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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

बेचारे ठाकुर साहब


     रात को ठाकुर साहब के खेत पर माँस और दारू की पार्टी जोरों से चल रही थी। गाँव के सारे पियक्कड़ ठाकुर साहब के सामने जमीन पर बैठकर दारू के पैग लगा रहे थे और ठाकुर साहब सीना चौड़ा किए हुए कुर्सी को सिंहासन समझकर अपने पुरखों के सम्मान में पलीता लगा उस पर बैठे हुए दारू के पैग लेते हुए घमंड में चूर-चूर हो मुस्कुरा रहे थे। 

पार्टी खत्म हुई और सारे पियक्कड़ों ने वहाँ से अपने-अपने घरों को रवाना होते हुए कहा, "ठाकुर साहब के राज में हम सबकी मौज ही मौज है।"

ठाकुर साहब ने अपनी एक आँख खोल अपने सीने को थोड़ा अकड़ा कर  घमंड से चूर होते हुए उन्हें देखा और फिर कुर्सी पर ही नशे से मूर्छित हो गए।

ऐसे ही कुछ दिनों तक पार्टियों का व ठाकुर साहब की जयकारों का दौर चलता रहा और बेचारे ठाकुर साहब के खेत-खलिहान और घर बिक गए। 

अब ठाकुर साहब के जयकारे लगाने वालों ने एक दूसरे ठाकुर साहब खोज लिए हैं। अब उन ठाकुर साहब के खेत-खलिहान और घर अपने बिकने के उचित समय का इंतज़ार कर रहे हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 5 मई 2018

लघुकथा - नेक बदला


    जिले ने नफे से पूछा - नफे उस दिन फतेह ने तेरी जो बेइज्जती की थी, उसका तूने बदला लिया कि नहीं?
इससे पहले कि नफे कुछ कहता सूबे बोल पड़ा - भाई इसने तो ऐसा बदला लिया है कि फतेह उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा।
जिले ने हैरानी से पूछा - ऐसा कैसा बदला ले लिया, जो भुलाया न जा सके?
सूबे मुस्कुराते हुए बोला - नफे से ही पूछ ले न।
जिले - भाई नफे आखिर क्या बदला लिया तूने?
नफे मंद-मंद मुस्कुराया - ये तो तू सूबे से ही पूछ।
जिले बेचैन हो बोला - अरे भाइयो काहे को तड़पा रहे हो? सीधे-सीधे बता क्यों नहीं देते कि आखिर हुआ क्या था?
सूबे ने बताया - फतेह नफे से जिस दिन लड़ा था, उसके अगले दिन ही उसका सड़क पर एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट में फतेह के शरीर से काफी खून बह गया था और जब उसे खून की जरूरत पड़ी तो हमेशा उसके साथ रहने वाले उसके सारे संगी-साथी कोई न कोई बहाना कर उसे पीठ दिखा गए।
सूबे की बेचैनी कुछ और बढ़ गई। उसने बेचैन हो पूछा - अच्छा फिर क्या हुआ?
सूबे बोला - फिर क्या होना था। जब ये बात अपने नफे को पता चली तो ये झट से हॉस्पिटल जा पहुँचा और फतेह के लिए रक्तदान कर डाला। 
सूबे ने आगे पूछा - जब फतेह को ये पता चला तो उसने क्या किया?
सूबे बोला - करना क्या था। वह अपने दोनों हाथ जोड़कर रोते हुए नफे से अपने कर्मों के लिए माफी माँगने लगा। उसके ऐसा करने पर नफे ने उससे कहा कि ये नफे का बदला लेने का तरीका है। अब फतेह की रगों में फतेह के संग-संग नफे का खून भी दौड़ा करेगा।
जिले नफे को अपने सीने से लगाते हुए बोला - मेरे यार बहुत ही नेक बदला लिया है तूने।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

रविवार, 17 सितंबर 2017

लघुकथा : कागौर


   श्राद्धों में कौओं को कागौर खिलाने के बाद भेदा कमरे में बने मंदिर के आगे हाथ जोड़कर बोला, "हे भगवान हमाई अम्मा को स्वर्ग में आराम और चैन से रखियो।"
तभी कमरे में टँगी भेदा की अम्मा की तस्वीर फर्श पर आ गिरी।
भेदा ने तस्वीर को ध्यान से देखा तो उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अम्मा उससे कह रही हों, "लला अगर बहू की बातन में न आयकै हमाओ समय से इलाज करवाय देते तो आज तुम्हाये संगें हमऊ कागौर खिलाय रहीं होतीं।"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शनिवार, 2 सितंबर 2017

लघुकथा : बाहरी


  रीबा समुद्र के किनारे बैठा देख रहा था, कि लोग बारी-बारी से गणेश जी की विभिन्न आकर की प्रतिमाएँ लाते और उन्हें समुद्र मैं विसर्जित करके नाचते-गाते हुए वहाँ से अपने-अपने घर की ओर चले जाते।

गरीबा बहुत देर तक यह सब देखता रहा।

फिर अचानक ही वह बुदबुदाया, "ये और हम लोग गणपति बप्पा को बरोबर पूजता है, लेकिन ये महाराष्ट्र का लोग हम उत्तर भारतीयों  को भैया बोलता है और हमसे बहुत बुरा व्यवहार करता है। हम लोग कई पीढ़ी से यहाँ रह रहा है, फिर भी ये लोग हमको बाहरी ही मानता है।"

गरीबा ने बीड़ी जलाकर एक लंबा सा कश खींचा और बड़बड़ाया, "गणपति बप्पा को ये लोग अपना सबसे बड़ा देवता मानता है, तो वो भी तो उत्तर भारत के हिमालय परबत पर जन्म लिया था। फिर तो अपना गणपति बप्पा भी बाहरी हुआ न?"

फिर अचानक गरीबा जोर से खिलखिलाया, "या फिर हो सकता है, कि इन लोगों का हिमालय परबत महाराष्ट्र में ही किसी जगह पर हो?"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 9 जून 2016

लघुकथा : वो सिपाही



   कार में जा रहे प्रेमी युगल में से प्रेमिका ने जब जून की तपती दोपहर में सड़क पर पिकेट पर खड़े सिपाही को देखा तो प्रेमी से कहा, "डार्लिंग देखो तो कितनी गर्मी हो रही है और ये सिपाही इस गर्मी में भी रोड पर खड़ा हुआ है।"
"
डिअर ये अपनी ड्यूटी कर रहा है।" प्रेमी ने समझाया।
प्रेमिका बोली, "वो तो ठीक है। पर यार सोचो तो सही। टेम्परेचर 46° से ऊपर हो रखा है। न तो इसके आसपास पानी का इंतजाम है और न ही ऐसी कोई जगह जहाँ ये कुछ देर के लिए छाँव में जाकर सुस्ता ले। यार ये लोग इतनी गर्मी कैसे सह लेते हैं। अगर ए.सी. न हो तो मैं तो कुछ पलों में गर्मी के मारे मर ही जाऊँ।"
"
स्वीट हार्ट जैसे हम लोग सुविधाओं के आदी हो चुके हैंवैसे ही ये पुलिसवाले दुविधाओं के आदी हो चुके हैं। खैर हम भी कहाँ इन फालतू लोगों के चक्कर में पड़ गए। वैसे एक बताऊँ आज तुम बहुत हॉट लग रही हो।" प्रेमी ने रोमांटिक होते हुए कार को तेजी से उस सिपाही के बगल से निकालते हुए कहा।
प्रेमिका हर बार की तरह शरमाई नहीं, बल्कि हॉट शब्द को सुनते ही उसको अपने सामने पसीने से सनी वर्दी पहनेगर्मी से तमतमाए चेहरे और प्यास से सूख रहे गले संग उस तपती दोपहर में जलती सड़क पर ड्यूटी दे रहा पीछे छूटा वो सिपाही नज़र आने लगा।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह


रविवार, 29 मई 2016

लघुकथा : कोई फायदा नहीं


     ज सिपाही बत्तीलाल बहुत गुस्से में है गुस्से में हो भी क्यों न? जबसे एस.एच.ओ. ने सिपाही पान सिंह को चिट्ठा मुंशी बनाया है, तबसे ही उसने बत्तीलाल का जीना हराम कर रखा है। हालाँकि दोनों ने एक साथ ही पुलिस ट्रेनिंग की थी और दोनों एक ही प्लाटून में थे फिर भी पान सिंह जाने क्यों बत्तीलाल को परेशान करता रहता है। बत्तीलाल ही क्या थाने का पूरा स्टाफ ही उसके गंदे व्यवहार से दुखी हो रखा है। चिटठा मुंशी बनने से पहले तक तो उसका व्यवहार ठीक-ठाक था, लेकिन चिटठा मुंशी बनने के बाद तो वह अपने आपको थाने का दूसरा एस.एच.ओ.  समझने लगा है। दो दिन पहले ही बत्तीलाल की साली की शादी थी लेकिन उसकी छुट्ठी न हो पायी। बेचारे को घरवाली व ससुराल से जाने कितने ताने सुनने पड़े। पता नही पान सिंह ने एस.एच.ओ. के कान में क्या कह दिया कि जैसे ही बत्तीलाल छुट्टी की दरख्वास्त लेकर एस.एच.ओ. के सामने पहुँचा, एस.एच.ओ. ने घुड़की देकर उसे भगा दिया। आज बत्तीलाल ने फैसला कर लिया था, कि वह पान सिंह के खिलाफ कंप्लेंट करके ही रहेगा। उसने एक कंप्लेंट लैटर लिखा और ए..सी.पी. ऑफिस की ओर चल दिया। ए..सी.पी. के सामने पेश होने की हिम्मत उसमें थी नहीं, सो उसने सोचा कि वह ए..सी.पी.  ऑफिस के आगे लगे कंप्लेंट बॉक्स में ही अपना कंप्लेंट लैटर डाल देगा। अचानक कुछ पल के लिए वह ठिठककर रुक जाता है। उसे अपने साथी पान सिंह पर दया आ जाती है कि यदि उसकी नौकरी को कुछ हो गया तो उसके बाल-बच्चों का क्या होगा? फिर वह सोचता है कि अगर उस दुष्ट को अपने किये की सजा नहीं मिली तो वह थाने के स्टाफ  के साथ बुरा बर्ताव करने से बाज नहीं आयेगा। उसे सबक सिखाने के लिए उसकी कंप्लेंट करनी जरुरी है। इतना सोचकर वह कंप्लेंट लैटर को कंप्लेंट बॉक्स में डालने को आगे बढ़ता है। अचानक उसकी नज़र कंप्लेंट बॉक्स पर लिखी एक लाइन पर चली जाती है। भद्दी सी लिखावट में किसी ने पेन से बहुत ही छोटे अक्षरों में कुछ लिख रखा था। शायद पुलिस के किसी जवान ने ही लिखा होगा। बत्तीलाल ध्यान से उस लाइन को पढ़ने की कोशिश करता है। वहाँ लिखा हुआ था कोई फायदा नही। बत्तीलाल ने उस लाइन को गौर से कई बार पढ़ा फिर कंप्लेंट लैटर को अपनी जेब में डाला और भारी क़दमों से वापस थाने की ओर चल दिया। 


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 22 मई 2016

लघुकथा : गधा कौन


भूरा जैसे ही जज के सामने पहुंचा, फफककर रोने लगा जज ने उससे पूछा "क्या बात हुई? क्यों रो रहे हो?"
भूरा बोला,"माई बाप हमने चोरी नही की है। इन पुलिस वालों ने हम पर झूठा इल्जाम लगाकर हमें फंसा दिया है
जज ने कहा, "अच्छा यदि तुमने चोरी नही की तो उस जगह पर देर रात क्या कर रहे थे"
भूरा ने सुबकते हुए बोला, "जज साहब हम दिल्ली में नए-नए आये थे इसलिए रात को रास्ता भटक गये थे। रास्ते में इन पुलिस वालों ने पकड़ कर चोरी के इल्जाम में बंद कर दिया
जज ने कुछ सोच विचार के बाद भूरा से कहा,"बेटा चिंता मत करो मैं तुम्हारे साथ न्याय करूँगा
इतना कहकर जज ने भूरा के वारंट में कुछ लिखा और हस्ताक्षर करके भूरा को पेश करने लाये सिपाही के हवाले करवा दिया। 
कोर्ट के कमरे से निकलकर थोड़ी दूर चलने के बाद भूरा अचानक खिल -खिलाकर हँसने लगा 
उसे पकड़े हुए चल रहे सिपाही ने हैरान होकर उसकी ओर देखा व बोला, "भूरा अभी तो तू इतना रो रहा था और अब अचानक यूँ हँसने लगा क्या बात हैं? कहीं तेरे दिमाग के पुर्जे तो ढीले नही हो गये?" 
भूरा हँसते हुए बोला, "अरे दीवान जी! यह सब करना पड़ता है अगर मैं जज के सामने ये सब ड्रामा नहीं करता तो आज वह मुझे पक्का सजा दे देता लेकिन मेरे इस ड्रामे के कारण शायद वह मुझे बरी कर दे देखा मैंने उस जज को गधा बना दिया"
सिपाही ने मुस्कुराते हुए कहा, "भूरे! तेरे जैसे छत्तीस अपराधियों से वह जज रोज़ निपटता है। तूने जज को नहीं बल्कि जज ने तुझे गधा बना दिया है यह देख अपना वारंट जज ने तुझे पूरे तीन महीने की जेल की सजा दी है

इससे पहले कि भूरा गश खाकर गिरता सिपाही ने उसे संभाल लिया

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

कार्टून गूगल से साभार 

मंगलवार, 17 मई 2016

लघुकथा : ठुल्ले


  पान की दुकान पर खड़े दो शिक्षकों की नज़र काफी देर से कड़ी धूप में ट्रैफिक चला रहे दो पुलिसवालों पर थी।
"यार इन ठुल्लों की जिंदगी भी क्या है? जहाँ दुनिया इस कड़ी दुपहरी में कहीं न कहीं छाँव में सुस्ता रही है, वहीं एक ये लोग हैं जो रोड पर अपनी ऐसी-तैसी करवा रहे हैं।" पहले शिक्षक ने पान की पीक थूकते हुए कहा।
दूसरे शिक्षक ने समर्थन किया, "तू ठीक कह रहा है। पर यार ये तो बता ये ठुल्ले का मतलब होता क्या है?" 
"ठुल्ला यानि कि ठलुआ मतलब कि बिना काम-धाम का खाली इन्सान।" पहला खींसे निपोरते हुए बोला।
तभी स्कूल का चपरासी भागते हुए आया और उनसे बोला, "सर जी यहाँ आप दोनों इतनी देर से गप्पबाजी में लगे हुए हैं और वहाँ आपकी क्लास के बच्चों ने धमा-चौकड़ी मचाकर आसमान सिर पर उठा रखा है। प्रिंसिपल साहब बहुत गुस्से में हैं।"
इतना सुनते ही वे दोनों स्कूल की ओर भाग लिए।
पानवाला पान पर चूना लगाते हुए एक पल को गर्मी का प्रकोप झेलते हुए ट्रैफिक चला रहे पुलिसवालों को देख रहा था और दूसरे पल पेड़ों की आड़ ले धूप से बचते-बचाते हुए स्कूल की ओर भाग रहे उन शिक्षकों को।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

लघुकथा : क़ुरबानी


    रफ़ीक़ असलम के कान में फुसफुसाया - "भाई जान सामने देखो सलमा आ रही है। क्यों न आज इस गली के सूनेपन का फायदा उठा लिया जाये?"
असलम रफ़ीक के गाल पर जोरदार झापड़ मारते हुए गुस्से में बोला - "हरामखोर आज के पाक दिन ऐसी बात सोचना भी हराम है।"
रफ़ीक़ अपना गाल सहलाते हुए बोला- "माफ़ करना भाई जान गलती हो गयी।"
असलम ने रफ़ीक़ के कंधे पर हाथ धरकर मुस्कुराते हुए कहा - "आज बकरीद पर अल्लाह को बकरे की क़ुरबानी दे आते हैं फिर किसी और रोज हम दोनों इस हसीना की क़ुरबानी ले लेंगे।" 
"हा हा हा भाई जान आईडिया अच्छा है।" रफ़ीक़ खिलखिलाया। और दोनों मस्जिद की ओर बढ़ चले।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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