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रविवार, 2 मार्च 2014

कहानी: गौना

माज सेवा का चाव लिए एक दिन कुछ मित्रों के साथ मिलकर हमने भी एक एन.जी.ओ. रजिस्टर्ड करवा लिया. अब हमारे सामने प्रश्न यह था, कि अपने एन.जी.ओ. के द्वारा पहला भला काम क्या किया जाए? हमने यह निश्चय किया कि अपने एन.जी.ओ. की शुरुआत किसी ऐसे भले काम से करेंगे जो वास्तव में भला हो. हमने अपने सभी मित्रों, नाते-रिश्तेदारों को इस विषय में सूचित करके इस बारे में उनकी नेक राय माँगी, लेकिन भले काम के बारे में सुनकर वे राय देने से शायद इसलिए डर गए, कि कहीं उनकी राय के साथ हम उनकी जेब भी ढीली न करवा दें. सो उन्होंने हमें यह राय दी कि फालतू चक्करों में पड़ने के बजाय अपने काम पर ध्यान दें और जीवन जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दें. यह एन.जी.ओ. वगैरह चलाना नेताओं और बड़े लोगों काम है और हम मिडिल क्लास वाले इस लायक नहीं हैं, कि एन.जी.ओ. जैसी बड़ी चीज के विषय में सोचें भी. उनकी मिडिल क्लास सोच पर गुस्सा भी आया और हँसी भी. अरे भई अब क्या अच्छा काम करने के लिए भी हाई क्लास या मिडिल क्लास के होने या न होने के बारे में भी सोचना पड़ेगा? 
सब ओर से निराशा मिलने के बाद  हमने फैसला किया कि अब हम स्वयं ही यह निर्णय करेंगे, कि एन.जी.ओ. का शुभारंभ किस भले कार्य से किया जाए. आख़िरकार दो दिन की चर्चा में हमारी मेहनत रंग लाई और हमने अपने एन.जी.ओ. की ओपनिंग के लिए एक भला कार्य चुन लिया. हमने निर्णय लिया कि हम अपने एन.जी.ओ. के द्वारा  किसी गरीब कन्या का विवाह करवाएँगे. हमने अपने खास-खास रिश्तेदारों में इस बारे में विधिवत सूचना भिजवा दी और उन सबसे विनम्र आग्रह किया कि किसी गरीब कन्या की तलाश करें ताकि इस नेक कार्य को करके हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ हो सके.
अगले दिन ही नाना जी का फोन आया कि उन्होंने एक गरीब कन्या की खोज कर ली है. वह नाना जी के घर के सामने भाड़ भूनने वाले भुज्जी की लड़की थी.  भुज्जी, जिसका नाम संतोष था और गाँव में उसे सब प्यार से संतोषा कहते थे, ने बेटा पाने की लालसा में लड़कियों की कतार लगा दी थी. छः लड़कियाँ होने के पश्चात आखिर उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उसके घर एक बेटा पैदा हुआ. अब संतोषा के घर में बूढ़े माँ-बाप, पत्नी, बच्चों  और स्वयं को जोड़कर एक क्रिकेट टीम तैयार हो चुकी थी, जिसने उसके घर के बजट को क्लीन बोल्ड कर दिया था. वो तो नाना जी के घर में नानी और मामियों के काम में उसकी लड़कियाँ सहायता कर देती थीं और बदले में नाना जी की ओर से उसके घर के गुजारे लायक मदद मिल जाती थी. जब नाना जी को फोन पर गला फाड़ कर हमारी शुभ काम करने की योजना के बारे में संतोषा ने सुना, उसने नाना जी के तब तक पैर नहीं छोड़े जब तक कि उन्होंने इस बात का वादा नहीं कर दिया कि हमारे एन.जी.ओ. का शुभारंभ उसकी बड़ी बेटी के विवाह से ही होगा.
हालाँकि इस बारे में शायद पूरा गाँव ही सुन चुका होगा, क्योंकि नाना जी फोन पर इतनी तेज आवाज में बात करते हैं, कि उनकी बिटिया यानि कि मेरी माँ भी यह अनुभव करने लगती हैं वो अपने दामाद यानि कि मेरे पिता के मुकाबले फोन पर कुछ ज्यादा ही चीखते हुए बतियाते हैं. अब जाने नाना जी के कान में सुनने में कोई दिक्कत है या फिर वो फोन के दूसरी ओर बात कर रहे इंसान को ही बहरा समझते हैं.  
नाना जी ने हमें आदेश दिया कि जल्द से जल्द इस शुभ कार्य को अंजाम किया जाए. हमारी सबसे छोटी मौसी का फोन आया कि वह भी इस शुभ कार्य में हमारे साथ रहेंगी और उनसे बात करने पर पता चल गया कि वो केवल विवाह मंडप पर ही हमारे साथ रहेंगी. मामाओं व मामियों ने भी इस भले कार्य में हमारा पूरा साथ देने का वादा किया. अब यह पता नहीं चल पाया कि वे कितना साथ देंगे. वैसे हमने उनके साथ के प्रकार के बारे में ज्यादा पूछना भी उचित नहीं समझा, क्योंकि हमें लगा कि वे सब मन से भी हमारे साथ रहें तो भी कम से कम कुछ सहारा तो मिलेगा ही.
जहाँ हमारे रिश्तेदार इस कार्य में सहयोग करने को उत्सुक हो रहे थे, वहीं हमारे एन.जी.ओ. के एक सदस्य, जो अपने विचारों से विद्रोही स्वाभाव का था, के प्रभाव में आकर अन्य सदस्य हमारे विरोध पर उतर आए. उन सबने मिलकर तर्क दिया कि एन.जी.ओ. का आरंभ किसी छोटे-मोटे भले कार्य के माध्यम से होना चाहिए न कि ऐसे भारी-भरकम बजट वाले काम से. हम गंभीर सोच में पड़ गए, लेकिन हमारी टीम, जिसमें अब केवल मैं और मेरी माँ ही बचे थे, ने फैसला लिया कि एक बार जिस काम को करने का फैसला कर लिया है तो उसे पूरा करके ही दम लेंगे. एन.जी.ओ. के सदस्यों के अलावा हमें अपने पारिवारिक सदस्यों का विरोध भी झेलना पड़ा. पिता जी और बड़े भाई को जब हमारी योजना के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्या अनाप-शनाप पैसा आ रहा जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा ली.
चारों ओर से होनेवाले विरोध से हमारा उत्साह कुछ पल के लिए भंग हो गया, लेकिन शरीर में राजपूती खून ने उबाल मारा और “रघुकुल रीत सदा चलि आई / प्राण जायें पर वचन न जाई” दोहे को दोहराते हुए हमने निर्णय किया कि इस भले कार्य को हम करके ही रहेंगे चाहे कोई बुरा माने या भला. एन.जी.ओ. के बाकी सदस्यों को जब हमारे इस दृढ फैसले के बारे में पता चला तो उन्होंने कोई भी सहायता करने से साफ़ इंकार कर दिया और पिता जी और बड़े भाई से किसी मदद की उम्मीद हमने कभी की ही नहीं थी. हम हमें जो कुछ करना था खुद ही करना था.
माँ ने अपनी बचत पोटली और मैंने अपनी एक्स्ट्रा पे को इस भले कार्य में होम करने का निर्णय किया. अपनी आर्थिक तैयारी के उपरांत हमने नाना जी से संतोषा की बेटी के विवाह के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए कहा. नाना जी ने विवाह का मुहूर्त निकलवा कर आदेश दिया, कि विवाह तिथि से एक सप्ताह पहले ही विवाह की तैयारी करवाने के लिए हम उनके घर हाज़िर हो जायें. 
हम माँ और बेटे विवाह की तय तिथि से एक सप्ताह पहले ही  नाना जी की हवेली में पहुँच गए. हमें वहाँ सभी मौसा-मौसियाँ अपने बाल-बच्चों के साथ उपस्थित मिले. पूरे घर में उत्सव सा माहौल था. हमारे लिए उत्सव का माहौल कुछ देर बाद ही मायूसी से भर गया. कारण यह था कि नाना जी ने संतोषा की बेटी के विवाह का जो बजट बनाया था वह मेरी एक्स्ट्रा पे और माँ की बचत से कई गुना अधिक था. हमने नाना जी से हिम्मत जुटाकर यह पूछने की हिम्मत की, कि हम गरीब कन्या का विवाह करने जा रहे हैं या फिर राजसी घराने की किसी लाडली का? यह सुनते ही नाना जी भड़क उठे और बोले कि उन्होंने आस-पास के गाँवों में इस विवाह की घोषणा कर दी है और हम संतोषा की बेटी का विवाह राजपूती आन-बान के साथ किया जाएगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे.
राजपूती आन-बान पर कुर्बान होना अब हमारी विवशता बन गई थी. अब हमारे सामने यक्ष प्रश्न यह था, कि इस लंबे-तगड़े बजट के लिए धन का इंतज़ाम आखिर कैसे किया जाए? पिता जी और भाई से इस बारे में बात करना ओखली में सिर देना होता. एन.जी.ओ. के अन्य सदस्यों से कोई आस थी नहीं. हमें निराश देख हमेशा की तरह माँ की माँ यानि कि मेरी नानी जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई और हमें चुपचाप उधार के तौर पर विवाह में खर्च होनेवाली राशि प्रदान कर दी.
हमने राजपूती परंपरा के अनुसार संतोषा की बेटी के लिए दहेज का सामान ख़रीदा व विवाह हेतु जरूरी सामान का प्रबंध किया. आस-पास गाँवों में इस विवाह के बारे में खबर फैल गई और सभी नाना जी की तारीफों के पुल बाँधने लगे. गाँव वाले इस बात से अनजान थे कि विवाह हम अपने एन.जी.ओ. के अंतर्गत करवा रहे थे. वे तो यह समझ रहे थे कि यह सब नाना जी की कृपा से हो रहा है. हालाँकि ऐसी बात नहीं थी कि नाना जी ने कोई मदद नहीं की. नाना जी के आदेश पर घरातियों व बारातियों के भोजन में खर्च होने के लिए आटा और दाल की बोरियाँ गोदाम से निकाल कर हाज़िर कर दी गईं.
निश्चित दिन व समय पर संतोषा की बेटी का विवाह बड़े धूम-धाम से संपन्न हुआ. आस-पास के गाँवों में रहनेवाले लोग इस विवाह को कौतूहलवश देखने आए और नाना जी की जय-जयकार करते हुए वापस गए. हमने मामा की लड़की को इस विवाह की तस्वीरें खींचने के लिए उसके हाथ में कैमरा देकर नियुक्त कर दिया, ताकि वो तस्वीरें हमारे नवनिर्मित एन.जी.ओ. की ऑडिट रिपोर्ट के काम आ सकें, लेकिन उसका कैमरा अपने दादा के मूछों पर ताव देते हुए अंदाज से दूसरी ओर घूमा ही नहीं. विवाह होने के बाद संतोषा की बेटी को नम आँखों से हम सबने विदा किया. विवाहरुपी शुभ कार्य करने के दो दिन बाद ही हम वापस अपने घररुपी ठिकाने में पहुँच गए.
हम इस आर्थिक झटके से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे, कि एक दिन नाना जी का फोन आ गया. घर की खैर-खबर पूछने के बाद उन्होंने बताया, कि उनके पास सुबह संतोषा आया था और पूछ रहा था कि बेटी का गौना करवाने की तारीख कबकी रखी जाए? नाना जी ने कहा, कि जिस प्रकार ठाट-बाट से संतोष की बेटी का विवाह हुआ था, उसी प्रकार गौना भी होना चाहिए वरना इलाके में हाल ही में बनी इज्ज़त मिटटी में मिल जायेगी. फोन रखने के बाद निराश और दुखी हो माँ मेरा और मैं उनका मुँह देखने लगा.  
कुछ देर बाद फिर से फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर संतोषा था. वह माँ को प्रणाम करके बोला, “जीजी रचना के गौना की तारीख कब की रखी जाए?”

इतना सुनते ही माँ ने घबराकर फोन काट दिया और हम माँ-बेटे अपना-अपना सिर पकड़कर गहरी सोच में डूब गए.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

चाय गरम

पांडे जी के बगल में बैठे यात्री ने उन्हें टोकते हुए कहा, “क्या पांडे जी आपकी चाय से कोई दुश्मनी है क्या?”
“नहीं ऐसी कोई बात तो नहीं है.” पांडे जी ने उसे समझाने की कोशिश की.
उस यात्री ने शिकायती लहजे में कहा, “तो फिर चाय के नाम से आपका मुँह क्यों उतर जाता है?”
“नहीं असल में आज मेरा चाय पीने का मन नहीं हो रहा है.” पांडे जी ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.
अब ये साथ वाले यात्री को कौन समझाता कि पांडे जी और चाय का नाता बचपन से ही कितना अटूट रहा है. बचपन में ये कहावत थी, कि पांडे जी चाय की चम्मच पीते हुए पैदा हुए थे. उनका चाय का रिश्ता अपने बड़े भाई के माध्यम से बना था. बड़े भाई ने मजाक ही मजाक में एक दिन सात महीने के नन्हे पांडे जी को थोड़ी सी चाय क्या पिला दी, उन्होंने चाय के स्वाद से प्रभावित होकर माँ का दूध ही पीना छोड़ दिया. अब जाने यह चाय का ही प्रभाव था, जो उनके शरीर में चुस्ती सदैव विराजमान रहती थी. उनसे कुछ भी काम निकलवाना हो तो बस उन्हें बढ़िया सी कड़क चाय पिला दीजिए और पांडे जी प्रसन्न होकर काम करने को तत्पर हो जाते. बचपन से ही मेहनती होने के कारण पांडे जी अपनी पढ़ाई का खर्चा बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर निकाला करते थे. बच्चों के माँ-बाप भी यह भली-भांति जानते थे कि यदि अपने बच्चों को अच्छी तरह पढ़वाना है तो पांडे जी को चाय भी बढ़िया ही पिलानी पड़ेगी. एक बार एक बालक की माँ से भूल हो गई और उसने पांडे जी को चाय पिलाने की जरुरत नहीं समझी. उसी दिन पांडे जी ने उस बालक को ट्यूशन पढ़ाने से संन्यास ले लिया और उस बालक के माँ-बाप के लाख मनाने के बावजूद नहीं माने.
पांडे जी के माँ-बाप ने अपने बेटे की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए दिल्ली भेज दिया. पांडे जी बिहार से दिल्ली तो पहुँच गए, लेकिन चाय की दीवानगी ने उनका साथ नहीं छोड़ा. दिल्ली में उनके साथ सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे उनके साथियों को उनकी चाय नामक कमजोरी का पता चल गया था और वे अक्सर उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाते रहते थे. लड़कों के साथ-साथ लड़कियाँ भी पांडे जी का उनकी चाय नामक प्रेमिका से मिलन करवाने के बदले अपने नोट्स बनवाकर पांडे जी का बखूबी इस्तेमाल करती रहती थीं.
पांडे जी के चाय प्रेम की लोकप्रियता का आलम यह था कि अक्सर उनके मित्र चाय पार्टी का आयोजन करते रहते थे. एक बार तो ऐसी ही एक चाय पार्टी में पांडे जी के मित्रों ने चाय को राष्ट्रीय पेय बनाने की बात छेड़ दी, जिसका पांडे जी ने पुरजोर समर्थन किया.
चाय प्रेम का पांडे जी को घाटा ये हुआ कि उनकी मेहनत के बल पर उनके साथी सफल होकर अपनी मंज़िल पाते रहे और पांडे जी चाय का पल्लू पकड़े जस के तस हालत में बने रहे.
एक रोज देर रात तक पढ़ाई करते रहने के कारण पांडे जी की आँख खुलते-खुलते दोपहर हो गई. पास का चाय वाला अपनी दुकान बंद करके कहीं गायब था. सो चाय की तलब मिटाने के लिए पांडे जी कुछ दूर पर सड़क के किनारे स्थित चाय की दुकान पर चाय पीने जा पहुँचे. वहाँ युवाओं की भीड़ को देखकर उन्होंने चायवाले से उस भीड़ का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वे युवा विपक्ष दल के हैं और सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं. अभी पांडे जी ने चाय के दो-चार घूँट ही लिए थे कि युवाओं ने पुलिस पर पत्थरबाजी आरंभ कर दी. पुलिस ने भी बदले में लाठी चार्ज कर दिया. दो-चार लाठी वहीं चाय का स्वाद लेते पांडे जी के भी पड़ गईं. लाठी खाकर युवाओं की भीड़ वहाँ से भाग ली और उनके साथ-साथ पांडे जी भी अपने कमरे की ओर भागे. पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था. उनकी चप्पल टूट गई और उसे ठीक करने के लिए उन्हें रुकना पड़ा और बेचारे पुलिस की पकड़ में आ गए.
हवालात में जाने से पहले उन्होंने थानेदार के बहुत हाथ-पैर जोड़े, लेकिन वह उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुआ. उन्होंने मित्रों के द्वारा इधर-उधर से सिफारिश भी लगवाई, लेकिन शायद उनकी कुंडली में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान में हाज़िरी लगवाना ही लिखा था, सो जब कोर्ट में उनकी पेशी हुई तो जज साहब ने उनका जेल जाने का मुहूर्त निश्चित कर दिया. अब वे उस घड़ी को कोसने लगे जब वे चाय पीने फुटपाथ की दुकान पर पहुँचे थे और इस आफत में आ फँसे. उन्हें चाय के नाम से अब नफरत सी होने लगी थी.
उन्होंने जेल में प्रवेश किया तो पुराने कैदियों ने उनकी खिचाई शुरू कर दी. उन्हें आदेश सुनाया गया कि उन्हें सुबह-शाम अपने जेल वार्ड की लैट्रीन साफ़ करनी पड़ेगी और नियम से उसमें में झाड़ू से सफाई करनी पड़ेगी. पांडे जी ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया तो कैदियों ने उनकी ढंग से मरम्मत कर डाली. अब पांडे जी का गुस्सा फूट पड़ा. उनकी आँखों से आंसुओं की धार बहे जा रही थी. रोते-रोते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि चाहे उनकी जान चली जाये, पर वे ऐसा गंदा काम हरगिज न करेंगे. उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि जेल से निकलकर जेल में होनेवाली संदिग्ध गतिविधियों के बारे में अपनी जेलयात्रा नामक वृतांत में विस्तार से लिखेंगे. पांडे जी का गुस्सा देखकर पुराने कैदी नरम पड़ गए. उन्होंने पांडे जी के साथ अच्छा व्यवहार करना आरंभ कर दिया. जबकि असल बात ये थी कि जेल में नशे का धंधा करनेवाले पुराने कैदी इस बात से डर रहे थे, कि कहीं पांडे जी उनकी पोल खोलकर उनका धंधा चौपट न कर दें. धीमे-धीमे पांडे जी की सज़ा के सात दिन समाप्त हो गए. उनका जेल के कैदियों के साथ ऐसा लगाव हो गया था, कि उनसे बिछुड़ते हुए उनकी आँखें भर आईं. कैदियों ने उनसे आग्रह किया कि यदि वो अपना जेलयात्रा वृतांत लिखें तो जेल में कैदियों द्वारा झेली जा रहीं परेशानियों का जिक्र करना न भूलें. जेल के दादा टाइप के कैदियों ने उनके कान में फुसफुसाकर आग्रह किया कि वो जेल में होने वाली छोटी-मोटी चिंदी चोरी का जिक्र न करें. पांडे जी उन सबको ऐसा करने का वादा करके वहाँ से चल पड़े.
जब वो अपने कमरे पर वापस आये तो आस-पड़ोस वालों का व्यवहार उन्हें अच्छा नहीं लगा. जेलयात्रा का तमगा मिलने से पांडे जी आस-पड़ोस में चर्चा का विषय बन चुके थे. अब कुछ दिनों के लिए माहौल ठीक करने के वास्ते उन्होंने सोचा कि चलो अपने माँ-बाप के पास पटना ही घूम आया जाए.
अचानक ही उनके कान में फिर से पड़ोस के यात्री की आवाज आई, “अरे पांडे जी अब ऐसी भी क्या नाराजगी? अब हठ छोड़कर एक-एक कप चाय हो ही जाए.”
पांडे जी भी मन ही मन सोचने लगे, कि जो होना था वो तो शायद भाग्य में होना लिखा ही था. अब इस बात पर अपनी पुरानी दिलरुबा चाय से क्या खफा होना. इतना सोचकर उन्होंने अपने सहयात्रियों के हाथ से चाय का गरमागरम प्याला लेकर अपने कलेजे में उतार लिया. इतने दिनों बाद अपनी चाय नामक महबूबा से मिलकर वह स्वप्नलोक में विचरने लगे.  अचानक ही किसी ने उन्हें बुरी तरह झंझोड डाला.
वो आँख मलकर उठते हुए बोले, “कौन सा स्टेशन आ गया?”
“पटना स्टेशन आ गया है वो भी दो घंटे पहले. मैं सफाईवाला हूँ. चलो निकलो बोगी से मुझे इसकी सफाई करनी है.” सफाईवाले ने पांडे जी को हड़कते हुए बोला.
पांडे जी हैरान हो गए उन्होंने अपना सामान चारों ओर ढूँढा पर नहीं मिला. इसका मतलब था, कि साथ वाले यात्री के माध्यम से चाय नामक डायन एक बार फिर से उन्हें दगा दे गई थी. अब उन्हें चाय के नाम से नफरत के साथ-साथ डर भी लगने लगा था.
कुछ समय बाद उन्हें प्लेटफार्म पर आवाज़ सुनाई दी, “चाय गरम.”

इतना सुनना था कि पांडे जी डर के मारे बोगी की सीट के नीचे घुस गए.

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
*चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

एक प्रेम कहानी ऐसी भी

  वाराणसी के पावन घाट पर ज्योति और कुलदीप के बीच प्रेम का बीज उपजा था. दोनों ही वाराणसी के होस्टलों में रहते हुए शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. एक दिन कुलदीप अपने दोस्तों और ज्योति अपनी सहेलियों के साथ वाराणसी के घाट पर गंगा मैया के दर्शन करने आये और उनकी एक-दूसरे से ऐसी नज़रें मिलीं तो एक-दूसरे के हो गए. धीरे-धीरे मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और दोनों में प्यार बढ़ता गया. अब ज्योति को अपना नीरस सा जीवन उमंगों से भरा लगने लगा था. पहले वह किताबों के संसार में सिमटकर खोयी रहती थी. उसका मकसद था पढ़-लिखकर एक मुकाम पाना और अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा करना. इसी संसार में खोये हुए अक्सर वह हर युवा लड़की की भांति स्वप्न देखा करती थी उस सपनों के राजकुमार के जो आसमान से घोड़े पर सवार होकर आएगा और उसे अपने साथ अपने सपनों की रानी बनाकर ले जाएगा.
कुलदीप के रूप में ज्योति को उसके सपनों का राजकुमार मिल चुका था. अब वह अपने सपनों के राजकुमार के साथ भविष्य के सपने सजोने लगी. एक दिन ज्योति की गोद में लेटे हुए कुलदीप ने ज्योति को उदास देख उसकी उदासी का कारण जानना चाहा तो उसने टालने की कोशिश की. जब कुलदीप नहीं माना तो उसकी जिद के आगे उसे झुकना पड़ा.
ज्योति धीमे स्वर में बोली, “कुलदीप मैं तुम्हें कई दिनों से बताना चाह रही थी, लेकिन अक्सर झेंप जाती थी. मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा है.”
“ये क्या कह रही हो?” कुलदीप को विश्वास नहीं हुआ.
ज्योति उसके गले से लगती हुई बोली, “सच कह रही हूँ. हम दोनों के प्यार का बीज मेरे गर्भ में पल रहा है.”
“मैं कैसे मान लूँ कि यह बच्चा हमारे प्यार का ही फल है?” कुलदीप ने कठोर बनते हुए कहा.
ज्योति उसकी बात सुनकर हैरान हो गई, “तुम ये कैसी बातें कर रहे हो? ये हमारे प्यार का फल नहीं है तो फिर किसके प्यार का फल है?”
“अब जाने तुमने कितनों के साथ प्रेमलीला खेली हो और उसके फल को मेरे माथे मढ़ रही हो.” कुलदीप व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए बोला.
ज्योति को जैसे आघात सा लगा, “तुमने मुझे क्या धन्धेवाली समझा है, जो मैं सबसे प्रेमलीला रचाती फिरुंगी.”
“मैं कुछ नहीं जानता. आज से मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है. तुम्हारी होने वाली संतान तुम्हें ही मुबारक हो.” इतना कहकर कुलदीप वहाँ से चला गया और ज्योति वहीं पार्क के कोने में बिलखती रही. 
इस मुसीबत की घड़ी में ज्योति की प्रिय सहेली रेनू ने उसका बहुत साथ दिया. ज्योति के गर्भ में बच्चा छः महीने का हो चुका था, सो डॉक्टर ने गर्भपात से इनकार कर दिया. अब रेनू  शहर में एक किराये का मकान खोजकर ज्योति को रखकर उसकी देखभाल करने लगी. एक दिन ज्योति ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया. अब ज्योति सोचने लगी कि बिन ब्याही होकर माँ बनने की बात अगर माँ-बाप को पता लगी तो वे तो जीते-जी मर जायेंगे.
रेनू ने इस विपदा से बचने का उपाय सुझाया. दोनों सहेलियाँ सवेरे-सवेरे वाराणसी के घाट के पास स्थित एक मंदिर में गईं और मंदिर के मुख्य द्वार पर ज्योति ने सुबकते हुए अपनी संतान को रखा और वहाँ से भारी मन लिए चली आई.
जब मंदिर के पुजारी ने नन्हे बालक को देखा तो चौंक गए और चीखकर बोले, “अरे ये कौन अपना बच्चा छोड़ गया है यहाँ पर.”
वहीं बगल से निकल रही सफाई कर्मचारी शन्नो ने जब यह देखा तो झट से बोली, “पुजारी जी मेरा बच्चा है. भगवान का आशीर्वाद दिलवाने आई थी.”
पुजारी जी क्रोधित होकर बोले, ”आशीर्वाद दिलवाने लाई थी तो अपनी गोद में रखती. यहाँ रास्ते में क्यों पटक दिया? कहीं पैर इसके ऊपर पड़ जाता तो.”
शन्नो बोली, “पुजारी जी माफ कर दीजिए. छोटी जाति की हूँ न सो आप बड़ी जाति वालों जितना दिमाग नहीं चलता.” इतना कहकर शन्नो उस बच्चे को लेकर चंपत हो गई.
शन्नो उस बच्चे को गोद में छुपाये तेजी से चलते हुए बड़बडा रही थी, “हे भगवान आज तूने मेरी लोटरी खोल दी. मेमसाब की सूनी गोद में यह बच्चा जब डालूँगी तो मालामाल कर देगीं. जाने किसका पाप सुबह-सुबह मेरे लिए वरदान बनकर आ गया?”
उसके बड़बडाने को मुनेश सुन रहा था. वह हाल ही में पुलिस में भर्ती हुआ था और भर्ती होने के लिए मांगी गंगा स्नान की मन्नत पूरी करने वाराणसी के घाट पर आया था. वह फुर्ती से उसकी ओर लपका और उसे टोकते हुए बोला, “ए बुढिया ये किसका बच्चा चुरा लाई?”
शन्नो एकदम घबराते हुए संभली और जवाब दिया, “किसका बच्चा? अरे मेरा बच्चा है.”
मुनेश उसे हड़कते हुए बोला, “तेरी उम्र और रंग को देखकर कहीं से भी ये तेरा बच्चा नहीं लगता. सही-सही बता नहीं तो हवालात में जायेगी. मैं पुलिस में ही हूँ.”
शन्नो के डर के मारे पसीने छूटने लगे, “बाबू जी माफ कर दो. ये बच्चा तो मुझे मंदिर के द्वार पर पड़ा मिला था. मैंने सोचा इसे पाल-पोस लूंगी. वरना बेचारा भूख से ही मर जाता.”
“पाल-पोस लेगी या फिर इसे बेच देगी.” मुनेश ने गुस्से में उससे बच्चा छीन लिया.
 उस बच्चे को लेकर मुनेश मेरठ ले आया. मुनेश भी अनाथ ही था. उसके माता-पिता बचपन में ही दुर्घटना के शिकार हो स्वर्ग सिधार गए थे. उसे उस बच्चे में अपना बचपन दिखाई दिया. उसने उसे अपने बच्चे की तरह पालना शुरू कर दिया.
समय का पहिया चलता रहा और वह बच्चा, जिसका नाम मुनेश ने प्यार से आकाश रखा था, दस साल का शरारती बच्चा बन चुका था. पुलिस लाइन्स में अक्सर उसकी शिकायत मुनेश के पास आती रहती थीं, लेकिन मुनेश उन्हें हंसकर टाल देता था. एक दिन आकाश ने एस.पी. के घर में स्थित बाग में घुसकर अमरुद तोड़ लिए. उस बाग में काम करनेवाले माली ने आकाश को पकड़कर उसके गाल पर झापड़ झड़ दिए. जब आकाश ने घर जाकर रोते हुए यह बात मुनेश को बताई तो उसका खून खौल उठा. वह बाग में गया और माली के गालों को मार-मार कर लालकर दिया.
मुनेश की पेशी एस.पी. साहिबा के पास हुई. उन्होंने माली और मुनेश से सारे हालत जाने और मुनेश से पूछा, “तुम्हारी तो शादी नहीं हुई फिर ये बच्चा किसका है?”
मुनेश ने मन्नत पूरी करने के लिए वाराणसी के घाट पर गंगा स्नान करने और अजय को बुढिया से लेने की पूरी घटना एस.पी. साहिबा को बता दी. मुनेश को चेतावनी देकर माफ कर दिया गया और माली को आइन्दा किसी बच्चे पर हाथ न उठाने की सख्त हिदायत दी गई.
मुनेश के जाने के बाद एस. पी. साहिबा ने अपने अर्दली से कहा, “अगर कोई मिलने आये तो उससे कह देना मेरी तबियत ठीक नहीं है. आज मैं आराम करूँगी.”
इतना कहकर एस. पी. साहिबा बीते दिनों में खो गयीं. अपनी सहेली रेनू के साथ जब वह यानि कि ज्योति अपने बच्चे को ईश्वर के सहारे छोड़कर आई थी तो कितना रोई थी. वो रेनू जैसी सहेली ही थी, वरना जाने क्या हाल होता उसका. रेनू के समझाने पर ज्योति ने अपनी पढ़ाई में फिर से ध्यान देना शुरू कर दिया और कड़े परिश्रम के परिणामस्वरुप पुलिस सेवा में चुनी गई. घरवालों ने खूब जोर डाला पर ज्योति की किसी से विवाह करने की इच्छा ही न हुई. उसे हर आदमी में अपने भूतपूर्व प्रेमी कुलदीप का घृणित चेहरा ही दिखाई देता था. अचानक ही उसके हृदय में फिर से प्रेम की अनुभूति होने लगी. यह प्रेम मुनेश के लिए था. जिसने उसके बच्चे को अपना बच्चा समझकर इतने दिनों पाला पोसा और इस कारण अभी तक शादी भी नहीं की. वह सोच रही थी कि कुलदीप से उसका प्यार शायद यौवनावस्था में की हुई केवल एक भूल थी और मुनेश के प्रति प्यार आदरभाव से भरा हुआ सच्चा प्रेम था.
उधर मुनेश के हृदय में भी उथल-पुथल चल रही थी. वह अपने आपसे बतिया रहा था, “मैंने एस.पी. साहिबा के माली को मारा और फिर भी उन्होंने मुझे माफ कर दिया. बड़ी ही नेक महिला हैं. पर एक बात समझ में नहीं आई, कि उन्होंने अभी तक शादी क्यों नहीं की. इतने उच्च पद पर आसीन विनम्र युवती का अभी तक कुँवारी रहना अजीब ही लगता है. उनकी आयु मेरे बराबर की ही होगी. मेरे तो माँ-बाप नहीं थे जो कोई बाप अपनी बेटी मेरे साथ ब्याहता. वैसे भी आकाश ही अब मेरा जीवन है. अब उसे पढ़ा-लिखाकर लायक इंसान बनाना ही मेरा लक्ष्य है. पर उनकी क्या मजबूरी होगी? सुना है उनका तो भरा-पूरा परिवार है. फिर क्या कारण रहा होगा? हो सकता है कोई उनके लायक लड़का ही न मिला हो. वैसे कोई किस्मतवाला ही होगा जिससे उनकी शादी होगी.” और इन्हीं विचारों में खोये हुए उसकी आँख लग गई.
सुबह शोर सुनकर मुनेश की नींद टूट गई. एस.पी. साहिबा का अर्दली मुनेश के घर का दरवाजा पीट रहा था.
मुनेश ने दरवाजा खोलकर उससे पूछा, “अरे भाई क्यों इतने बेचैन हो रखे हो? क्या मुसीबत आई है?”
अर्दली ने कहा, “तुम्हें एस.पी. साहिबा ने बुलाया है.”

मुनेश अर्दली के साथ एस.पी. साहिबा यानि कि ज्योति के घर पहुँचा तो वहाँ उसकी सहेली रेनू मुनेश को एकांत में ले गई और उसे बीती सारी बात बताई तथा यह भी बताया कि ज्योति उससे शादी करना चाहती है. मुनेश ने उससे कहा कि कहाँ वह एक सिपाही और कहाँ वह एस.पी. कैसे जोड़ बनेगा? रेनू ने उसे समझाया कि अपने बेटे के प्रति तुम्हारे समर्पण और प्रेम से प्रभावित होकर ज्योति उसे प्यार करने लगी है और प्यार में कोई जाति, धर्म या पद नहीं देखा जाता. चूँकि मुनेश भी ज्योति को मन ही मन चाहने लगा था सो उसने बिना संकोच किये इस रिश्ते के लिए हाँ कर दी और एक शुभ महूर्त में उन दोनों का विवाह हो गया.  

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

आवाज़ का रहस्य (कहानी)

   रात को पढ़ने के लिए बैठा ही था, कि ऊपर वाले मकान से कुछ पीसने की आवाज़ आने लगी. परिवार में सभी चौकन्ने हो गये. चौकन्ना होना ही थाक्योंकि ऊपर वाले मकान को खाली हुये 6 महीने से अधिक समय हो चुका था और वहाँ से आवाज़ आना ही नामुमकिन था. हम सभी आपस में इस विषय पर चर्चा करने लगेतो छोटी बहन ने बताया कि उसने कई बार रात के समयहमारी छत से पड़ोस की छत पर किसी के कूदने की आवाज़ सुनी थी. हम सभी अनुमान लगाने लगेकि कहीं ऊपर वाले मकान में कोई आतंकवादी गतिविधि तो नहीं चल रही हैक्योंकि दिल्ली शहर आतंकवादियों की आतंक फ़ैलाने के लिए मनपसंद जगह है. मेरे पिता ने अनुमान लगायाकि ऊपर शायद कारतूस बनाने का काम चल रहा है. माँ ने उनकी बात का समर्थन किया. सुबह हुई और मैं सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ गया तथा खिड़की से ताका-झांकी कर ऊपर वाले मकान की छानबीन करने लगा. अंदर झाँकने पर देखाकि दो पानी की बोतलें आधी भरी रखी हुईं थीं तथा पास में ही ग्लूकोज का डिब्बा रखा थाजिसके ऊपर एक गिलास रखा था. फर्श पर कुछ बिखरा पड़ा हुआ था. दूसरे कमरे में झाँका तो कमरा खाली दिखा व उसमें धूल जमी हुई थी. रात को आने वाली आवाज को मन का भ्रम मानकर मैं नीचे उतर आया. रात बीती. सुबह उठकर आया तो माँ ने बताया कि सुबह करीब 5 बजे फिर से कुछ पीसने की आवाज़ आई थी. घर के सभी सदस्य सावधान हो गये. पिता जी सवेरे ही थाने गये तथा मालखाने में पता लगायाकि ऊपर वाला मकान किसी के नाम आबंटित हुआ है या नहीं व मालखाना मोहर्रर को पूरी घटना के विषय में भी अवगत कराया. मालखाना मोहर्रर ने पूरी जांच करने का वादा किया. छोटी बहन ने मुझे बतायाकि उसने ऊपर वाले मकान के पड़ोसवाले मकान में कुछ लड़के देखे हैंजो कुछ-कुछ कश्मीरी आतंकवादियों जैसे लग रहे थे. कहीं वे ही तो ऊपर वाले मकान में कुछ गडबड करने न आते हों. मुझे उसकी बात में कुछ दम लगा. तभी पीछे सीढियों पर कुछ आवाज आने लगी. मैं पिछला दरवाज़ा खोलकर ऊपर गयातो मालखाना मोहर्रर ऊपरवाले मकान के पड़ोस में रहने वाले दक्षिण भारतीय से पूछताछ कर रहा था. मैंने वहाँ पहुँचकर उसे पूरी घटना के बारे में बताया. उसके पास कई चाबियाँ थीं. हमने बारी-बारी सभी चाबियों को आजमाकर मकान का ताला खोलने का प्रयास किया. सौभाग्य  से एक चाबी लग गई और ताला खुल गया. कमरे में घुसे तो देखाकि अंदर चारों ओर मकड़ी के जाले जमे हुए थे. फर्श पर धूल जमी पड़ी थी. जिस जगह से कुछ पीसने की आवाज़ आती थीवहाँ कोई निशान न था. ग्लूकोज का डिब्बा खाली था तथा उसके ऊपर गिलास सा दिखने वाला एक खाली डिब्बा रखा था. आधी भरी पानी की बोतल काफी पुरानी लग रही थी. शौचालय एवं स्नानघर भी जाले व धूल से पटे पड़े थे. बरामदे का दरवाज़ा खोलते ही मालखाना मोहरर्र डर गयाक्योंकि वहाँ नंगे पैरों के निशान थे. असल में वे निशान मेरे ही पैरों के थेजो सुबह मकान की छानबीन के दौरान बरामदे  में बन गये थे. इस बात को मैंने उससे छुपा लिया. आखिर कुछ समय जाँच-पड़ताल करने के पश्चात मालखाना मोहरर्र यह कहते हुए चला गयाकि वह उस इलाके के बीट ऑफिसर को मकान पर निगाह रखने के लिए कह देगा. मैंने सारी बात घर में आकर बताई. अब घर वाले कुछ और सशंकित हो उठे. अब सभी ऊपरवाले मकान में किसी प्रेतात्मा का वास होने का अनुमान लगाने लगे. माँ ने बतायाकि ऊपरवाले की लड़की ने एक बार प्रेम प्रसंगवश अपने हाथ की नसें काट ली थीं. कहीं उस लड़की की मौत न हो गई हो और वह भूतनी बनकर मकान में भटकती हो. रात हुई और फिर से कुछ पीसने की आवाज़ आने लगी. मैंने इस रहस्य से पर्दा उठाने का संकल्प कर लिया तथा रात होते ही दूसरी मंजिल पर पहुँच गया. मालखाना मोहर्रर से मैंने उस घर की चाबी लेकर अपने पास रख ली थी. दरवाज़ा खोलकर जैसे ही मैं भीतर घुसातो एक औरतजिसके बाल बिखरे हुए थेबदहवास हालत में थी कुछ पीसने में लगी हुई थी. मेरे भीतर घुसते ही वह कर्कश ध्वनि में बोली, आओ ठाकुर तुम्हारा ही इंतज़ार था. मैंने सहमते हुए उससे पूछा, तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रही हो?” यह सुनकर उस औरत ने अपने बिखरे बालों को अपने चेहरे से हटायातो मैं चौंक गया क्योंकि वह उस मकान में रहने वाले किरायदार की पत्नी थी. मैंने डरते हुए पूछा, चाची आप सब तो यह मकान छोडकर छ: महीने पहले ही चले गये थेतो फिर इतनी रात को यहाँ अँधेरे में अकेली क्या कर रही हो”? मेरी बात सुन उसने बहुत भद्दा ठहाका लगाया और बोली, मैं यहाँ से गई ही कब थीमेरा पति दूसरी शादी करना चाहता थालेकिन मैं उसे तलाक देने को राजी न हुई. सो मकान खाली करने से पहले उसने मेरा गला दबाकर मुझे मार दिया और मेरी लाश को एक बक्से में बंद करके ज़मीन में दफना दिया. तबसे मेरी आत्मा इसी मकान में भटक रही है. अब यहाँ पर अकेले रहते-रहते मैं भी बहुत ऊब गई थी. अच्छा हुआ जो तुम आ गये. अब मैं तुम्हारा टेंटुआ दबाकर तुम्हें भी अपने टोली में शामिल कर लूंगी. फिर हम दोनों की खूब जमेगी. इतना कहकर उसने मेरा गला अपने दोनों हाथों से दबा लिया. मेरा दम घुटने लगा. मैं खुद को बचाने की कोशिश करने लगा. अचानक मेरी आँख खुल गई. मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था. मैं अपनी खैर मनाने लगाकि यह केवल एक सपना ही था. अगली रात आई. हम सब आवाज़ आने के बारे में ही चर्चा कर रहे थे. रात के करीब नौ बज चुके थे. तभी फिर से वही आवाज़ आने लगी. सभी सिहर उठे. मैंने वह आवाज़ ध्यान से सुनी. वह आवाज़ कुछ पीसने की न होकर कुछ इधर-उधर लुढ़काने की  थी. मैंने झट से दूसरी मंजिल पर पहुँचकर उसके दरवाज़े से कान लगाएलेकिन वहाँ कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. एक मंजिल और ऊपर चढ़कर गयातो देखा कि तीसरी मंजिल वाले की बिटिया पत्थर के खिलोने से खेल रही थी. जिसकी आवाज़ बहुत तेज आ रही थी. मैं उसे देखकर मुस्कुराने लगा तथा सोचने लगाकि जिस आवाज़ ने हमारा इतने दिनों तक जीना हराम कर रखा था आख़िरकार उस आवाज़ का रहस्य पता चल ही  गया.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मुठभेड़ (कहानी)

फ्तर में अपने काम में व्यस्त था, कि अचानक फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर कोई स्पेशल ब्रांच का फोन नंबर माँग रहा था. मैंने सोचा कि शायद कोई मुसीबत का मारा होगा, सो ज्यादा पूछताछ करने की बजाय दिल्ली पुलिस की फोन डायरी में से खोजकर स्पेशल ब्रांच का फोन नंबर उसे बता दिया.
कुछ देर बाद उस व्यक्ति का फिर से फोन आया. उसने जो कुछ बताया उससे मैं सकते में आ गया. उसने बताया कि वह मुंबई में रहता है और उसके यहाँ किरायेदार के रूप में इस समय छः नौजवान ठहरे हुए हैं. उनके पास हथियार भी हैं. चुपचाप उन सबकी बात सुनने पर पता चला, कि उनका दिल्ली में हुई एक डकैती और एक हत्याकांड में हाथ भी रहा है. उसने निवेदन किया मैं उसे किसी ऐसे विश्वस्त पुलिसवाले का फोन नंबर दे दूँ, जो मुंबई आकर उन्हें गिरफ्तार कर सके.
मैंने कहा कि मुंबई पुलिस को इस बारे में क्यों नहीं बताते तो वह बोला कि मैंने इस बारे में सोचा था और अपने एक दोस्त से इस बारे में राय भी ली थी, लेकिन उसने बताया, कि मेरे किरायेदारों की जान-पहचान मुंबई पुलिस में है. कहीं मैंने मुंबई पुलिस में शिकायत की और उन लड़कों को पता चल गया, तो मेरी जान तो गई समझो.
ठीक है मैं कुछ करता हूँ.” इतना कहकर मैंने फोन काट दिया.
मैंने कुछ देर सोच-विचार किया फिर अपने पिता जी को फोन मिलाया. वो शायद कहीं व्यस्त थे, सो मेरा फोन न उठा सके. इसके बाद मैंने अपने बड़े भाई से संपर्क साधा और उसे इस बारे में सूचित किया. उसने स्पेशल ब्रांच में तैनात सब इंस्पेक्टर गजराज सिंह को इस घटना के विषय में बताया. अगले दिन गजराज सिंह का फोन आया. उन्होंने कहा कि वो मेरे दफ्तर आ रहे हैं. गजराज सिंह जब दफ्तर में पहुँचे तो मैंने उन्हें विस्तार से मुंबई से फोन करनेवाले इंसान, जिसने अपना नाम रोहित बताया था, के बारे में व उसके द्वारा दी गई सूचना के बारे में बताया. गजराज सिंह ने पूरी डिटेल लेकर अगले दिन तक इंतज़ार करने के लिए कहा.
अगले दिन सुबह ही उनका फोन आया. उन्होंने बताया कि रोहित द्वारा बताई बात बिलकुल ठीक है. दिल्ली में पिछले साल डकैती पड़ी थी और उसके बाद पुलिस के एक मुखबिर की गुप्तांग काटकर मार डालने की घटना भी घटी थी. उन्होंने कहा कि मैं रोहित से बात करूँ कि वह किसी भी तरह उन बदमाशों को बहला-फुसलाकर दिल्ली ले आये.
मैंने जब यह बात रोहित को बताई तो वह बोला कि इस समय उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और छः लोगों के साथ रेल में सफर करने के लिए कम से कम तीन हजार रूपये की जरूरत पड़ेगी. मैंने यह बात गजराज सिंह को बताई तो उन्होंने ने कहा कि रोहित से कहो कि वह पता बता दे. उसे उसके घर पर रुपये भिजवा दिए जायेंगे. इस काम के लिए उन्होंने मुंबई में रहनेवाले अपने एक मित्र को कह भी दिया. रोहित का शाम को फोन आया कि गजराज सिंह के मित्र से उसने बात की थी, लेकिन वह व्यस्तता का हवाला देकर रुपयों को वहीं आकर लेने को कह रहा है, जो कि बहुत दूर है. उसने आग्रह किया कि यदि रुपये उसके बैंक के खाते में जमा करवाए जा सकें तो वह रेल का टिकट खरीद सकता है और उन बदमाशों के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो सकता है. बहरहाल उसकी यह माँग भी पूरी कर दी गई.
शाम के समय रोहित का फोन आया कि उसने दिल्ली आने की टिकट खरीद ली हैं और वह अगले दिन सुबह की ट्रेन से उन बदमाशों के संग दिल्ली को रवाना होगा. उसने ट्रेन की बोगी नं. और सीट नं. लिखवा दिए. मैंने गजराज सिंह को सारी परिस्थिति बताकर आगे की योजना पूछी तो वो बोले कि मैं तैयार रहूँ क्योंकि परसों बदमाशों को पकड़ने के लिए होनेवाली संभावित मुठभेड़ में मैं भी उनके साथ रहूँगा.
अब आगामी मुठभेड़ के लिए मैंने तैयारी आरम्भ कर दी. शाम को डी.सी.पी. साहब समय से  घर रवाना हो गए. मैंने दफ्तर बंद किया और वहीं कुछ दूर स्थित जिम में गया और कसरत की व थोड़ी-बहुत मुक्केबाजी करके अपने मुक्के सटीक किये. इसके बाद थाने के शस्त्र भंडार में जाकर रिवाल्वर व पिस्तौल (खाली) चलाने का अभ्यास किया. शस्त्र भंडार में मेरे रूप में शायद कोई पहली बार इस तरह अभ्यास करने आया था. इसी कारण वहाँ तैनात पुलिस स्टाफ बहुत खुश हुआ और मुझे अच्छी तरह हथियारों का अभ्यास करवाया.
रात को घर लौटते-लौटते देर हो गई सो खा-पीकर सो गया. सुबह उठा तो रोहित का फोन आया. उसने बताया कि वह उन बदमाशों के साथ ट्रेन में बैठ गया है और कल दोपहर तक दिल्ली पहुँच जाएगा.  मैं मुठभेड़ होने के बारे में सोचकर ही रोमांचित हो रहा था. अब तक तो मैंने अखबारों या टी.वी. पर ही मुठभेड़ की खबर पढ़ी और सुनी थी लेकिन अब तो मैं भी किसी मुठभेड़ का हिस्सा बनने जा रहा था.
फिल्मों में अक्सर पुलिस और बदमाशों की मुठभेड़ देखकर सोचा करता था कि कभी मैं भी मुठभेड़ में किसी बदमाश को गोली मारकर ढेर करूँगा. चलो आखिर वह पल जीवन में आ ही गया. फिर दिमाग में सवाल उठा कि मुठभेड़ में क्या केवल बदमाश ही मारे जाते हैं? मुठभेड़ में गोलीबारी दोनों ओर से होती है या तो बदमाश मरते हैं या फिर पुलिसवाले और या फिर दोनों ही. इसका मतलब कि कल होनेवाली मुठभेड़ में मेरी जान भी जा सकती है? फिर सोचा कि इस देश की माटी हमारे लिए माँ जैसी ही तो है और अगर अपनी इस धरती माँ और समाज के लिए यह तुच्छ जान चली भी जाए तो यह तो सौभाग्य की बात ही होगी. अगर यह मेरा आखिरी दिन है तो आखिरी ही सही. चलो आज इसे जी भरके जिया जाए.
अब मैं उस दिन को दिल से जीना चाहता था. उस दिन मैंने अपने भूले-बिसरे सभी दोस्तों को फोन करके उनके हाल-चाल लिए. संगीत का आनंद लिया और अपनी मोटर साइकिल से जमकर सैर की. रात को समय से सो गया और इतनी जमकर नींद ली कि उठते-उठते सूरज निकल आया. नहाया-धोया, खाया-पीया और मुठभेड़ में जाने को तैयार हो गया. जाते समय माँ के चरणों को छुआ. हो सकता था कि उन पावन चरणों को छूने का फिर से मौका मिलता ही नहीं.
निश्चित समय पर मैं रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया. गजराज सिंह अपने मुठभेड़ में सिद्धहस्त अन्य पुलिसवाले साथियों के साथ कुछ समय बाद ही वहाँ पहुँच गए. वे सभी देखने में साक्षात् यमदूत प्रतीत हो रहे थे. शायद मृत्यु से निरंतर भेंट करते हुए उन्होंने यमराज से सेटिंग कर ली थी, सो मृत्यु उनके आस-पास भी नहीं फटकती थी. वे सभी मुझे अविश्वास से देख रहे थे जैसे कह रहे हों कि यह छोकरा यहाँ कर रहा है? गजराज सिंह ने प्लान समझाया कि उन बदमाशों को कार में बिठाकर किसी गेस्ट हाउस में ले जाकर धर पकड़ा जाए. उन को बहलाकर गेस्ट हाउस ले जाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई.
हम सभी हथियार कपड़ों के नीचे छुपाकर रेलवे स्टेशन के भीतर बढ़ चले. जब हम स्टेशन पर पहुँचे तो वहाँ खड़ी ट्रेन के शीशे में अपना चेहरा निहारा तो देखा मेरी आँखों में रक्त उतर आया था और देश और समाज के दुश्मनों से दो-दो हाथ करने को मेरी बाजुएँ फडकने लगीं. मैं, गजराज सिंह और हमारे दो साथी वहीं स्टेशन पर रुक गए तथा हमारे दो जवान उस स्टेशन से एक स्टेशन पहले ही ट्रेन में चढ़कर बदमाशों की घेराबंदी करने के लिए नियुक्त किये गए. हम स्टेशन पर ट्रेन के आने का इंतज़ार करने लगे. रोहित का फोन नहीं मिल पा रहा था. पिछले स्टेशन पर ट्रेन पहुँच चुकी थी और जिन दो जवानों को पिछले स्टेशन से ट्रेन में चढ़ने और रोहित व उसके साथ आ रहे बदमाशों की घेराबंदी करने के लिए भेजा गया था. उन्होंने फोन करके बताया कि उस प्रकार के व्यक्ति उस बोगी की उन सीटों पर नहीं हैं. गजराज सिंह ने आरक्षण केन्द्र में फोन करके रोहित द्वारा बताई गईं सीटों की डिटेल पूछी तो पता चला कि वो सीटें किसी दूसरे परिवार के नाम पर आरक्षित थीं, जिनमें चार पुरुष और दो महिलाएँ थीं. कुछ समय पश्चात जिस स्टेशन पर हम रोहित और बदमाशों  पलकें बिछाए प्रतीक्षा कर रहे थे ट्रेन आ धमकी. उस ट्रेन से उतरकर हमारे दोनों जवान भी आ पहुँचे. हमें रोहित नामक व्यक्ति ने मूर्ख बना दिया था. हम सभी बैरंग वापस लौट चले. इस प्रकार मुठभेड़ शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली,भारत 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

टोटका (कहानी)

   
   माँ आँगन के गेट के बाहर निकलने को हुईं तो फिर से उन्हें चावल, सिंदूर और बाल गेट के बीचों-बीच रखे मिले. आज फिर से कोई टोटका कर गया था. माँ टोटका करनेवाले को गरियाते हुए वापस घर को लौट आईं. मैंने जब जाकर डंडे से उस सामान को एक ओर खिसका कर किया तब माँ घर से निकलीं. कुछ दिनों से हम सब परेशान थे. कारण था हमारे घर के आस-पास टोटका किया जा रहा था.
हमारा परिवार कालोनी में अपने काम से काम रखनेवाले परिवार के रूप में जाना जाता है. यही कॉलोनी वालों के लिए ईर्ष्या का विषय है. वैसे तो हमारे घर के आस-पास टोटका होना कोई नहीं बात नहीं थी, लेकिन कुछ दिनों से ये कुछ ज्यादा होने लगा था. सही मायने में कहा जाए तो टोटका उन कायरों और असफल व्यक्तियों का हथियार है, जो यह सोचते हैं कि टोटका करके वे किसी का अहित कर अपना भला कर सकते हैं.
हालाँकि हमें कुछ हद तक पता चल चुका था, कि टोटका करने के पीछे किसका हाथ था, क्योंकि कालोनी के जासूस टाइप के लड़कों से अपना पक्का याराना रहता था. उन्होंने ही बताया था, कि सुबह के अंधेरे में उन्होंने कुछ भली महिलाओं को हमारे घर के इर्द-गिर्द टोटका करने के लिए मंडराते हुए देखा था. वैसे हमें भली-भांति ये भी मालूम था कि टोटका करने में सिद्धहस्त उन महिलाओं का पारिवारिक जीवन कुछ अधिक खुशहाल नहीं था. शायद यही वजह थी, जो वे अपनी खुशहाली पाने की खातिर हमारे घर की खुशहाली पर टोटके के रूप में बुरी नज़र डालती रहती थीं.
ऐसी बात नहीं है कि केवल हम ही टोटका करनेवालीं भली महिलाओं से परेशान थे, कालोनी में रहने वाले अधिकांश लोग उनकी टोटकेबाजी से तंग आ चुके थे. हर समस्या का हल भी अवश्य होता है, सो हमारा परिवार भी इस समस्या का हल खोजने में जुट गया. सबने अपने-अपने सुझाव बताये, लेकिन कोई भी जंचा नहीं. अंत में छोटी बहन ने इस टोटकेबाजी से हमें मुक्त कराने का बीड़ा उठाया. हमारे घर में लोकतान्त्रिक व्यवस्था है, इसलिए हम यह नहीं सोचते कि कौन छोटा है या फिर कौन बड़ा. सो हमने घर की सबसे छोटी सदस्या को बिना कोई प्रश्न पूछे यह कार्य सौंप दिया.
अब छोटी बहन अपने कार्य में जुट गई. उसके कार्य के लिए जो जरूरी सामान उसने माँगा, उसे लाकर दे दिया गया. उसके जरूरी सामान पर नज़र डालें तो वह कुछ यूँ था - गुंथा हुआ आटा, काला धागा, चने की दाल, हरी मिर्चें, सिंदूर, कुछ सुइयाँ, कुछ बाल और एक नींबू. हमारे मन में ये ख्याल तो आ रहे थे, कि आखिर इस सामान का वह करेगी क्या, लेकिन हमें उसकी प्रतिभा पर पूरा यकीन भी था, सो हमने उसे जो उसका करने का मन था करने दिया.
वह अपने कमरे में अपने काम को अंजाम देने में व्यस्त थी और हम सभी दूसरे कमरे में यह सोचने में व्यस्त थे, कि आखिर वह करने क्या जा रही थी. घड़ी की सबसे तुच्छ सेकंड की सुई पर कभी ध्यान न देनेवाला मैं अति व्यस्त मानव आज सेकंड की सुई के पीछे लगा हुआ था. परिवार के बाकी सदस्य खाली बैठे क्या करते सो वे सभी अनुमान नामक शब्द का सदुपयोग करने लगे. करीब आधा घंटा हो चुका था. सेकंड की सुई मेरी नज़रों से तंग आ चुकी थी और परिवार के सदस्यों के सारे अनुमान अनुमानों की नदी में डुबकी लगाकर डूबकर खत्म हो चुके थे.
अचानक छोटी बहन ने अपने कमरे का दरवाजा खोला. अब हम उसके मुँह खुलने और उसकी योजना सुनने का इंतज़ार करने लगे. उसने थाली में रखी आटे की गुड़िया हमें दिखाई तो हमें बहुत गुस्सा आया, कि इतनी देर से कमरे में आटे का प्रयोग करके मूर्तिकला में समय नष्ट किया जा रहा था. वह हमारा गुस्सा भाँप गई और उसने अधिक समय न गँवाते हुए अपना आईडिया बताया. उसने बताया कि जैसे लोहा लोहे को काटता है, वैसे ही टोटके को टोटका ही खत्म करेगा.
अब उसने उस आटे की गुड़िया के सिर में बाल लगाये, उसके माथे पर सिंदूर लगाया, उसके गले में चने की दाल व हरी मिर्च से बनी हुई माला पहनाई, उसके पूरे शरीर में सुइयाँ घुसाईं और उसके साथ कटा नींबू रखकर घर के पिछले दरवाजे के पास टोटकेवाली आंटी के पति की खड़ी हुई मोटर साइकिल के ऊपर चुपचाप जाकर रख दिया.
अब हम उस गुड़िया को देखकर उत्पन्न होनेवाली प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगे. दोपहर हुई, दोपहर बीती और शाम हुई. हमारे दिल में धुकधुकी सी हो रही थी. अचानक ब्लॉक में चीख-पुकार आरम्भ हो गई. उस चीख-पुकार में हम कुछ आवाजें ही सुन पाए.
“देखो यह पक्का किसी तांत्रिक ने टोटका किया है.”
“अरे इस गुड़िया के सिर में घुसी सुइयाँ तो देखो. ये सुइयाँ इसके सिर में इसलिए घुसाई गईं हैं जिससे कि जिस पर भी टोटका हो उसके सिर में भयंकर दर्द उठ जाए और दिमाग सुन्न हो जाए.”
“और इसके गले में लटकी चने की दाल और हरी मिर्च की माला यह बताने के लिए काफी है, कि इस टोटके को करनेवाला कोई अघोरी तांत्रिक है.”
“अरी बहन इस गुड़िया के बाल हो न हो शमशान घाट में जली हुई किसी लाश के सिर से उखाड़े हुए हैं.”
“बुरा हो टोटका करनेवाले का. अभी हॉस्पिटल से फोन आया है कि अभी कुछ देर पहले ही मेरे पति का एक कार से एक्सीडेंट हो गया है और उनकी दायीं टांग टूट गई है.”
और फिर गालियों की ऐसी बौछार आरंभ हुई कि हम सबको कान में रुई ठूसनी पड़ी. इसके बाद सभी महिलाओं ने मिलकर ऊपर से नीचे तक पूरे ब्लाक को अच्छी तरह पानी से धोया और धूप-अगरबत्ती लगाई. टोटके में सिद्धहस्त महिलाएँ भी छोटी बहन के टोटके से ऐसी भयभीत हुईं कि उन्होंने टोटका करने से बिलकुल संन्यास ले लिया.
इस टोटके का एक लाभ भी हुआ. हमारे ब्लाक में रहनेवाले एक आलसी और कामचोर लड़के ने अगले दिन अपनी माँ से कहा कि उसका हमेशा बंद रहनेवाला दिमाग अचानक ही काम करने लगा है और अब वह नाकारा नहीं बैठ सकता तथा नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ा होगा. उस लड़के की माँ के हृदय में अचानक टोटका करनेवाले के प्रति आदरभाव उत्पन्न हो गया. अब ये और बात थी कि पिछली शाम को टोटके करनेवाले को सबसे अधिक गरियाया उन्होंने ही था.
अब कॉलोनी इस बात से संतुष्ट हैं कि कॉलोनी में अब कोई टोटका नहीं होता है और हमारा परिवार कॉलोनी वालों की ओर से मन ही मन परिवार की छुटकी सदस्या को टोटकेबाजी से मुक्ति दिलाने के लिए अक्सर धन्यवाद देता रहता है.

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 
चित्र:गूगल से साभार 

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