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शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

व्यंग्य : कागा अब बोले नहीं मुंडेर पे


   हुत दिन गुज़र गए पर अपनी मुंडेर पर कोई कागा अर्थात कौआ काँव-काँव करते नहीं दिखा। एक वो भी दिन थे जब अक्सर कौए काँव-काँव करते मुंडेर पर दिख जाते थे और हम बालक चीखते हुए उनसे कहते थे ‘उड़ जा कौआ चाचा आते हों’ या फिर ‘उड़ जा कौआ मामा आते हों’। सच कहें बेशक हम इतने बड़े हो गए लेकिन बचपन दिल में अभी भी जीवित है और ये बचपन अक्सर जिद करता है कि हमारी मुंडेर पर कोई कौआ आकर बैठे और जोर से काँव-काँव करे और फिर हम चीखकर बोलें ‘उड़ जा कौआ कोई अपना आता हो’। पर दिल की बात दिल में ही रह जाती है और कोई कौआ मुंडेर की ओर मुंह भी नहीं मारता और ये बचपन दिल के भीतर ही बैठा हुआ तड़पता रहता है। आजकल कौए भी ईद के चाँद बन चुके हैं वो साल में दो बार दिख भी जाता है लेकिन ये कौए तो साल में एक ही बार दीखते हैं वो भी श्राद्धों में। आखिर कौओं ने घर पर आना और आकर मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने की परम्परा का त्याग क्यों कर दिया? कहीं उन्हें भी कलियुगी संस्कृति ने अपनी छत्रछाया में जगह तो नहीं दे दी जो वो दूत बनना छोड़कर यूँ अचानक लापता हो गए। फिर मन सोचता है कि कौए बेचारे भी क्या करें आज के युग में बेटा बाप का नहीं रहा, भाई को भाई फूटी आँख नहीं सुहाता तो रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदारों को सीधी आँख भला कैसे देख सकते हैं? जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोगों की आशाएँ विशाल और ह्रदय सिकुड़कर छोटे होते जा रहे हैं और उन सिकुड़ते हृदयों में रिश्तेदार तो कभी रह ही नहीं सकते। पहले रिश्तेदार एक दूसरे के सुख-दुःख के साथी होते थे। मुसीबत के समय अपने रिश्तेदार के कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हो जाना सच्चे रिश्तेदार की निशानी होती थी। पर समय के कोल्हू ने रिश्तेदारी को ऐसा पेरा कि न तो सच्ची रिश्तेदारी सलामत बची और न ही सच्चे रिश्तेदार। छोटे-छोटे स्वार्थ की खातिर रिश्तेदार का राम नाम सत्य तक कर देने को तत्पर रिश्तेदारों को रिश्तेदारी का र भी ठीक ज्ञात नहीं रहा हो तो कौए बेचारे क्या करें? वो कैसे पता लगायें कि घर आनेवाला वाकई में रिश्तेदार है क्योंकि उसके हृदय में तो रिश्तेदारी नामक तत्व पहले ही तार-तार हो चुका मिलता है। शायद इसीलिए कोई कौआ भूले-भटके घर की मुंडेर पर बैठ भी जाए तो किसी रिश्तेदार के आने की सूचना देने को काँव-काँव नहीं करता। असल में उसे रिश्तेदार के दिल में वो पुराना प्रेम व स्नेह दिखाई ही नहीं देता इसलिए उसके भीतर काँव-काँव कर ख़ुशी मनाने की भावना भी दम तोड़ देती है। इसलिए कौओं ने अब काँव-काँव करना छोड़ दिया है। शहरों में बड़े-बड़े मकानों और संकुचित दिलों वाले भले लोग भी भला कहाँ कामना करते हैं कि कोई कौआ काँव-काँव करे और कोई रिश्तेदार आ टपके तथा उनकी व्यस्तता में खलल डाल दे। इसलिए उन्होंने अपने घर की मुंडेर पर काँच या लोहे के कंटीले तार लगाकर कौओं को वहाँ बैठने से अवरुद्ध कर दिया। अब कौओं को भी मुंडेर पर काँव-काँव कर मेहमान या रिश्तेदार के आने का संदेशा देने का चाव नहीं रहा है। अब वे अपना समय या तो किसी लाश का माँस नोंचने में व्यतीत करते हैं या फिर मनुष्य का वेश धरकर किसी सदन में जाकर काँव-काँव करने लगते हैं।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह  

कार्टून गूगल बाबा से साभार 

रविवार, 2 मार्च 2014

कहानी: गौना

माज सेवा का चाव लिए एक दिन कुछ मित्रों के साथ मिलकर हमने भी एक एन.जी.ओ. रजिस्टर्ड करवा लिया. अब हमारे सामने प्रश्न यह था, कि अपने एन.जी.ओ. के द्वारा पहला भला काम क्या किया जाए? हमने यह निश्चय किया कि अपने एन.जी.ओ. की शुरुआत किसी ऐसे भले काम से करेंगे जो वास्तव में भला हो. हमने अपने सभी मित्रों, नाते-रिश्तेदारों को इस विषय में सूचित करके इस बारे में उनकी नेक राय माँगी, लेकिन भले काम के बारे में सुनकर वे राय देने से शायद इसलिए डर गए, कि कहीं उनकी राय के साथ हम उनकी जेब भी ढीली न करवा दें. सो उन्होंने हमें यह राय दी कि फालतू चक्करों में पड़ने के बजाय अपने काम पर ध्यान दें और जीवन जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दें. यह एन.जी.ओ. वगैरह चलाना नेताओं और बड़े लोगों काम है और हम मिडिल क्लास वाले इस लायक नहीं हैं, कि एन.जी.ओ. जैसी बड़ी चीज के विषय में सोचें भी. उनकी मिडिल क्लास सोच पर गुस्सा भी आया और हँसी भी. अरे भई अब क्या अच्छा काम करने के लिए भी हाई क्लास या मिडिल क्लास के होने या न होने के बारे में भी सोचना पड़ेगा? 
सब ओर से निराशा मिलने के बाद  हमने फैसला किया कि अब हम स्वयं ही यह निर्णय करेंगे, कि एन.जी.ओ. का शुभारंभ किस भले कार्य से किया जाए. आख़िरकार दो दिन की चर्चा में हमारी मेहनत रंग लाई और हमने अपने एन.जी.ओ. की ओपनिंग के लिए एक भला कार्य चुन लिया. हमने निर्णय लिया कि हम अपने एन.जी.ओ. के द्वारा  किसी गरीब कन्या का विवाह करवाएँगे. हमने अपने खास-खास रिश्तेदारों में इस बारे में विधिवत सूचना भिजवा दी और उन सबसे विनम्र आग्रह किया कि किसी गरीब कन्या की तलाश करें ताकि इस नेक कार्य को करके हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ हो सके.
अगले दिन ही नाना जी का फोन आया कि उन्होंने एक गरीब कन्या की खोज कर ली है. वह नाना जी के घर के सामने भाड़ भूनने वाले भुज्जी की लड़की थी.  भुज्जी, जिसका नाम संतोष था और गाँव में उसे सब प्यार से संतोषा कहते थे, ने बेटा पाने की लालसा में लड़कियों की कतार लगा दी थी. छः लड़कियाँ होने के पश्चात आखिर उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उसके घर एक बेटा पैदा हुआ. अब संतोषा के घर में बूढ़े माँ-बाप, पत्नी, बच्चों  और स्वयं को जोड़कर एक क्रिकेट टीम तैयार हो चुकी थी, जिसने उसके घर के बजट को क्लीन बोल्ड कर दिया था. वो तो नाना जी के घर में नानी और मामियों के काम में उसकी लड़कियाँ सहायता कर देती थीं और बदले में नाना जी की ओर से उसके घर के गुजारे लायक मदद मिल जाती थी. जब नाना जी को फोन पर गला फाड़ कर हमारी शुभ काम करने की योजना के बारे में संतोषा ने सुना, उसने नाना जी के तब तक पैर नहीं छोड़े जब तक कि उन्होंने इस बात का वादा नहीं कर दिया कि हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ उसकी बड़ी बेटी के विवाह से ही होगा.
हालाँकि इस बारे में शायद पूरा गाँव ही सुन चुका होगा, क्योंकि नाना जी फोन पर इतनी तेज आवाज में बात करते हैं, कि उनकी बिटिया यानि कि मेरी माँ भी यह अनुभव करने लगती हैं वो अपने दामाद यानि कि मेरे पिता के मुकाबले फोन पर कुछ ज्यादा ही चीखते हुए बतियाते हैं. अब जाने नाना जी के कान में सुनने में कोई दिक्कत है या फिर वो फोन के दूसरी ओर बात कर रहे इंसान को ही बहरा समझते हैं.  
नाना जी ने हमें आदेश दिया कि जल्द से जल्द इस शुभ कार्य को अंजाम किया जाए. हमारी सबसे छोटी मौसी का फोन आया कि वह भी इस शुभ कार्य में हमारे साथ रहेंगी और उनसे बात करने पर पता चल गया कि वो केवल विवाह मंडप पर ही हमारे साथ रहेंगी. मामाओं व मामियों ने भी इस भले कार्य में हमारा पूरा साथ देने का वादा किया. अब यह पता नहीं चल पाया कि वे कितना साथ देंगे. वैसे हमने उनके साथ के प्रकार के बारे में ज्यादा पूछना भी उचित नहीं समझा, क्योंकि हमें लगा कि वे सब मन से भी हमारे साथ रहें तो भी कम से कम कुछ सहारा तो मिलेगा ही.
जहाँ हमारे रिश्तेदार इस कार्य में सहयोग करने को उत्सुक हो रहे थे, वहीं हमारे एन.जी.ओ. के एक सदस्य, जो अपने विचारों से विद्रोही स्वाभाव का था, के प्रभाव में आकर अन्य सदस्य हमारे विरोध पर उतर आए. उन सबने मिलकर तर्क दिया कि एन.जी.ओ. का आरंभ किसी छोटे-मोटे भले कार्य के माध्यम से होना चाहिए न कि ऐसे भारी-भरकम बजट वाले काम से. हम गंभीर सोच में पड़ गए, लेकिन हमारी टीम, जिसमें अब केवल मैं और मेरी माँ ही बचे थे, ने फैसला लिया कि एक बार जिस काम को करने का फैसला कर लिया है तो उसे पूरा करके ही दम लेंगे. एन.जी.ओ. के सदस्यों के अलावा हमें अपने पारिवारिक सदस्यों का विरोध भी झेलना पड़ा. पिता जी और बड़े भाई को जब हमारी योजना के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्या अनाप-शनाप पैसा आ रहा जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा ली.
चारों ओर से होनेवाले विरोध से हमारा उत्साह कुछ पल के लिए भंग हो गया, लेकिन शरीर में राजपूती खून ने उबाल मारा और “रघुकुल रीत सदा चलि आई / प्राण जायें पर वचन न जाई” दोहे को दोहराते हुए हमने निर्णय किया कि इस भले कार्य को हम करके ही रहेंगे चाहे कोई बुरा माने या भला. एन.जी.ओ. के बाकी सदस्यों को जब हमारे इस दृढ फैसले के बारे में पता चला तो उन्होंने कोई भी सहायता करने से साफ़ इंकार कर दिया और पिता जी और बड़े भाई से किसी मदद की उम्मीद हमने कभी की ही नहीं थी. हम हमें जो कुछ करना था खुद ही करना था.
माँ ने अपनी बचत पोटली और मैंने अपनी एक्स्ट्रा पे को इस भले कार्य में होम करने का निर्णय किया. अपनी आर्थिक तैयारी के उपरांत हमने नाना जी से संतोषा की बेटी के विवाह के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए कहा. नाना जी ने विवाह का मुहूर्त निकलवा कर आदेश दिया, कि विवाह तिथि से एक सप्ताह पहले ही विवाह की तैयारी करवाने के लिए हम उनके घर हाज़िर हो जायें. 
हम माँ और बेटे विवाह की तय तिथि से एक सप्ताह पहले ही  नाना जी की हवेली में पहुँच गए. हमें वहाँ सभी मौसा-मौसियाँ अपने बाल-बच्चों के साथ उपस्थित मिले. पूरे घर में उत्सव सा माहौल था. हमारे लिए उत्सव का माहौल कुछ देर बाद ही मायूसी से भर गया. कारण यह था कि नाना जी ने संतोषा की बेटी के विवाह का जो बजट बनाया था वह मेरी एक्स्ट्रा पे और माँ की बचत से कई गुना अधिक था. हमने नाना जी से हिम्मत जुटाकर यह पूछने की हिम्मत की, कि हम गरीब कन्या का विवाह करने जा रहे हैं या फिर राजसी घराने की किसी लाडली का? यह सुनते ही नाना जी भड़क उठे और बोले कि उन्होंने आस-पास के गाँवों में इस विवाह की घोषणा कर दी है और हम संतोषा की बेटी का विवाह राजपूती आन-बान के साथ किया जाएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे.
राजपूती आन-बान पर कुर्बान होना अब हमारी विवशता बन गई थी. अब हमारे सामने यक्ष प्रश्न यह था, कि इस लंबे-तगड़े बजट के लिए धन का इंतज़ाम आखिर कैसे किया जाए? पिता जी और भाई से इस बारे में बात करना ओखली में सिर देना होता. एन.जी.ओ. के अन्य सदस्यों से कोई आस थी नहीं. हमें निराश देख हमेशा की तरह माँ की माँ यानि कि मेरी नानी जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई और हमें चुपचाप उधार के तौर पर विवाह में खर्च होनेवाली राशि प्रदान कर दी.
हमने राजपूती परंपरा के अनुसार संतोषा की बेटी के लिए दहेज का सामान ख़रीदा व विवाह हेतु जरूरी सामान का प्रबंध किया. आस-पास गाँवों में इस विवाह के बारे में खबर फैल गई और सभी नाना जी की तारीफों के पुल बाँधने लगे. गाँव वाले इस बात से अनजान थे कि विवाह हम अपने एन.जी.ओ. के अंतर्गत करवा रहे थे. वे तो यह समझ रहे थे कि यह सब नाना जी की कृपा से हो रहा है. हालाँकि ऐसी बात नहीं थी कि नाना जी ने कोई मदद नहीं की. नाना जी के आदेश पर घरातियों व बारातियों के भोजन में खर्च होने के लिए आटा और दाल की बोरियाँ गोदाम से निकाल कर हाज़िर कर दी गईं.
निश्चित दिन व समय पर संतोषा की बेटी का विवाह बड़े धूम-धाम से संपन्न हुआ. आस-पास के गाँवों में रहनेवाले लोग इस विवाह को कौतूहलवश देखने आए और नाना जी की जय-जयकार करते हुए वापस गए. हमने मामा की लड़की को इस विवाह की तस्वीरें खींचने के लिए उसके हाथ में कैमरा देकर नियुक्त कर दिया, ताकि वो तस्वीरें हमारे नवनिर्मित एन.जी.ओ. की ऑडिट रिपोर्ट के काम आ सकें, लेकिन उसका कैमरा अपने दादा के मूछों पर ताव देते हुए अंदाज से दूसरी ओर घूमा ही नहीं. विवाह होने के बाद संतोषा की बेटी को नम आँखों से हम सबने विदा किया. विवाहरुपी शुभ कार्य करने के दो दिन बाद ही हम वापस अपने घररुपी ठिकाने में पहुँच गए.
हम इस आर्थिक झटके से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे, कि एक दिन नाना जी का फोन आ गया. घर की खैर-खबर पूछने के बाद उन्होंने बताया, कि उनके पास सुबह संतोषा आया था और पूछ रहा था कि बेटी का गौना करवाने की तारीख कबकी रखी जाए? नाना जी ने कहा, कि जिस प्रकार ठाट-बाट से संतोष की बेटी का विवाह हुआ था, उसी प्रकार गौना भी होना चाहिए वरना इलाके में हाल ही में बनी इज्ज़त मिटटी में मिल जायेगी. फोन रखने के बाद निराश और दुखी हो माँ मेरा और मैं उनका मुँह देखने लगा.  
कुछ देर बाद फिर से फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर संतोषा था. वह माँ को प्रणाम करके बोला, “जीजी रचना के गौना की तारीख कब की रखी जाए?”

इतना सुनते ही माँ ने घबराकर फोन काट दिया और हम माँ-बेटे अपना-अपना सिर पकड़कर गहरी सोच में डूब गए.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

सुमित को मिला आगमन साहित्य सम्मान-2013

नॉएडा, उत्तर प्रदेश: आगमन साहित्य अकादमीहापुड़ द्वारा दिनांक 23 फरवरी, 2014 (रविवार) को अपरान्ह 2.30 बजे कार्ल हूबर स्कूलइंस्टीट्यूशनल एरियासेक्टर-62, नोएडा, उत्तर प्रदेश के सभागार में "लोकार्पण एवं सम्मान समारोह" का आयोजन किया गयाजिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ शायर पद्मश्री डॉ० गुलज़ार देहलवी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में दरभंगा (बिहार) से पधारे वरिष्ठ साहित्यकारविद्वान्चिंतक एवं मैथिली के लोकप्रिय गीतकार-जनकवि श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० अशोक मैत्रेय एवं मुम्बई से पधारे कविवर डा० विनोद भल्ला ने शिरकत की। इस अवसर पर सम्मान्य कवियोंपत्रकारोंअतिथियों एवं दर्शकों से खचाखच भरे सभागार में दिल्ली गान के लेखक सुमित प्रताप सिंह को अकादमी की ओर से श्री पवन जैन एवं डॉ० अशोक मैत्रेय द्वारा सम्मान-पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर "आगमन साहित्य सम्मान-2013" से सम्मानित किया गया। 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

मिस्ड कॉल

पको वो बीते दिन तो याद ही होंगे, जब मोबाइल फोन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बना था। लैंडलाइन फोन के सहारे गुजर-बसर करनेवाले हम भोले और भाले जीवों के नीरस होते जा रहे जीवन में एक नई अनुभूति का अहसास करवाने आया था मोबाइल फोन और उसके साथ ही साथ आ धमकी थी मिस्ड कॉल। शुरूआती दौर में आउट-गोइंग व इनकमिंग के बहुत अधिक दाम लगते थे। इसलिए शान दिखाने के चक्कर में मोबाइल फोन मध्यवर्गीय भारतीय मानुष की जेब ढीली कर डालता थालेकिन हम भारतीय  तो ठहरे हर मुश्किल का हल निकालने में सिद्धहस्त। सो इस समस्या को भी दूर करने में हमने अधिक समय नहीं लगाया। अब लोग एक दूसरे से बतियाने के लिए मिस्ड कॉल का प्रयोग करने लगे। उधर से मिस्ड कॉल आती और इधर से सस्ते लैंडलाइन का सदुपयोग होना आरम्भ हो जाता। प्रेमी और प्रेमिकाओं की तो लव लाइफ मिस्ड कॉल से निकल पड़ी। मिस्ड कॉल ने प्रेम के पंछियों का भाग्य ही बना डाला। उधर से प्रेमिका मिस्ड कॉल मारती और इधर प्रेमी महोदय टेलीफोन की दुकान के कोने में बने फोन बूथ में लैंड लाइन से प्रेमिका को फोन मिलाकर उसमें खो जाते थे और अपनी जेब ढीली करवाते रहते थे 
हालाँकि मिस्ड कॉल का बाकी समाज को भी बहुत लाभ मिला। सड़कों पर अवैध रूप से विराजमान रेहड़ी-पटरी वाले मिस्ड कॉल मिलते ही अपना सामान-सट्टा लेकर रफू चक्कर हो जाते थे और नगर निगम वाले बचे हुए नाममात्र सामान से ही वजू करने को विवश होकर  जाते थे। चोरोंसटोरियों और उन जैसे अन्य भले मानुषों के लिए मिस्ड कॉल  वरदान जैसा कार्य करती थी। जैसे ही उनपर पुलिसिया धावे का अंदेशा होतातभी कहीं से मिस्ड कॉल आ जाती और वे तथाकथित भले मानुष झट से जाने कहाँ अदृश्य हो जाते और बेचारे पुलिसवालों का हाल साँप के गुज़र जाने पर लकीर पीटते रह जानेवाला हो जाता।

समय बदला टेलिकॉम कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता ने इनकमिंग कॉल मुफ्त करवा डाली और आउटगोइंग कॉल भी पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो गईलेकिन मिस्ड कॉल का जलवा अभी बरक़रार है। हमपर तो इसकी विशेष तौर से कृपा रहती है। दोस्तयार व रिश्तेदार सभी मिस्ड कॉल नामक प्रेम हमें अक्सर प्रदान करते रहते हैं और हम उनके मिस्ड कॉल रुपी प्रेम का खामियाजा आउटगोइंग कॉल कर-करके भरते रहते हैं। लोग हैं कि अपना लाभ देखते हुए हमें मिस्ड कॉल की सेवा देते रहते हैं और एक हम हैं जो सर्वप्रेम का भाव दिल में बसाये हुए मिस्ड कॉल का जवाब दे-देकर लक्ष्मी मैया को हमसे धीमे-धीमे दूर करते रहते हैं । एक बार किसी काम व्यस्त थेकि एक दोस्त की मिस्ड कॉल आ गई। जब हमने उसे कॉल किया तो खिलखिलाते हुए बोला, "यार अब क्या बताएँ असल में महीने का आखिरी दिन हैइसलिए मोबाइल रिचार्ज नहीं करवा पाया सो मिस्ड कॉल करनी पड़ी"। मन तो हुआ कि उस दुष्ट से पूछ लें, कि यहाँ हमारा क्या महीने का पहला दिन हैइस दिन हमारा भी महीने का आखिरी दिन ही होता है और इस रोज हमारे वेतन का भी लगभग राम नाम सत्य हो चुका होता है। पर आदत से मजबूर जो ठहरे। माँ-बाप ने बचपन से ऐसी आदत डाल रखी हैकि किसी का दिल नहीं दुखाया जाता चाहे बेशक दूसरा हमारे दिल के हजार टुकड़े करके चला जाए। फिर यह सोचते हैं कि कभी वो भी दिन थे जब मिस्ड कॉल की प्रतीक्षा में हमारे पल कितनी बेचैनी और इंतज़ार में बीता करते थे। इसलिए मन मसोस कर इस मिस्ड कॉल नामक विपदा को झेलते रहते हैं। ये लो जी फिर से ससुरी मिस्ड कॉल आ गई। चलिए लगता है कि किसी गरीब ने इस तथाकथित अमीर को याद फ़रमाया है।
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

संपादक की पत्नी

   संपादक की पत्नी नामक संबंध लेखक समुदाय के लिए बड़ा ही पवित्र है. संपादक महोदय हमारे लिए यदि आदरणीय हैं, तो उनकी पत्नी महोदया हम सबके लिए परम आदरणीया हैं. हम लेखकों को नचाने वाले संपादक नामक खिलौने को कसने की चाभी उन्हीं के पावन हाथों में विराजमान रहती है, जिसका समय-समय पर उनके कोमल दिखनेवाले कठोर हाथों से सदुपयोग होता रहता है.  वो संपादक के जीवन की स्वामिनी हैं. वो उनके सारे सुखों को हरने वाली है और उनका जीवन दुखों से भरने वाली हैं. संपादक जी वैसे तो अपने घर से बाहर शेर हैं, किन्तु घर में पहुँचकर अपनी परम परमेश्वरी पत्नी के सामने कोल्हू का बैल बनकर हो जाते ढेर हैं. कोल्हू का बैल बनना उनकी नियति है. दिन भर दफ्तर में पिरते हैं फिर अपने घर में थके-मांदे अपनी पत्नी के निर्देश पर पिरते-पिरते आहें भरते हैं. उनका घर उनके कठिन परिश्रम से बना हुआ उनकी पत्नी का साम्राज्यिक संसार है और उस साम्राज्य में संपादक की हर साँस पत्नी के आदेश से ही भीतर व बाहर आती और जाती है. संपादक द्वारा अस्वीकारे व दुत्कारे जाने पर हम लेखकों की अंतिम आस हैं संपादक की पत्नी. उन्होंने यदि स्वीकृति दे दी, तो समझो लेखकों का भाग्य जाग गया और यदि उन्होंने भी दुत्कार दिया, तो लेखनी छोड़कर दूसरा कार्य करने में ही भलाई है. इसलिए यदि वो थोड़ी-बहुत बदसूरत भी हैं, तो भी उनकी खूबसूरती की शान में कसीदे पढ़े जा सकते हैं. उनकी आँखों में थोड़ी-बहुत विकृति है या थोड़ा-बहुत भेंगा भी देखती हैं तो क्या हुआ ? हम लेखकों के लिए तो वो मृगनयनी ही हैं. वो चाहे लगड़ाकर चलें या फिर बैसाखी के सहारे पर हमारी दृष्टि में उनकी चाल हिरनी की चाल को भी मात देती है. उनकी कर्कश बोली भी हमारे कानों में रस घोल देती है. चाहे उनकी आवाज सुनते-सुनते हमारा सिर दर्द से फटने लगे, किन्तु फिर भी हमें अपने मुस्कुराते चेहरे संग वाह-वाह करने का धर्म ही निभाना चाहिए. उनके रूखे-सूखे बाल भी काली घटाओं से प्रतीत होते हैं और उनकी छोटी सी चोटी भी काली नागिन का आभास करती प्रतीत होती है.  उनकी बेढंगी स्थूल काया भी मॉडलों की छरहरी काया को मात देती है. उनकी हँसी बेशक औरों को भयानक लगे किन्तु हम लेखकों के लिए वो ऐसी लगती है जैसे फूल झर रहे हों. अनेक कमियाँ होते हुए भी इस धरा पर वो एक संपूर्ण नारी हैं, क्योंकि वो एक पत्नी हैं वह भी किसी ऐरे-गैरे या नत्थू-खैरे की नहीं की नहीं, बल्कि माननीय संपादक महोदय की पत्नी हैं. वो जो कहें वह सत्य है और जो न कहें वह भी सत्य है. वो हम लेखकों को लेखन की वैतरणी पार करवाने वाली खेवा हैं. संपादक द्वारा हम लेखकों पर की गईं ज्यादतियों के लिए उन्हें सबक सिखाने का हमारा अचूक अस्त्र और शस्त्र हैं  संपादक की पत्नी. यदि उनका वरद हस्त हम लेखकों को मिल जाये तो लेखकीय कैरियर बिगड़ते- बिगड़ते बन जाये, अन्यथा संवरते-संवरते बिगड़ जाये. इसलिए आइये हाथ जोड़कर नमन करें इस वसुंधरा पर अवतरित हुई उस महान नारी को, जिसके हाथ में हम लेखकों के भाग्य को बनाने व बिगाड़ने की कुंजी है.
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

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