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रविवार, 17 सितंबर 2017

लघुकथा : कागौर


   श्राद्धों में कौओं को कागौर खिलाने के बाद भेदा कमरे में बने मंदिर के आगे हाथ जोड़कर बोला, "हे भगवान हमाई अम्मा को स्वर्ग में आराम और चैन से रखियो।"
तभी कमरे में टँगी भेदा की अम्मा की तस्वीर फर्श पर आ गिरी।
भेदा ने तस्वीर को ध्यान से देखा तो उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अम्मा उससे कह रही हों, "लला अगर बहू की बातन में न आयकै हमाओ समय से इलाज करवाय देते तो आज तुम्हाये संगें हमऊ कागौर खिलाय रहीं होतीं।"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शनिवार, 2 सितंबर 2017

लघुकथा : बाहरी


  रीबा समुद्र के किनारे बैठा देख रहा था, कि लोग बारी-बारी से गणेश जी की विभिन्न आकर की प्रतिमाएँ लाते और उन्हें समुद्र मैं विसर्जित करके नाचते-गाते हुए वहाँ से अपने-अपने घर की ओर चले जाते।

गरीबा बहुत देर तक यह सब देखता रहा।

फिर अचानक ही वह बुदबुदाया, "ये और हम लोग गणपति बप्पा को बरोबर पूजता है, लेकिन ये महाराष्ट्र का लोग हम उत्तर भारतीयों  को भैया बोलता है और हमसे बहुत बुरा व्यवहार करता है। हम लोग कई पीढ़ी से यहाँ रह रहा है, फिर भी ये लोग हमको बाहरी ही मानता है।"

गरीबा ने बीड़ी जलाकर एक लंबा सा कश खींचा और बड़बड़ाया, "गणपति बप्पा को ये लोग अपना सबसे बड़ा देवता मानता है, तो वो भी तो उत्तर भारत के हिमालय परबत पर जन्म लिया था। फिर तो अपना गणपति बप्पा भी बाहरी हुआ न?"

फिर अचानक गरीबा जोर से खिलखिलाया, "या फिर हो सकता है, कि इन लोगों का हिमालय परबत महाराष्ट्र में ही किसी जगह पर हो?"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 9 जून 2016

लघुकथा : वो सिपाही



   कार में जा रहे प्रेमी युगल में से प्रेमिका ने जब जून की तपती दोपहर में सड़क पर पिकेट पर खड़े सिपाही को देखा तो प्रेमी से कहा, "डार्लिंग देखो तो कितनी गर्मी हो रही है और ये सिपाही इस गर्मी में भी रोड पर खड़ा हुआ है।"
"
डिअर ये अपनी ड्यूटी कर रहा है।" प्रेमी ने समझाया।
प्रेमिका बोली, "वो तो ठीक है। पर यार सोचो तो सही। टेम्परेचर 46° से ऊपर हो रखा है। न तो इसके आसपास पानी का इंतजाम है और न ही ऐसी कोई जगह जहाँ ये कुछ देर के लिए छाँव में जाकर सुस्ता ले। यार ये लोग इतनी गर्मी कैसे सह लेते हैं। अगर ए.सी. न हो तो मैं तो कुछ पलों में गर्मी के मारे मर ही जाऊँ।"
"
स्वीट हार्ट जैसे हम लोग सुविधाओं के आदी हो चुके हैंवैसे ही ये पुलिसवाले दुविधाओं के आदी हो चुके हैं। खैर हम भी कहाँ इन फालतू लोगों के चक्कर में पड़ गए। वैसे एक बताऊँ आज तुम बहुत हॉट लग रही हो।" प्रेमी ने रोमांटिक होते हुए कार को तेजी से उस सिपाही के बगल से निकालते हुए कहा।
प्रेमिका हर बार की तरह शरमाई नहीं, बल्कि हॉट शब्द को सुनते ही उसको अपने सामने पसीने से सनी वर्दी पहनेगर्मी से तमतमाए चेहरे और प्यास से सूख रहे गले संग उस तपती दोपहर में जलती सड़क पर ड्यूटी दे रहा पीछे छूटा वो सिपाही नज़र आने लगा।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह


रविवार, 29 मई 2016

लघुकथा : कोई फायदा नहीं


     ज सिपाही बत्तीलाल बहुत गुस्से में है गुस्से में हो भी क्यों न? जबसे एस.एच.ओ. ने सिपाही पान सिंह को चिट्ठा मुंशी बनाया है, तबसे ही उसने बत्तीलाल का जीना हराम कर रखा है। हालाँकि दोनों ने एक साथ ही पुलिस ट्रेनिंग की थी और दोनों एक ही प्लाटून में थे फिर भी पान सिंह जाने क्यों बत्तीलाल को परेशान करता रहता है। बत्तीलाल ही क्या थाने का पूरा स्टाफ ही उसके गंदे व्यवहार से दुखी हो रखा है। चिटठा मुंशी बनने से पहले तक तो उसका व्यवहार ठीक-ठाक था, लेकिन चिटठा मुंशी बनने के बाद तो वह अपने आपको थाने का दूसरा एस.एच.ओ.  समझने लगा है। दो दिन पहले ही बत्तीलाल की साली की शादी थी लेकिन उसकी छुट्ठी न हो पायी। बेचारे को घरवाली व ससुराल से जाने कितने ताने सुनने पड़े। पता नही पान सिंह ने एस.एच.ओ. के कान में क्या कह दिया कि जैसे ही बत्तीलाल छुट्टी की दरख्वास्त लेकर एस.एच.ओ. के सामने पहुँचा, एस.एच.ओ. ने घुड़की देकर उसे भगा दिया। आज बत्तीलाल ने फैसला कर लिया था, कि वह पान सिंह के खिलाफ कंप्लेंट करके ही रहेगा। उसने एक कंप्लेंट लैटर लिखा और ए..सी.पी. ऑफिस की ओर चल दिया। ए..सी.पी. के सामने पेश होने की हिम्मत उसमें थी नहीं, सो उसने सोचा कि वह ए..सी.पी.  ऑफिस के आगे लगे कंप्लेंट बॉक्स में ही अपना कंप्लेंट लैटर डाल देगा। अचानक कुछ पल के लिए वह ठिठककर रुक जाता है। उसे अपने साथी पान सिंह पर दया आ जाती है कि यदि उसकी नौकरी को कुछ हो गया तो उसके बाल-बच्चों का क्या होगा? फिर वह सोचता है कि अगर उस दुष्ट को अपने किये की सजा नहीं मिली तो वह थाने के स्टाफ  के साथ बुरा बर्ताव करने से बाज नहीं आयेगा। उसे सबक सिखाने के लिए उसकी कंप्लेंट करनी जरुरी है। इतना सोचकर वह कंप्लेंट लैटर को कंप्लेंट बॉक्स में डालने को आगे बढ़ता है। अचानक उसकी नज़र कंप्लेंट बॉक्स पर लिखी एक लाइन पर चली जाती है। भद्दी सी लिखावट में किसी ने पेन से बहुत ही छोटे अक्षरों में कुछ लिख रखा था। शायद पुलिस के किसी जवान ने ही लिखा होगा। बत्तीलाल ध्यान से उस लाइन को पढ़ने की कोशिश करता है। वहाँ लिखा हुआ था कोई फायदा नही। बत्तीलाल ने उस लाइन को गौर से कई बार पढ़ा फिर कंप्लेंट लैटर को अपनी जेब में डाला और भारी क़दमों से वापस थाने की ओर चल दिया। 


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 22 मई 2016

लघुकथा : गधा कौन


भूरा जैसे ही जज के सामने पहुंचा, फफककर रोने लगा जज ने उससे पूछा "क्या बात हुई? क्यों रो रहे हो?"
भूरा बोला,"माई बाप हमने चोरी नही की है। इन पुलिस वालों ने हम पर झूठा इल्जाम लगाकर हमें फंसा दिया है
जज ने कहा, "अच्छा यदि तुमने चोरी नही की तो उस जगह पर देर रात क्या कर रहे थे"
भूरा ने सुबकते हुए बोला, "जज साहब हम दिल्ली में नए-नए आये थे इसलिए रात को रास्ता भटक गये थे। रास्ते में इन पुलिस वालों ने पकड़ कर चोरी के इल्जाम में बंद कर दिया
जज ने कुछ सोच विचार के बाद भूरा से कहा,"बेटा चिंता मत करो मैं तुम्हारे साथ न्याय करूँगा
इतना कहकर जज ने भूरा के वारंट में कुछ लिखा और हस्ताक्षर करके भूरा को पेश करने लाये सिपाही के हवाले करवा दिया। 
कोर्ट के कमरे से निकलकर थोड़ी दूर चलने के बाद भूरा अचानक खिल -खिलाकर हँसने लगा 
उसे पकड़े हुए चल रहे सिपाही ने हैरान होकर उसकी ओर देखा व बोला, "भूरा अभी तो तू इतना रो रहा था और अब अचानक यूँ हँसने लगा क्या बात हैं? कहीं तेरे दिमाग के पुर्जे तो ढीले नही हो गये?" 
भूरा हँसते हुए बोला, "अरे दीवान जी! यह सब करना पड़ता है अगर मैं जज के सामने ये सब ड्रामा नहीं करता तो आज वह मुझे पक्का सजा दे देता लेकिन मेरे इस ड्रामे के कारण शायद वह मुझे बरी कर दे देखा मैंने उस जज को गधा बना दिया"
सिपाही ने मुस्कुराते हुए कहा, "भूरे! तेरे जैसे छत्तीस अपराधियों से वह जज रोज़ निपटता है। तूने जज को नहीं बल्कि जज ने तुझे गधा बना दिया है यह देख अपना वारंट जज ने तुझे पूरे तीन महीने की जेल की सजा दी है

इससे पहले कि भूरा गश खाकर गिरता सिपाही ने उसे संभाल लिया

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

कार्टून गूगल से साभार 

मंगलवार, 17 मई 2016

लघुकथा : ठुल्ले


  पान की दुकान पर खड़े दो शिक्षकों की नज़र काफी देर से कड़ी धूप में ट्रैफिक चला रहे दो पुलिसवालों पर थी।
"यार इन ठुल्लों की जिंदगी भी क्या है? जहाँ दुनिया इस कड़ी दुपहरी में कहीं न कहीं छाँव में सुस्ता रही है, वहीं एक ये लोग हैं जो रोड पर अपनी ऐसी-तैसी करवा रहे हैं।" पहले शिक्षक ने पान की पीक थूकते हुए कहा।
दूसरे शिक्षक ने समर्थन किया, "तू ठीक कह रहा है। पर यार ये तो बता ये ठुल्ले का मतलब होता क्या है?" 
"ठुल्ला यानि कि ठलुआ मतलब कि बिना काम-धाम का खाली इन्सान।" पहला खींसे निपोरते हुए बोला।
तभी स्कूल का चपरासी भागते हुए आया और उनसे बोला, "सर जी यहाँ आप दोनों इतनी देर से गप्पबाजी में लगे हुए हैं और वहाँ आपकी क्लास के बच्चों ने धमा-चौकड़ी मचाकर आसमान सिर पर उठा रखा है। प्रिंसिपल साहब बहुत गुस्से में हैं।"
इतना सुनते ही वे दोनों स्कूल की ओर भाग लिए।
पानवाला पान पर चूना लगाते हुए एक पल को गर्मी का प्रकोप झेलते हुए ट्रैफिक चला रहे पुलिसवालों को देख रहा था और दूसरे पल पेड़ों की आड़ ले धूप से बचते-बचाते हुए स्कूल की ओर भाग रहे उन शिक्षकों को।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

लघुकथा : क़ुरबानी


    रफ़ीक़ असलम के कान में फुसफुसाया - "भाई जान सामने देखो सलमा आ रही है। क्यों न आज इस गली के सूनेपन का फायदा उठा लिया जाये?"
असलम रफ़ीक के गाल पर जोरदार झापड़ मारते हुए गुस्से में बोला - "हरामखोर आज के पाक दिन ऐसी बात सोचना भी हराम है।"
रफ़ीक़ अपना गाल सहलाते हुए बोला- "माफ़ करना भाई जान गलती हो गयी।"
असलम ने रफ़ीक़ के कंधे पर हाथ धरकर मुस्कुराते हुए कहा - "आज बकरीद पर अल्लाह को बकरे की क़ुरबानी दे आते हैं फिर किसी और रोज हम दोनों इस हसीना की क़ुरबानी ले लेंगे।" 
"हा हा हा भाई जान आईडिया अच्छा है।" रफ़ीक़ खिलखिलाया। और दोनों मस्जिद की ओर बढ़ चले।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

लघु कथा : हिसाब





    रिंग रोड के मेडिकल फ्लाई ओवर से पहले एक आदमी को लिफ्ट के लिए विवशता में चिल्लाते देख भूपेन्द्र की बाइक में अचानक ब्रेक लग गए हालाँकि उसकी बाइक में ब्रेक लगने का मतलब था कि आज ऑफिस के लिए लेट होना और लेट लतीफी के लिए ऑफिस में सीनियर की हिदायत भरी डांट सुनना फिर भी अपनी आदत से बाज न आते हुए भूपेन्द्र बीच सड़क पर बाइक रोकते हुए बुदबुदाया, “लगता है बेचारे की बस छूट गयी है वैसे भी बस ज्यादा दूर नहीं गई है बस कुछ पलों में ही अपनी बाइक के पीछे होगी
वह आदमी बाइक पर बैठते ही गिडगिडाया, “भाई वो टाटा सूमो वाला मेरा बैग लेकर भाग रहा है प्लीज उसका पीछा करो
भूपेन्द्र तेजी से बाइक भगाते हुए फिर बुदबुदाया, “ये साला टाटा सूमो वाला तो आई.एन.ए. की ओर जा रहा है और अपन को जाना है मोतीबाग यानि कि आज डांट तो पक्की. पर किसी मदद करने के आगे डांट खाना छोटी-मोटी बात है। पर इस बन्दे का बैग टाटा सूमो में क्या कर रहा है?” भूपेन्द्र ने उस आदमी से पूछ ही लिया, “भाई साहब आपका बैग टाटा सूमो में कैसे रह गया?”
“क्या बताऊँ भाई ऑफिस को लेट हो रहा था। जब कोई बस नहीं मिली तो इस टाटा सूमो की सवारी बनना पड़ा। मेडिकल पर पैसे खुल्ले करवाकर ड्राइवर को दे रहा था। जब पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ गाडी ही नहीं थी।“ उस आदमी ने एक सांस में ही पूरी घटना बता डाली।
भूपेन्द्र ने उसे सांत्वना दी, “कोई दिक्कत नहीं। देखें वो साला कहाँ तक भागता है।“
कुछ देर में ही टाटा सूमो के बगल में बाइक खडी थी और वह आदमी अपना बैग उसमें से निकालकर उसके ड्राइवर की माँ-बहन एक कर रहा था टाटा सूमो के ड्राइवर के माफ़ी मांगकर वहां से चले जाने के बाद वह आदमी भूपेन्द्र की ओर मुड़ा और बड़ा अहसानमंद होते हुए बोला, “भाई आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने मेरा हजारों का नुकसान होने से बचा लिया
भाई साहब धन्यवाद की कोई जरुरत नहीं है मैंने तो अपना हिसाब चुकाया था” भूपेन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा
उस आदमी ने हैरान हो पूछा, “कौन सा हिसाब?”
“एक बार मैं भी बड़ी मुसीबत में फँसा हुआ था, तब एक भले इन्सान ने मुझे उस मुसीबत से निकाला था मैंने भी उसे जब धन्यवाद करना चाहा तो उसने कहा था किसी मुसीबत के मारे की मदद कर देना हिसाब चुक जाएगा अब मैंने तो अपना हिसाब चुका दिया अब आप अपना हिसाब चुकाएँ या न चुकाएँ ये आपकी मर्जी” इतना कहकर भूपेन्द्र ने अपनी बाइक अपने ऑफिस की ओर दौड़ा दी
तभी उसे पीछे से उस आदमी की तेज आवाज सुनाई दी “भाई हिसाब जरुर चुकाया जायेगा
   
लेखक : सुमित प्रताप सिंह   
चित्र गूगल से साभार

सोमवार, 29 जून 2015

लघु कथा : तमाशबीन



   पुलिस जिप्सी ने जैसे ही सड़क पर यू टर्न लिया, गलत दिशा से आ रही एक मोटरसाइकिल उससे टकरा गयी और उसपर सवार आदमी उछलकर कुछ दूर जा गिरा। पुलिस जिप्सी का ड्राइवर सूबे और उसका साथी हवलदार फत्ते झट से जिप्सी से नीचे उतरे और उस आदमी को सड़क से उठाकर उसे सड़क के एक किनारे बिठाकर उसे फर्स्ट ऐड देकर उसके सामान्य होने की प्रतीक्षा करने लगे। तभी सूबे ने देखा कि एक व्यक्ति अपने मोबाइल से उनकी रिकॉर्डिंग कर रहा है। यह देख सूबे को बीते दिनों मोबाइल से फ़िल्म बनाने और उसे तोड़-मरोड़कर अपने हिसाब से पुलिसवालों के खिलाफ इस्तेमाल करने की घटनाएँ ताज़ा हो गयीं। अपनी नौकरी खतरे में देख सूबे उस व्यक्ति से मोबाइल छीनने को उसपर झपटा, लेकिन वह व्यक्ति पलक झपकते ही वहाँ से उड़न छू हो गया। तभी वहाँ से गुज़र रहे एक पहलवान ने सूबे को टोककर उससे पूछा, "उस आदमी के पीछे क्यों भाग रहे थे? कौन था वो और उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ दिया जो उसे पकड़ने की इतनी जरुरत पड़ गयी?"

तभी मोटरसाइकिल सवार कराहते हुए उठा और पहलवान से बोला, "भाई साहब वह तमाशबीन था और ये तमाशबीन किसी की मदद करने के बजाय अपने मोबाइल से फ़िल्म बनाकर और उसे सब जगह भेजकर किसी न किसी बेचारे का दुनियाभर में तमाशा बनाते हैं। गलती मेरी थी जो मैं गलत साइड से जल्दबाजी में मोटरसाइकिल चलाकर जा रहा था। शुक्र है कि मेरे साथ कोई अनहोनी नहीं हुयी और भला हो इन पुलिसवाले भाइयों का जो इन्होंने समय पर सहायता देकर मुझे बचा लिया।"

तभी पहलवान ने अपनी कनखियों से अपने अगल-बगल में देखा तो पाया कि वहाँ मौजूद बाकी तमाशबीन भी वहाँ से खिसक चुके थे।


मंगलवार, 5 मई 2015

लघु कथा : अपना-अपना प्रेम


  क उत्साही पत्रकार दूर-दराज गाँव में अपने न्यूज़ चैनल पर लाइव टेलीकास्ट के माध्यम से मौजूद था
पत्रकार – “जी हाँ इस समय आप देख रहे हैं कि हमारे बगल में एक खेत किसान अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी लगाने को तैयार खड़ा हुआ है आइये हम किसान से ही पूछते हैं कि आखिर ऐसा खतरनाक कदम उठाने के लिए ये क्यों विवश हुआ”?
पत्रकार किसान के मुँह पर माइक सटा देता है – “हाँ तो पपुआ क्या आप हमारे चैनल को बताएँगे कि आप अपने पूरे परिवार के साथ फाँसी क्यों लगाने जा रहे हैं”?
पपुआ – “प्रेम के कारण”
पत्रकार – “प्रेम के कारण। क्या बकवास कर रहे हो? तुम तो कह रहे थे कि फसल बर्बाद होने की वजह से फाँसी लगाने जा रहे हो। 
पपुआ – “साब हम अपने खेतों और ज़मीन को अपनी माँ मानते हैं और जितना आपको अपने चैनल की टी.आर.पी. से प्रेम है उससे कहीं ज्यादा प्रेम हम इस माँ से करते हैं फसल बर्बाद होने की वजह से हमारे ऊपर इतना कर्ज़ा चढ़ गया है कि हमारी माँ के नीलाम होने की नौबत आ गयी है और यही हमसे नहीं देखा जाएगा इसलिए हमने फैसला किया था अपनी धरती माँ से बिछुड़कर घुट-घुटके मरने की बजाय फाँसी लगाकर एक बार में ही अपने सारे कष्टों से मुक्त हो जायें

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

यमराज का न्याय (लघु कथा)



   मराज का दरबार लगा हुआ था। चित्रगुप्त प्रत्येक जीव के कर्मों का बही खाता जाँचकर यमराज को उसका पूरा विवरण देते थे और यमराज उस जीव को उसके लिए तय स्थान पर भेजने का निर्णय सुना देते थे। तभी एक जीव को पकड़कर यमदूतों ने यमराज के सामने प्रस्तुत किया।
यमराज - इस जीव ने क्या धृष्टता की है?
यमदूत - महाराज यह जीव बहुत जल्दी में लगता है। बार-बार पंक्ति बदल कर दूसरी पंक्ति में अन्य जीवों के आगे खड़ा हो जाता है।
यमराज - चित्रगुप्त देखो तो इस जीव की मृत्यु किस प्रकार हुई थी?
चित्रगुप्त - महाराज इसे अपनी पंक्ति में न रहने की बहुत पुरानी बीमारी है। यह सड़कों पर भी अपनी पंक्ति में नहीं चलता था और बार-बार अपनी पंक्ति बदलता रहता था। एक दिन इसी आदत के कारण यह एक ट्रक के नीचे आकर अकाल मृत्यु का शिकार हो गया।
यमराज - क्या इसको ट्रैफिक पुलिस के संदेश "लेन ड्राइविंग, सेफ ड्राइविंग" के विषय में ज्ञान नहीं था?
चित्रगुप्त - महाराज इसे यातायात के सभी नियमों का भली-भाँति ज्ञान था, किन्तु इसमें जल्दबाजी की सनक रहती थी।
यमराज - ठीक है तो इस दुष्ट को पृथ्वी पर फिर से भेजो। वहाँ यह ट्रैफिक पुलिस का सिपाही बनकर सड़कों पर यातायात को सुचारू रूप से चलवाने में योगदान देगा। जब यह तेज धूप में तपकर कोयले की तरह काला होते हुए व वाहनों का धुआँ पी-पीकर अपना कलेजा खोखला करते हुए यातायात में अवरोध उत्पन्न कर आतंक मचानेवाले इस जैसे आतंकियों से निपटेगा तब इसे अनुभव होगा कि इस जैसे दुष्टों के कारण पृथ्वी लोक पर मानव जाति को कितनी विपत्तियाँ और कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं।
चित्रगुप्त - जैसी आपकी आज्ञा महाराज।

कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

समझदार (लघु कथा)


संजना अपनी सहेली कविता से काफी दिनों बाद मिली थी। कविता अपनी सहेली संजना के लिए रसोई में चाय बनाने में व्यस्त थी और संजना कविता के दो साल के बेटे चिंटू के साथ बतिया रही थी। चिंटू अपनी तोतली बोली में उससे बातें करने में मस्त था।
संजना से बात करते हुए अचानक चिंटू बोला, "आंटी ये पपीता फ्लिज में रख दो।"
"
क्यों बेटा फ्रिज में क्यों रख देंक्यों न इसे काटकर आपको खिला दें?" संजना ने प्यार से चिंटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।"
चिंटू बोला, "आंटी इछ पपीते को चूहे ने कात कर खलाब कर दिया है। इछलिये अगल हम इछे खाएंगे तो बीमाल पड़ जाएँगे।"
तभी कविता चाय लेकर आ जाती है।
"
देखा मेरा बेटा कितना समझदार हो गया है।" कविता मुस्कुराते हुए बोली।
संजना ने हँसते हुए कहा, "हाँ इसकी बातों से लग तो ऐसा ही रहा है। अच्छा चिंटू बेटा जब ये पपीता ख़राब हो ही गया है तो आप इसे फ्रिज में क्यों रखवा रहे हैं?"
"
आंटी हमाली नौकलानी जब काम कलने आएगी तो हम उछको ये पपीता दे देंगे। इछे उछका छोता बेता खा लेगा।" चिंटू गंभीर होकर बोला।
संजना ने हैरान होकर कहा, "कविता तेरा बेटा तो कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया है।"
*चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 28 मार्च 2015

पाप (लघुकथा)


रमेश की माँ रमेश से बोली, "बेटा कई दिनों से सफाईवाली काम पर नहीं आ रही है। घर के आँगन में घास बहुत उग आई है। तू कोई लड़का लेकर आ जो कुछ खर्चा लेकर ये घास उखाड़ दे।"
"ठीक है माँ मैं कोई लड़का ढूँढता हूँ।" रमेश ने कहा।
तभी पड़ोस की झुग्गियों में रहनेवाली छोटी-छोटी बच्चियाँ रोज की तरह वहाँ खेलने आ पहुँची।
रमेश ने उन बच्चियों को देखा और अपनी माँ को सुझाव देते हुए बोला, "माँ कोई भी लड़का घास उखाड़ने आएगा तो पूरे दिन की दिहाड़ी के रूप में ढाई-तीन सौ रुपए ऐंठ ले जायेगा। इन लड़कियों से ही आँगन की घास क्यों नहीं उखड़वा लेतीं। इन्हें दो-चार रुपए दे दोगी तो उन्हीं में ये खुश हो जाएंगी। वैसे भी पूरा दिन यहाँ खेलती ही तो रहती हैं। खेलते-खेलते घास भी उखाड़ लेंगी।"
"हाँ बेटा कह तो तू ठीक रहा है। पर अभी नवरात्रि चल रही हैं और इस समय कन्याओं से काम करवाने से सिर पर पाप चढ़ेगा। नवरात्रि ख़त्म होने के बाद इनसे ही घास उखड़वाती हूँ।" रमेश की माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।
 लेखक : सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 


शुक्रवार, 20 मार्च 2015

लघु कथा : दुःख


फे और जिले कैंटीन में चाय पी रहे थे। तभी कैंटीन के बगल से निकल रही एक महिला को देखकर नफे बोला, "इस उजाड़ सरकारी दफ्तर में ये हसीन औरत क्या कर रही है?" 
जिले ने बताया, "इसका पति सूबे कुछ महीनों पहले ही सड़क दुर्घटना में मारा गया था। अब ये बेचारी अपने पति के बदले नौकरी पाने के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रही है, ताकि यह अपना और अपने छोटे-छोटे बच्चों का पेट पाल सके"।
नफे ने जोर से साँस लेते कहा, "ओहो इतनी भरी जवानी में इसने अपना पति खो दिया। इसकी पतली कमर और हिरनी सी चाल देखकर तो कोई भी अपना सबकुछ लुटा दे। इसको देखकर मेरा तो कलेजा दुःख के मारे फटा जा रहा है"।
"सही कह रहा है नफे। ईश्वर न करे कभी हम भी किसी सड़क दुर्घटना में मारे जाएँ और हमारी पत्नियाँ भी इसी तरह भटकते हुए धक्के खा रही हों तब हम जैसे भले लोगों का उनकी जवानी को देखकर शायद ऐसे ही दुःख के मारे कलेजा फटा करेगा"। जिले के इतना कहते ही कैंटीन के उस कोने में सन्नाटा छा गया।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

सोमवार, 26 जनवरी 2015

लघु कथा : देशभक्ति


   मांडेंट साहब ने पूरे स्टाफ को ब्रीफ करते हुए कहा, “आज 26 जनवरी हैजो कि देश का राष्ट्रीय पर्व है। इस दिन पूरी कर्मठता से ड्यूटी करें और अपनी देशभक्ति का परिचय दें।” उन्होंने आगे कहा, “यह दिन देखने के लिए हमारे पुरखों ने बहुत सारी कुर्बानियां दीं। अनेक कष्ट सहेतब जाकर हम सब स्वतंत्र हुए तथा आगे चलकर हमारा देश गणतंत्र बना। इतनी कठिनाइयों के बाद मिले इस विशेष दिन पर कोई ऊंच-नीच न होने पाये। आओ आज हम सब मिलकर यह शपथ लेंकि चाहे हमारी जान चली जाये लेकिन हमारे वतन की इज्जत मिट्टी में न मिलने पाए।” इतना कह कर कमांडेंट साहब पूरे स्टाफ को अलर्ट रहने का आदेश देकर अपने कमरे में चले गये। स्टाफ इधर-उधर बिखर कर आपस में बतियाने लगाकिन्तु एक युवा सिपाही उसी स्थान पर शांत खड़ा रहा। उसके मन पर कमांडेंट साहब के भाषण का अत्यधिक प्रभाव पड़ा था। उसने ठान लिया थाकि अपने देश की सेवा में यदि उसे प्राणों की भी आहुति देनी पड़ेतो वह पीछे नहीं हटेगा। देशभक्ति का दिल में जोश जगाने के लिए वह कमांडेंट साहब के प्रति बहुत आभारी था। वह कमांडेंट साहब का धन्यवाद करने के लिए उनके कमरे के भीतर गया। कमांडेंट साहब व उनका ऑफिस स्टाफ टीवी पर 26 जनवरी के कार्यक्रम देखने में मस्त था। सिपाही ने कमांडेंट साहब को सैल्यूट किया। इससे पहले वह कमांडेंट साहब से अपने दिल की बात कह पाताटीवी में राष्ट्रगान आरंभ हो गया। वह सावधान होकर खड़ा हो गया और धीमे-धीमे स्वयं भी राष्ट्रगान गाने लगा। इस दौरान उसने देखाकि कमांडेंट साहब अपने स्टाफ के साथ मजे से बैठकर बतियाते हुए टीवी देखने में मस्त रहे। युवा सिपाही कमांडेंट साहब व उनके स्टाफ की ऐसी महान देशभक्ति को देखकर मन ही मन गदगद हो उठा। 


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 


बुधवार, 31 दिसंबर 2014

लघु कथा : बदला


रजत ने जैसे ही फ़िल्म की सी.डी. खरीदने के लिए उठाई तो नितिन को गुस्सा आ गया।
नितिन- "रजत तुझे शर्म-वर्म है कि नहीं?"
रजत- "क्यों दोस्त क्या बात हो गई?"
नितिन- "तू उस फ़िल्म की सी.डी. खरीद रहा है, जिसमें हमारे धर्म का मजाक उड़ाया गया है और हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया गया है।"
रजत- "इसीलिए तो इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. खरीद रहा हूँ, ताकि अपने धर्म और देवी-देवताओं के अपमान का बदला लिया जा सके"
नितिन- "मैं कुछ समझा नहीं।"
रजत- "इस फ़िल्म में हमारे धर्म और देवी-देवताओं का अनादर किया गया है। यह जानते हुए भी अपने धर्म के कुछ तथाकथित विद्वान लोग इस फ़िल्म को देखने की इच्छा करेंगे। मैं उन तथाकथित विद्वानों को इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. को कॉपी करके मुफ़्त में बाटूँगा, जिससे कि वे सभी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में जाकर देखने की बजाय अपने घर पर ही देखें। इस प्रकार मेरे और मेरे जैसे अनेक लोगों के इस छोटे से प्रयास से फ़िल्म निर्माता का आर्थिक रूप से नुकसान होगा और वह आइन्दा से किसी भी धर्म या जाति का अपमान करनेवाली फ़िल्में बनाने से बाज आएगा।
नितिन- "अच्छा ऐसा है क्या?" दुकानदार से "भैया इस फ़िल्म की एक लोकल सी.डी. मुझे भी देना।"


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