बुधवार, 2 सितंबर 2026

समाज की दास्तान है खोया हुआ दरख़्त

    खोया हुआ दरख़्त कवि इंशाद अली का हाल ही में प्रकाशित हुआ कविता संग्रह है। ये उनकी पहली पुस्तक है। उनके इस कविता संग्रह में कुल 77 कविताएं संकलित हैं। उन्होंने पुस्तक की भूमिका में दो शब्द के माध्यम से ये दावा किया है कि ये पुस्तक उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को शब्दों में पिरो कर लिखने का प्रयास किया है। हालाँकि उन्होंने ये जिम्मा पाठकों के ऊपर छोड़ा है वे ही निर्णय करें कि इस पुस्तक में संकलित उनकी रचनाएं कविताओं की श्रेणी आती हैं या नहीं।

पुस्तक के आरंभ में समर्पण के माध्यम से ही इंशाद अली ने बतला दिया है कि वे इंसानियत के पैरोकार रचनाकार हैं और पाठकों को इस बात की उम्मीद जगाते हैं कि उनकी कविता इंसानियत का झंडा बुलंद करने वाली ही होगी।

अपनी पहली कविता माफ़ी से ही अपनी शाख से टूटी टहनी के माध्यम से वे मानवीय रिश्तों की टूटन पर कलम चलाते हुए वे लिखते हैं - टूटी हुई टहनी जानती है - वो फिर से नहीं जुड़ सकती/ उसका हरा रंग/ अब किसी और शाख में उगेगा/ उसकी कहानी/ अब किसी और पत्ते की जुबान बनेगी। अपनी शीर्षक कविता खोया हुआ दरख़्त के द्वारा वे अपनी जड़ों से नाता तोड़ने वालों के लिए कामना करते हुए लिखते हैं - शायद किसी शाम/ वो लौट आयेगा/ अपनी ही छाँव के नीचे/ जहाँ जड़ें/ फिर से मिट्टी से मिलेंगीं/ और दरख़्त/ फिर से/ घर पा लेगा।

घर जो बना नहीं कविता में वे घर के भीतर घर की तलाश करते हुए लिखते हैं - मैं अब भी उसी घर के अंदर/ घर ढूँढ रहा हूँ/ शब्दों में नहीं/ सन्नाटे के बीच/ एक आवाज ढूंढ़ रहा हूं/ जो पुकारे - "आ गया तू? थक गया होगा..." घर की आत्मा कविता में वे रसोई को घर की आत्मा की संज्ञा देते हुए अपनी माँ को याद हुए लिखते हैं - उसके लिए/ वह सिर्फ एक रसोई नहीं/ एक पूजा थी/ जिसमें रोज/ वह अपनी आत्मा जलाकर/ सुगंध बनाती है। सीढ़ियाँ कविता में वे बचपन की यादों को ताज़ा करते हुए लिखते हैं - वो सीढ़ियां/ बुआ और मौसी की गोद जैसी थीं/ जहां कोई डांट नहीं थी/ बस अपनापन था। दो परछाइयाँ कविता में वे दो परछाइयों को नफरत और इंसानियत की उपमा देते हुए लिखते हैं - अब नफरत/ तेज चाल में चलती है/ शोर मचाती, ज़हर उगलती/ इंसानियत/ धीमे क़दम रखती है/ कहीं ठोकर न खा जाए// कहीं आँगन में/ उसके लिए दरवाजा बंद न हो जाए।

     वे अपनी कविताओं में सपनों की बात करते हैं। दीवार पर टंगे सपने कविता में वे अपने सपनों की बात करते हुए लिखते हैं - दीवारों पर कुछ सपने टंगे हैं/ बाबूजी का पुराना चश्मा/ माँ के हाथों की चूड़ियों की खनक/ बहन की हंसी में घुला हुआ कोई गीत/ छोटे भाइयों के टूटे खिलौने की आवाज/ चाची की साड़ी का गोटा/ और ताई की आँखों में ठहरा हुआ काजल। ख्वाब: जेब से पूछते हुए कविता में वे सपनों पर कुछ अलग अंदाज में लिखते हैं। इसका कविता में वे समाज के मेहनतकश वर्ग के सपनों को जेब पर आश्रित होने की बात करते हुए लिखते हैं- और तब/ दिल पूछ बैठता है/ ये ख्वाब हैं/ या हमारे माथों पर/ लगी कोई तोहमत?/ क्यों यहां/ ख्वाब भी/ इंसान की जेब से पूछकर आते हैं।

     इंशाद अली ने इस पुस्तक में समाज के लगभग हर विषय पर संवेदना व मार्मिकता से परिपूर्ण कविताओं का सृजन किया है। पहला मुर्दा, जमीन के टुकड़े, मेरी मिट्टी को हाथ न लगाना, खाली शहर, मिट्टी की खुशबू, सांस लेती मशीन, वसीयत, शोर, बंटवारा व बड़ा भाई इत्यादि कविताएँ उन्हें ऐसे रचनाकार के रूप प्रस्तुत करती हैं जो समाज के प्रति सरोकार रखते हुए बड़ी जिम्मेदारी के साथ कलम चलाते हैं। इंशाद अली अपनी इस पुस्तक में उर्दू और हिंदी को कंधे से कंधा मिलाकर गंगा-जमुनी तहज़ीब में कविता कहते नज़र आते है। उनकी संजीदगी से लिखी गईं कविताओं को पढ़कर कुछ अच्छा पढ़ने के शौकीन पाठकों द्वारा उनसे कुछ और बेहतर कविताओं की आस लगाई जा सकती है। इंशाद अली को इनके प्रथम सफल प्रयास हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु अग्रिम शुभकामनाएँ!

पुस्तक - खोया हुआ दरख़्त  (कविता संग्रह)

लेखक - इंशाद अली, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश 

प्रकाशक - इंक पब्लिकेशन, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश 

मूल्य - 250 रुपए, पृष्ठ - 134

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, दिल्ली

 


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