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बुधवार, 24 जून 2026

रहस्य और रोमांच से भरपूर उपन्यास कालदंड


    कालदंड उपन्यास युवा लेखक लोकेश कौशिक की पहली पुस्तक है। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस उपन्यास में लोकेश पाठकों को आरंभ से अंत से बांधे रहते हैं। उपन्यास में लेखक ने प्रत्येक वस्तु, स्थान, व्यक्ति के व्यक्तित्व व मानसिक स्थितियों का जो गहराई से वर्णन किया है वो लेखक के लेखकीय कौशल का कमाल है।

उपन्यास की कहानी बलि के नाम पर किसी तांत्रिक द्वारा दो बच्चों की निर्मम हत्या से आरंभ होती है। उपन्यास के मुख्य पात्र विशु के माध्यम से उपन्यास के कथ्य को गढ़ा गया है। इसमें दर्शायी गयी कथा के माध्यम से लेखक ने समाज में फैले अंधविश्वास व जादू, टोना-टोटका जैसी कुप्रथाओं पर अपनी लेखनी के माध्यम से प्रहार किया है। लेखक ने ये दर्शाने का प्रयास किया है कि बलि के नाम पर किसी की हत्या कर अपने इष्ट से कुछ प्राप्त करने की लालसा करना मूर्खता और भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

उपन्यास में जहाँ कुछेक स्थान पर सारंग व सावित्री के प्रेम दृश्यों की उपस्थिति पाठकों के हृदयों को कोमलता से छूती हुई उनमें प्रेम के अनेक कमल खिला देती है, वहीँ माखन, भूरा व उसके साथियों द्वारा क्रूरतापूर्वक सारंग के कबीले के पुरुषों, महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गों का निर्ममता से किया जाने वाला संहार पाठकों को मन-मस्तिष्क को उद्वेलित कर देता है।

कुल मिला कर ‘कालदंड’ पठनीय उपन्यास है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकेश कौशिक में हिन्दी लेखन जगत में अच्छी ओपनिंग की है और मुझे आशा के साथ पूर्ण विश्वास है कि लोकेश कौशिक हिन्दी लेखन जगत में लंबी पारी खेलेंगे। मेरी ओर से उन्हें लेखन में स्वर्णिम भविष्य हेतु हार्दिक शुभकामनाएं एवं शुभाशीष!

सुमित प्रताप सिंह 


शनिवार, 15 मार्च 2025

साहित्य की शिप्रा में डुबकी लगातीं आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर


   दयपुर, राजस्थान में 8 जून, 1951 को जन्मी आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर की शिक्षा-दीक्षा हाड़ौती क्षेत्र कोटा, राजस्थान में हुई तथा उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में परास्नातक किया है। उनको हिंदी, मराठी, संस्कृत, अँग्रेजी़ भाषाओं का ज्ञान है तथा सिंधी उनकी मातृभाषा है। उन्होंने 15 वर्ष में लेखन प्रारंभ किया तथा उनकी लेखन की विधाएँ कविता, कहानी, लघुकथा, हास्य-व्यंग्य, संस्मरण, आलेख, निबंध, रेखाचित्र इत्यादि हैं। उनकी लघुकथाएँ एवं कविताएँ 21 अखिल भारतीय साझा संग्रहों में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा शीघ्र ही उनकी लघुकथाओं का संग्रह प्रकाशित होनेवाला है। उन्हें लेखन के क्षेत्र में अनेक पुरस्कार-सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इस समय वह मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में साहित्य की शिप्रा में नियमित रूप से डुबकी लगाने में मग्न हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से उनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

सुमित प्रताप सिंह - आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर - बचपन से ही मुझे अपने जेबखर्च से धर्मयुग, सा. हिंदुस्तान, पराग, चंदामामा, नंदन, अरुण, सुषमा, सरिता, मुक्ता, माधुरी, नवचित्रपट आदि पत्रिकाएँ खरीदकर पढ़ने का चस्का लग गया था। आठवीं में थी कि समग्र प्रेमचंद, शरतचंद्र, टैगोर, ताराचंद्र बंद्योपाध्याय, अमृता प्रीतम, गुरुदत्त, शिवानी, जैनेंद्र आदि को पढ़ने में ही समय गुज़रने लगा था।    

   मेरे पिता एक साहित्यप्रेमी डॉक्टर थे। उनके पास महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब से डाक द्वारा सिंधी-उर्दू भाषाओं में कई दैनिक समाचार पत्र और पत्रिकाएँ आया करती थीं, उर्दू में ब्लिट्ज़ भी। उनमें पिताजी के लेख भी प्रकाशित हुआ करते थे। शायद पठन-पाठन का गुणसूत्र उन्हीं से विरासत में मिला।  

   1966-67 में मैं ग्यारहवीं में थी। शुरु से ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने और बेस्ट स्टूडेंट का पुरस्कार कलेक्टर के हाथों मिलने से हमारी हिंदी विषय की अध्यापिका श्रीमती शकुंतला पाराशर को मुझसे बड़ी आशाएँ थीं। विद्यालयीन वार्षिक गृहपत्रिका ' प्रेरणा ' की वह संपादक थीं और चाहती थीं कि पत्रिका के लिए कोई कविता-कहानी ज़रूर लिखकर दूँ।

     लिखने का तो कोई अनुभव था नहीं। हाँ, गंभीर साहित्य के अध्ययन का अनुभव काम आया। कोशिश करके मैंने कक्षा दूसरी में हुए एक सच्चे अनुभव/संस्मरण को कहानी की तरह लिख डाला। इस तरह आपके शब्दों में ' लिखने का रोग ' लगा नहीं, लगाया गया और पिछले साठ वर्षों से यह संक्रमण यथावत है। 

     अगर कहूँ कि लेखन एक रोग नहीं, वरन एक महौषधि है हमारे मस्तिष्क और जीवन दोनों को ऊर्जस्वित रखने के लिए तो यह सत्योक्ति होगी, अतिशयोक्ति नहीं।

सुमित प्रताप सिंह - लेखन से आप पर कौन-सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा? 

आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर - लेखन व्यक्तित्व एवं सोच को परिष्कृत व परिमार्जित करने में सहायक होता है। लेखक के सामाजिक अवदान को नकारा नहीं जा सकता। समाज में एक सम्मान्य स्थान पाना भी अच्छा प्रभाव है।

     मुझे नहीं लगता कि लेखन से कोई बुरा प्रभाव भी पड़ता है। हाँ, साहित्यकार के साथ-साथ 'महिला' होने के नाते कुछ अति सम्मानित साहित्यकारों की कुत्सित दृष्टि का भी कभी-कभार सामना करना पड़ जाता है, लेकिन सामाजिक ठेकेदारों की मान्यता तो यह है कि यह पुरुष का दोष नहीं, 'नारी सशक्तीकरण' ही इसकी जिम्मेदार है।

सुमित प्रताप सिंह - क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर - जी हाँ, लेखन प्राचीन काल से ही समाज का दिशा निर्देशक रहा है। क्रूर विधर्मी आक्रमणों और परतंत्रता के दौरान साहित्य लेखन ने ही समाज को सांस्कृतिक रूप से एकजुट रखकर अध्यात्म और भारतीय अस्मिता को जीवित बनाए रखा। गुरु नानक और कबीर का लेखन तो समाज को बदलाव का संदेश देने का जीवंत उदाहरण है। वैसे भी जनजागरण तो लेखन के बिना संभव ही नहीं।

सुमित प्रताप सिंह - आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों? 

आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर - मेरी अपनी प्रिय रचना एक लघुकथा है 'नक़ाबपोश '। 2008 में महाराष्ट्र छोड़कर मैं उज्जैन स्थलांतरित हुई तो यहाँ स्कूल-कॉलेज की युवतियों को नकाबपोशी का अभ्यस्त पाया। बुर्कानशीन की तरह उनकी सिर्फ़ आँखें ही खुली दिखती थीं। मोटरसाइकिल पर लड़के के पीछे चिपककर बैठी नक़ाबपोश बालिका किसी की बेटी या बहन ज़रूर होगी। सार्वजनिक परिवहन में यात्रा के दौरान सामने जब भी और जितनी देर भी ऐसी लड़कियाँ देखती, मुझे अपने भीतर ऑक्सीजन की भारी कमी महसूस होने लगती और मेरा दम घुटने लगता था। विवश हो मुझे अपनी दृष्टि और ध्यान, दोनों को वहाँ से हटाना पड़ता था। एक बार तो सामने बैठी एक लड़की से पूछ ही लिया, "तुम्हें साँस लेने में तकलीफ़ नहीं होती?" वह चुप रही। बाद में सार्वजनिक यातायात साधनों को ही त्यागना पड़ा।

     उसी समय मेरे भीतर एक विचार कौंधा कि अगर विवाह के बाद पर्दे की अभ्यस्त इस लड़की को घूँघट करना पड़ा तो यह ज़रूर विद्रोह पर उतर आएगी...और तभी इस लघुकथा का बीज अंकुरित हो गया।

    पर्दाप्रथा को एक जर्जर रूढ़ि बतानेवाला युवा वर्ग स्वयं इसका कितना आदी हो चुका है, उनके इस विचार-विपर्यय के कारण मुझे अपनी यह रचना प्रिय है।

सुमित प्रताप सिंह - आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर - मुझ जैसी गुमनाम लघुकथाकार की पुरज़ोर कोशिश रहती है कि लघुकथा लेखन के ज़रिए कोई-न-कोई न-कोई सामाजिक समस्या बीज रूप में उठाऊँ, साथ ही उसका संभावित समाधान और मनोवांछित संदेश भी उसमें गुंफित हो। यदि उस संदेश का प्रभाव एक प्रतिशत पाठक पर भी पड़ता है तो समझूँगी, लेखन सफल हुआ।

सोमवार, 16 सितंबर 2024

आया मौसम रोने-धोने का


    ड़ोसी राज्य में रोने-धोने का मौसम फिर से आ चुका है। जगह-जगह रोने-धोने के विधिवत कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। पड़ोसी राज्य में चुनावी घोषणा होने के बाद से ही रोने-धोने के कार्यक्रमों की आशंका सभी को थी। विधायक जी जो सत्ता का मजा सालों से लूट रहे थे, उन्हे इस बार उनकी पार्टी ने टिकट से बेदखल कर दिया। ये बेदखली उनसे बर्दाश्त नहीं हुई और उनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा, जिसमें उनके भविष्य में अय्याशी करने के सारे सपने डूब कर बेमौत मर गए। उनके जैसे कई विधायक पूर्व विधायक होने की बात को सोच-सोच कर सुबक रहे हैं। कभी वे पार्टी हाईकमान के पैर पकड़ कर रो रहे हैं, कभी अपनी पत्नी के पल्लू में दुबक कर रो रहे हैं तो कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए सार्वजनिक रूप से रो रहे हैं। विधायक जी के साथ-साथ सालों से विधायक बनने का सपना पाले हुए पुराने और वरिष्ठ कार्यकर्ता भी रो रहे हैं। पार्टी की नीव को अपने खून-पसीने से सींचने के बावजूद उन्हें अपनी पार्टी से आश्वासन के सिवा कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हर बार चुनावी बेला पर वरिष्ठ कार्यकर्त्ता अपने इलाके को स्वयं को भावी विधायक घोषित करने वाले बड़े-बड़े और भारी-भरकम बैनरों व पोस्टरों से पाट देते हैं, लेकिन इन ठठकर्मों से हाईकमान नहीं पट पाता और वे बेचारे मन मसोस कर रह जाते हैं। कभी मंत्रियों के बेटा-बहू, बेटी-दामाद और नाते-रिश्तेदार उनकी योजना को पलीता लगाते हैं तो कभी बैलून कैंडिडेट आकर उनके प्लान को चौपट कर डालते हैं। वे भरकस प्रयत्न करते हैं कि पार्टी हाईकमान और पार्टी के वरिष्ठों के समक्ष स्वयं को पार्टी रत्न साबित कर सकें, पर ऐसा कुछ नहीं हो पाता और अंततः वे दहाड़े मार-मार कर रोने लगते हैं। जनता इस पूरे घटनाक्रम को देख कर मुस्कुराती है और जी भर कर खिलाती है। हालांकि उसकी ये खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाती और चुनाव समाप्त होते ही पूर्व विधायकों और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से रोने-धोने की जिम्मेदारी लेकर अगले पांच सालों के लिए वो रोने-धोने के लिए विवश हो जाती है।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 13 जून 2024

वरिष्ठ कार्यकर्ता की सौगंध


     ब तक इलेक्शन थे तब तक भागजा पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता जिले सिंह को सांस लेने की फुर्सत नहीं थी। अपनी पार्टी के हर टुच्चे से टुच्चे काम की जिम्मेवारी उनके ही जिम्मे थी। उनका सिद्धांत है घर का जरूरी से जरूरी काम चाहे हो न हो पर पार्टी का कोई काम नहीं छूटना चाहिए। सालों-साल से वे इसी सिद्धांत का कड़ाई से पालन करते आ रहे थे। पार्टी का हर छोटा बड़ा नेता उनकी पार्टी भक्ति से बहुत प्रभावित था और इसी कारण उनका बहुत सम्मान करता था। उनके मन-मस्तिष्क पर पार्टी भक्ति इतनी अधिक हावी थी कि एक बार उनके बचपन के लंगोटिया यार व सफा पार्टी के जिला संयोजक नफे सिंह ने उनसे उनकी पार्टी की बुराई करते हुए कह दिया कि कब तक अपनी पार्टी के लिए दरी बिछाते रहोगे कभी पार्टी किसी छोटे-मोटे चुनाव में अपने लिए टिकट का जुगाड़ भी कर लो। बस इतनी सी बात पर जिले सिंह का खून खौल उठा। हालांकि उन्होने अपने लंगोटिया यार का खून तो नहीं किया पर उससे हमेशा के लिए कट्टी कर की। 

     एक रात जिले सिंह राजनैतिक रैली में पूरे दिन मेहनत करने के बाद अधिक थकान होने के कारण बिस्तर पर लेटे हुए कराह रहे थे कि तभी उनकी धर्मपत्नी ने उनसे शिकायती लहजे में कहा, "लगता है आपकी ज़िंदगी अपनी पार्टी के लिए मुफ्त में ही शरीर तोड़ने में कटेगी।" जिले सिंह गुर्रा कर उससे बोले, "क्या फालतू बकवास कर रही है?" "फालतू बकवास नहीं कर रही बल्कि सही बोल रही हूँ। अब तो आस-पड़ोस के लोग भी ताने मारने लगे हैं।" पत्नी उदास होते हुए बोली। जिले सिंह ने मामले की गंभीरता को समझा और गुर्राना छोड़ अपनी पत्नी को पुचकारते हुए उससे पूछा, "क्या ताना मारा? हमें भी तो बता।" "लोग कहते हैं नालायक से नालायक कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी से टिकट लेकर अपनी किस्मत बना ली पर आप के हिस्से में तो बस पार्टी के काम का बोझ आया।" पत्नी तुनक कर बोली। पत्नी की बात सुनकर जिले सिंह का खून खौल उठा पर उन्होंने समझदार पतियों द्वारा बनायी कहावत 'पत्नी से बहस, जीवन तहस-नहस' को याद किया और फिर उन्होंने नाजुक स्थिति को ठंडा पानी पीकर भली-भाँति संभाला। पत्नी तो अपनी बात कहकर शांति के साथ सो गयी लेकिन शांति की सखी अशांति जिले सिंह के मस्तिष्क में घर कर गयी और उन्हें उस रात नींद नहीं आयी। पूरी रात उनके मन-मस्तिष्क में पत्नी द्वारा कही गयी बातें ही गूँजती रहीं।  

     अगले दिन जिले सिंह ने बिना ये सोचे-समझे कि उनके जैसे कार्यकर्ताओं का काम केवल पार्टी की सेवा करना है और टिकट पाने का अधिकार सिर्फ पार्टी के नेताओं के पुत्र-पुत्री और सगे-सबंधियों तथा सिनेमा व खेल जगत के चर्चित सितारों को ही है, जाकर अपनी पार्टी के कार्यालय में जाकर घोषणा कर दी कि अब वे पार्टी के कार्यक्रमों में दरी बिछाने के कार्य तक ही सीमित नहीं रहेंगे। अब उन्हें भी अब तक पार्टी के लिए किए गए कार्यों का ईनाम चाहिए। इस संबंध में उन्होंने पार्टी के जिलाध्यक्ष से संपर्क साधा और निगम पार्षद के होने वाले चुनाव के लिए टिकट की मांग कर डाली। जिलाध्यक्ष ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि अभी उनसे वरिष्ठ कार्यकर्त्ता कतार में हैं। उनका नंबर आएगा तो उन्हें उनके परिश्रम का फल अवश्य दिया जायेगा। जिले सिंह ने सोचा कि निगम पार्षद का टिकट तो बाद में मिलता रहेगा क्यों न अपने लड़के के लिए कोई छोटी-मोटी ठेकेदारी का ही जुगाड़ कर लिया जाये। इस इच्छा के साथ उन्होंने स्थानीय विधायक से भेंट की पर विधायक अपने सगे-संबंधियों और चमचों के बीच सरकारी ठेकों की बन्दर बाँट पहले ही कर चुका था। अब जिले सिंह ने अपने जिले के सांसद से गुहार लगाई और अपने बेटे के लिए किसी छोटी-मोटी सरकारी नौकरी के लिए उनका चरण वंदन करते हुए निवेदन कर डाला। पर सांसद के यहाँ से भी उनके हिस्से में निराशा ही हाथ आयी। सभी ओर से निराश होने के पश्चात् जिले सिंह ने अपनी पार्टी के विरुद्ध विद्रोह की पताका लहरा दी। जिले सिंह का यह विद्रोह पार्टी के पदाधिकारियों को रास न आया और उन्हें तत्काल विधिवत लात मार कर पार्टी से निष्काषित कर दिया गया। इस घटना के बाद जिले सिंह के ज्ञान चक्षु ऐसे खुले कि उन्होंने राजनीति से एक कोस की दूरी बना ली। इसके बाद सबसे पहले उन्होंने अपने लंगोटिया यार नफे सिंह के घर जाकर उससे हाथ जोड़कर अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगी और उसके बाद अपने घर पहुंच कर अपनी पत्नी के सिर पर हाथ रखकर सौगंध खायी कि भविष्य में उनके लिए उनके परिवार और परिवार के सदस्यों से महत्वपूर्ण कोई और नहीं होगा।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टूनिस्ट: श्याम जगोता 

गुरुवार, 6 जून 2024

नटबंधन का दौर


    लोकतंत्र के महाभारत की समाप्ति हो चुकी है। अब समय है गठजोड़ कर सरकार बनाने का। किसी भी राजनैतिक दल को जनता ने इतनी शक्ति प्रदान नहीं की कि वो केवल अपने दम पर सरकार बना सके। अब सरकार बनाने का पथ उस रस्सी का रूप धर चुका है जिस पर मुख्य राजनीतिक दल को नट बनकर करतब दिखाते हुए लोकतंत्र की चाबी हासिल करने जाना है। दूसरे राजनीतिक दल भी नट बनकर उस रस्सी पर करतब दिखाना चाहते हैं। किंतु ये तभी संभव है जब रस्सी पर पहले से करतब दिखा रहा नट अपना संतुलन खोकर नीचे आ गिरे। इसके लिए रस्सी के दोनों ओर खड़े छोटे नटों को प्रलोभन दिया जाता है कि वह बड़े नट को दिए गए अपने वचन से नट जाएं तो उन्हें सुनहरा अवसर प्रदान किया जाएगा। छोटे नट विचारमग्न हो अपने नफे-नुकसान का गुणा-भाग करने में व्यस्त हो जाते हैं कि कहीं सबसे बड़े नट का साथ छोड़कर कम बड़े नट के साथ मिल गए और वहां उतना सम्मान नहीं मिला तो उनके नटने के परिणामस्वरूप उनके राजनीतिक भविष्य की तो खाट ही खड़ी हो जाएगी। छोटे नटों के उत्तर की प्रतीक्षा में कम बड़े नट रस्सी पर चल रहे सबसे बड़े नट के साथ-साथ नीचे ही इस आस के साथ करतब दिखाना आरंभ कर देते हैं कि कब उनके भाग्य का छींका टूटे और सबसे बड़ा नट अपने-आप ही रस्सी से फिसल कर नीचे धरती पर ऐसा गिरे कि भविष्य में उठकर अपने पैरों पर चल ही न पाए। फिर तो रस्सी भी उनकी होगी और छोटे नटों का साथ भी रहेगा। जनता दर्शक बनी उन नटों के करतबों को देखकर सोचने लगती कि देश में अब गठबंधन की अपेक्षा नटबंधन का दौर आ चुका है।

रचना तिथि - 6 जून, 2024

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

कार्टून - श्याम जगोता

 

रविवार, 26 मई 2024

अभिभावक-शिक्षक भेंटवार्ता


     जिस प्रकार की इन दिनो गंभीर अभिभावक-शिक्षक भेंटवार्ता होती है, ऐसी भेंटवार्ता हमारे भाग्य में कभी थी ही नहीं। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले हम भोले-भाले विद्यार्थी विद्या का अर्थ ग्रहण करने की अपेक्षा विद्या की अर्थी निकालने का अधिक चाव रखते थे। हमारे माता-पिता को अपने-अपने काम से ही फुर्सत नहीं मिला करती थी, जो हम और हमारी पढ़ाई पर ध्यान दे पाते। पिताजी अपनी नौकरी के भंवर में ऐसे फंसे हुए थे कि उससे निकलना बहुत कठिन था और माँ को घर के काम से ही पल भर का चैन नहीं मिलता था रही सही कसर हमारे शिक्षक महोदय पूरी कर दिया करते थे। उनको अपने छात्रों को पढ़ाने से अधिक प्राइवेट ट्यूशन से दो पैसे की ऊपरी कमाई करने में अधिक आनंद आता था। जब कभी उन्हें कक्षा में पढ़ाने को विवश होना पड़ता था तो वह ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखने के बजाय अपने डंडे से छात्रों के शरीर पर लिखाई अधिक किया करते थे। न तो शिक्षकों ने हमारे अभिभावकों को किसी भेंटवार्ता के लिए बुलाया न ही किसी छात्र ने अपने अभिभावकों को शिक्षक से मिलने का सुझाव देने का साहस किया। सभी छात्र चुपचाप शिक्षकों के मजबूत डंडों की भेंटवार्ता अपने-अपने शरीर से इस आस के साथ करवाते रहते थे, कि चाहे बुद्धि का विकास हो न हो लेकिन डंडे खा-खाकर उन सबके शरीर में सहनशक्ति और मजबूती का विकास तो होकर ही रहेगा।

     आज के समय की बात ही कुछ और है। अब अभिभावक स्कूल की फीस भी भरते हैं और अपने बच्चे की हर छोटी-मोटी गलतियों के लिए शिक्षक की फटकार भी सहते हैं। असल में देखा जाए तो स्कूल में भारी भरकम फीस भरने के बावजूद पढ़ाने की नैतिक जिम्मेवारी अभिभावकों के जिम्मे ही है। वे बेचारे नौकरी और घर की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ अपने नौनिहालों को पढ़ाने के नाम पर स्वयं बचपन को न चाहते हुए भी जीते हुए फिर से अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए विवश हैं। शिक्षकों की भी विवशता है वे बेचारे पूरी कक्षा के विद्यार्थियों पर भला एक साथ कैसे ध्यान दे सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को शिक्षकों द्वारा ये जिम्मेवारी सौंप दी जाती है, कि या तो अपने बच्चों को ढंग से पढ़ाओ या फिर उनका बेकार रिजल्ट भुगतने को तैयार रहो। ऐसे सभी कड़े निर्देश देने के लिए प्रत्येक स्कूल में समय-समय पर अभिभावक-शिक्षक डांटवार्ता का आयोजन किया जाता है   

     अभिभावक-शिक्षक डांटवार्ता के दौरान शिक्षक अपने मुख पर गांभीर्य और दुख का ऐसा आवरण चढ़ा लेते हैं, कि एक बार को तो ऐसा प्रतीत होता है कि भेंटवार्ता से पूर्व वे किसी न किसी भले मानस की चिता को मुखाग्नि देकर आए हों। अपने बच्चे के भविष्य के प्रति चिंतित भयभीत अभिभावक शिक्षक द्वारा बच्चे के विषय में दिए गए आदेशात्मक कड़े निर्देश सिर झुका कर विवशतावश सुनते रहते हैं। बच्चे को पढ़ाई की मशीन बनाने की प्रक्रिया पर इतनी विस्तृत व गंभीर वार्ता होती है कि इस वार्ता के आगे भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली कश्मीर वार्ता भी अपनी लघुता पर खिन्नता प्रकट करने लगे। भेंटवार्ता में अभिभावकों को बच्चे की शिकायत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से डांट की इतनी अधिक मात्रा प्रदान की जाती है, कि एक बार को तो इच्छा होती है कि अभिभावक-शिक्षक भेंटवार्ता के स्थान पर इसका नाम बदल कर अभिभावक-शिक्षक डांटवार्ता रख दिया जाए।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 18 मई 2024

लोकतंत्र के नज़रबट्टू


     स बार चुनावी महाभारत में फिर से राजनीतिक दलों द्वारा फिल्म एवं खेल जगत के सितारों को टिकट देकर चुनावी दंगल में जनता के बीच लाया गया है। आशा है कि सदा की भांति जनता फिल्मी पर्दे पर दिखाए गए अभिनेताओं व अभिनेत्रियों के जलवों एवं खेल के मैदान में खेल जगत के सितारों द्वारा किए गए अभूतपूर्व प्रदर्शन पर मोहित हो उन्हें अपना जनप्रतिनिधि चुन ही लेगी। चुने जाने के बाद वे कथित जनप्रतिनिधि अपने चुनावी क्षेत्र से ऐसे लापता हो जायेंगे जैसे गधे के सिर से सींग। वे जनता के दुःख दर्द सुनने, उसकी परेशानियों का समाधान करने व अपने चुनावी क्षेत्र के हाल चाल की खबर रखने के अलावा हर वो काम करेंगे जो उनकी सुख सुविधा और यश को बढ़ाने का कार्य करें। जनता के बीच अंधभक्ति और चमचत्व में सर्वोच्च डिग्री धारक उन जनप्रतिनिधियों के नाकारापन पर आंख बंद किए रहेंगे। यदि कोई भूल से भी उनकी आँखें खोलने का प्रयास भी करेगा तो उस बेचारे पर देशद्रोही अथवा सांप्रदायिक होने की मोहर लगा दी जाएगी।

     उन कथित जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र की सुध तब आएगी जब अगले चुनावी रण का बिगुल फिर से बजेगा। इसके बाद कभी वे खेतों में दराती लेकर फसल काटने का ड्रामा करेंगे तो कभी किसी गरीब के जाकर उसके सीने से चिपट कर उसका सच्चा हितैषी बनने का स्वांग करेंगे। जो नौटंकी के मास्टर माइंड होंगे वे किसी गरीब के घर जाकर उसके खून-पसीने से जोड़े गए अन्न को हजम कर उस गरीब व उसके परिवार को अगले कुछ दिनों भूख से दो-दो हाथ करने के लिए छोड़ कर किसी और गरीब के घर भोजन कर गरीबों का हितैषी बनने के अभियान पर निकल पड़ेंगे।

     उनके चुनावी फंड के भाग्य में जनता की भलाई में खर्च होने के बजाय यूं निठल्लेपन पड़े रहते हुए आंसू बहाना ही लिखा होगा। चुनावी फंड को जनप्रतिनिधि द्वारा जनता के कल्याण हेतु खर्च करने के स्वप्न को जनता द्वारा दिन में जागते हुए देखा जाएगा। किन्तु उसका ये स्वप्न कभी भी पूरा नहीं हो पायेगा। कथित जनप्रतिनिधि के कार्यकाल के पूरा होने पर वापिस जमा होना ही उसकी नियति होगी।

    राजनीतिक दलों के कर्मठ कार्यकर्त्ता दलों के कार्यक्रमों में दरी बिछाने या नेताओं की जय- जयकार करने को ही अपना सौभाग्य समझेंगे क्योंकि उनके ज्ञान चक्षु खुलने के बाद उन्हें इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति चुकी है कि चुनावी टिकट के लिए जनता के बीच जाकर उसकी सेवा करने के बजाय चर्चित चेहरा होना अधिक आवश्यक होता है। इसलिए वे कर्मठ कार्यकर्त्ता अंधभक्ति और चमचत्व की मिश्री नींबू पानी में अच्छी तरह घोलने के बाद एक घूँट में उसे पी जायेंगे। इसके बाद अपने-अपने राजनीतिक दल का झंडा उठा कर कथित जनप्रतिनिधियों के अनुगामी बनकर उनकी जयकार से आकाश को गुंजायमान कर देंगे। यह देख कर लोकतंत्र भरपूर स्नेह के साथ लोकतंत्र के नज़रबट्टू कथित जनप्रतिनिधिओं को अपने सीने से लगा लेगा।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रचना तिथि– 13/05/2024

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

साहित्य का प्रसाद बांटते डॉ.जय शंकर शुक्ल

    पेशे से प्रवक्ता व हृदय से साहित्यकार डॉ जय शंकर शुक्ल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शिक्षा निदेशालय में कर्मरत हो साहित्य साधना करते हुए समाज में साहित्य का प्रसाद बांटने में वर्षों से जुटे हुए हैं। अपने मन-मस्तिष्क की भट्टी में समाज के विभिन्न विषय रूपी अन्न को अच्छी तरह भूनकर उसका आटा बना कर व उसमें अपना लेखकीय कौशल रुपी बूरा मिला कर उसकी पंजीरी बना उसे प्रसाद के रूप में देश के हिंदी साहित्य प्रेमियों को बांटने में कई वर्षों से मग्न हैं। शुक्ल जी द्वारा किए साहित्यिक यज्ञ के परिणामस्वरूप इन्हें अनेक साहित्यिक पुत्रों एवं पुत्रियों की प्राप्ति हो चुकी है जो इनके नाम की पताका साहित्य जगत में फहरा रहे हैं। अब तक शुक्ल जी ने लगभग 150 कहानियों की रचना की है, जो अब तक 13 कहानी संग्रहों के रूप में प्रकाशित भी हो चुकी है। साथ ही साथ इनके चार उपन्यास अधूरा सच, पराए लोग, मोरपंखी इंद्रधनुष एवं भावना के स्वर प्रकाशित हो चुके हैं एवं दो उपन्यास प्रकाशन क्रम में है। इसी तरह 14 कविता संग्रह, दो साक्षात्कार संग्रह, समीक्षा और आलोचना की कुल मिलाकर इनकी 40 से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी है। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

सुमित प्रताप सिंह - आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

डॉ जयशंकर शुक्ल - सुमित जी, जहां तक लेखन की बात है यह मुझमें वंशानुगत है। प्रारंभ से ही अपने साथ घटित घटनाओं को कहीं लिखकर रख लेने की एक प्रवृत्ति रही है। अब यह प्रवृत्ति कितनी सही है अथवा कितनी गलत इसके बारे में तो मैं कुछ नहीं कर सकता। हां इतना जरूर कहूंगा की धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति स्थाई होती चली गई। और यह अपने साथ कुछ नए-नए रास्तों को भी बनाती चली गई। यदि आपके प्रश्न के अनुसार लेखन को रोग कहें तो अब यह रोग स्थाई हो चुका है और सुख देने लगा है। 

सुमित प्रताप सिंह - लेखन के प्रारंभिक काल में आपने कौन सी विधा में लेखन किया?

डॉ जयशंकर शुक्ल - मित्र, यदि इसे किसी रचना से केंद्रित करके देखा जाए तो मेरे जीवन की सबसे पहली रचना एक उपन्यास के रूप में रही। लेखक के जीवन में उसकी पहली कृति सबसे महत्वपूर्ण होती है इसलिए नहीं कि वह पहली है बल्कि इसलिए कि वहां से उसकी यात्रा प्रारंभ होती है और इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों को जब समीक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसे में जो हालात हमारे सामने उद्घाटित होते हैं वह पहली कृति के आधार भूमि को लेकर ही आगे बढ़ते हैं।

सुमित प्रताप सिंह - लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

डॉ जयशंकर शुक्ल - अच्छा प्रभाव पड़ा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा यह कहना मेरे लिए कठिन है। लेकिन इतना जरुर कहना चाहूंगा कि लेखन अब जीवन बन गया है। आपाधापी के आज के संसार में समाज के द्वारा मिलने वाले खट्टे-मीठे अनुभवों को लिख पाना व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। यदि कुछ और साफ लहजे में कहा जाए तो यह एक सात्विक व्यसन बन चुका है। लेखन ने जीवन को परिष्कृत होने में भी मदद की है अपने पूर्व और बाद के जीवन का अवलोकन करने पर मैं कह सकता हूं कि मेरे लेखन ने मैं जो कुछ भी हूं वह मुझे बनाया है। अब यह समाज की तरफ बात जाती है कि वह मुझे अच्छा मानती है तो लेखन का मुझ पर अच्छा प्रभाव पड़ा। और यदि समाज मुझे बुरा मानती है तो लेखन का मुझ पर बुरा प्रभाव पड़ा। मैं समझता हूं इतनी साफगोई के साथ मैं अपना जवाब दे पा रहा हूं।

सुमित प्रताप सिंह - क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

डॉ जयशंकर शुक्ल - समाज हम सबको साथ लेकर बनता है समाज का परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से होता है वास्तव में समाज परिवर्तनशील है और यह परिवर्तन कई कर्म द्वारा संभव हो पता है लेखन इन सब में एक कारण हो सकता है जब हम किसी भी साहित्यिक रचना को आकार प्रदान करते हैं तो उसमें समाज की भूमिका कई रूपों में निश्चित तौर पर होती है और प्रेरणा से लेकर सबक तक यह रचनाएं समाज को निरंतर प्रदान करती रहती है समाज इससे सबक लेकर के स्वयं में सुधार करें तो समाज सुधार जाता है वहीं यदि समाज इसके नकारात्मक पक्षों को अपनाता है तो हम यह कैसे कह पाएंगे कि यह रचनाएं समाज सुधार कर रही है।

सुमित प्रताप सिंह - आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

डॉ जयशंकर शुक्ल - सुमित जी, एक रचनाकार से उसके जीवन में सबसे कठिन प्रश्न यदि कोई है तो वह यही है जो आप पूछ रहे हैं। रचनाकार की सभी रचनाएं उसे प्रिय होती है। उसमें कम प्रिय अथवा अधिक प्रिय का कोई मानक ही नहीं है। रचनाकार जब किसी रचना को आकार देता है तो एक तरह से वह सृजन करता है। और यह सृजन उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है, जो उसे संतुष्टि प्रदान करता है। संतुष्ट प्रदान करने वाला कोई भी कार्य किसी भी व्यक्ति के लिए छोटा अथवा बड़ा नहीं हो सकता ऐसा मेरा प्रबल मत है। मैंने अपने अब तक के साहित्यिक जीवन में हिंदी साहित्य के विविध रूपकारों में अपनी रचनाओं को आकार दिया है। सबसे प्रिय रचना अगर कहे तो अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद जी के जीवन पर लिखित 12 सर्गों का महाकाव्य क्रांतिवीर आजाद मुझे सबसे अधिक प्रिय है। और मेरे दिल के करीब है।

सुमित प्रताप सिंह - आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

डॉ जयशंकर शुक्ल - मित्रवर, समाज को संदेश दे सकूं अपने आपको इस लायक मैं नहीं समझ समझता। समाज एक ऐसी इकाई है जो संदेश-निर्देश की परिधि से काफी अलग है। एक व्यक्ति उस समाज रूपी इकाई का एक सदस्य है जो अपने कार्यों के द्वारा अपने समाज में अपना योगदान प्रदान करता है और इस योगदान के आधार पर उसका मूल्यांकन करते हुए सामाजिक संस्थाएं उसका अभिनंदन करती हैं। मेरे अपने विचार से सामाजिक ताने-बाने में व्यक्ति नहीं अपितु उसके कार्य महत्वपूर्ण होते हैं। आपने अपने प्रश्नों के द्वारा मुझे अपने विचार व्यक्त करने का जो अवसर दिया उसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूं।

रविवार, 24 सितंबर 2023

व्यंग्य: भक्षक बनाम रक्षक पुलिस


     मार्केट में एक कथित जिम्मेदार माँ से जब अपने बच्चे की शरारतों का बोझ न संभाला गया, तो वह उस मार्केट में गश्त लगा रहे दो पुलिस वालों की ओर इशारा करते हुए अपने बच्चे से बोली। 

माँ – चुप हो जा शैतान वरना तुझे सज़ा दूँगी । उन पुलिस वालों से तुझे पकड़वा दूँगी । वे तुझको जेल में डाल कर खूब डंडे लगाएंगे। फिर तुझको अपनी माँ के ये बोल याद आएंगे। 

गश्त लगा रहे पुलिस वालों, जिनका नाम जिले और नफे था, ने जब ये सुना तो नफे बोला – ये महिला भी गजब ढाती है, बच्चे को हम जैसे सीधे-सादे पुलिस वालों से डराती है । 

जिले – चलो मिलकर लेते हैं इस नारी की क्लास, ताकि भूल जाए करना ऐसी बकवास ।  

दोनों पुलिस वाले उस महिला और उसके बच्चे के पास टहलते हुए पहुंचते हैं । बच्चा उन दोनों को देखकर डर के मारे काँपने लगता है। 

नफे – मैडम, देश को भविष्य को क्यों बिना बात में डराती हैं? हम रक्षक पुलिस वालों को भक्षक क्यों बताती हैं? 

जिले – आपको पता है कि कुछ दिनों पहले हुआ था एक प्रकरण, जिसमें एक बच्चे का कुछ शैतानों ने कर लिया था अपहरण।

माँ – अच्छा ऐसा कैसे हुआ था? अपहरण के बाद उस बच्चे का क्या हुआ था? 

नफे – उस बच्चे की माँ भी आप जैसी ही जिम्मेदार और भली थी । उसने भी अपने बच्चे को खिलाई पुलिस के डर की मोटी डली थी ।    

जिले – जब उस बच्चे का अपहरण करके कार में ले जाया जा रहा था, उस समय बगल  से पुलिस वालों को कहीं इंतज़ाम देने के लिए ले जाया जा रहा था।

माँ – फिर क्या हुआ?

 नफे – चूंकि उस बच्चे की माँ भी आप जैसी थी महान, इसलिए अपहरण करने वालों के काम में नहीं आया व्यवधान।

माँ – मतलब?

जिले – मतलब कि वह बच्चा पुलिस को देख कर बुरी तरह डर गया. और आपने शोले फिल्म में गब्बर सिंह वो का डायलॉग तो सुना ही होगा ‘जो डर गया सो....’

माँ – नहीं नहीं अब आगे कुछ मत बोलिए। मेरी बेवकूफी को बेवकूफी मान कर ही छोड़िए। आगे से न होगा ऐसा गलत काम। बेटा, पुलिस वाले अंकलों को बोल राम-राम!

बच्चा – दोनों अंकल जी को राम-राम! 


जिले और नफे – राम-राम! आगे से अपनी माँ की गलत बातों पर बिलकुल मत देना ध्यान।

ये सुन कर बच्चा मुस्कुरा दिया। बच्चे की मुस्कराहट में माँ ने भी पूरा साथ दिया।

और इस तरह जिले-नफे की समझदारी से एक बच्चे का भविष्य अंधकार में जाने से बाल-बाल बच गया।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Photo credits - Pradeep Yadav 

शनिवार, 16 सितंबर 2023

व्यंग्य : उपयोगिता का दौर

 


     ज का दौर उपयोगिता का दौर है। जब तक आप उपयोगिता की कसौटी पर खरे उतरते हैं आप सिरमौर हैं वरना किसी और का शुरू हो जाता दौर है। यूनानी विचारक प्लेटो के अनुसार एक गोबर से भरी टोकरी भी सुन्दर कही जा सकती, यदि वह उपयोगिता रखती है। इसलिए इस संसार में जीने के लिए आपको अपनी उपयोगिता समाज के समक्ष सिद्ध करनी ही पड़ेगी। यदि आपमें उपयोगिता का अभाव है, तो फिर आपको समाज में नहीं मिलना भाव है। अब आपके मस्तिष्क में ये प्रश्न कौंधेगा, कि इस ससुरी उपयोगिता का मानक भला है क्या? इस प्रश्न का बड़ा सरल सा उत्तर है, कि जब तक आप दूसरों के काम आ सकते हैं या उनकी सुख-सुविधा को बनाए रखने में सहयोगी बने रहने की योग्यता रखते हैं तब तक आपका सम्मान है। जिस दिन आपकी उपयोगिता समाप्त हुई उसी दिन आपको समाज के उपयोगिता प्रेमी जीवों का अंतिम प्रणाम है। एक छात्र को ही ले लीजिए। वह बेचारा दिन-रात परिश्रम करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। उसे आरंभ में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता का सामना करना पड़ता है। इन असफलताओं के दौर में वह समाज के लिए अनुपयोगी जीव होता है। उससे बात करना तो दूर उसे आजू-बाजू भी भटकने नहीं दिया जाता तथा साथ में उसे ताने मार-मार कर उसका जीवन दुष्कर कर दिया जाता है। जैसे ही उस छात्र का भाग्य करवट लेता है और वह किसी प्रतियोगी परीक्षा को उत्तीर्ण कर लेता है, तो उससे अनुपयोगी का पदक वापिस लेकर उसके सिर पर उपयोगिता का मुकुट सम्मान सहित धर दिया जाता है। अब अपनी हिन्दी भाषा की बात करें तो कुछ लोग हिन्दी के बल पर ही कमाएंगे और खाएंगे, किन्तु जब सम्मान देने का समय आएगा तो अंग्रेजी में बड़बड़ाते हुए अंग्रेजी के ही गुण जाएंगे। ऐसी दोहरी मानसिकता वाले जीवों के लिए जब तक हिंदी की उपयोगिता है, तभी तक वे उसके साथ रहते हैं। ऐसे जीवों के लिए हिंदी की उपयोगिता हिंदी पखवाड़े के बीच ही सर्वाधिक होती है। हिंदी पखवाड़े में ये जीव हिंदी के काँधे पर सवार हो हिंदी को समर्पित कार्यक्रमों में मंच पर विराजमान होने का सुख प्राप्त करेंगे, मानदेय राशि से भरे लिफाफे और हिंदी सेवी सम्मान व पुरस्कार बटोरेंगे, किंतु जैसे ही हिंदी पखवाड़ा समाप्त होगा ये जीव पखवाड़े के बीच मिली सुख-सुविधा को उपलब्ध करवाने वाले भले मानवों को थैंक यू वैरी मच का संदेश भेज कर पुनः अंग्रेजी के चरणों में लौटना आरंभ कर देंगे। वैसे इसमें इनका दोष नहीं है क्योंकि ये दौर ही उपयोगिता का है न कि अनुपयोगिता का। है कि नहीं?

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रचना तिथि - १४ सितंबर, २०२३

चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 9 सितंबर 2023

जी-20 आला रे


     राजधानी दिल्ली और एनसीआर में उत्सव का माहौल है। जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन के उपलक्ष में दिल्ली एनसीआर दुल्हन की भांति सज चुके हैं। कूड़ा-करकट और गंदगी बहुत उदास हैं। उन बेचारों को उठा-उठा कर आयोजन स्थल से दूर ले जाकर पटका जा रहा है। गली-मोहल्ले और सड़कें चमचमा रहे हैं। कुरूपता अचानक से जाने कहां लापता हो गयी है। चहुं ओर उत्सव का माहौल है। ऐसा लगता है कि जैसे हर कोई गा रहा हो जी-20 आला रे। अभावों में भी सुखद स्वप्नों के सहारे जीने वाले देश को आस है, कि जी-20 शिखर सम्मेलन उनके भविष्य को स्वर्णिम बनाएगा। जी -20 आला रे गीत का गायन करते हुए जी-20 शिखर सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सभी देशवासी पूरे जी-जान से जुटे हुए हैं। देश की राजधानी के चप्पे-चप्पे में और इसकी सीमाओं पर सुरक्षा के लिए तैनात जवान अन्य एजेंसियों संग इस प्रयास में है कि ये आयोजन सफल हो जाए। विश्व बंधुत्व की ओर भारत को अग्रसर करने के लिए लोग कष्टों को सुख मान कर हर्षित व गर्वित हैं। राजधानी दिल्ली व एनसीआर लीप-पोत कर सजाए गए अपने आकर्षक रूप को लोगों के नैनों के दर्पण में निहारते हुए इस असमंजस में हैं कि वे इस पर इतराएं, इठलाएं या फिर से अपने पूर्व रुप में आने के लिए समय काटते जाएं। विदेशी मेहमानों के आगमन से उल्लास से भरी ये धरती विश्व बंधुत्व व प्रगति के स्वप्नों को साकार करने के लिए अत्यधिक उत्साहित है। अब जाने ये स्वप्न साकार होंगे या फिर बाहर से आया कोई बहुरूपिया अपने चेहरे पर बंधुत्व का मुलम्मा चढ़ा कर इस बंधुत्व को तार-तार करने के अपने कुत्सित उद्देश्य को पूर्ण कर लौट जाएगा। बहरहाल इस आयोजन को सफल बनाने के लिए कई रातों की नींद की बलि दे चुकीं आँखें मिलकर इसकी सफलता की आस के साथ निरंतर गुनगुना रही हैं जी-20 आला रे।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 2 सितंबर 2023

दंगे के बाद


     दोनों समुदायों की भीड़ आमने-सामने खड़ी हो एक-दूसरे का खून बहाने को तैयार थी। उन्माद में कमी न आए इसलिए समय-समय पर दोनों पक्षों का नेतृत्व कर रहे नेता धार्मिक नारे लगाकर अपने-अपने धर्म की खातिर मर-मिटने के लिए उन्मादी भीड़ को दुष्प्रेरित कर रहे थे। दोनों समुदायों के बीच बेचारा भाईचारा धरती पर लहूलुहान हो दर्द से बुरी तरह कराह रहा था। उसके बगल में ज़मीन पर पड़ी गंगा-जमुनी तहजीब भी लुटी-पिटी हालत में आंसू बहा रही थी। ये सब देखकर मियाँ दंगे लाल मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। भाईचारे ने ये जानते हुए भी कि उसका चारा बनना तय है उन्मादी भीड़ से पूछा - आप सभी क्यों एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हो?

भाइचारे के सवाल के जवाब में एक तरफ से आवाज आई मज़हब की खातिर और दूसरी ओर ध्वनि गूंजी धर्म की रक्षा के लिए।

गंगा-जमुनी तहजीब ने उन्हें समझाया - ये सब करने से तुम सबको सिवाय खून-खराबे के कुछ हासिल नहीं होनेवाला है।

मजहब की राह में में क़ुर्बान होने से हमें शहादत मिलेगी। एक तरफ से कोई उन्मादी चिलाया। हां हां धर्म के लिए मर-मिटने से हम धर्मयोद्धा कहलाएंगे। दूसरी ओर से कोई अन्य उन्मादी हुंकारा।

भाईचारा गुस्से में चीखा - किसी को कुछ नहीं मिलना। दंगे के बाद या तो तुम सबकी लाशों को चील-कुत्ते खायेंगे या फिर तुम सब सालोंसाल जेल में पड़े हुए अपनी-अपनी जमानत होने का इंतज़ार करते रहोगे।

ये सुनकर दोनों ओर की उन्मादी भीड़ ठिठक गई। मजहब के ठेकेदारों ने मामला बिगड़ते देख मज़हबी नारे लगाने शुरू कर दिए। भीड़ के मन-मस्तिष्क में भीतर ठिठक कर रुका उन्माद फिर से सिर उठा कर खड़ा हो गया। 

मियाँ दंगे लाल ने ये नज़ारा देखकर एक खूंखार ठहाका लगाया।

तभी गंगा-जमुनी तहजीब कोशिश करके उठी और बोली - अरे बेवकूफों, जिनके बहकावे में आकर तुम सभी अपना और अपने बच्चों का जीवन बर्बाद करने जा रहे हो कभी उनसे इस बारे में पूछा है, कि उनके खुद के बच्चे तो विदेश में पढ़-लिखकर अपना भविष्य बना रहे हैं और वे तुम सबको आपस में भिड़वा कर तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का भविष्य खराब करवाने जा रहे हैं।

गंगा-जमुनी तहजीब की बात पर जहां मजहबी ठेकेदार बगलें झांकने लगे, वहीं भीड़ के मन-मस्तिष्क में तन कर खड़ा हुआ उन्माद अचानक ढीला पड़ कर बैठ गया।

भाईचारे ने गंगा जमुनी तहजीब की बात को आगे बढ़ाया - हां हां इन धर्म के ठेकेदारों से कहो कि ये अपने बच्चों को विदेश से बुलाकर भीड़ का नेतृत्व करने को कहें।

ये सुनते ही दोनों ओर की भीड़ का उन्माद धाराशाही हो गया। ये देखकर मियाँ दंगे लाल भी अपने सिर पर पांव रखकर वहां से भाग लिए।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार

शनिवार, 26 अगस्त 2023

चंदा मामा बस एक टूर के


     चंदा मामा आँखें बंद किए हुए कुछ गुनगुना रहे थे, कि तभी उन्हें आभास हुआ, कि उनके दक्षिणी ध्रुव पर कोई धीमे से उतरा है। एक बार को तो उन्होंने विचार किया कि यह उनका भ्रम है, लेकिन तभी वंदे मातरम और जय हिंद की गूंजती ध्वनियों ने इस बात की पुष्टि कर दी कि कोई न कोई तो उनसे मिलने आया है। उन्होंने फिर गुनगुनाना आरंभ कर दिया - लो आ गया दीवाना कोई, गाने को तराना हिंद का। 

चंद्रयान-3 ने चंदा मामा को अपना परिचय देते हुए कहा - चंदा मामा, मैं चंद्रयान-3 हूँ। मैं हिंदुस्तान से आया हूँ। 

चंदा मामा ने तंज कसा - कमाल है जिस देश में जाति, समुदाय और धर्म की राजनीति से ही लोगों को समय नहीं मिल पाता। दूसरे के महापुरुषों और योद्धाओं का अपरहण कर अपनी जाति का ठप्पा लगाने में व्यस्त रहने वाले देश को भला इतनी फुर्सत कैसे मिल गयी जो तुम्हें यहाँ भेज दिया। 

 चंद्रयान-3 ने हँसते हुए कहा - चंदा मामा, जिसकी जैसी प्रवृत्ति होगी, वह वैसा व्यवहार तो करेगा ही है। हिंदुस्तान में ऐसे धूर्त और मूर्ख लोगों के बजाय उन लोगों की संख्या अधिक है जिनकी प्रवृति है अपने देश के नाम और सम्मान को लगातार ऊंचा उठाने की कोशिश करते रहना। आज मेरा आपसे मिलना उसी कोशिश का ही सुखद परिणाम है।

चंदा मामा ये सुनकर खुश हो गए - ये तो बहुत अच्छी बात है। अच्छा ये बताओ भांजे कि हिंदुस्तान से मेरे लिए क्या उपहार लेकर आए हो?

चंद्रयान-3 ने अपनी जेब से राखी निकाली और चंदा मामा को सौंपते हुए कहा - चंदा मामा, आपके लिए उपहार तो देशवासियों ने ढेर सारे सौंपे थे, लेकिन इस राखी के प्रेम का भार इतना अधिक हो गया था कि उन सभी उपहारों को साथ न ला पाया।

चंदा मामा भावुक होते हुए बोले - इससे बड़ा और कीमती उपहार तो कोई हो भी नहीं सकता। अच्छा अब ये बताओ कि हिंदुस्तान में अभी भी मेरे लिए कविता या गीत गाते हैं कि नहीं?

ये पूछ कर उन्होंने चंदा मामा दूर के' कविता को गुनगुनाना आरंभ कर दिया।  

चंद्रयान-3 मुस्कुराते हुए बोला - चंदा मामा, इन दिनों हिंदुस्तान में कविता या गीत के बजाय ऑनलाइन नाचने का चलन चल पड़ा है। लोग अपनी बहू-बेटियों को सोशल मीडिया पर बेशर्मी से दिन-रात नचवा रहे हैं और खुद भी उनके साथ ठुमके लगा रहे हैं। लाज और मर्यादा को उन्होंने खूँटी पर टांग दिया है। हालाँकि आपके चाहने वाले अभी भी आपको कविताओं और गीतों में जीवित रखे हुए हैं। पर..।

चंदा मामा ने पूछा - पर क्या?

चंद्रयान-3 ने बताया - पर आपकी प्रिय कविता में थोड़ा सा बदलाव आ गया है।

चंदा मामा - कैसा बदलाव?

चंद्रयान-3 ने हँसते हुए बताया - कविता में अब चंदा मामा दूर के नहीं बल्कि बस एक टूर के हो गए हैं।

     ये सुनते ही चंदा मामा खिलखिला कर हँसने लगे। चंद्रयान-3 ने तिरंगा झंडा निकाल कर चंदा मामा के ऊपर फहरा दिया। ये देख मन ही मन जल रहे देश के दुश्मनों के सीनों को अंतरिक्ष से टूट कर गिरते धूमकेतुओं ने धरती के बजाय उन पर ही गिर कर उन्हें जला कर पूरी तरह खाक कर दिया।

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 19 अगस्त 2023

हैडपंप का पाकिस्तान को खत


     पाकिस्तान में दूसरी बार गदर मचने के बाद बुरी तरह घायल हुए हैंडपंप ने अपनी सरकार को खत लिखा है। जिसमें उसने मांग की है कि अब उसे जमीन से पानी निकालने के काम से वॉलंटरी रिटायरमेंट स्कीम के तहत रिटायर कर दिया जाए और उसके बेटे टोंटी वाले नल को मुल्क की खिदमत करने का मौका दिया जाए। उसने इसकी वजह बताते हुए कहा है कि वह खुद की जमीन उखाडू बेइज्जती से बहुत ज्यादा दुःखी हो चुका है। हर बार सरहद पार से कोई तारा सिंह आता है और उसका सितारा गर्दिश में डाल देता है। पाकिस्तान की फ़ौज और पुलिस देखती रह जाती है और वह उस हैडपंप को उखाड़ कर उसके जरिए उसके मुल्क के लोगों का बुरी तरह बैंड बजवा कर अपने बीबी-बच्चों के साथ वापिस अपने मुल्क़ को लौट जाता है।

     आखिरकार वह कब तक पड़ोसी मुल्क के उस खूंखार इंसान के हाथों खुद की, अपने मुल्क की और अपने मुल्क के लोगों की हर बार होने वाली बुरी हालत और बेइज्जती को बर्दाश्त करता रहेगा। उसने आगे समझाते हुए कहा है कि पिछली बार गदर में सिर्फ अपने मुल्क के लोग परेशान थे पर पड़ोसी मुल्क के लोगों ने खूब जमकर मजा लिया था। लेकिन इस बार तो पड़ोसी मुल्क भी हमारे साथ-साथ रो रहा है। दूसरे गदर में सकीना की ओवरएक्टिंग और हद से ज्यादा रोने-धोने ने उसके लोगों के दिलोदिमाग में सिनेमा से ऊब पैदा कर दी है। वे बेचारे तारा सिंह के गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने से अपने कान के परदे फटने की चिंता से बेहद घबराए हुए हैं। उस ओर के वीआरएस ले चुके हैंडपंपों ने दुत्कारते हुए पैगाम भेजा है, कि अपने देश से कहो कि बेशक अपने आकाओं से थोड़ी और भीख मांगनी पड़े पर अब अपने देश के हैंडपंपों को वीआरएस देकर विश्राम करने और टोंटी वाले नलों को काम पर लगाने का आदेश जारी कर दे वरना तीसरा गदर आएगा और तुम्हारे देश की बत्ती गुल करके चला जायेगा। बाकी कुछ बचेगा तो हमारे देशवासियों द्वारा दिया गया श्राप तुम्हारा तिया-पांचा कर देगा। तुम्हारे देश के हठ के कारण हमारे देशवासी तीसरी बार गदर देखने को विवश होंगे। कहीं ऐसा न हो कि पूरा भारत क्रोध में आकर तुम्हारे देश के सारे हैंडपंपों को उखाड़ कर तुम्हारा ढंग से बैंड बजा डाले। 

     बेचारे हैडपंप ने पाकिस्तान सरकार को आगे समझाते हुए लिखा है, कि उसे वीआरएस देने से मुल्क का आने वाला कल महफूज़ रहेगा और इस बहाने उसके बेटे टोंटी वाले नल को भी रोजगार मिल जायेगा, जिससे कि वह आवारागर्दी छोड़ कर अपने मुल्क़ की तरक्की और बेहतरी में कुछ न कुछ मदद कर पायेगा । इससे ये फायदा होगा कि तारा सिंह को जब पाकिस्तान के हैंडपंपों को वीआरएस दिए जाने का पता चलेगा, तो शायद वह हमसे भी तबाह और पिछड़े किसी और मुल्क में अपने हैडपंप उखाड़ने के शौक को पूरा करने के लिए चल पड़े और बॉलीवुड के जरिए पाकिस्तान की दुनिया भर में बार-बार, लगातार होने वाली बेइज्जती का सिलसिला खत्म हो जाए।

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

मौजमस्ती दर्शन


     प्राचीन काल में चार्वाक नाम के एक ऋषि हुए थे। उन्होंने अपने चावार्क दर्शन में कहा है ‘यावद् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋण कृत्वा, घृतं पीवेत्’। आधुनिक काल में हमें भी उनकी विचारधारा 'जब तक जिओ सुख से जिओ, उधार लो और घी पिओ।' को चरितार्थ करनेवाले कई ऋषियों की प्राप्ति हुई है। ऐसे ऋषि राजनीति में भी अपनी गहरी पैठ जमाये हुए हैं और देश के विभिन्न प्रदेशों की सत्ता में जमे हुए अपनी हर नाकामी के लिए दूसरों को दोषी सिद्ध करने के खेल में महारत हासिल कर चुके हैं। 

     जैसे कि हर विभाग में दो प्रकार के जीव होते हैं। इनमें पहले प्रकार के जीव अपने विभागीय कार्य को बड़े ही परिश्रम से करते हुए अपने काम से काम रखने के आदी होते हैं, वहीं दूसरे प्रकार के जीव कुछ भी करने के बजाय इधर-उधर उछल-कूद मचाते हुए बड़े अधिकारियों की चमचागीरी और उनके कान फूँककर ही अपने कार्यालय के अनमोल समय को व्यतीत करते हैं। अब न जाने विभाग के ये उछल-कूद मचाऊ कर्मचारी इन राजनीतिक ऋषिओं से प्रभावित हैं या फिर राजनीतिक ऋषि महाराज स्वयं इन कर्मचारियों से प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।

     इन राजनीतिक ऋषियों ने ऋषि चावार्क के सुविधावादी विचारों से प्रेरणा लेकर कलियुग में 'मौजमस्ती दर्शन' का सृजन कर लिया है। वैसे तो आधुनिक पीढ़ी पर अक्सर ये आरोप लगाया जाता है, कि वो अपनी प्राचीन परंपराओं से कटती जा रही है, लेकिन आधुनिक युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि राजनीतिक ऋषियों ने अपनी इस प्राचीन चार्वाकी परंपरा का मान रखते हुए उपरोक्त दर्शन के माध्यम से इस अद्भुत प्राचीन संस्कार को जीवन प्रदान किया है। हो सकता है कि आनेवाले समय वे अपने इस दर्शन का थीम सॉन्ग 'मस्तराम मस्ती में, आग लगे बस्ती में' को ही बना लें।

     बहरहाल ये सभी राजनीतिक ऋषि सत्ता का सदुपयोग करते हुए ‘मौजमस्ती दर्शन’ को चरितार्थ करते हुए हजारों की मदिरा एक दिन में ही डकार जाते हैं। बेशक चाहे इनके प्रतिनिधि क्षेत्र में बच्चियाँ भूख से बिलबिला कर अपने प्राण त्याग दें पर ये राजनीतिक ऋषि छप्पन भोग लगाना और उन भोगों को बिना डकार लिए हजम कर जाना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। इनका मानना है कि छोटी-मोटी बातों अथवा घटनाओं से ‘मौजमस्ती दर्शन, पर बिलकुल भी आँच नहीं आनी चाहिए। ऋषि चार्वाक भी स्वर्ग में अपने साथियों से उधार लेकर घृतपान करते हुए वहाँ से अपने कलियुगी शिष्यों और उनके अद्भुत कार्यों को देखकर धन्य होते हुए मंद-मंद मुस्कुराते रहते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 29 जुलाई 2023

अंतराष्ट्रीय कवि का त्यागपत्र


     वि लिक्खड़ लाल ने अचानक अपने सोशल मीडिया के बायोडाटा में स्वयं को राष्ट्रीय से अंतराष्ट्रीय कवि अपडेट कर दिया। उनके अंतराष्ट्रीय कवि के रूप में अपडेट होते ही उनके चेलों ने अपने गुरु की प्रशंसा के पुल बाँधते हुए सोशल मीडिया पर पोस्टों की बाढ़ ला दी। अब कवि लिक्खड़ लाल के चेले भी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कवि बनने के दिवास्वप्न देखने लगे। कवि लिक्खड़ लाल का कविता की चेरी तुकबंदी के संग सफर दो-चार साल पहले ही शुरू हुआ था। उन्होंने तुकबंदी को ही कविता माना और स्वयं को तुकबंद के बजाय कवि। जहाँ उनकी आयु के साथी नौकरी पेशा होकर अपने बाल-बच्चों पढ़ा-लिखा कर सक्षम बनाने के लिए संघर्षरत थे, वहीं लिक्खड़ लाल ने मलूकदास कवि के अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए सबके दाता राम।। नामक दोहे को गाँठ बाँध कर उसी का अनुसरण करने की भीष्म प्रतिज्ञा कर चुके थे। उनके बुजुर्ग माँ-बाप ने उन्हें अनगिनत बार गरियाया और उनकी पत्नी ने उन्हें सुबह-शाम, दिन-रात ताने दे-देकर समझाने की भरकश कोशिश की, लेकिन उनके कान पर जूं नहीं रेंगा। आखिरकार एक दिन थकहार कर उनकी पत्नी ने घर का चूल्हा ठंडा न होने के लिए प्राइवेट नौकरी पकड़ ली। अब बेचारी पत्नी घर और नौकरी की चक्की में दिन-रात पिसती रहती और कवि लिक्खड़ लाल तुकबंदियों के झूले में आनंद से झूला झूलते रहते। अपने आस-पास के लोगों को अपनी तुकबंदियों से धराशाही करने के बाद एक दिन उनका पदार्पण सोशल मीडिया पर हो गया। दरअसल उनके शहर में रहने वाले उनकी तुकबंदियों से दुखी जीवों ने अपने-अपने मस्तिष्क और कानों को उनकी तुकबंदियों के अत्याचार से बचाने के लिए एक दिन चंदा करके एक एंड्राइड फोन ख़रीदा और एक तकनीक बुध्दि से दक्ष युवा ने उस फोन का सदुपयोग कर कवि लिक्खड़ लाल का एक सोशल मीडिया अकाउंट बनाया और उन्हें सोशल मीडिया पर उनकी तुकबंदियों की पताका फहराने के लिए छोड़ दिया। सोशल मीडिया पर कुछ दिन अपनी तुकबंदियों के साथ चहलकदमी करने के बाद उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय कवि घोषित कर दिया। धीमे-धीमे कवि लिक्खड़ लाल को सोशल मीडिया पर ऐसे-ऐसे लिक्खड़ों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिन्होंने बिना-बात के निरंतर लिखकर और अपने लिखे को नियमित रूप से पुस्तक के रूप में छपवा कर जाने कितने हरे-भरे पेड़ों की हत्या करने का पुण्य अर्जित किया था। उन लिक्खड़ों में कुछ कवि लिक्खड़ लाल के गुरु बने तो कुछ ने उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली। अब सभी लिक्खड़ मिलकर सोशल मीडिया पर कविता का नाम देकर तुकबंदियों को पेलते रहते, जिसे देखकर बेचारी कविता मन मसोसकर सुबकते हुए आँसू बहाती रहती। धीमे-धीमे कवि लिक्खड़ लाल ने विदेश में बसे लिक्खड़ों से संपर्क स्थापित कर लिया। कुछ वर्षों की ऑनलाइन चमचागीरी के फलस्वरूप एक दिन विदेश में बसे कवि महालिक्खड़ लाल के निमंत्रण पर कवि लिक्खड़ लाल ने वैश्विक ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में विश्व भर के चुने हुए लिक्खड़ों के बीच अपनी तुकबंदियों को सुना-सुना कर सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया। इस ऑनलाइन काव्य गोष्ठी के बाद कवि लिक्खड़ लाल ने स्वयं को राष्ट्रीय से अंतराष्ट्रीय कवि के रूप में अपडेट कर दिया। उनके राष्ट्रीय से अंतराष्ट्रीय कवि होने की बात उनके पड़ोसी शहर में रहने वाले दूसरे लिक्खड़ कवि से बर्दाश्त न हुई और उसने लिक्खड़ लाल के अंतराष्ट्रीय कवि होने पर तंज कस दिया। उस तंज से कवि लिक्खड़ लाल ने तुकबंदी कर एक कथित कविता को रचा और पड़ोसी शहर के लिक्खड़ कवि को टैग करके सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। कवि लिक्खड़ लाल के चेलों ने उस पोस्ट पर कमेंट के रूप में माँ-बहन के सम्मान को समर्पित एक से बढ़कर एक गालियों की लाइन लगा दी। अपने सुसंस्कृत चेलों के संस्कारपूर्ण कमेंटों पर लव रिएक्शन देते हुए कवि लिक्खड़ लाल गौरवान्वित होने लगे। तभी उन्हें स्वयं को किसी पोस्ट में टैग होने की नोटिफिकेशन मिली। जब टैग की गयी पोस्ट पर जाकर उन्होंने देखा तो उनके होश उड़ गए। वो पोस्ट उनके प्रतिद्वंदी लिक्खड़ कवि थी। उस पोस्ट में वह अपने पहलवान साथियों के साथ लाइव होकर कवि लिक्खड़ लाल का तिया-पाँचा करने की धमकी देते हुए उनके घर की ओर प्रस्थान कर चुका था। ये देखते ही कवि लिक्खड़ लाल की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उन्होंने आनन्-फानन में अंतराष्ट्रीय कवि की पदवी को त्यागने की घोषणा करते हुए एक पत्र लिखा और उसे पडोसी शहर के लिक्खड़ कवि को क्षमा याचना के साथ टैग कर अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर पोस्ट कर दिया और अपने शहर से तड़ीपार हो गए। पड़ोसी शहर के लिक्खड़ कवि ने कवि लिक्खड़ लाल के त्यागपत्र को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। आजकल पड़ोसी शहर का लिक्खड़ कवि अंतराष्ट्रीय कवि की पदवी धारण कर चुका है। कवि लिक्खड़ लाल के चेलों ने भी अपनी निष्ठा का मुख पड़ोसी शहर के लिक्खड़ कवि की ओर मोड़ कर उसकी शिष्यता ग्रहण कर ली है। ये सब देखकर कवि लिक्खड़ लाल अपने फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट पर बैठे-बैठे आँसू बहाते रहते हैं और उनकी तुकबंदियाँ उनकी फिरकी लेती रहती हैं।

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 23 जुलाई 2023

पबजी वाला प्यार


      मय के साथ-साथ प्यार करने के अंदाज ने भी काफी प्रगति कर ली है। अब पेड़ों के इर्द-गिर्द घूमते हुए प्यार का इजहार करने वाला दौर नहीं रहा और न ही अब अपने प्यार को जताने के लिए सालों-साल तक अपने प्रेमी या प्रेमिका के गली-मोहल्ले या कूचे में भटकते रहने का समय रहा। अब तो पबजी वाले प्यार का ज़माना आ गया है। पबजी पर ऑनलाइन खेल खेलते हुए कब खेल-खेल में प्यार हो जाए पता ही नहीं चल पाता है। प्यार भी ऐसा होता है कि उसकी बाधा बनने वाली देश की सीमाएं भी तोड़ दी जाती हैं। हालांकि पुराने वाले प्यार की तरह पबजी वाला प्यार भी जाति, धर्म या समुदाय को स्वीकार नहीं करता, लेकिन इस नए-नवेले प्यार के रुप ने प्यार के लिए हर उल्टा-सीधा उपाय आजमाने की नीति अपनाई है। इश्क़ और जंग में सब जायज़ है मुहावरे को सही मायने में चरितार्थ इस पबजी वाले प्यार ने ही किया है।
     कई साल पहले एक फिल्म आई थी जिसमें नायक अपनी प्रेमिका को वापिस अपने देश में लाने के लिए पड़ोसी देश में जाकर प्यार के दुश्मनों से भिड़ जाता है और यहां तक कि गुस्से में उनका हैंडपंप तक उखाड़ डालता है। इधर मामला दूसरे टाइप का है। पबजी वाले प्यार में किसी से भिड़ने के बजाय खेल-खेल में बड़ा लंबा खेल खेलते हुए ऑफलाइन प्रेमी को दुलत्ती जड़कर और उसका सबकुछ बेचकर ऑनलाइन प्रेमी से प्यार की पींगें बढ़ाने के लिए रफूचक्कर हो प्रेमिका द्वारा पड़ोसी देश में अपने प्रेमी के यहां पहुंचने का शातिर खेल खेला जाता है। इस शातिर खेल को देखकर पड़ोसी देश का मीडिया और जन परेशान नहीं होते, बल्कि इसमें अपना गौरव और जीत का अनुभव करते हैं। मजे की बात ये है कि कुछ साल पहले जिस देश में पबजी खेल को प्रतिबंधित कर दिया गया था, उस देश में पबजी वाला प्यार कुलांचें भर रहा है। 
    देश का मीडिया अपने टीआरपी वाले प्यार में डूबकर मदहोश हो पबजी वाले प्यार की गाथा सुबह-शाम, दिन-रात सुना-सुना कर देश की जनता का भेजा खाली कर डालता है। सोशल मीडिया पर लिखाड़ू वीर पबजी वाले प्यार के पक्ष-विपक्ष में धड़ाधड़ लेख लिखकर सोशल मीडिया की कमर तोड़ने के लिए कमर कस लेते हैं। कोई इस पबजी वाले प्यार को देश की जीत मानता है तो कोई धर्म या समुदाय की। इस जीत के उत्सव में पूरा देश प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से डूब जाता है। इस बीच इस देश की सीमा एक पल को पबजी वाले प्यार की प्रेमिका की धूर्तता और चतुराई की सीमा को देखती है और दूसरे पल को देशवासियों की मूर्खता की सीमा को।

रविवार, 16 जुलाई 2023

अंतर्वस्त्र की व्यथा


     न दिनों पतियों का अंतर्वस्त्र कच्छा भयभीत व व्यथित है। उसका भयभीत व व्यथित होना उचित है। अभी हाल ही में एक प्रगतिशील नारी ने शब्दों की बुरी तरह धुनाई कर एक कथित कविता बना कर उसे रील प्रेमी नवनृत्यांगनाओं के बीच सोशल मीडिया पर मटकने के लिए छोड़ दिया। अब वह कथित कविता विवश हो सोशल मीडिया पर मटक रही है और लाइक-डिसलाइक व अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाओं को विवश हो गटक रही है। भयभीत व व्यथित कच्छा उसकी ऐसी स्थिति देखकर पसीना-पसीना हो रखा है। उसे इस बात का भय है कि इस कविता से कहीं ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो जाए कि उसका आस्तित्व ही समाप्त हो जाए। कच्छा जहाँ एक ओर भयभीत है वहीं पतियों से अप्रसन्न भी है। उसकी अप्रसन्नता इस बात से है कि पतियों ने स्वयं की इच्छाओं को तिलांजलि देकर परिवार की इच्छाओं और आवश्यकताओं को सर्वोपरि रखा। स्वयं का कच्छा निरंतर घिस-घिस कर अदृश्य होने की ओर अग्रसर रहा, किन्तु उसकी चिंता छोड़ अपने बाल-बच्चों और पत्नियों के अंतर्वस्त्रों व बहिर्वस्त्रों में कोई कमी न होने दी। कलियुग ने पूरे विश्व के हृदय में परिवर्तन कर दिया, किन्तु इस पति नामक जीव के हृदय ने जाने क्यों सौगंध खा रखी है, कि भैया हम न बदलने वाले। हम तो हर युग में जैसे थे की स्थिति में ही रहेंगे। पतियों की इस जैसे थे की स्थिति से कच्छे का तन-मन सुलग उठता है। कच्छे ने अपना आस्तित्व बचाने के लिए पतियों का माइंड वाश करने का प्रयास किया था, कि पति तो बहुत व्यस्त प्राणी होता है और वह जितना समय अपना कच्छा धोने में व्यय करेगा उतने समय में तो वह अपने परिवार की आवश्यकता की किसी न किसी वस्तु की व्यवस्था कर लेगा। हालाँकि ये कच्छे की अपने-आपको बचाने की एक चाल भर थी। वास्तव में कच्छे को धोते समय पति लोग अनावश्यक बल का प्रयोग करते थे, जिसके परिणामस्वरुप उसकी पसलियाँ क्षत-विक्षत हो जाती थीं। इसके अतिरिक्त पति महोदय कच्छे को धोते समय वाशिंग पाउडर और साबुन की इतनी तगड़ी डोज दे देते थे, कि कच्छे का अंग-प्रत्यंग वाशिंग पाउडर और साबुन से भर उठता था। चाहे जितना भी पानी में उसे निकालो पर वाशिंग पाउडर और साबुन के अंश उसमें जमे रहते थे। जिसका परिणाम ये मिलता था कि कच्छे के शरीर में बुरी तरह खुजली उठती थी और कच्छे को खुजली की थोड़ी मात्रा पतियों को भी समर्पित करनी पड़ती थी। फलस्वरूप पति बेचारे दिन-रात कच्छे द्वारा घेरे गए अंग को खुजाते रहते और अपने निर्दयी नाखूनों से कच्छे में छोटे-मोटे छेदों की अभिवृद्धि कर देते थे। वे छोटे-मोटे छेद ही आगे चलकर बड़े छेदों का रूप धरकर कच्छे के आस्तित्व को समाप्त कर डालते। कच्छे द्वारा माइंड वाश किए जाने के पश्चात् उसे धोने का भार पत्नियों पर आ गया। अब कच्छा अत्यंत प्रसन्न था। पत्नियां अपने नर्म व कोमल हाथों से और उचित मात्रा में वाशिंग पाउडर व साबुन का प्रयोग कर कच्छे को धोने लगीं। अब न तो उसकी पसलियां दुखती थीं और न ही उसका सामना खुजली से होता था। कुल मिला कर उसका अच्छा-खासा जीवन चल रहा था, किन्तु उसके ऊपर बनी कथित कविता ने उसके आस्तित्व को अचानक संकट में डाल दिया। अब कच्छा शांत हो उस कविता से समाज में उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है। देखें कि पत्नियों के नर्म व कोमल हाथों से उसके आस्तित्व की रक्षा हो पाती है या फिर उसके भाग्य में पतियों के हाथों पटक-पटक कर और खुजलाते हुए समाप्त होना ही लिखा है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 9 जुलाई 2023

बेवफाई के वक्तव्य का संशोधन

     ट्रेन से उतर कर प्लेटफार्म पर चलते हुए गला सूखने लगा तो वहीं दुकान से एक पानी की बोतल खरीद ली। फिर रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में  पहुंच कर अपने गले को पानी से तर किया और दुकानदार द्वारा लौटाए गए रुपयों को क्रम से लगा कर जेब में रखने लगा। तभी अचानक मेरा ध्यान एक दस रूपए के नोट पर गया तो उस पर सोनम गुप्ता बेवफा है लिखा पाया। ऐसा नोट मेरे पास दूसरी बार आया था। जब मुझे ऐसा पहला नोट मिला था तब पहली बार मेरा सामना सोनम गुप्ता की बेवफाई से हुआ था। हो सकता है कि ये शरारत किसी  कथित प्रेमी की हो जो अपने एक तरफ़ा प्रेम को  ठुकराए जाने का बदला सोनम गुप्ता नामक किसी मासूम लड़की से ले रहा हो। ऐसा भी हो सकता है कि किसी सोनम गुप्ता ने किसी मासूम छोकरे की प्रेम कहानी को बेवफाई की कटार से छील डाला हो। इसी उधेड़-बुन में डूबा हुआ था कि रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में लगे टेलीविज़न पर एक व्यक्ति रोते हुए दिखायी दिया। समाचार था कि उस बेचारे ने पाई-पाई जोड़कर अपनी पत्नी को पढ़ाया-लिखाया, लेकिन उस पढ़ाई-लिखाई का फल ये मिला कि उसकी पत्नी क्लास वन अफसर बन गयी और जब उस बेचारे का गर्व से सीना फुला कर जश्न मनाने का समय आया, तब उसे अपनी अफसर पत्नी की बेवफाई का मातम मनाना पड़ रहा है। हालाँकि ये पहला मामला नहीं है जब किसी पति ने अपनी पत्नी के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया और बदले में पत्नी की बेवफाई ही नसीब हुई। ऐसे अनेक मामले समाज में समय-समय पर आते रहते हैं। हालाँकि बेवफाई का मैडल केवल स्त्रियां ही नहीं जीततीं, इस मामले में पुरुष भी उनके तगड़े प्रतिस्पर्द्धी हैं। गाँव में जाने कितनी पत्नियां इस आस में अपना जीवन काट देतीं हैं, कि पढ़-लिख कर महानगर में नौकरी करने गया उनका पति एक दिन आएगा और उनके सारे सपनों को साकार करेगा। लेकिन उन बेचारी पत्नियों के सपनों को अपने स्वार्थ की भट्टी में झोंक कर उनके पढ़े-लिखे पति महानगरों में अपनी दूसरी सुंदर-सलोनी पत्नियों के पल्लुओं में खोये हुए बेवफाई का नया अध्याय लिख रहे होते हैं। रेलवे स्टेशन से निकल कर मैंने घर जाने के लिए ऑटो रिक्शा पकड़ा। ऑटो रिक्शा में सफर करते हुए कुछ सोच कर मैंने उस नोट पर लिखे वक्तव्य सोनम गुप्ता बेवफा है को संशोधित कर सिर्फ सोनम गुप्ता ही बेवफा नहीं है लिख दिया और ऑटो रिक्शा से उतर कर उस दस रूपये के नोट को अन्य नोटों के साथ ऑटो रिक्शा वाले के हवाले कर दिया। मैं घर में घुस ही रहा था, कि तभी अचानक एक बड़ी सी कार मेरे बगल में आकर रुकी। उसमें से हमारी कॉलोनी में सब्जी की रेहड़ी लगाने वाला संतोष उतरा और उतर कर मुझसे राम-राम किया। 

मैं उससे बोला - राम-राम संतोष, और सुनाओ कैसे हो?

संतोष ने बड़े ही संतोष के साथ उत्तर दिया - बाबू जी, राम जी की कृपा से बहुत अच्छे हैं।

अचानक मुझे शरारत सूझी और मैंने उससे पूछा - अरे भाई, तुम अपनी पत्नी को सिविल सर्विस की तैयारी करवा रहे थे। उसका कुछ परिणाम निकला?

संतोष के चेहरे पर अब संतोष के साथ मुस्कान भी आ गयी - हाँ बाबू जी, परिणाम बहुत शानदार निकला। श्रीमती जी, कलेक्टर बन गयीं हैं।

मैं प्रसन्न हो बोला - अरे वाह! ये तो बहुत अच्छा समाचार है। अच्छा ये बताओ कि अब तुम क्या कर रहे हो?

संतोष ने बताया - श्रीमती जी ने कलेक्टर बनने के बाद कपड़ों का एक शानदार शोरूम खुलवा दिया। और कभी सब्जी की  रेहड़ी लगाने वाला ये संतोष आज एक अच्छा-खासा बिजनेसमैन बन चुका है।

इतने सारे नकारात्मक समाचारों के बीच इस सुखद समाचार को सुनकर मन प्रफुल्लित हो उठा। मैंने ये सोच कर पीछे मुड़कर ऑटो रिक्शा वाले को देखा कि उसको दिए दस रुपए के नोट पर लिखे बेवफाई के वक्तव्य को फिर से संशोधित किए जाने की आवश्यकता है। पर वह ऑटो वाला जा चुका था। मैंने संतोष को  जलपान के लिए अपने घर में आमंत्रित किया, लेकिन उसने बताया उसके एक और कपड़ों के शोरूम का शहर के एक जाने-माने मॉल में उद्घाटन होना है। उसने किसी और दिन फुर्सत में आकर मिलने का वादा किया और राम-राम कर वहां से चला गया। घर के भीतर घुसते हुए अनायास जेब में हाथ गया तो वहां बीस रुपए का एक  मुड़ा हुआ नोट मिला। उसे खोल कर देखा तो उसमें भी सोनम गुप्ता की बेवफाई उपस्थित मिली। मैंने घर में घुसकर अपना बैग रखा और बाकी काम छोड़कर बीस रुपए के उस नोट में लिखे बेवफाई के वक्तव्य को संशोधित करने में जुट गया।

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 30 जून 2023

टमाटर महाराज की चिंता


     राजसभा सजी हुई थी। सिंहासन पर टमाटर महाराज अभिमान में चूर हो विराजमान थे। नगरवधू मंहगाई उनके चरणों की दासी बनी हुई उनकी सेवा में रत थी। सारी सब्जियां व फल बारी-बारी से टमाटर महाराज को प्रणाम कर राजसभा में स्थित आसनों पर उदास मन के साथ बैठ चुके थे। दालें अपने-अपने मुखों पर प्रसन्नता का झूठा आवरण चढ़ाए नृत्य करते हुए टमाटर महाराज का मनोरंजन कर रहीं थीं। प्याज देव से अदेव की श्रेणी में पहुंच टमाटर महाराज की भुजाओं को गीले नयनों संग धीमे-धीमे दबाने में व्यस्त थे। कालाबाजारियों के लिए टमाटर महाराज के निकट विशेष आसनों की व्यवस्था की गई थी। आम जनता को द्वारपाल बैगनों ने मुख्य द्वार पर ही रोक लिया था। आम जनता विवश हो दूर से ही टमाटर महाराज को देख कर दिवा स्वप्न में डूबी हुई लार टपका रही थी। तभी टमाटर महाराज ने सीसीटीवी ऑपरेटर भिंडी को आदेश दिया कि सीसीटीवी फुटेज देखकर हाल ही में सत्ता से पदच्युत हुए पेट्रोल महाराज की वर्तमान स्थिति का पता लगाया जाए। भिंडी त्वरित कार्यवाई कर पेट्रोल महाराज की वर्तमान स्थिति का पता लगा कर टमाटर महाराज के सम्मुख प्रस्तुत हुई।

टमाटर महाराज - कहो भिंडी क्या समाचार लाई हो?

भिंडी - महाराज, पेट्रोल के वर्तमान स्थिति प्याज की भांति बहुत खराब है।

प्याज के साथ दरबार में बैठे बाकी सभाजनों ने चौंक कर भिंडी को देखा। कभी प्याज को परमप्रिय महाराज से संबोधित करने वाली भिंडी के इस रूप को देखकर सभी ने उसे मन ही मन प्रणाम किया। बेचारे प्याज ने धीमे से सांस छोड़ते आह भरी और फिर से अपने कार्य में जुट गया।

तभी सेनापति कद्दू ने पेट्रोल को बंदी बनाकर राजसभा में प्रस्तुत किया।

सेनापति कद्दू - महाराज, ये दुष्ट डीजल और गैस के साथ आपको सिंहासन से हटाने का षड्यंत्र रच रहा था।

टमाटर महाराज ने पेट्रोल से पूछा - क्या ये सच है?

बेचारा पेट्रोल, टमाटर महाराज से दृष्टि नहीं मिला पा रहा था।

टमाटर महाराज - तू और तेरे साथी चाहे जितने भी प्रयत्न कर लें, किन्तु मुझे इस सिंहासन से नहीं डिगा पायेंगे।

इतना कहकर टमाटर महाराज ने जोर-जोर से हंसना आरंभ कर दिया।

टमाटर महाराज की हंसी में अनमने मन से राजसभा के बाकी सभाजनों ने भी साथ दिया।

तभी आकाशवाणी हुई - मूर्ख टमाटर, इस जग में कुछ भी चिरस्थाई नही है। जिस सिंहासन पर बैठ कर तू अभिमानित हो रहा है एक दिन उसी से औंधे मुंह नीचे गिरेगा।

टमाटर महाराज उस आकाशवाणी को सुनकर सकपका गए। फिर संभलकर उन्होने कड़क स्वर में राजसभा में पूछा - किसी ने कुछ सुना?

राजसभा में सभी ने एक स्वर में उत्तर दिया- नहीं महाराज!

टमाटर महाराज ने अनुभव किया कि सभी राजसभा जन मंद-मंद मुस्कुरा रहें हैं। तभी प्याज ने उत्साहित हो टमाटर महाराज की भुजाओं को और जोर-जोर से दबाने की प्रक्रिया अपनायी तथा दालों ने और अधिक आनंदित हो नृत्य करना आरंभ कर दिया। सभी ने कनखियों से देखा कि टमाटर महाराज के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं और वहां से अचानक पसीने की पतली धार बहने लगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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