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बुधवार, 24 जून 2026

रहस्य और रोमांच से भरपूर उपन्यास कालदंड


    कालदंड उपन्यास युवा लेखक लोकेश कौशिक की पहली पुस्तक है। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस उपन्यास में लोकेश पाठकों को आरंभ से अंत से बांधे रहते हैं। उपन्यास में लेखक ने प्रत्येक वस्तु, स्थान, व्यक्ति के व्यक्तित्व व मानसिक स्थितियों का जो गहराई से वर्णन किया है वो लेखक के लेखकीय कौशल का कमाल है।

उपन्यास की कहानी बलि के नाम पर किसी तांत्रिक द्वारा दो बच्चों की निर्मम हत्या से आरंभ होती है। उपन्यास के मुख्य पात्र विशु के माध्यम से उपन्यास के कथ्य को गढ़ा गया है। इसमें दर्शायी गयी कथा के माध्यम से लेखक ने समाज में फैले अंधविश्वास व जादू, टोना-टोटका जैसी कुप्रथाओं पर अपनी लेखनी के माध्यम से प्रहार किया है। लेखक ने ये दर्शाने का प्रयास किया है कि बलि के नाम पर किसी की हत्या कर अपने इष्ट से कुछ प्राप्त करने की लालसा करना मूर्खता और भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

उपन्यास में जहाँ कुछेक स्थान पर सारंग व सावित्री के प्रेम दृश्यों की उपस्थिति पाठकों के हृदयों को कोमलता से छूती हुई उनमें प्रेम के अनेक कमल खिला देती है, वहीँ माखन, भूरा व उसके साथियों द्वारा क्रूरतापूर्वक सारंग के कबीले के पुरुषों, महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गों का निर्ममता से किया जाने वाला संहार पाठकों को मन-मस्तिष्क को उद्वेलित कर देता है।

कुल मिला कर ‘कालदंड’ पठनीय उपन्यास है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकेश कौशिक में हिन्दी लेखन जगत में अच्छी ओपनिंग की है और मुझे आशा के साथ पूर्ण विश्वास है कि लोकेश कौशिक हिन्दी लेखन जगत में लंबी पारी खेलेंगे। मेरी ओर से उन्हें लेखन में स्वर्णिम भविष्य हेतु हार्दिक शुभकामनाएं एवं शुभाशीष!

सुमित प्रताप सिंह 


सोमवार, 19 अगस्त 2024

नॉस्टैल्जिया का गुलदस्ता है सिक्स ऑफ कप्स


    युवा कवयित्री सुश्री नेहा बंसल के हाल ही में प्रकाशित दूसरे अंग्रेजी कविता संग्रह 'सिक्स ऑफ कप्स' को पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले कवयित्री साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी कविताओं के संग्रह 'हर स्टोरी' के माध्यम से पाठकों के लिए उन नारियों की कहानियाँ लेकर आयीं थीं, जिनके बारे में समाज ने लिखना उचित नहीं समझा और यदि लिखा भी है तो उसे नगण्य की श्रेणी में ही रखा जाएगा। दूसरे कविता संग्रह में उन्होंने अपनी भूली-बिसरी यादों को स्थान दिया है। इस पुस्तक को कवयित्री ने अपने बाबा और अपने आईपीएस अधिकारी पति श्री दीपक यादव को समर्पित किया है। पुस्तक की भूमिका में कवयित्री ने इस कविता संग्रह को पाठकों के बीच लाने के उद्देश्य को बताने के लिए पत्रकार डौग लार्सन के कथन का उल्लेख किया है कि नॉस्टैल्जिया एक फाइल है जो अच्छे पुराने दिनों की खुरदरी धारों को हटा देती है। कवयित्री पुस्तक का शीर्षक सिक्स ऑफ कप्स रखने के प्रति पाठकों की जिज्ञासा का समाधान करते हुए बतातीं है, कि इसका शीर्षक एक छोटे आर्काना टैरो कार्ड के नाम पर रखा गया है।  भूमिका के उपरांत दो पृष्ठों में कवयित्री ने इस कविता संग्रह के प्रकाशित होने तक सहयोगी रहे मित्रो, बंधुओं व सहकर्मियों का आभार प्रकट किया है।

    इस कविता संग्रह में कुल 49 कविताएं एवं 3 हाइकु संकलित हैं। कवयित्री ने जहां इस पुस्तक की पहली कविता अपने दादा जी पर लिखी है, वहीं उनकी दूसरी कविता पुरानी दिल्ली में स्थित नानी जी के घर पर केंद्रित है, जो कि उनके अपने बड़े-बुजुर्गों के प्रेम व आदर तथा अपनी जड़ों से जुड़ाव को दर्शाती है। कवयित्री का अपने दादा जी से लगाव का ही परिणाम है कि उनकी उपस्थिति इस कविता संग्रह की कई कविताओं में दर्ज हुई है।  कवयित्री ने  विभिन्न त्योहारों, दूरदर्शन, जीवन में पहली बार खाए डोसे, गुड़िया, पिकनिक, भौतिकी विषय, प्रेम गीत, कलकत्ता में साड़ी खरीदने, बचपन की रामलीला, चंडीगढ़ के रॉक गार्डन, मूंग दाल के हलवे, घर के माली शिवचरण, सांची स्तूप, जन्मदिन की पार्टी, अंधविश्वास, पुदीना की चटनी, कागज की नाव इत्यादि विभिन्न विषयों पर बहुत सुंदर तरीके से अपनी कलम चलाई है। इस कविता संग्रह की कविताओं में कवयित्री द्वारा बीते हुए दिनों को फिर से जीवंत करने का प्रयास किया गया है। संवेदना, भावुकता एवं मार्मिकता से परिपूर्ण कविताएं हृदय को गहराई से छू लेती हैं। इस कविता संग्रह की माय ग्रैंड पा, नानी हाउस इन देल्ही-6, सिक्स ऑफ कप्स और महाशिवरात्रि इत्यादि कविताएं तो बहुत ही प्रभावशाली बन पड़ी हैं। इस कविता संग्रह की अंतिम कविता वीकेंड इन कार निकोबार को पढ़कर समाप्त करने के पश्चात ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पाठक को कवयित्री के बचपन से युवावस्था के सफर में साथ यात्रा करते हुए शरारत से भरे, मनोरंजक, भावपूर्ण, उत्साह से भरपूर और संघर्षमय जीवन से साक्षात्कार करने का अवसर प्राप्त हुआ हो। दूसरे शब्दों में कहें तो सिक्स ऑफ कप्स नॉस्टैल्जिया का गुलदस्ता है।

    प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी कवयित्री का संवेदना, भावुकता और समाज के प्रति कर्तव्य की भावना दर्शाता लेखन साहित्य जगत के लिए सुखद अनुभूति का आभास करवाता है। आशा है कि अंग्रेजी काव्य जगत कवयित्री की पिछली पुस्तक हर स्टोरी की भांति उनकी दूसरी पुस्तक सिक्स ऑफ कप्स को भी प्रसन्नता व उत्साह के साथ स्वीकार करेगा। मेरी ओर से सिक्स ऑफ कप्स की लेखिका सुश्री नेहा बंसल को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!

पुस्तक - सिक्स ऑफ कप्स

लेखिका - नेहा बंसल, नई दिल्ली

प्रकाशक - हवाकाल प्रकाशन, दिल्ली

पृष्ठ - 107

मूल्य - 400 रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

रविवार, 17 जुलाई 2022

रूपाली सक्सेना के लेखन की संदूकची

      रूपाली सक्सेना का उनकी प्रथम पुस्तक 'स्नेह की संदूकची' के साथ हिंदी लेखन जगत में आगमन हुआ है। किसी भी लेखक की जब प्रथम कृति आती है तो उसके हृदय में इस बात की आशंका रहती है कि न जाने लेखक व पाठक जन की स्वीकृति उसको मिल पाएगी अथवा नहीं। संभवतः कुछ ऐसी ही आशंका रूपाली सक्सेना के हृदय में भी हो रही होगी। 58 कविताओं के इस कविता संग्रह का आरंभ लेखिका ने गणेश स्तुति रचना से किया है। इसके उन्होंने अपने आसपास उपस्थित प्रत्येक विषय पर अपनी कलम चलाने का प्रयास किया है।  

इस कविता संग्रह की शीर्षक कविता 'स्नेह की संदूकची' वास्तव में शीर्षक कविता बनने के योग्य है। इस कविता में उपस्थित भाव पक्ष हृदय स्पर्शी है एवं ये कविता संवेदना से ओतप्रोत है। शीर्षक कविता के अतिरिक्त इस कविता संग्रह में संग्रहित राजपूत रानी के अमर त्याग पर केंद्रित उनकी हाड़ी रानी रचना इस बात का आभास करवाती है, कि ऐतिहासिक पात्रों पर उनकी कलम कुछ और लोकप्रिय रचनाओं का सृजन कर सकती है। इन दोनों रचनाओं के अतिरिक्त इश्क़, मेरा बेटा बड़ा हो गया है, मेरी ख्वाहिशें, विक्षिप्त, पर्यावरण हमारा है, गर तुम कान्हा होते, स्तनपान इत्यादि रचनाओं के माध्यम से रूपाली सक्सेना लेखन जगत के मन ये आस जगाती हैं, कि वह भविष्य में अच्छी व सार्थक रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य सृजन में अपना सक्रिय योगदान देंगीं। 

पाठकजन रूपाली सक्सेना की इस कृति की कुछ रचनाओं की कुछेक भाषायी त्रुटियों व सशक्तता के थोड़े-बहुत अभाव को ये सोच कर अनदेखा कर सकते हैं, कि यह उनका प्रथम साहित्यिक प्रयास है और लेखन की इस लंबी दौड़ को पूरा करने के लिए अभी उन्हें बहुत लंबी यात्रा  करनी है। जिस दिन रूपाली सक्सेना इस यात्रा को पूरा करेंगीं उस दिन उनके लेखन की संदूकची में कोई न कोई ऐसी साहित्यिक रचना होगी जो उन्हें अमरत्व प्रदान कर देगी।

पुस्तक - स्नेह की संदूकची

लेखिका - रूपाली सक्सेना

प्रकाशक - संदर्भ प्रकाशन, भोपाल (म.प्र.)

पृष्ठ - 104

मूल्य - 250/- रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

पुस्तक समीक्षा : सहिष्णुता की खोज

       इन दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता की खोज तो पुरातन काल से होती चली आ रही है। सुमित ने भी इस खोज को ऐसे समय जारी रखा जब देश में असहिष्णुता का माहौल निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा था। सुमित ने अपने अभिकथन में लिखा है कि नफे और जिले के काल्पनिक पात्र के माध्यम से खोज जारी रखी। व्यंग्य में ऐसे कथोपकथन वाले पात्रों के माध्यम से चोट करने का अच्छा प्रयास है ।
युवा व्यंग्यकार सुमित ने आधुनिक घटनाओं का समावेश अपने संग्रह में किया है चाहे वह साइबर युग के राजा, एक पत्र साक्षी और सिंधू के नाम, एक पत्र माइकल फेल्प्स के नाम, वायरल होने की चाहत या एक पत्र सन्नी लियाॅन के नाम जैसे एक से बढ़कर एक शीर्षकों के साथ घटित तथ्यों पर कटाक्ष किया है। जिसमें एक पत्र आमिर खान के नाम से तत्समय की परिस्थितियों पर बेबाक व्यंग्य किया है। असहिष्णुता की बात कहकर आमिर खान ने ही विवाद को जन्म दिया था और उनके इस विवाद को लेखक ने बड़ी ही संजीदगी से पकड़ लिया। इसके अतिरिक्त क्षणिक लाभ लेनेवाले बुद्धिजीवियों द्वारा लौटाए जा रहे सम्मान ढकोसले को भी उन्होंने सार्थक रूप से फोकस किया है।
इस व्यंग्य संग्रह में सामाजिक और ऐतिहासिक पात्रों का भी संयोजन किया है कंस का प्रतिशोध, आरक्षण महाराज, सच्ची श्रद्धांजलि, फूफा बनाने की परम्परा अच्छे व्यंग्यों में माने जा सकते है । एक बात और सुमित पक्के पुलिसवाले हैं इसीलिए समाज में घटित होनेवाली किसी भी घटना को उसी निगाह से देखकर वे व्यंग्य के सांचे में ढाल लेते हैं। यह उनका सराहनीय कौशल है। ठीक उसी प्रकार पुलिस समाज की पहरेदार होती है और व्यंग्यकार भी समाज का पहरेदार होता है । सुमित दोनों में सामंजस्य या यूँ कहें कि सहिष्णुता का भाव बनाकर चल रहे हैं। थूकाचाटी, गंदी बात, काश! हम भी सम्मान लौटा पाते, अगले जनम में मोहे ठुल्ला ही कीजो, एक पत्र रायते के नाम, नौकरी बचाव यंत्र, एनकांउटर, भैया आँखों से घर तक छोड़के आओगे आदि मुकम्मल व्यंग्य है। सुमित महानगरीय सभ्यता में विगलित होती परम्पराओं एवं सामाजिक सरोकारों को अपनी पैनी निगाह से पकडने का सार्थक प्रयास कऱ रहे है। जहाँ व्यंग्य में चारित्रिक एवं परिवेश गत परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लक्ष्य पर चोट की है, वहाँ ऐसे पात्रों को सिवाय मन-मसोसकर रहने के अतिरिक्त और विचार करने के अलावा कुछ नहीं बचता, तभी तो व्यंग्यकार को समाज-सुधारक भी कहा गया है।
पुस्तक : सहिष्णुता की खोज
लेखक: सुमित प्रताप सिंह
समीक्षक - रमाकान्त ताम्रकार, जबलपुर, म.प्र.
प्रकाशक: सी.पी. हाउस, रामा विहार, दिल्ली
पृष्ठ : 119
मूल्य : 160/-


बुधवार, 11 मई 2016

पुस्तक समीक्षा : सावधान रहें अब पुलिस मंच पर है


 सुमित मानव मूल्यों के सप्तरंगी कवि हैं। उनके मूल्यों के विषय लोक व्यवहार के हैं, मानवीय प्रवृत्तियों के हैं, लोकाचार के हैं, भारतीय परिवेश के है। उनका कविता संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों, विषमताओं एवं विगलती होती परिस्थितियों पर प्रहार कर उन्हें रेखांकित करता है । कविता संग्रह भावनाओं और यथार्थ का समिश्रण है जिसकी कवितायें संवेदनाओं में बहकर प्रस्फुटित हो रही हैं। सुमित समय सचेत हैं। उन्होंने छोटी-छोटी बातों पर दृष्टि डालकर और उन्हें सहज संवेदनाओं में पिरोकर चिंतन के लिए कविता संग्रह में प्रस्तुत किया है ।
सुमित ने अपने इस काव्य संग्रह में आम आदमी की परेशानियों को समाज के साथ-साथ पुलिस विभाग से जोड़कर मुखरित किया प्रतीत होता है लेकिन हकीकत में बात यह है कि पुलिस भी इंसान होती है, पर लोग उसे पुलिस ही मानते हैं इंसान नहीं और समय आने पर उससे जनता दोयम दर्जे का व्यवहार करती है । एक सिपाही की कहानीपुराना सिपाहीमें ही देखिए । सुमित के अभिव्यक्त-कथन में यह पीड़ा उभरकर सामने आती है । सुमित के स्वर में जो उच्छवास प्रकट होता है वह सृजनशीलता की अकुलाहट-व्याकुलता है । वे एक स्वस्थ्य परिवेश को देखना चाहते हैं।
उनकी शीर्षक कविता सावधान! पुलिस मंच पर हैविशुद्ध व्यंग्य कविता है, जो मंचीय लोगों द्वारा किए जा रहे कारनामों पर खुलकर प्रहार कर उन्हें आईना दिखा रही है। विनती सुन लो भगवान’ ’तुम नागनाथ हम साँपनाथकविताओं में व्यंग्य की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि व्यंग्य के दर्शन भी कविता संग्रह में हो रहे हैं। एक बात और सुमित के लेखन हेतु कहना चाहूँगा कि वे सहजता से गंभीर बात कह जाते हैं और हमें चिंतन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है यह उनकी लेखनी की सार्थकता है। ऐसा ही ‘गुलाम’, ‘भेड़ों की चिंता, ‘थू’ आओ जलाएं रावणपन आदि कविताओं में परिलक्षित हो रहा है।
जहाँ मंच पर कवियों के गिरते स्तर को उन्होंने अपनी लेखनी में सम्मिलित किया है तो वहीं वय उमर के चलतू प्रेम तू लड़की है झकास, अपुन लड़का बिंदास’ ’तेरी चाहत में बना देवदासआदि समय के प्रभाव की रचना है, लेकिन बकरे का इंतजारऔर अच्छा है बकरापन‘धंधेवाली’ ’वो बच्ची‘खूनी दरवाजालेखक के चिन्तन की पूर्ण परिपक्व रचनायें कहीं जा सकती हैं, जिनके द्वारा वे समाज पर सटीक प्रहार करते हुए गंभीर चिन्तन के लिए प्रेरित करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। इन कविताओं को राष्ट्रीय फलक पर रखा जा सकता है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों से मनाएँ पन्द्रह अगस्त’ ‘बन जा भारत का किसानमें भी रूबरू होता है । आज लोगों ने गिरगिट को भी मात कर दिया है इसीलिए तो ऐसे छली और प्रपंची लोगों का जमावड़ा समाज में है जो अपने स्वार्थ के लिए समाज में भ्रम फैला रहे हैं। ऐसे लोगों एव ऐसी परिस्थितियों को केन्द्र कें रखकर सुमित का रचनाकर्म सार्थक उॅचाईयों को छू रहा है। भाषा भी स्थानीय, सहज और आम बोलचाल की है इसीलिए पाठक इस कविता संग्रह को सहजता से आत्मसात कर सकेंगे।

पुस्तक - सावधान ! पुलिस मंच पर है
लेखक - सुमित प्रताप सिंहनई दिल्ली
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपए
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकारजबलपुर, मध्य प्रदेश  

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा : सावधान! अब पुलिस मंच पर भी है


‘सावधान! पुलिस मंच पर है’  यह सुनकर पाठकगण डरें नहीं, क्योंकि यह मात्र एक पुस्तक का नाम है,  जो कि व्यंग्य कविताओं का संग्रह है और इसके रचनाकार हैं युवा कवि और लेखक सुमित प्रताप सिंह। इस कविता संग्रह में कटाक्ष करती हुईं  कुछ कविताएँ खड़ी बोली हिन्दी की हैं और कुछ कविताएँ  ग्रामीण भाषा के लबादे में हैं।   इस संग्रह में संकलित  व्यंग्य कविताएँ काफी रोचक और सजीव हैं कि पढ़ते हुए मानस पटल पर एक छायाचित्र खींचने में सफल होती हैं। अधिकतर कविताएँ सामाजिक विषयों पर आधारित है। मुसीबतों के आने पर पर हमारा समाज पुलिस पर ही आश्रित होता है। कवि के अनुसार पुलिस की भूमिका और कर्तव्य इस कदर बढ़ चुके हैं, कि पुलिस को अब मंचों को भी सम्भालना होगाऔर उसकी मर्यादा की रक्षा के लिए तत्पर रहना पड़ेगा। इस संग्रह की पहली कविता लोक सभा चुनाव के दौरान लिखी गयी थी। कवि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश के अच्छे भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ इस कविता को लिखा है। हालांकि पहली कविता से मोदी विरोधी थोड़े और नाराज हो सकते हैं, क्योंकि उनकी नाराजगी तभी से आरंभ हो चुकी होगी जब उन्होंने पुस्तक का समर्पण पृष्ठ खोलकर देखा होगा, क्योंकि कवि ने अपने इस कविता संग्रह को देश के प्रधानसेवक श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को सादर समर्पित किया है।
           कविता संग्रह की दूसरी कविता "कवि घंटाल" आज के लेखक समुदाय पर करारा प्रहार करती है। आज का लेखक क्या सोचता है उसकी मानसिकता कैसी है? वह खुद में स्वयंभू है और सम्मान पाने के लिये किस तरह से सांठ-गांठ करता है इस पर एक दृष्टि कविता की निम्न पंक्तियों के माध्यम से डालिएगा : -
"हमने लिख लईं कविता चार
अब करनो है इनको प्रचार
दुय-चार हमें सम्मान दिलाय देओ
किनके पांव छूने बताय देओ
मालिश करनी तो बऊ करएँ
पदमश्री तक हम नहीं टरएँ
आओ एक- दूजे की पीठ खुजाएँ
मिल-जुल के आगे बढ़ जाएँ।
यकीनन उपरोक्त पंक्तियाँ आज के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी सच्चाई है जिसको समाज जानते हुए भी स्वीकार करने से परहेज करता है। इस संग्रह की यह कविता मुझे बेहद पसंद आयी। चूंकि कवि पुलिस विभाग में कार्यरत है तो इसकी रचनाओं में इसका असर भी दिखता है। कवि समाज और पुलिस दोनों की भूमिकाओं को तीसरी नजर से देखता और कम शब्दों में तीखे बाण तानता हुआ दिखा। कवि का पुलिसिया अनुभव भी इसकी कविताओं जगह बनाने में कामयाबी पाता है। जहाँ ये कविता के माध्यम से जेबकतरों से डरवाने के साथ-साथ सतर्क भी करता है। कवि कटाक्ष करने हेतु कहीं देवदास बन बैठा है तो कहीं बिंदास लड़का। असहिष्णुता की आड़ में राजनीति करने वाले साहित्यकार भी कवि की व्यंग्य दृष्टि  से बच नहीं पाए। सम्मान लौटाने की उत्कंठा इतनी कि उसके मन में विचार आता है : -
"हम अपुरस्कृत लोग
दुख व पीड़ा से
उदास और बेचैन हो
अक्सर छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।
इन पंक्तियों को पढ़कर कवि की मानसिक छटपटाहट को महसूस कर सकता है कि वह क्या सोचता है? कविताओं के अगले क्रम में ही एक कविता शीर्षक है "विनती सुन लो भगवान" जो कि देश में मँहगाई की समस्या पर लिखी गई है। टमाटर और प्याज के बढ़ते दामों से कवि इतना प्रभावित है कि वह अगले जनम खुद ही टमाटर और प्याज बनने की प्रार्थना भगवान से कर बैठता है।
           संग्रह की एक कविता " होली तो हो ली" समाज व हमारे तीज-त्यौहारों पर  सोशल मीडिया किस तरह से काबिज़ हो चुका है इस पर कवि ने इस कविता के द्वारा जोरदार व्यंग्य कसा है। यह एक ऐसा कविता संग्रह हैं जिसमें पाठक को हर क्षेत्र व विषय पर हँसातीं और गुदगुदातीं रचनाएँ मौजूद हैं। चूंकि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से बड़े से बड़े गम्भीर मुद्दों पर चोटिल प्रहार किया जाता है । कवि ने समाज में व्याप्त छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ी संजीदगी से उठाया  है और उठाकर आराम -आराम से धो-धो कर पछाड़ा है। अलबत्ता  इस संग्रह को मैं व्यंग्य कविताओं का मिक्स वेजिटेबल नाम देती हूँ जो थोड़ा मीठा-नमकीन और थोड़ा तीखा है। जिसको पढ़कर आपको भी उतना ही आनंद आयेगा जितना कि मुझे आया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, कुरीतियों व विद्रूपता को इस कविता संग्रह में इतने अच्छे ढंग से रखा गया है कि पाठकगण का ध्यान संग्रह पढ़ने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार- विमर्श के लिए बाध्य करेगा है। सुमित प्रताप सिंह को इस कविता संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ!
पुस्तक -  सावधान!पुलिस मंच पर है।
लेखक-   सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य -  200 रुपए
समीक्षक - शशि पाण्डेय, नई दिल्ली।
इस पुस्तक को आप निम्न लिंक पर क्लिक करके Online भी मँगवा सकते हैं : -

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर हैजितना अनोखा इस पुस्तक का नाम है, उतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहीं, अपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूं, जब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंग, मुसीबतो की रेनिंगप्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया है, उसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर हैको पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविता, कहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर हैमें भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया है, जिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी है, जो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती है, साथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा है, लेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर हैके जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए
तू लड़की झकास, अपुन लड़का बिंदास,
तेरी आंखें कुछ खास, अपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोली, तुझे देख नीयत डोली,
मेरे दिल की खाली खोली, आ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ा, तेरे वेट में कबसे खड़ा,
तेरे वास्ते सबसे लड़ा, तुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, संभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर हो, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकी, अपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापनकविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,
मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,
आ आ मुझे काट,
जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,
तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,
इलाके में हो गया है दंगा,
सेना ने कस लिया शिंकजा,
मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,
यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,
उसने अपने बचपन के यार,
सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,
सूरज के बेटे ने आकर,
गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,
हम इन इंसानों से अच्छे हैं,
इनसे कई गुना सच्चे हैं,
कभी कोई बकरा या मुर्गा,
किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटता, लूटता या जलाता नहीं,
आज मुझे हुआ यह अहसास है,
मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैं, लेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपननामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय है, क्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?
लालाजी कुछ कहिए,
सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,
इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,
जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?
मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,
जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार है, जो हमारा मनोरंजन तो करती है, साथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी है, जो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशी, रोहिणी, दिल्ली।


सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई पुस्तक


     सुमित प्रताप सिंह की नवप्रकाशित पुस्तक 'सावधान! पुलिस मंच पर है’ पढ़ी जा रही है। हाथ में आते ही यह कविता संग्रह समृद्ध प्रस्तुति का अहसास कराता है। हिन्दी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित इस कविता माला का आवरण पृष्ठ एकदम आकर्षित करता है जिसकी सज्जा एवं चित्रांकन लाजवाब हैं। प्रभावी मुद्रण की यह पुस्तक 47 कविताओं का उपस्थिति स्थल है। रचनाएं सहजस्वाभाविक व जन जीवन से जुड़ी होने के कारण पाठक को अपनेपन का अहसास कराती हैं। पढ़ते पढ़ते कई जगह यादों के स्वप्नलोक की भी यात्रा हो जाती है। जहाँ पृष्ठों की रचना 'अच्छा है बकरापनद्वारा मनुष्य की 'पशुवृतिकी पतन पराकाष्ठा और जानवरों की 'मानवताकी समृद्ध महानता को बड़े ही सहज भाव से उकेरा गया है वहीं मात्र 19 शब्दों की एक रचना 'काशसम्मान वापसी पाखण्ड पर एक करारा तमाचा है। सामान्य जनजीवन का हिस्सा बन चुके धरना प्रदर्शन व दिल्ली की पेयजल समस्या जैसे विषय जहाँ ख़ूबसूरती से पंक्तिबद्ध किए गए हैं वहीं 'परिवर्तननाम की कविता के माध्यम से बदलते सामाजिक मूल्यों पर कटाक्ष किया गया है। यहाँ कविताओं में एक तरफ सर्वजन हिताय - सर्व जन सुखाय की मनोभावना व्यक्त है तो दूसरी ओर बंजारे मन की आवारगी दृष्टव्य है। पुस्तक शीर्षक वाली कविता पुलिस कार्य प्रणाली का प्रथम दृष्टया वर्णन करती है। एक अन्य रचना द्वारा हाल के ज्वलंत विषय प्याज - टमाटर की महंगाई को बड़े सहज भाव से चिन्हित किया गया है। 
जन सुलभ भाषा में साधारण जनजीवन से जुड़ी ये रचनाएं जन मानस का जीवन वृतांत सुनाती हुई स्वर लहरी हैं। 
कवि ने इस पुस्तक के माध्यम से समाज के प्रति निज उत्तरदायित्व का निर्वहन और कुरीति निवारण का आह्वान किया है। 
सुमित प्रताप सिंह को बहुत बहुत बधाई!

- श्री अनिल समोता 
     इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस
      द्वारका, नई दिल्ली-75 

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मंगलवार, 3 जून 2014

Book Review: Vyangyaste is one of the most inspirational compositions of writing


  A writer is a mirror of the society who reflects the truth, elevates a creative society, and leads the society in the right directions as a valuable, vital, and highly responsible person. A writer with the same character will be a leader of the mind, and can shape a better society"

    Today I am pleased to write my view and critics of famous book “Vyangastey” authored by Delhi Anthem creator Sumit Pratap Singh. Sumit Pratap Singh a worth name, a fantastic writer who joined the Delhi Police Service in his tough time and after that he became a writer. He has written several books with Damini Anthem and Hariyana Anthem songs. His Offbeat Story has a stunning performance to the writer what exactly he is. I like his writing style which is bold, brave, crispy and engaging. There is never a boring moment in the book and it’s full with hilarious anecdotes. I would recommend it to everyone. Book reviews can be an indispensable asset to writer. Well I will rename this book under category of Creative-Fiction.
   
     It is amusing to see the hard work of a writer with his creative ideology. The creation of such things plays a significant role in the social welfare. As a book meant to amuse and instruct the significant issues in society and certainly has the edge on most of what passes for advice right now. However, I do have issues with sycophants, corruptions, criminals, idiotic morons of identity politics and opportunists in the midst of the crowd. Therefore in this context, it was important for a writer to enlighten the issues of the system to offer fair and equitable opportunities to weed out the unwanted elements from the healthy democracy.
  

     And in chapters “An addressing letter to the Ravan, Adhunik Neta, Obama, PradhanMantri, Atanki aur Kisan” most current analysis and literature, including social ills, the writer tries his best way to invoke the Govt. nefarious actions in the society. He addresses the real problems that often occur. Author also provokes the actual fact that there should not be any partiality for society prejudicially and without hard work there is no way to achieve success.

However, it’s one of the most inspirational compositions of writing I've read. Expectations are very high. It’s not a small achievement. I would like to thank Mr. Sumit Ji whatever he contributes for the country as a writer. It would be my pleasure if possible I do translate this creation from Hindi to English. Finally I would conclude a pious line from unknown-

“We seek a Life inside the stories but factually Life is itself a Story”

Yogesh R.G. Singh 
Ex- Project Scientst, 
National Aerospace Laboratories,
India

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