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रविवार, 14 अगस्त 2022

तिरंगे की निश्चिंतता

    तिरंगा इन दिनों प्रफुल्लित हो मुस्कुरा रहा है। मुस्कुराए भी क्यों न आखिरकार उसे हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत देश के चप्पे - चप्पे में लहराने का सुखद आनंद जो प्राप्त होने जा रहा है। जहां अधिकांश देशवासी तिरंगे को प्रसन्नता पूर्वक अपने - अपने घरों में फहराने की योजना बना रहे हैं, वहीं कुछ देशवासी विवशता व अनिच्छा का अपने मन-मस्तिष्क में घालमेल कर तिरंगा न फहराने की जुगत भिड़ा रहे हैं। इन दिनों जिस ओर भी दृष्टि दौड़ाओ वहां तिरंगा ही दिखाई दे रहा है। सड़कों पर वाहन चालकों से किसी न किसी प्रकार धन ऐंठने वालों ने भी आजकल तिरंगे की शरण ले ली है। उनके द्वारा भावनाओं का व्यापार कर वाहन चालकों को औने-पौने दामों में तिरंगे सौंपे जा रहे हैं। दुकानों पर बिकने को आतुर तिरंगे बाजारों की शोभा बढ़ा रहे हैं और साथ ही साथ कई बेचारों का जी कोयले की भांति जला रहे हैं। तिरंगा इन दिनों व्यस्त होने का एक माध्यम भी बन गया है। सरकारी कार्यालयों में छोटे - बड़े कर्मचारी तिरंगे के संसार में व्यस्त हैं। बड़े कार्यालयों से छोटे कार्यालयों में धड़ाधड़ तिरंगों की खेप भिजवाई जा रही है। आदेशानुसार छोटे कार्यालयों से कर्मचारियों की घर पर लहराते तिरंगे के साथ मनमोहक फोटो व सेल्फियां बड़े कार्यालयों की ओर सावधानी से मार्च करती हुईं पहुंच रहीं हैं। इस बार तिरंगा कुछ निश्चिंत सा है। उसका निश्चिंत होना स्वाभाविक भी है। अब परिस्थितियां जो उसके अनुकूल हैं। अब न तो उसे सरेआम जलाए जाने का डर है और न ही फाड़ कर अपमानित किए जाने का भय। इन दिनों निश्चिंतता उसका स्वभाव बन गई है। अब वह निर्भय और निश्चिंत हो हवा संग अठखेलियां खेलते हुए जमकर लहरा रहा है। देश में आयोजित किए जा रहे अमृत महोत्सव में तिरंगे को अमृत चखे जाने की अनुभूति हो रही है।

     अचानक कुछ कर्कश ध्वनियों को सुन तिरंगा विचलित हो उठता है। "मेरे दिल में देशभक्ति कूट - कूट कर भरी हुई है ये जरूरी तो नहीं कि मैं अपनी देशभक्ति का झूठा दिखावा करने के लिए अपने घर में तिरंगा फहराने का ड्रामा करूं।" "ये लोग घर-घर तिरंगा फहराने के षड्यंत्र के अनुसार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं।" "बाबू जी, हर गली शराब की दुकान योजना ने हमारी हालत पतली कर दी। शराब ने हमारा सबकुछ बिकवा दिया। हम तिरंगा घर पर फहराएंगे पर पहले हम बेघरों को घर तो दो, वरना हम नहीं फहराने वाले तिरंगा - विरंगा।" ये सब सुन कर तिरंगा सकुचाते हुए उदास हो धीमी गति से लहराने लगता है। तभी तिरंगे को जय हिंद और वंदे मातरम का घोष करती हुई भीड़ दिखाई देती है। उसे दिखाई देता है कि भीड़ के बीच में अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर सैनिक का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ उसके अपनों को अपने अंतिम दर्शन देने के लिए चला आ रहा है। ये दृश्य देखकर तिरंगा द्रवित हो उठता है और अचानक वह तन कर ये सोच कर गर्व से पुलकित हो लहराने लगता है कि जब तक देश की खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूत हैं तब तक तिरंगे के सम्मान को कोई आंच नहीं आ सकती।

बुधवार, 4 नवंबर 2020

व्यंग्य : पर्यावरण के लिए युद्ध


   देश की राजधानी में पर्यावरण एक बार फिर से खतरे में है। इसलिए फिर से पर्यावरण के लिए युद्ध लड़ने का समय आ गया है। युद्ध की तैयारी के लिए पर्यावरण से चले पिछले युद्धों की फाइलों को जल्दबाजी में टटोला जा रहा है। उन फाइलों का अध्ययन कर पीछे देख आगे चल का फार्मूला अपना कर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला कर पराली जलाने के लिए पड़ोसी राज्यों के किसानों को पानी पी-पी कर कोसा जा रहा है। इसके साथ ही साथ राजधानी के निवासियों द्वारा निजी वाहनों का प्रयोग करने के लिए उनकी कड़ी निंदा करने की प्रक्रिया चल रही है। उन्हें सलाह की वेशभूषा में आदेश दिए जाने की तैयारी की जा रही है कि वे सभी सार्वजनिक यातायात व्यवस्था का सदुपयोग कर अपनी यात्रा करने की तैयारी आरंभ करें। ये सुनते ही पहले से ही भीड़ से भयभीत सार्वजनिक यातायात व्यवस्था का दम फूलने के संग-संग डर के मारे उसके पसीना छूटने लगा है। राजधानी वासियों ने अपनी आदतानुसार सुझाव रुपी आदेश का पालन करने के लिए भली-भांति तैयारी करनी शुरू कर दी है और इस तैयारी के अंतर्गत सार्वजनिक वाहनों की भीड़ में घुसने और उस भीड़ में से सकुशल बाहर निकलने का अभ्यास करना आरंभ कर दिया है। एक घर से आरंभ हुआ ये अभ्यास धीमे-धीमे पूरी राजधानी में फैलता जा रहा है। राजधानी में वास करने वाली भेड़ें राजधानी वासियों की इस कार्यवाही को देख कर शंका कर रही हैं कि उनके झुंड में से गायब हुई भेड़ों ने कहीं इंसान की खाल पहननी शुरू तो नहीं कर दी है।

लंबे समय तक सोने के बाद जागे ऑड-इवन बंधुओं ने बुलावे का अंदेशा जानकर तैयार होने की प्रक्रिया आरंभ कर दी है। स्लोगनों से सजी तख्तियों संग प्रदूषण से युद्ध करने के लिए अप्रशिक्षित सैनिकों ने रेड लाइटों पर मोर्चा संभाल लिया है और अपने एक हाथ में स्लोगनों की तख्तियाँ पकड़े तथा दूसरे हाथ में स्मार्ट फोन पकड़ कर उसमें खोते हुए स्मार्ट तरीके से अपना टाइम पास करने में मस्त हो चुके हैं। लंबे-चौड़े होर्डिंग राजधानी की हर रेड लाइट पर युद्ध की घोषणा करते दीख रहे हैं। विज्ञापनों के पेट में जितना भी धन रूपी भोजन डाला जा रहा है, उनकी भूख उतनी ही अधिक बढ़ती जा रही है तथा वे सब कुएँ से खाई का रूप धारण करते जा रहे हैं। जैसे-जैसे विज्ञापनों का आकार बढ़ रहा है वैसे ही युद्ध का नेतृत्व कर रहे महायोद्धा के पेट का आकार भी बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण ये सब देख कर अपने पुरखों खर-दूषण को साष्टांग प्रणाम करने के उपरांत दंड पेलना आरंभ कर देता है। पर्यावरण एक बार को इस युद्ध का नेतृव कर रहे महायोद्धा और उनके कथित युद्ध को श्रद्धापूर्वक नमन करता है और फिर राजधानी के दमघोंटू वातावरण में साँस लेने का भरकस प्रयत्न करते हुए अपनी अंतिम घड़ी की राह तकना शुरू कर देता है। तभी वह बुझती आँखों से देखता है कि उस कथित युद्ध का नेतृत्व कर रहे महायोद्धा के बगल में पर्यावरण का वेश धारण किए हुए कोई बहुरुपिया खड़ा हुआ मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर राजधानी वासियों का अभिवादन स्वीकार कर रहा है। महायोद्धा के अकुशल सैनिक उस कथित युद्ध की कथित जीत के उपलक्ष में य घोष करते हुए दिखाई देते हैं। पर्यावरण अपनी भूल पर पछतावा करता है कि उसने स्वयं को असली पर्यावरण समझने की भारी भूल की। इसी पछतावे में उस बेचारे के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

बिनोद हमारे दिलों में है


      ये ज़माना ट्रेंडिंग का है। सोशल मीडिया पर कब क्या ट्रेंड हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इन दिनों ट्विटर पर ट्रेंडिंग की जिम्मेवारी बिनोद ने संभाल रखी है। देश की अधिकांश ट्विटरी जनता इस बात को जानने की इच्छुक है कि आखिकार बिनोद को क्यों ट्रेंड किया जा रहा है।

असल मे यह सब एक यू-ट्यूब चैनल Slayy Point से शुरू हुआ, जब उसके क्रिएटर अभ्युदय और गौतमी ने अपने वीडियो पर आने वाले कमेंट पर एक वीडियो बनाने का सोचा। 15 जुलाई को उन्होंने अपने चैनल पर ‘Why Indian Comments Section is Garbage (BINOD)’ नाम से एक वीडियो शेयर किया। जिसमें उन्होंने लोगों के कुछ अजीबोगरीब कमेंट्स दिखाए। इस वीडियो में बिनोद थारू नाम के एक शख्स ने हर कमेंट में सिर्फ बिनोद लिखा था। वीडियो के सामने आने के बाद से ही लोगों ने हर यू-ट्यूब वीडियो पर कमेंट में बिनोद लिखना शुरू कर दिया।

जल्द ही यह ट्रेंड Twitter पर भी लोकप्रिय हो गया। विचारणीय प्रश्न ये है कि बिनोद थारू नामक व्यक्ति क्यों सभी जगह बिनोद लिखता फिरता है।

यदि हम इस विचारणीय प्रश्न पर विचार न भी करें तो भी बिनोद के इस बिनोदी व्यवहार का कारण समझा जा सकता है। इस संसार में हर इंसान अपनी रोटी, कपड़ा और मकान इत्यादि आवश्यकताओं के पूरा होने बाद अपने दिल में एक सपना पालना शुरू करता है। उस सपने का नाम है 'जग में नाम कमाना'। नाम कमाने के लिए लोग दान देते हैं, लोगों की सहायता करते हैं और स्कूल, धर्मशाला इत्यादि का निर्माण करते हैं। जो ये सब नहीं कर पाते हैं वे अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल मीडिया पर बैठ जाते हैं। शायद इसी सपने को साकार करने के लिए बिनोद ने अपना बिनोदी अभियान शुरू किया होगा।

बहरहाल बिनोद को अपने परिश्रम का लाभ मिला और फुरसतिया यूट्यूबरों, ट्विटराओं और ट्विटरियों ने बिनोद को ट्रेंड करना शुरू कर दिया। ये ट्रेंड धीरे-धीरे पूरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर फैल चुका है। अब लोग बिनोद को खोज रहे हैं। कुछ लोग उसके ट्रेंड होने का कारण ढूँढ़ रहे हैं।

ऐसा करते हुए लोग ये भूल जाते हैं कि जिस बिनोद की तलाश में वे सब लगे हुए हैं वह तो हम सभी के दिलों में पैठ बनाकर बैठा हुआ है। नाम कमाने की इच्छा रखने वाला हर वो इंसान बिनोद है जो समाज सेवा करके, दान-दक्षिणा देकर या फिर कोई अच्छा और भला कार्य करने के बजाय उल्टे-सीधे और अजीबोगरीब तरीके आजमा कर अपना नाम कामना  चाहता है।

बहरहाल बिनोद का मिशन सफल हो चुका है। अब हर कोई बिनोद की चर्चा में व्यस्त है। कई फर्जी बिनोद इसका क्रेडिट लूटने के लिए सोशल मीडिया पर प्रकट हो चुके हैं। पर असली बिनोद इन सब घटनाओं को देखकर मंद-मंद मुस्कुराता हुए ट्विटराओं के ट्वीटों में, फेसबुक पोस्ट में या फिर यूट्यूब के वीडियो पर कमेंट के रूप में अपना नाम बिनोद दर्ज करने में मस्त हो रखा है।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 25 मार्च 2018

व्यंग्य : श्रीराम की चिंता


        राम का नाम भारत के जन-जन में और कण-कण में बसा हुआ है। ये उनके नाम का ही प्रभाव माने कि किसी को विरोध करना हो, अपनी माँगों को मजबूती से रखना या फिर अपनी राजनीति की नैया पार लगवानी हो तो राम ही याद आते हैं। अभी कुछ दिन ही तो बीते हैं जब एक समूह राम के चित्रों को जूते मारते हुए मार्च कर रहे थे। उस महान मार्च को सुरक्षित निकलवाने के लिए उस क्षेत्र के वीर पुलिसकर्मी कमर कसे हुए थे। मार्च निकालने वाले जनसमूह के समर्थक और शुभचिंतक सोशल मीडिया पर प्रसन्नतापूर्वक इस मार्च के वीडियो व चित्रों को शेयर करते हुए गर्वित हो रहे थे। इस सारे घटनाक्रम को तिरपाल में बैठे राम लला गुमसुम हो देख रहे थे। हो सकता है कि राम लला सोच रहे हों कि उस तिरपाल से मुक्ति मिले तो कुछ किया जाए। पर वो कहावत है न कि 'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' सो राम लला को कुछ करने के लिए शायद अभी वर्षों तक और प्रतीक्षा करनी पड़े। वैसे भी उन्हें अब आदत हो गई है इन सबको सहने की। कोई पहले उनके अस्तित्व को नकारता है और फिर आवश्यकता पड़ने पर उनके चरणों में ही जाकर अपनी नाक रगड़ता है, कोई उन्हें पहले तो खूब गरियाता है फिर अचानक स्वार्थ सिद्धि के लिए उनका जयघोष करने लगता है तो कोई उन्हें अत्याचारी घोषित कर उनके लिए अभद्रता की हदें पार करने को उतारू हो जाता है। ये सब देखकर राम लला एकपल को उदास हो जाते हैं फिर कुछ पल बाद मुस्कुराते हैं। कुछ क्षण मुस्कुराने के पश्चात वो उठकर केवट मल्लाह को हृदय से लगाते हैं, फिर शबरी के झूठे बेरों से अपनी भूख मिटाते हैं और फिर महर्षि बाल्मीकि को प्रणाम कर चिंता करते हुए मन ही मन बुदबुदाते हैं, 'ये लंकापति रावण मृत्यु से पहले भारत भूमि में किन-किन स्थानों पर अपने बीज रोप गया था?'
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : युवराज का सपना


कई दशकों तक देश की कथित रूप से सेवा करने का दम भरनेवाले राजनैतिक दल के लाड़ले युवराज ने विदेशी धरती से देश में 2019 ईसवी में होनेवाले लोकसभा चुनावों का बिगुल अभी से फूँक दिया है। ये निर्णय उन्होंने बहुत सोच-समझकर लिया है। भारतीय धरती से उन्होंने बहुत प्रयास कर लिया, लेकिन सफलता ने उनके पास फटकना भी मंजूर नहीं किया है। क्या-क्या नहीं किया उन्होंने। अपने लाव-लश्कर के संग दलित के घर में आधी रात को जा धमके और वहाँ बाकायदा मीडिया की मौजूदगी में दलित के हाथों से अपना भोग लगवाया। भोग लगवाने के उपरांत अपनी सहृदयता के गीत गाकर उस दलित परिवार को सपनों का झुनझुना पकड़ाया और वहाँ से रफूचक्कर हो लिए। वो बेचारा दलित परिवार अभी भी सपनों में खोकर झुनझुना बजा रहा है और युवराज सपनों के सौदागर बनकर इत-उत डोलने में मस्त हैं। युवराज ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खाट पंचायत का बड़े स्तर पर आयोजन किया। ये आयोजन इतने बड़े स्तर का था, कि आसपास के गाँववालों की अपने-अपने घरों के लिए टूटी खाटों की जगह नई खाटों को लाने की समस्या चुटकियों में हल हो गई। वे सब खाट पंचायत से नई और मजबूत खाटें लूटकर ले गए और अब उन खाटों पर बैठकर हुक्का फूँकते हुए खाट पंचायत की जोर शोर से ठहाका लगाते हुए चर्चा करते रहते हैं। वहाँ वो सभी खाट पर बैठे-बैठे हुक्का फूँकते हैं और यहाँ कलेजा फुंकता है युवराज का। युवराज इस कृत्य के लिए विरोधियों को जिम्मेवार ठहरा उन्हें पानी पी-पीकर कोसते हुए गरियाते रहते हैं। युवराज ने समय-समय पर अपने कुर्ते की बाजुएँ ऊपर चढ़ाकर सत्ता को सीधी चुनौती भी दी है। वो और उनके दलीय चमचे आए दिन सुंदर और सुशील गालियों से सत्ता पक्ष को सुशोभित करते हुए अपने विपक्षी होने का हक अदा करते रहते हैं। चाहे महागठबंधन की रैलियाँ हों या ‘देश के टुकड़े होंगे हजार’ जैसे नारे लगानेवाले कथित देशप्रेमियों का प्रदर्शन हो या फिर खुद ही दंगा करके खुद ही को पीड़ित दर्शानेवाले शांतिप्रिय समुदाय की विरोध सभा हो युवराज हर जगह पूरी तत्परता से और सबसे पहले उपस्थित मिलते हैं। पर उनकी इस योग्यता से बैर रखनेवाले उन्हें सत्तापक्ष का एजेंट करार देते हैं और उनपर आरोप मढ़ते रहते हैं, कि सत्ता पक्ष के इशारों पर काम करते हुए वो अपनी देश के सबसे ईमानदार राजनैतिक दल की नैया डुबोने में लगे हुए हैं। ऐसे वचन सुनकर युवराज का चेहरा गुस्से के मारे तिलमिला उठता है और उनकी बाजुएँ फडकने लगती हैं। वो क्रोध में अपने कुर्ते की बाजुओं को ऊपर चढ़ाते हैं और वंशवाद के रथ पर सवार हो अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर भोंथरे बाण से लोकसभा चुनाव-2019 रुपी मछली पर निशाना साधने को तैयार होते हैं, कि तभी कोई उनकी कमर पर गदे से जोरदार प्रहार करता है और युवराज उस अप्रत्याशित आक्रमण से घायल हो रथ से नीचे गिर जाते हैं। अचानक उनकी आँख खुल जाती है और वो खुद को औंधे मुँह बिस्तर से जमीन पर गिरा हुआ पाते हैं। वो अपना सिर उठाकर सामने देखते हैं तो सामने राजमाता दुखी और उदास होकर खड़ी हो अपना माथा पीट रही होती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

व्यंग्य : असहिष्णु देश के दीवाने लोग


    पना भारत देश बहुत ही असहिष्णु देश है। ये इतना असहिष्णु देश है कि आए दिन इस देश में असहिष्णुता से परेशान बेचारों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना पड़ता है, कि ये देश कितना अधिक असहिष्णु है। इस देश के बहुसंख्यक असहिष्णु समुदाय के सहारे अपना सफल फिल्मी कैरियर बनानेवाले अभिनेता को सालों बाद अचानक ये अहसास होता है कि ये देश तो बड़ा असहिष्णु है। वो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ये घोषित करते हैं कि इस देश में इतनी ज्यादा असहिष्णुता बढ़ चुकी है कि यहाँ रहने में उन्हें और उनकी बीबी को बहुत डर लगने लगा है। हालाँकि इतना ज्यादा डरा हुआ होने के बावजूद भी वो इस असहिष्णु देश को छोड़कर कहीं और बसने का विचार भी नहीं करते। हमारे देश के असहिष्णु जीवों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है और वे उन अभिनेता को फिल्मी दंगल में पटखनी देने के बजाय जीत दिलवाकर अपने असहिष्णु होने का ठोस सबूत देते हैं। अभिनेता के शुभचिंतक भी अवसर का लाभ उठाते हुए असहिष्णुता का विरोध करते हुए अपने धूल जम चुके पुरस्कारों और सम्मानों को लगे हाथों लौटाकर विरोध के साथ-साथ अपने आपको गुमनामी से निकालने का प्रयास कर एक तीर से दो शिकार कर डालते हैं और वो भी इस देश को छोड़ने की बजाय इसकी छाती पर ही मूँग दलते  रहते हैं।
बीते दिनों कई साल संविधान के उच्च पद पर बैठकर मलाई खाने के बाद एक बेचारे जाते-जाते असहिष्णुता का रोना रो गए और देश में असहिष्णुता का भोंपू फिर से बजने लगा। वो इतने सालों तक मलाई खाते रहें, लेकिन इस दौरान उन्हें असहिष्णुता के बिल्कुल भी दर्शन नहीं हुए, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उनका मलाई खाना अब बंद होनेवाला है, उन्होंने असहिष्णुता का शिगूफा छोड़ दिया और जाते-जाते इस असहिष्णु देश में इतनी इज्जत कमा गए कि अब उन्हें लोगों को अपना मुँह दिखाने में भी सोच-विचार करना पड़ रहा है। बहरहाल अपने देश के इतने असहिष्णु होने के बावजूद भी आए दिन कोई न कोई  मुँह उठाए इसमें बसने के लिए चला आता है। ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से चल रहा है। बाहर से यहाँ आ धमकने के बाद लोग यहीं डेरा डाल लेते हैं और जब लगता है कि इनका डेरा उखड़ने का खतरा नहीं रहा तो फिर ये असहिष्णुता का राग अलापने लगते हैं। अपना देश कोई देश न होकर धर्मशाला का प्रमाणपत्र पानेवाला है। पहले ही यहाँ नेपालियों और बांग्लादेशियों ने डेरा जमाकर उत्पात मचा रखा है और अब रोहिंग्या भी अपना रोना रोते हुए बोरिया-बिस्तर लादकर आ धमक रहे हैं। उन्हें कोई ये क्यों नहीं बताता कि उन्हें ऐसे असहिष्णु देश में न बसकर बांग्लादेश, पाकिस्तान या फिर अरब के किसी सहिष्णु देश में जाकर पनाह मांगनी चाहिए। पर ये बात शायद उन्हें समझ में नहीं आनेवाली। हमारे असहिष्णु देश के दीवानों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी लगता है कि आने समय में देश के इन बाहरी दीवानों के आगे के हम असहिष्णु बहुसंख्यकों की संख्या लुप्तप्राय न हो जाए।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : ढीले लंगोटवाले बाबा


“महाराज आप कौन हैं?”
“हम बाबा हैं।“
“कौन से बाबा?”
“हम कलियुग के बाबा हैं।“
“आप करते क्या हैं?”
“हम लोगों के दुःख और परेशानी दूर करते हैं।“
“क्या वास्तव में आप लोगों के दुःख व परेशानी दूर करते हैं?”
“अब अगर शक हैं तो हमारे भक्तों से जाकर पूछ लो। हम क्या बताएँ।“
“आपके भक्त इस देश की जनता के ही अंग हैं और क्या आपको लगता है कि जनता वाकई में कुछ बताने लायक है। फिर उससे पूछने से फायदा क्या? वैसे आप ही क्यों नहीं बता देते?”
“देखो बालक भक्तों के दुःख और परेशानी दूर हुए हों या न भी हुए हों लेकिन वे सब इस बात में यकीन करते हैं कि इनका खात्मा एक न एक दिन अवश्य होगा। ये आस ही उनमें ऊर्जा का संचार करती है और वे आनंद व प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं।“
“और एक दिन इसी आस में भक्तों का राम नाम सत्य हो जाएगा लेकिन शायद उनके कष्ट दूर नहीं हो पाएँगे।“
“बालक ऐसी निराशावादी सोच से उबरो।“
“निराशावादी सोच नहीं बल्कि हकीक़त है। आप झूठे संसार में अपने भक्तों को रखकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं।“
“बालक हम खिलवाड़ नहीं बल्कि हमारे और हमारे भक्तों के जीने का जुगाड़ कर रहे हैं।“
“वो भला कैसे?”
“बालक इस संसार में इतने कष्ट हैं कि किसी भी व्यक्ति का जीना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए हम अपने भक्तों को इस संसार से दूर स्वप्नों के संसार में जीने का तरीका सिखाते हैं।“
“हाँ और इसके बदले आपके मूर्ख भक्त आपकी झोली भरके आपको मालामाल कर देते हैं।“
“बालक ये तुम गलत कह रहे हो।“
“तो फिर सही बात क्या है?”
“सही बात ये है कि हम बाबा होने का फर्ज निभाते हुए अपने भक्तों को मोहमाया के बंधन से मुक्त करते हैं।“
“और अपनी मोहमाया के जाल में अपने भक्तों को क़ैद कर लेते हैं। बाबा वैसे आप किस धर्म के हैं?”
“बालक कार्ल मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम है और हम किसी भी नशे के खिलाफ हैं इसलिए हम किसी भी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वैसे तुम हमारा पंथ, संप्रदाय अथवा धर्म बाबागीरी ही मान सकते हो।“
“मतलब आप अफीम की बजाय भक्तों को बाबागीरी नाम की चरस पिला रहे हैं।“
“बालक हम भक्तों को चरस नहीं बल्कि प्रेमरस पिला रहे हैं, जिससे विश्व में बंधुत्व की भावना का विकास हो सके।“
“खैर छोड़िए आप ये बताइए कि आपका असली नाम क्या है?”
“बालक सच कहें तो हमें हमारा असली नाम याद ही नहीं रहा है। अब तो हमें लंगोटवाले बाबा के नाम से ही जाना जाता है।“
“अच्छा बाबा एक बात और बताएँ।“
“अब बाकी बातें फिर कभी करेंगे फ़िलहाल हम अपने भक्तों को आशीर्वाद देने जा रहे हैं।“
यह कह बाबा बहुत ही अधीर हो कुछ समय पहले ही वहाँ पधारीं महिला भक्तों की ओर चलने को हुए। उनकी ऐसी हालत देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “बाबा आपने तो अपना नाम लंगोटवाले बाबा बताया था पर आप तो लंगोट के ढीले लगते हैं।”
बाबा आँख मारके मुस्कुराते हुए बोले, “बालक नाम तो हमारा ढीले लंगोटवाले बाबा ही है, लेकिन बोलने में ढीले शब्द साइलेंट हो जाता है।”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
* कार्टून गूगल से साभार 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

व्यंग्य : जीना इसी को कहते हैं

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?
भाई सारी जमा पूंजी लगाकर एक धंधा शुरू किया था पर वो जमा नहीं। सारा पैसा डूब गया। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।
तो इसमें इतना निराश क्यों होता हैथोड़ी कोशिश और मेहनत कर सब ठीक हो जाएगा।
भाई अगर तू मेरी जगह होता तो अब तक किसी पेड़ पर लटक चुका होता 
- भाई इतना भी सिरफिरा नहीं हूँ, जो पेड़ पर लटककर अपनी कीमती जान दे दूँ और न ही मैं उन लोगों जितना महान नहीं हूँ, जो आए दिन जरा सी परेशानी या मुसीबत आनेपर इस अनमोल जीवन का राम नाम सत्य कर डालते हैं। मेरा मानना है कि कई योनियों के बाद नसीब हुआ ये मानव जीवन यूँ एक पल में गँवाने के लिए नहीं है जब तक कि इसके पीछे कोई नेक उद्देश्य न हो।
- नफे तू भी कहाँ मेरे और मेरे जैसे लोगों के दुखों को सुन भावुक हो उठा। खैर तू मेरी छोड़ अपनी सुना। आज तेरे चेहरे पर बड़ी रौनक लग रही है। कहाँ से आ रहा है?
भाई आज इंडिया गेट की सैर करके आ रहा हूँ।
अरे वाह तो क्या-क्या देखा वहाँ?
वहाँ अंग्रेजों की सेवा करते हुए प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्धों में मारे गए 90,000 अंग्रेज भक्त भारतीय सैनिकों की याद में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया युद्ध स्मारक रुपी इंडिया गेट देखाइसकी मेहराब के नीचे स्थित आजादी के बाद स्थापित की गई अमर जवान ज्योति को सादर नमन कियाइंडिया गेट के इर्द-गिर्द घूमते हुए पानी पूरी खायी और जिले सिंह से मुलाकात की।
अरे भाई मैं वहाँ कहाँ मिल गया जबकि मैं तो कल दुखी हो अपना सिर पकड़े हुए घर पर ही पड़ा रहा।
भाई वो जिले सिंह कोई और था। हमें देखते ही पुकारकर अपने पास बुला लिया। गुब्बारे बेच रहा था। अब से कुछ साल पहले नाई का काम करता था। दिल्ली के एंड्रूज गंज इलाके में मालिक सनी की दुकान में जिले सिंह नौकर नहीं बल्कि मालिक की तरह काम करता था। बहुत ही हाजिर जवाब था। अपने ग्राहक के बालों को काटते हुए उनका खूब मनोरंजन करता रहता था और साथ ही साथ अपने मालिक सनी की खिंचाई भी करता रहता था।
फिर वो गुब्बारे क्यों बेचने लगा?
उसके मालिक को रोज शराब पीने की बुरी आदत थी। जिले ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं माना। सनी भी उन भले लोगों में से एक था जो नेक सलाह को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। और एक दिन वो भी आया जब शराबखोरी ने सनी का एक्सीडेंट करवा दिया और सनी अपने परिवारअपनी दुकान और जिले सिंह को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।
- ओहो ये तो बहुत दुखद हुआ। अच्छा फिर जिले का क्या हुआ?
- जिले अच्छा कारीगर था पर उसे कहीं काम नहीं मिला।
- क्यों भई अच्छे कारीगर को तो काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
- भाई जिले सिंह खरी बात कहनेवाला खरा इंसान ठहरा और आज के जमाने में खरी-खरी कहनेवालों को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता। और फिर उसकी उम्र और बालों में आ रही सफेदी भी उसके काम मिलने के आड़े आ गयी।
और वो बेचारा इंडिया गेट पर गुब्बारे बेचने लगा।
हाँ पर वो निराश नहीं था। उसके भीतर जिंदगी को जीने का जज्बा दिखाई दे रहा था। वो और लोगों की तरह निराशा से अपना जीवन बर्बाद करने की बजाय मेहनत करके अपने और अपने परिवार की गुजर-बसर करने के लिए प्रयासरत है और कुला मिलाकर खुश है। वैसे दोस्त एक बात कहूँ जीना इसी को कहते हैं।
बात तो तू ठीक कह रहा है भाई। उस जिले सिंह ने इस जिले सिंह को सबक दिया है। जिले सिंह को ये तेरा दोस्त अपनी प्रेरणा बनाएगा और जिंदगी को पूरी हिम्मत से लड़ते हुए जिएगा।
अब आया न लाइन पर।
हाँ भाई बेशक देर से आया पर दुरुस्त आया।  है कि नहीं?
बिलकुल भाई!

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 18 मार्च 2017

व्यंग्य : इन दिनों


    न दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही उसके द्वारा कर्मठता से किए गए कार्यों से पूरे विश्व में देश की चर्चा हुई। उन विशेष कार्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो इसके द्वारा अल्पसंख्यकों पर इतनी कृपा की गयी कि वो वोट बैंक बनने से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पाए। इस वोट बैंक के सहारे उसने खूब मजे काटे पर इन दिनों इस परंपरागत वोट बैंक ने भी इसका बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के संसाधनों का सदुपयोग करते हुए घोटालों की जमकर खेती की गयी और फसल से जो आय हुई उसे स्विस बैंक के चरणों में अर्पित कर दिया गया। देश के विकास का नारा देते-देते अपने परिवार की वंशबेल में पानी देकर पोषित किया जाता रहा। पर वो कहते हैं न कि किसी भी बात की होती है तो हद पार हुई और उसी वंशबेल से एक अनुपयोगी पौधा उपज गया जिसने अपने पुरखों के परिश्रम का राम नाम सत्य कर डाला। उस पौधे की संगत में आकर कुछ नए पौधे, जो जोश में आकर खुद को वटवृक्ष समझकर उछल रहे थे, वो भी अपना तिया-पाँचा करवा बैठे। अब क्या करें इन दिनों देश में ऐसी आंधी चल रही है जो देश के लिए अनुपयोगी पौधों व वृक्षों को जड़ से हिलाकर अपनी अंतिम साँसे गिनते हुए अपना शेष जीवन बिताने को विवश किए हुए है। इस आँधी ने सिर्फ राजनीति की वंशबेल को ही बेजान नहीं किया, बल्कि इसके परमप्रिय समर्थकों, जिन्हें लोग भूलवश चमचा समझ लेते हैं, का भविष्य भी दाँव पर लगा दिया। बीते दिनों इन परमप्रिय समर्थकों ने असहिष्णुता राग गाते हुए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया था ताकि इस माध्यम द्वारा ही उस आँधी को रोका जा सके और उनके पापी पेट पर लात न पड़े। पर आँधी इतनी बेरहम निकली कि उसकी रफ़्तार के आगे उन परमप्रिय समर्थकों की भी कुछ न चली। फलस्वरूप इन दिनों परमप्रिय समर्थक अपने भविष्य को अंधकारमय पाते हुए सुबकने को विवश हैं। ऐसे गर्म माहौल में भी एक ये सर्दी है जो जाने का नाम नहीं ले रही। लगता है कि सर्दी ने भी ये सोच रखा है कि ये इन दिनों आँधी के मारे उन बेचारों को सर्द-गर्म की सौगात देकर उनके अंजर-पंजर ढीले करते हुए ही रवाना होगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

व्यंग्य : क्या देश वाकई में चीख रहा है


    देश में इन दिनों चीख-पुकार मची हुई है। जब भी देश में कुछ नया होता है तो लोग चीखते हैं और पूरा दम लगाकर चीखते हैं। इस बार चीखने की शुरुआत नवंबर, 2016 को हुई थी। बड़े नोटों की बंदी ने देश के कुछ भले और ईमानदार लोगों के दिलों पर करारा आघात किया, जिससे वो एकदम से बिलबिला उठे। उनसे ज्यादा परेशान उनके संरक्षक और आका हो गए और सड़क से लेकर संसद तक उन्होंने जमकर चीख-पुकार मचानी शुरू कर दी। हालाँकि इस फैसले से उनका नेक दिल बहुत दुखा और उन्होंने काफी कष्ट और परेशानी महसूस की पर उन्होंने देश की जनता के कष्टों को ढाल बनाकर तलवारबाजी करनी शुरू कर दी। वैसे अगर देखा जाए तो उनका चीखना जायज भी है। देश की जनता का खून चूस-चूसकर ईमानदारी और मेहनत से जमा किया इतना ढेर सारा धन यूँ अचानक रद्दी हो जाए तो भला कोई चुप रह भी कैसे सकता है। इसलिए भुक्तभोगी चीख रहे हैं और इस चीख-पुकार से जनता को दिग्भ्रमित करते हुए अपने रद्दी हो चुके धन को फिर से धन की श्रेणी में लाने की भरपूर जुगत लगा रहे हैं। बैंक कर्मचारियों के रूप में अपने देश में एक नई ईमानदार कौम का उदय हुआ है और ईमानदारी में वो बाकी कौमों को तेजी से पीछे छोड़ने को तत्पर है। उनकी ईमानदारी देखनी हो तो बैंक के पिछले दरवाजे पर खड़े हो जाएँ। आपको बिना किसी विशेष परिश्रम के ही बैंककर्मियों के दिलों से झाँकती हुई विशेष ईमानदारी के दर्शन हो जाएँगे। साथ ही साथ दिख जाएँगे चीखते रहनेवाले वे भले और ईमानदार लोग भी। बैंक कर्मचारियों द्वारा चीखनेवाले भले मानवों को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से गड्डियों का भोग लगाया जाता है, जिसे वे अपने सेवकों को प्रसाद के रूप में वितरित करके फिर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर देते हैं। यह देख उनके चमचे भी प्रसाद को ठिकाने लगाकर अपने गुरुओं का समर्थन करते हुए उनका साथ देते हुए रेंकना शुरू कर देते हैं। जो चमचे चीखने में असमर्थ हैं और कलम तोड़ने में सिद्धहस्त हैं उन्हें आभासी दुनिया पर बिठा दिया जाता है और वो सभी निष्ठापूर्वक अपने आकाओं के समर्थन व नोटबंदी के विरोध में आभासी दुनिया पर चिल्ल-पों मचाना आरंभ कर देते हैं तथा ये घोषित करने का पूरा प्रयास करते हैं कि पूरा देश उनके संग विरोध में चीख रहा है जबकि मामला कुछ और ही होता है। दरअसल पूरा देश उन सबकी चीख-पुकार सुनते हुए खिलखिलाकर हँस रहा होता है।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

व्यंग्य : अब तेरा क्या होगा कालिया


   काले धन उर्फ़ कल्लूकल्लनकालिया इन दिनों अधिकांश देशवासी तुम्हें दे रहे हैं जी भरकर गालियाँ। सरकार ने तुम्हें बाहर निकलने को कहा था लेकिन तुम नहीं निकले। फलस्वरूप तुम्हें बाहर निकालने को सरकार को बड़ा कदम उठाना पड़ा और उसके एक कदम उठाने से ही तुम्हारी ढिमरी टाइट हो गई तथा तुम्हारे आकाओं की चूलें तक हिल गईं। अब ये और बात है कि तुम्हें बाहर निकालने के लिए सरकार के इस औचक हमले का परिणाम आम जनता को भी झेलना पड़ रहा है। नोट चेंज करवाना और नोट छुट्टे करवाना अब राष्ट्रीय चिंता और समस्या बन गई है। इन दिनों लोगों का समय ए.टी.एम.बैंकों व डाकघरों की चौखट पर लाइन लगाकर नए नोटों के दर्शन करने की इच्छा लिए हुए ही बीत रहा है। उनका सुबह का ब्रेकफास्ट, दोपहर का लंच और रात का डिनर वहीं लाइन में लगे हुए ही हो रहा है। जो लोग खुशनसीब हैं वे तो नए नोटों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं, लेकिन जो अभागे मानव हैं वे बेचारे नए नोटों के दर्शनों का स्वप्न देखते हुए ही लाइन में लगे रहते हैं। इन दिनों बैंककर्मी देवदूतों से कम प्रतीत नहीं हो रहे हैं और हर व्यक्ति लाइन में लगे हुए ये कामना कर रहा है कि उसपर इन देवदूतों की कृपा हो जाए और उसकी मुट्ठी नई करेंसी से गर्म हो जाए। अब ये और बात है कि ये देवदूत गुपचुप दानवपना दिखा रहे हैं और अपने परिचितों और सगे-सम्बन्धियों को नवनोट मिलन परियोजना का भरपूर लाभ प्रदान कर रहे हैं। लोग नोट दर्शन की आस लिए रात से ही बिस्तर डालकर ए.टी.एम.बैंकों व डाकघरों के आगे धरना सा दिए बैठे हुए हैं। एक बार को तो लगता है कि जितनी शिद्दत से लोग नवनोट मिलन की इच्छा कर रहे हैं, उतनी शिद्दत से अगर ऊपवाले को याद कर लिया जाए तो उसके दर्शन पाकर इस जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाए।
वैसे मजे की बात ये है कि जनता इतने कष्टों को झेलकर भी प्रसन्न है और सरकार के इस सार्थक कदम की प्रशंसा कर-करके विपक्षी दलों का कलेजा फूँककर कोयला बनाने की साजिश में लगी हुई है। गांधी जी हरे से गुलाबी हो मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। अचानक नोटबंदी से अवैध खजानों में बंदी बन रखे नोट रद्दी का ढेर बन चुके हैंजिससे नक्सलियों और आतंकियों के पाक कामों में अचानक विराम लग गया है। कश्मीर में पत्थरबाजी नामक लघु उद्योग को करारा झटका लगा है। पड़ोसी देश के शांति मिशन में अवरोध उत्पन्न हुआ है और वो शांतिदूतों की सप्लाई में काफी दिक्कत महसूस कर रहा है। तुम्हारे आकाओं के ताऊ-ताईचाचा-चाचीमामा-मामी व अन्य सगे-संबंधी विरोध का झंडा उठाए हुए कभी मार्च कर रहे हैं तो कभी संसद का सदन जाम करने के लिए कमर कस रहे हैं। इन सबसे इतर अधिकतर देशवासी एक नए भारत के उदय होने की आहट सुन रहे हैं। इन दिनों देश भी मुस्कुराकर तुमसे गब्बरी अंदाज में पूछ रहा है "अब तेरा क्या होगा कालिया?"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
*कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 5 नवंबर 2016

व्यंग्य : देशी ड्रैगन


- भाई नफे!
- हाँ बोल भाई जिले!
- किन हसीन ख्यालों में खोया हुआ मुस्कुरा रहा है?
- भाई मैं तो चीनी ड्रैगन की हालत देखकर मुस्कुरा रहा था।
- क्यों क्या हुआ चीनी ड्रैगन को?
- होना क्या है बेचारा अधमरा हो रखा है।
- वो भला कैसे?
- भाई इस दिवाली देशवासियों ने देशभक्ति का दम दिखाया और चीनी माल का बहिष्कार कर चीनी ड्रैगन की हालत खस्ता कर दी।
- सुना है भाई कि इस बार व्यापारी वर्ग ने इस काम में बड़ी भूमिका निभाई।
- हाँ भाई इस बार व्यापारी भाइयों ने चीनी ड्रैगन की नैया डुबोने में पूरी भूमिका निभाई। इस बार दिवाली पर चीनी सामान की खपत में 60% की गिरावट दर्ज की गई, जिसके कारण  चीनी ड्रैगन अधमरा हो रखा है।
- मतलब कि अभी भी अपने देश में 40% ऐसे महान लोग मौजूद हैं, जो चीनी सामान को इस्तेमाल करने में गर्व करते हैं।
- हाँ भाई दुर्भाग्यवश ऐसे महान लोग भी इस देश में मौजूद हैं।
- वैसे कौन हैं ये महान लोग?
- ये महान लोग देशी ड्रैगन  हैं।
- देशी ड्रैगन?
- हाँ भाई देशी ड्रैगन।
- भाई अब तू कंफ्यूज मत कर, बल्कि इनके बारे में खुलके बता।
- भाई देशी ड्रैगन ऐसे महान लोग हैं जो इस देश में रहते और यहाँ का खाते बेशक हैं लेकिन इन्हें इस देश और इसके नफे-नुकसान से कोई मतलब नहीं है। ये लोग तो हमेशा इस चिंता में डूबे रहते हैं कि इन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए बल्कि इनका स्वार्थ सिद्ध होते रहना चाहिए।
- भाई इन देशी ड्रैगनों की पहचान क्या है?
- भाई इन देशी ड्रैगनों को आसानी से पहचाना जा सकता हैं। हर गली-मोहल्ले और नुक्कड़ पर इनकी उपस्थिति मिल जाएगी। इनमें से कुछ लोग दिवाली से पहले और बाद में चीनी सामान खरीदने की वकालत करते हुए मिल जाते हैं और कुछ पड़ोसी देश के कलाकारों के लिए आँसू बहाते दिख जाते हैं। कुछ आतंकियों के जनाजों में छाती पीटते हुए देश विरोधी नारे लगाते हुए मिल जाते हैं तो कुछ किसी मुठभेड़ में अपराधियों के मारे जाते ही सेना अथवा पुलिस के विरुद्ध मोर्चा ले जाँच आयोग बिठाने की सिफारिश करते हुए दिख जाते हैं।
- आखिर कैसे लोग हैं ये?
- लोग नहीं भाई देशी ड्रैगन बोल।
- हाँ भाई ये लोग सही मायने में ड्रैगन ही हैं। भारत की पवित्र भूमि में पल रहे अपवित्र देशी ड्रैगन।
- अब तू ठीक से इन्हें समझा।
- हाँ भाई बिलकुल समझ गया। पर ये तो बता कि इन दिनों इन देशी ड्रैगनों के हाल क्या हैं?
- इन दिनों बेसुध होकर पड़े हुए हैं बेचारे।
- हालत ज्यादा नाजुक तो नहीं हो गई इनकी।
- भाई इस समय देश के हालात ही ऐसे हो रखे हैं कि इनकी हालत नाजुक होना लाजिमी है। मुझे तो इस बात का डर है कि कहीं आए दिन लगनेवाले सदमों से ये मर न जाएँ।
- हा हा हा भाई अगर ऐसा हुआ तो बढ़िया ही रहेगा। कम से कम इस देश की धरती से फालतू का कुछ बोझ तो कम हो जाएगा। 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

व्यंग्य : कंस का प्रतिशोध


 विष्णु जी को उदास हो किन्हीं ख्यालों में खोए देखकर लक्ष्मी जी से रहा नहीं गया और उनसे पूछ ही लिया।
-
प्रभु किन विचारों में खोए हुए हैं?
-
बस ऐसे ही कुछ सोच रहे थे।
-
कुछ न कुछ तो बात है प्रभु। आप यूँ ही गुमसुम और उदास नहीं हो सकते।
-
नहीं-नहीं देवी ऐसी कोई विशेष बात नहीं है।
-
प्रभु शायद मेरी सेवा में कोई कमी रह गयी है।
-
मैंने कहा न लक्ष्मी ऐसी कोई बात नहीं है।
-
तो जो भी बात है कृपया मुझे बताएँ।
-
द्वापर युग में हमने कृष्ण का अवतार लिया था।
-
हाँ तो उस युग में हमने भी रुकमणि के रूप में आप संग अवतार लिया था।
-
हाँ बिलकुल! उस युग में हमने अपने अत्याचारी मामा कंस और उसके दुष्ट सहयोगियों का वध किया था।
तो!
-
तो हुआ ये कि कंस ने मरते हुए चुपके से हमारे पाँव पकड़कर अपने कर्मों के लिए क्षमा माँगी और हमसे धोखे से एक वरदान ले लिया।
धोखे से! किन्तु मैंने तो ये सुना है कि भोले शंकर ही भोलेपन के कारण धोखे में फँसते हैं पर आप भी...।
-
अब क्या करतेउस समय मानवातार में कुछ पल के लिए बुद्धि भी मानवीय हो गयी थी इसलिए धोखे में फँस गए।
-
आप तो फँस गए और साथ ही मुझे भी फँसवा दिया।
-
वो कैसे?
-
अभी तक तो मैं और सरस्वती अपनी सहेली पार्वती का उनके पति के भोलेपन के लिए मजाक उड़ाती थीं, लेकिन अब सरस्वती और पार्वती मुझे जीने नहीं देंगी।
-
अरे भई भूल हो गयी सो हो गयी।
-
वैसे कंस ने आपसे वो कौन सा वर लिया था जिसने आपको इतनी परेशानी में डाल दिया?
-
उसने वर माँगा था कि अगले युग उसका जन्म कंस के रूप में न हो।
-
कंस के रूप में नहीं तो फिर किस रूप में वह जन्म लेना चाहता था?
-
वह मेरे रूप में जन्म लेना चाहता था।
-
इसका अर्थ है कि मरते समय उसको वास्तव में सद्बुद्धि आ गयी थी।
-
देवी जैसे कि कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह दुष्ट प्रवृत्ति के लोग अपनी दुष्टता से कभी भी बाज नहीं आ सकते।
-
अब इसमें दुष्टता वाली बात क्या हो गयीउस बेचारे ने तो तुम्हारे आदर्शों से प्रभावित होकर तुम्हारे रूप में जन्म लेने का वर माँगा और आप उसे दुष्ट मानने पर तुले हुए हैं।
-
देवी यही तो उसकी दुष्टता थी।
-
वो भला कैसे?
-
उसने मरते समय अपने साथियों व अपनी मृत्यु का बदला लेने के लिए षड़यंत्र रचा था।
-
कैसा षड़यंत्र प्रभु?
-
कंस द्वापर युग में तो हमारा बाल-बांका नहीं कर सकाकिन्तु कलियुग में उसने हमारे नाम पर पूर्व योजनानुसार ऐसी कालिख पोती है कि लोग हमारा  नाम लेने से भी कतराने लगे हैं और जो लोग नाम ले भी रहे हैं वो अभद्रतापूर्वक ले रहे हैं।
-
अच्छा ऐसी बात है। वैसे प्रभु कंस ने कहाँ और किस नाम से जन्म लिया है?
-
उस दुष्ट ने भारत देश में मेरे पर्यावाची नाम से जन्म लिया है और इस समय वहाँ के एक तथाकथित राष्ट्रभक्त विश्वविद्यालय में अपने हरकतों से मेरे नाम का मानमर्दन करने में लगा हुआ है।
इतना कहकर विष्णु जी ने गहरी साँस छोड़ी और उदास हो फिर से ध्यान मग्न हो गए।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 



सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

Satire : My real Indian Diwali




     Whenever I decided that I will try to inspire my friends, relatives and people around me by boycotting Chinese products & will convey my message about empowering local businesses in our own country to produce those products. Suddenly, some people with jolterhead attitudes appeared infront of me and started arguing that this is not at all possible and I would not be enough capable to do this. I replied them “Every drop of sea is the whole ocean”.They started laughing on me sarcastically and told me that you can’t avoid Chinese products from your routines where every second item belongs to China because of its cheapness in comparison to India. I could not understand the points why they were favouring Chinese items, either they were of Chinese origin or it may be that they were Chinese agents. I said that it may be cheap but not so good to empower our economy so I must boycott Chinese products and would also suggest my friends and relatives to boycott these products on a big scale. They again asked me "How would you reach up to more and more people by conveying the message?" I told them frankly, "You can see my smart phone and I will begin from it. I will send SMS, start calling people over phone using different platforms, and will share message on Social media too."
This time they laughed out loudly and said, "Dear, You are carrying a cellphone in your hand that is also being manufactured from Chinese companies."
I smiled and said, "You must that; Only Iron can cut Iron. So I will use this Chinese smart phone against Chinese products."
After sometimes, The same people were going their way angerly and I just kept lighting Diyas and Lamps after destroying Chinese lights. First time ever I celebrated real Indian Diwali. When I was lighting Diyas made of mud by poor people, I could feel their smiling faces in oil containing in it. 

Writer : Sumit Pratap Singh

* Image from google with thanks

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

व्यंग्य : राम नाम की शक्ति

-भाई नफे!
-हाँ बोल भाई जिले!
-आज तू क्या बुदबुदाने में लगा हुआ है?
-भाई मैं राम नाम का जाप कर रहा था।
-भाई आज तुझे राम का नाम का जाप करने की क्या सूझ पड़ी?
-राम नाम में बहुत शक्ति है भाई।
-अच्छा ऐसा क्या?
-हाँ भाई! राम नाम का प्रयोग करते हुए देश की शीर्ष सत्ता तक पहुँचा जा सकता है और राम नाम को गरियाते हुए देश की सत्ता को पलटा भी जा सकता है।  
-क्या वास्तव में ऐसा कुछ है?
-हाँ भाई बिलकुल ऐसा ही है। और तो और अगर किसी भी गलत कार्य को सही सिद्ध करना हो तो राम का नाम बड़ा ही काम आता है।
-वो कैसे भाई?
-एक महोदय हैं। काफी चर्चित व्यक्ति हैं। एक बार उनसे किसी ने कह दिया कि ब्राम्हण होकर माँसाहार करते हुए शर्म नहीं आती।
-अच्छा तो फिर उन्होंने क्या जवाब दिया?
-जवाब क्या देना था उन्होंने झट से राम का सहारा ले लिया।
-वो भला कैसे?
-वो ऐसे कि उन्होंने राम द्वारा सोने के हिरण को मारने की घटना का उल्लेख करते हुए उनका माँसाहार प्रेमी होना सिद्ध कर दिया और उसी घटना का उदारहण देते हुए स्वयं के माँसाहारी होने को सही साबित कर डाला।
-मतलब कि उन महोदय ने अपने उदर को माँसाहार से तुष्ट करने के लिए राम नाम की बैसाखी का सहारा लिया।
-और नहीं तो क्या। वैसे भाई तुझे नहीं लगता कि लोग शाकाहारी या माँसाहारी चाहे जैसा भी भोजन करें लेकिन उसको सही साबित करने के लिए लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।
-भाई बात तो तेरी ठीक है पर क्या करें अपने देश में बहुसंख्यक अपने धर्म के पक्ष में चूँ भी कर दें तो उनको सांप्रदायिक होने का तमगा देने के लिए कुछ लोग हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।  
-पर दूसरा पक्ष देखें तो राम के नाम से इन लोगों को इतना प्रेम है कि वो राम का नाम मुँह में और बगल में छुरी रखकर अपना काम सिद्ध करते हुए औरों का काम-तमाम करने को तत्पर रहते हैं।   
-इसका मतलब कि राम का नाम बस दिखावे के लिए ही बचा है।
-ये मैंने कब कहा?
-तो फिर तेरे कहने का मतलब क्या है?
-भाई माना कि राम के कपूत राम नाम का अपने स्वार्थों के लिए मानमर्दन कर रहे हैं लेकिन ये सब होने के बावजूद भी राम नाम की महत्ता अब भी मौजूद है।
-भाई क्या सचमुच में ऐसा है?
-हाँ भाई बिलकुल ऐसा ही है। राम के पूत अभी भी अपने राम और उनके आदर्शों को अपने-अपने दिलों में बसाए हुए समाज की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
-भाई अब तो मेरा दिल भी कर रहा है कि मैं भी तेरे साथ बैठकर राम नाम का जाप करूँ।
-ठीक है पर पहले अपने बगल की छुरी तो निकालकर बाहर फैंक दे।
-हा हा हा भाई हम राम के पूतों में से हैं न कि कपूतों में से। इसलिए हमें बगल में छुरी रखने की न तो इच्छा रहती है और न ही कोई जरुरत।  
-
तो फिर दिल से बोल राम-राम।
-
राम-राम, जय श्री राम।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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