता पर कटाक्ष करते हुए वहाँ मौजूद श्रोताओं के दिलों को झकझोर दिया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. हरीश अरोड़ा ने कहा कि सुमित व्यंग्य के क्षेत्र में तेजी से उभरते हुए व्यंग्यकार हैं और आशा है कि वो यूँ ही सार्थक व्यंग्य लिखना जारी रखेंगे। विशिष्ट अतिथि डॉ. लालित्य ललित ने कहा कि पुलिस और कविता विरोधाभासी हैं लेकिन सुमित की 'नो कमेंटऔर पुलिस के कवियों की लेखक मंच पर उपस्थिति पुलिस का उजला पक्ष दिखाती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं शोध दिशा के संपादक डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल ने 'नो कमेंटके लिए अपनी शुभकामनायें अर्पित कीं और कहा कि सुमित प्रताप की नई पुस्तक भी शीघ्र आनी चाहिए ताकि पाठक सुमित प्रताप की व्यंग्य कला का पूरा लाभ उठा सकें। मुख्य अतिथि डॉ. प्रेम जनमेजय ने अपनी व्यंग्य शैली में पुलिस और साहित्य के रिश्ते को परिभाषित किया और कहा कि आज की गोष्ठी पुलिस कर्मियों के भावनात्मक रूप का दिग्दर्शन कराती है। इस अवसर पर प्रदीप महाजनअमित मिश्रामुस्ताक अंसारीआशीष राघवविजय गुरदासपुरी, बी.के. सिंहरशीद अहमदप्रवल यादवमोहन कुमारजयदेव जोनवाल इत्यादि सुधीजन उपस्थित थे। 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

क्या दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई हैं


   कुछ साल पहले दिल्ली में रोजी-रोटी की खातिर बसने आये या फिर सालों से दिल्ली में निवास करने के बावजूद दिल्ली को अपना नहीं माननेवाले लोगों से अक्सर बिन माँगी राय मिलती जाती है कि दिल्ली की लड़कियों का चरित्र ठीक नहीं होता अर्थात वो बिगड़ी हुई होती हैं। इन तथाकथित रायवीरों को यह बताना जरूरी है कि दिलवालों के शहर दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैं। दिल्ली ही क्यों लड़कियाँ किसी भी शहर या कसबे या फिर गाँव की बिगड़ी हुई नहीं होतीं। अब चूँकि बात दिल्ली की लड़कियों की हो रही है तो दिल्ली शहर में हर देशहर प्रान्त एवं हर जाति और सम्प्रदाय के लोग पाए जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दिल्ली शहर में एक लघु भारत बसता है। इस लघु भारत में रहते-रहते यहाँ के निवासी खुले दिल के स्वामी हो जाते हैं तथा किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने में औरों से अधिक सिद्धहस्त भी होते हैं और उनके शब्दकोश से भेदभाव और असंभव शब्द धीमे-धीमे मिट जाते हैं। किसी के साथ दो पल हँसकर बात करने को बिगड़ा हुआ होना कहा जाए तो शायद दिल्ली का हर निवासी बिगड़ा हुआ है। अन्य शहरों की भाँति दिल्ली की लड़कियों का भी एक परिवार होता है जिसमें सभ्यता एवं संस्कृति वास करती हैं। यहाँ की लड़कियाँ भी अपने परिवार के सम्मान की परवाह करती हैं और मर्यादा का पालन करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर होती हैं। जिन लड़कियों को देखकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ेपन का तमगा प्रदान किया जाता है असल में वो उन लड़कियों का 10-12 प्रतिशत होता है जो विभिन्न शहरों या कसबों से दिल्ली में शिक्षा प्राप्त करने या नौकरी करने के उद्देश्य से आती हैं और अपने माँ-बाप के विश्वास का राम नाम सत्य करके यहाँ स्वच्छंदता की सारी हदें पार कर डालती हैं और उन्हीं लड़कियों को दिल्ली की लड़कियों का प्रतिनिधि मानकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ा घोषित कर दिया जाता है। इसलिए यदि कभी कोई आपसे कहे कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी होती हैं तो उससे कहिएगा कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैंबल्कि ऐसा सोचनेवाले उस व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही बिगड़ा हुआ है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
www.sumitpratapsingh.com

रविवार, 7 दिसंबर 2014

व्यंग्य : चूहा मौत जाँच आयोग


     कॉलोनीवाले काफी दिनों से परेशान थे। कॉलोनी में डेरा जमाये हुए चूहों ने उन सबका जीना हराम कर रखा था। आख़िरकार एक दिन ईश्वर ने उनकी सुन ली और उनकी जान आफत में डाले रखनेवाले चूहों का सरदार कॉलोनी के एक घर के स्टोर में धराशाही हुआ मिला। उस एक हाथ लंबे चूहे के शव को देखने के लिए सभी कॉलोनीवासी एकत्र हुए। उन सबके लिए यह बहुत ही सुखद दृश्य था। अब कॉलोनीवासियों के लिए यह शोध का विषय बन चुका था, कि उस बलशाली चूहे की मौत आखिर इतनी आसानी से कैसे हुई? वहाँ उपस्थित जनसमूह में एकत्र व्यक्ति इस विषय पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। एक बात गौर करने लायक है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हम भारतीयों को चाहे कुछ विशेष रूप से प्राप्त न हुआ हो, लेकिन अपने-अपने विचार प्रस्तुत करने और अपने-अपने तर्क देने का अधिकार अवश्य मिल गया है और इसी अधिकार का सदुपयोग करते हुये सभी ने अपने-अपने अनुमानों के घोड़े दौड़ने आरम्भ कर दिए। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन  के एक कर्मठ सदस्य, जो अपनी नौकरी के दौरान कर्मठता नामक बुराई से दूर ही रहे, ने अपने विचार प्रस्तुत किये कि ये चूहा अभी हाल ही में पड़ोसी राज्य में एक तथाकथित संत के पुलिस द्वारा पकडे जाने के घोर दुःख में डूबकर चल बसा है।
उनके इस तर्क के पक्ष में कुछ नरमुंड हिले तथा नरमुंडों ने नहीं हिलकर अपनी समर्थित न होने की इच्छा प्रदर्शित कर दी।

कॉलोनी की एक चाची गंभीर होकर बोलीं, "ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा। बल्कि इस चूहे ने जिस स्टोर में अपने प्राण त्यागे, उस स्टोर को इसने अपना अभेद्य किला समझ लिया होगा तथा खुद स्वघोषित संप्रदाय का प्रधान। इसके भ्रम को शेर के मौसा बिलौटे ने तोड़ डाला और अपने खतरनाक पंजों के वार से इसे यमलोक पहुँचा दिया।"
अब कॉलोनी के युवा दल की बारी थी। उनमें से एक युवा ने तर्क दिया, "इस चूहे की मौत हृदयघात से हुई है। कुछ दिन पहले इसके पुत्र को कॉलोनी के एक घर में पिंजरे में फँसा कर मार डाला गया था। अपने पुत्र के वियोग में ही इसके प्राण पखेरू उड़ गए हैं।"

बहरहाल जैसा कि प्रत्येक सभा में होता है वही इस सभा में भी हुआ। बहस आरम्भ हुई और बिना किसी परिणाम के बहस का समापन भी हो गया। अंत में एक बुजुर्ग उठे। कलियुग में वैसे तो बुजुर्गों को इतना सम्मान दिया जाता है कि उनके हाल पर छोड़ना ही हम कलियुगी जीव अपना परम कर्तव्य समझते हैं, लेकिन जब कोई उलझन या परेशानी  आती है तो इन्हीं बुजुर्गों के तजुर्बों के आगे दंडवत होने के लिए हम सभी तत्पर रहते हैं। बहरहाल बुजुर्ग ने राय दी कि इस चूहे की मौत की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया जाए, जिसका नाम रखा जाए "चूहा मौत जाँच आयोग"। यह राय सुनते ही राजनीतिक रूप  से बेरोजगार हुए व्यक्तियों के चमचों की बाछें खिल गईं। उन चमचों के कठिन प्रयत्न आखिर रंग लाये और उस क्षेत्र के भूतपूर्व विधायक के नेतृत्व में पिछले चुनावों में अपनी जमानत जब्त करवा चुके निगम पार्षदों ने इस आयोग का जिम्मा संभाला। अब कॉलोनी वालों को प्रतीक्षा है कि "चूहा मौत जाँच आयोग" कब और क्या रिपोर्ट देता है? जबकि "चूहा मौत जाँच आयोग" के सम्मानित अध्यक्ष व सदस्य इस इंतज़ार में हैं कि कॉलोनी में किसी और बलशाली चूहे की मौत हो और इस चूहे की फ़ाइल बंद करके अगले चूहे की मौत पर व्यस्तता का बहाना मिल सके।


रविवार, 30 नवंबर 2014

लघु कथा : बराबरी


बस में काफी भीड़ थी। सलमा बस में अपनी सहेली के साथ महिला सीट पर बैठी हुई थी। वह बहुत देर से बस में खड़े हुए एक लड़के को देख रही थी। उस लड़के को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह बहुत ही थका हुआ था और थकान के मारे उससे खड़ा भी हुआ नहीं जा रहा था। 
अचानक सलमा ने उस लड़के को बुलाते हुए कहा, "भैया आप मेरी सीट पर आकर बैठ जाइए।"
"तू पागल हो गई है जो एक अनजान लड़के को सीट दे रही है।" सलमा की सहेली उसे डाँटते हुए बोली।
सलमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज के समय में हम महिला और पुरुष की बराबरी की बात करते हैं तो यह बात हमारे व्यवहार में भी होनी चाहिए और मुझे लगता है कि मुझसे ज्यादा उस लड़के को महिला सीट की जरुरत है।"
इतना कहकर सलमा वहाँ से उठकर खड़ी हुई और अपनी सीट उस लड़के को दे दी।

*चित्र गूगल बाबा से साभार 

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

व्यंग्य : लिफ़ाफे के भीतर


   हर की उस छोटी सी कॉलोनी में उस रोज विद्रोह की सुगबुगाहट होने लगी, जब उस कालोनी की सीवर लाइन जाम हो जाने के कारण बिजली घर पूरी तरह भर गए। मज़बूरन बिजली विभाग के कर्मचारियों को उस कालोनी की बिजली की सप्लाई काटनी पड़ी। मई के गर्म महीने में बिना बिजली के कॉलोनीवालों के तपते हुए शरीरों में उनके मस्तिष्क भी बुरी तरह तपकर भट्टी का रूप धारण कर चुके थे। कॉलोनीवालों के एक परिचित पत्रकार से उनकी दुर्दशा न देखी गई और उसने जिम्मेदारी संभाली कि वह अपने अख़बार के माध्यम से कॉलोनीवासियों की समस्या का समाधान करने का भरकस प्रयत्न करेगा। जब वह पत्रकार उस कॉलोनी में अपने फोटोग्राफर के साथ उस खबर को कैद करने के लिए पहुँचा तो वहाँ परेशान कॉलोनीवासियों के दुखों को सुनकर उसकी भी आँखें भर आईं। उसने उस कॉलोनी की समस्या को राई का पहाड़ बताकर अपने अख़बार में प्रमुखता से छपवाया। अख़बार में खबर आते ही नेता व सम्बंधित विभागों के अधिकारी गण आकर कॉलोनी में हाजिरी लगाने लगे। पत्रकार भी इस दौरान कॉलोनी में हाज़िर रहा। उसने एक बात महसूस की कि कोई भी नेता अथवा अधिकारी कॉलोनी में आता तो चुपचाप एक बंद लिफाफा कॉलोनी की एसोसिएशन के अध्यक्ष के हाथों में पकड़ाकर चला जाता। लिफाफा हाथ में आते ही अध्यक्ष महोदय बाकी कालोनी वासियों के साथ चुपचाप अपने-अपने घरों में विश्राम करने चल पड़ते। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। पत्रकार इस दौरान शांत होकर इस सारी प्रक्रिया का साक्षी बना रहा। अब उस पत्रकार को अध्यक्ष के लिफाफा लेने की क्रिया पर बहुत क्रोध आने लगा था। उसने काफी सोच-विचार के उपरांत यह अनुमान लगाया कि हो न हो अध्यक्ष महोदय को इस बात को यहीं दबाने के एवज में लिफाफे में बंद करके गुपचुप तरीके से रकमरूपी रिश्वत दी जा रही है जिसमें कालोनीवालों की भी गुप्त सहमति है। पत्रकार ने निश्चय किया कि वह अध्यक्ष और कॉलोनीवालों को अकेले-अकेले रकम नहीं डकारने देगा। अब वह अगले दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगा। अगले दिन एक और अधिकारी महोदय कॉलोनी में पधारे और कुछ देर के विचार-विमर्श के पश्चात उन्होंने भी अध्यक्ष की ओर चुपके से एक लिफाफा बढ़ा दिया, जिसे पत्रकार ने चीते सी फुर्ती दिखाकर अध्यक्ष का प्रतिनिधि बताकर बीच में ही झटक लिया। उस अधिकारी के चले जाने के बाद पत्रकार ने अनुभव किया कि लिफाफे के भीतर कुछ हलचल हो रही है। 
पत्रकार ने घबराते हुए पूछा, "कौन है लिफ़ाफ़े के भीतर?" 
तभी लिफाफे का मुँह थोड़ा सा खुला और उससे से आवाज आई, "जी मैं आश्वासन हूँ"।

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 


मंगलवार, 22 जुलाई 2014

निंदा टु निंद्रा



   निंदा नामक क्रिया हम भारतीयों को इतनी अधिक भाती है, कि इस क्रिया को कर-करके भी हम लोग बिलकुल भी नहीं थकते। घरोंगलीमोहल्लोंबाजारों व कार्यालयों में जब भी हमें अवसर मिलता है हम तन्मयता से निंदा रुपी क्रिया में तल्लीन हो जाते हैं। हमारी निंदा का पात्र अक्सर वह बेचारा मानव होता हैजो किसी न किसी मामले में हमसे बीस होता है और हम स्वयं के उन्नीस रह जाने का बदला उससे उस पर निंदा शस्त्र का प्रयोग करके लेते रहते हैं। हम चाहकर भी निंदा से दूरी नहीं बना पाते। हमारी अक्षमता हमें निंदा से चिपके रहने को विवश किये रहता है। वैसे निंदा झेलनेवाले को निंदा से हानि की बजाय लाभ ही अधिक रहता है। वह नियमित निंदा नामक शस्त्र का मुकाबला करते-करते और अधिक चुस्त-दुरुस्त होकर चपलता प्राप्त कर लेता है और हम निंदा में खोये हुए जस के तस बने रहते हैं। निंदा झेलनेवाला कबीर के दोहे "निंदक नियरे राखियेआँगन कुटी छवाय। बिन पानीसाबुन बिना,निर्मल करे करे सुभाय।।" से प्रेरणा लेकर हम निंदकों की निंदा को झेलते हुए प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ता रहता है और हम कुंए के मेढक बनकर अपने उसी छोटे से संसार में मस्त रहते हुये दिन-रात निंदा में लगे रहते हैं। हम भारतवासियों के साथ-साथ हमारे द्वारा चुनकर संसद के प्रतिनिधि भी निंदा नामक क्रिया का प्रयोग करने में अत्यधिक सुखद अनुभूति का अनुभव करते हैं। विशेषरूप से विपक्ष में बैठने के लिए विवश होनेवाले प्रतिनिधियों के लिए तो यह क्रिया संसद के होनेवाले अधिवेशनों को बिताने का एकमात्र मुख्य साधन है। सत्ता पक्ष चाहे जितना भी अच्छा काम कर लेलेकिन विपक्ष उसके हर कार्य में खोट निकालते हुए अपने निंदा रुपी कर्तव्य का पालन अवश्य करेगा। हालाँकि सत्ता पक्ष अपने कार्य में लीन रहते हुए विपक्षी निंदकों को आये दिन ठेंगा दिखाता रहता है। कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता हैकि जब निंदक निंदा करते हुए  सदन में बैठे-बैठे निंद्रा में ही खो जाते हैं और स्वयं ही निंदा के पात्र बन जाते हैं। असल में उन्हें यह बात धीमे-धीमे समझ में आने लगती है कि जब-जब भी किसी देश की जानता जाग उठती है तो अक्षमों व नालायकों को निंदा करते-करते संसद में निंद्रा में खोते हुए ही अपना वक़्त बिताना पड़ता है।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

चित्र गूगल से साभार 

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