मंगलवार, 10 मार्च 2026

एक छोटी सी भय स्टोरी


जिले - भाई नफे! 

नफे - हां बोल भाई जिले! 

जिले - आज बड़ी बोरियत हो रही है। कोई बढ़िया सी स्टोरी सुना दे।

नफे - जो हुकुम मेरे आका!

जिले - भाई, ड्रामा करना छोड़ और स्टोरी सुना।

नफे - चल तो तेरी ये इच्छा भी पूरी कर देता हूं। 

जिले - हाँ भाई, अब जल्दी से सुना दे कोई बढ़िया सी स्टोरी।

नफे - तो सुन स्टोरी।  एक छोटी मासूम सी बच्ची के हाथ से छूटा पानी का गुब्बारा राह भटक गया और एक मोहतरमा के चरण छूने की कोशिश में उनके पास गिर कर फट गया। फटते ही उसके चीथड़े-चीथड़े उड़ गए। उसके कुछ अवशेष छींटों के रूप में उन मोहतरमा पर गिर गए। ये उस गुब्बारे का बहुत बड़ा गुनाह था और इस गुनाह में बराबर की जिम्मेदार थी वो मासूम बच्ची जिसने गुब्बारे को नीचे फेंक कर उससे ये गुनाह करवाया था। हालांकि गुनाह उस बच्ची का नहीं बल्कि होली के त्यौहार के खुमार का था, जिसमें डूब कर उसने इस गुनाह को अंजाम दिया था। 

जिले - भाई, इसमें गुनाह क्या हो गया? होली पर रंग, गुलाल और पानी के गुब्बारे तो चलते ही हैं।

नफे - तेरे लिए ये होली पर नॉर्मल बात है लेकिन उन मोहतरमा के लिए नहीं थी। 

जिले - अच्छा तो आगे की स्टोरी सुना।

नफे - वैसे देखा जाए तो होली के खुमार का भी दोष नहीं था, बल्कि दोष तो इस भारतीय संस्कृति को दिया जाना चाहिए जो किसी भी धर्म व समुदाय में भेद करना नहीं सिखाती। भारतीय संस्कृति की इसी खूबी को उस बच्ची ने अपने माता-पिता व घर के बुजुर्गों से ग्रहण किया होगा और उसने बिना भेद किए गुब्बारे को मोहतरमा को समर्पित कर होली की शुभकामनाएं देनी चाही होंगी। 

जिले - हद है भाई, भारतीय संस्कृति भला क्यों दोषी हुई? हमारी भारतीय संस्कृति आपसी सद्भाव और भाईचारे को 

सिखाती है और भला इसमें गलत क्या है?

नफे - भारतीय संस्कृति की ये खूबी तुझ जैसे और मुझ जैसे लोगों को भाती है, लेकिन उन मोहतरमा को शायद ये पसंद न हो।

जिले - बड़ी अजीब मोहतरमा है। खैर तू आगे की स्टोरी सुना।

नफे - अपनी-अपनी सोच है। अब देखा जाए तो असल में दोष भारतीय संस्कृति का ही है इसलिए भारतीय संस्कृति को स्वयं को दोषी मानते हुए ये स्वीकार करना चाहिए कि उसके कारण ही गुब्बारे ने ये गुनाह किया जिसकी परिणति एक तरुण की तरुणाई के कारुणिक अंत के साथ हुई। 

जिले - बताओ मोहतरमा पर जरा से पानी के छींटे गिरने का परिणाम एक युवा के जीवन की हानि से हुआ। देखा जाए तो ये बहुत ही दुःखद और शर्मनाक घटना है।

नफे - तेरे लिए ये भले ही दुःखद और शर्मनाक घटना हो, लेकिन हो सकता है कि उन मोहतरमा के कलेजे को इस घटना से ठंडक का अहसास हुआ हो? बहरहाल उन मोहतरमा के सगे-संबंधियों और शुभचिंतकों द्वारा तरुण को इस जीवन-मरण के चक्र से असमय मुक्त किए जाने से कुंभकर्णी निंद्रा में सोये हुए दंगे के जिन्न को जगाने का कार्य किया है। इस समाचार ने सामाजिक सद्भाव व भाईचारे के भीतर भय उत्पन्न कर दिया है। 

जिले - भाई, मैने तो सोचा था कि तू कोई मनोरंजक स्टोरी सुनाएगा, लेकिन तू तो भयभीत करने वाली स्टोरी सुनाने लगा।

नफे - बिलकुल ठीक समझा। ये आज की एक छोटी सी भय स्टोरी ही थी और संभवतः इस छोटी सी भय स्टोरी का अंत इसके विराट और भयंकर रूप लेने के बाद ही समाप्त होगा।

जिले - भाई मैं तो चला।

नफे - यूँ अचानक कहाँ चल दिया।

जिले - सद्भावना और भाईचारे को साथ लेकर समाज में प्रेम और सद्भाव को फैलाने, ताकि तेरे द्वारा सुनायी गयी ये छोटी सी भय स्टोरी विराट और भयंकर रूप को धारण न कर सके।

नफे - अगर ऐसा हो सका तो देश और समाज के लिए बहुत अच्छा होगा। चल मैं भी तेरे साथ चलता हूं।

(रचना तिथि - 8 मार्च, 2026) 

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

कार्टून ChatGPT से साभार 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

थाना जातिपुरम


    त्तर प्रदेश के एक थाने में एक अपराधी के संबंध में आमद करवाने गया तो रोचनामचा मुंशी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ही निकले। मैने उनसे वहां के थानाध्यक्ष के बारे में पूछा तो मुंशी जी ने बताया कि वे फलानी जाति के हैं। उस इलाके में ढिमकानी जातियों का बाहुल्य होने के कारण उन जातियों के थानाध्यक्ष उस थाने में नहीं लगाए जाते हैं। सरकार को शायद इस बात का डर रहता है कि कहीं उन जातियों के थानाध्यक्ष विपक्षी दल वालों का सहयोग न करने लगें और चुनाव में सरकार का समीकरण बिगड़ जाए। मुंशी, जो अलानी जाति से था, ने बताया कि उस थाने में चूंकि थानाध्यक्ष फलानी जाति के हैं तो वहां फलानी जाति के पुलिस कर्मियों की बहुलता है और चलती भी उन्हीं की है। मैंने हंसकर कहा कि इसका मतलब है कि अलानी जाति वाले पुलिस कर्मी इस थाने में अल्पसंख्यक हैं तो उसने हंसकर कहा कि हम ही अल्पसंख्यक नहीं हैं बल्कि और जाति वाले भी अल्पसंख्यक की भूमिका में हैं। तभी मुंशी के फोन पर किसी अन्य पुलिस कर्मी का फोन आया और वह मुंशी से फोन पर बहस करने में लग गया। फोन कटने पर मैंने उससे पूछा कि क्या बात हो गई तो वह हंसते हुए बोला कि महाशिवरात्रि के इंतज़ाम में फलानी जाति के पुलिस कर्मियों को छोड़ कर बाकी सभी पुलिस कर्मियों की ड्यूटी लगा दी गई थी। कल पास की नहर में एक आदमी डूब गया। उस डूबते हुए आदमी को बचाने के लिए पुलिस ने गांव के एक तैराक को नहर में कुदवाया पर बदकिस्मती से वह तैराक भी नहर में डूब गया। अब आसपास के गांव वाले दूसरे आदमी के डूबने का दोष पुलिस पर मढ़ रहे हैं। इस आपातकालीन स्थिति से बचने के लिए पुलिस की एक टुकड़ी चाहिए जिसमें बचे हुए थानाध्यक्ष की जाति के सारे पुलिसकर्मी भाइयों का नाम शामिल है इसी कारण फोन पर वह साथी मुझसे बहस करने में लगा हुआ था। थाने से बाहर निकला तो मुंशी जी के ही जाति भाई मिल गए। उन्होंने बताया कि थानाध्यक्ष भले आदमी हैं। वे यदि साठ प्रतिशत अपनी जाति के पुलिसकर्मियों के लिए करते हैं तो पचास प्रतिशत बाकी जाति के पुलिस कर्मियों के लिए भी करते हैं। अब हर जाति वालों को कम से कम अपनी जाति के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से इतनी आस तो रखनी ही चाहिए और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का भी ये कर्तव्य है कि वह अपनी जाति वाले कनिष्ठ पुलिस अधिकारियों की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखे। मैंने उस पुलिस कर्मी और उस थाना जातिपुरम को प्रणाम किया और वापिस अपने घर की राह पकड़ ली। वैसे ध्यान देने वाली बात ये है कि इस देश में ये इकलौता जातिपुरम थाना नहीं है। इस देश में ऐसे जातिपुरम थानों की संख्या भरपूर मात्रा में उपलब्ध है।

रचना तिथि - 16.02.2026

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