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गुरुवार, 13 जून 2024

वरिष्ठ कार्यकर्ता की सौगंध


     ब तक इलेक्शन थे तब तक भागजा पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता जिले सिंह को सांस लेने की फुर्सत नहीं थी। अपनी पार्टी के हर टुच्चे से टुच्चे काम की जिम्मेवारी उनके ही जिम्मे थी। उनका सिद्धांत है घर का जरूरी से जरूरी काम चाहे हो न हो पर पार्टी का कोई काम नहीं छूटना चाहिए। सालों-साल से वे इसी सिद्धांत का कड़ाई से पालन करते आ रहे थे। पार्टी का हर छोटा बड़ा नेता उनकी पार्टी भक्ति से बहुत प्रभावित था और इसी कारण उनका बहुत सम्मान करता था। उनके मन-मस्तिष्क पर पार्टी भक्ति इतनी अधिक हावी थी कि एक बार उनके बचपन के लंगोटिया यार व सफा पार्टी के जिला संयोजक नफे सिंह ने उनसे उनकी पार्टी की बुराई करते हुए कह दिया कि कब तक अपनी पार्टी के लिए दरी बिछाते रहोगे कभी पार्टी किसी छोटे-मोटे चुनाव में अपने लिए टिकट का जुगाड़ भी कर लो। बस इतनी सी बात पर जिले सिंह का खून खौल उठा। हालांकि उन्होने अपने लंगोटिया यार का खून तो नहीं किया पर उससे हमेशा के लिए कट्टी कर की। 

     एक रात जिले सिंह राजनैतिक रैली में पूरे दिन मेहनत करने के बाद अधिक थकान होने के कारण बिस्तर पर लेटे हुए कराह रहे थे कि तभी उनकी धर्मपत्नी ने उनसे शिकायती लहजे में कहा, "लगता है आपकी ज़िंदगी अपनी पार्टी के लिए मुफ्त में ही शरीर तोड़ने में कटेगी।" जिले सिंह गुर्रा कर उससे बोले, "क्या फालतू बकवास कर रही है?" "फालतू बकवास नहीं कर रही बल्कि सही बोल रही हूँ। अब तो आस-पड़ोस के लोग भी ताने मारने लगे हैं।" पत्नी उदास होते हुए बोली। जिले सिंह ने मामले की गंभीरता को समझा और गुर्राना छोड़ अपनी पत्नी को पुचकारते हुए उससे पूछा, "क्या ताना मारा? हमें भी तो बता।" "लोग कहते हैं नालायक से नालायक कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी से टिकट लेकर अपनी किस्मत बना ली पर आप के हिस्से में तो बस पार्टी के काम का बोझ आया।" पत्नी तुनक कर बोली। पत्नी की बात सुनकर जिले सिंह का खून खौल उठा पर उन्होंने समझदार पतियों द्वारा बनायी कहावत 'पत्नी से बहस, जीवन तहस-नहस' को याद किया और फिर उन्होंने नाजुक स्थिति को ठंडा पानी पीकर भली-भाँति संभाला। पत्नी तो अपनी बात कहकर शांति के साथ सो गयी लेकिन शांति की सखी अशांति जिले सिंह के मस्तिष्क में घर कर गयी और उन्हें उस रात नींद नहीं आयी। पूरी रात उनके मन-मस्तिष्क में पत्नी द्वारा कही गयी बातें ही गूँजती रहीं।  

     अगले दिन जिले सिंह ने बिना ये सोचे-समझे कि उनके जैसे कार्यकर्ताओं का काम केवल पार्टी की सेवा करना है और टिकट पाने का अधिकार सिर्फ पार्टी के नेताओं के पुत्र-पुत्री और सगे-सबंधियों तथा सिनेमा व खेल जगत के चर्चित सितारों को ही है, जाकर अपनी पार्टी के कार्यालय में जाकर घोषणा कर दी कि अब वे पार्टी के कार्यक्रमों में दरी बिछाने के कार्य तक ही सीमित नहीं रहेंगे। अब उन्हें भी अब तक पार्टी के लिए किए गए कार्यों का ईनाम चाहिए। इस संबंध में उन्होंने पार्टी के जिलाध्यक्ष से संपर्क साधा और निगम पार्षद के होने वाले चुनाव के लिए टिकट की मांग कर डाली। जिलाध्यक्ष ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि अभी उनसे वरिष्ठ कार्यकर्त्ता कतार में हैं। उनका नंबर आएगा तो उन्हें उनके परिश्रम का फल अवश्य दिया जायेगा। जिले सिंह ने सोचा कि निगम पार्षद का टिकट तो बाद में मिलता रहेगा क्यों न अपने लड़के के लिए कोई छोटी-मोटी ठेकेदारी का ही जुगाड़ कर लिया जाये। इस इच्छा के साथ उन्होंने स्थानीय विधायक से भेंट की पर विधायक अपने सगे-संबंधियों और चमचों के बीच सरकारी ठेकों की बन्दर बाँट पहले ही कर चुका था। अब जिले सिंह ने अपने जिले के सांसद से गुहार लगाई और अपने बेटे के लिए किसी छोटी-मोटी सरकारी नौकरी के लिए उनका चरण वंदन करते हुए निवेदन कर डाला। पर सांसद के यहाँ से भी उनके हिस्से में निराशा ही हाथ आयी। सभी ओर से निराश होने के पश्चात् जिले सिंह ने अपनी पार्टी के विरुद्ध विद्रोह की पताका लहरा दी। जिले सिंह का यह विद्रोह पार्टी के पदाधिकारियों को रास न आया और उन्हें तत्काल विधिवत लात मार कर पार्टी से निष्काषित कर दिया गया। इस घटना के बाद जिले सिंह के ज्ञान चक्षु ऐसे खुले कि उन्होंने राजनीति से एक कोस की दूरी बना ली। इसके बाद सबसे पहले उन्होंने अपने लंगोटिया यार नफे सिंह के घर जाकर उससे हाथ जोड़कर अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगी और उसके बाद अपने घर पहुंच कर अपनी पत्नी के सिर पर हाथ रखकर सौगंध खायी कि भविष्य में उनके लिए उनके परिवार और परिवार के सदस्यों से महत्वपूर्ण कोई और नहीं होगा।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टूनिस्ट: श्याम जगोता 

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

व्यंग्य : अंतिम इच्छा का दुष्प्रभाव

     सूबे को फफककर रोते हुए देखकर जिले ने नफे से पूछा।

जिले : भाई नफे, अपने सूबे को कौन सा दुःख है जो इतना रो रहा है।

नफे : उसका दुःख उसके लिए बहुत दुखदायी है इसलिए उसे रोना पड़ रहा है।

जिले : उस दुखदायी दुःख से हमारा भी परिचय करवा।

नफे : सूबे उस घड़ी को कोसते हुए रो रहा है, जब उसने अपने पिता की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करने के विषय में सोचा।

जिले : अरे, सूबे के पिता की मौत कब हो गयी?

नफे : दो दिन पहले ही उनकी मृत्यु हुई थी।

जिले : वो तो भले चंगे थे, फिर भला ऐसा क्या हुआ जो वो अचानक मर गए।

नफे : सूबे के पिता प्राण चंद मंच के अति सक्रिय कवि रहे हैं। अपने माँ-बाप को दर-दर भटकने पर विवश करने वाले प्राण चंद जब मंच पर खड़े हो माता-पिता पर केंद्रित भावुक तुकबंदियों को कविता के वेश में काव्यप्रेमी श्रोताओं के सम्मुख बड़ी चतुराई से परोसते थे, तो श्रोतागण भावुक हो उन्हें प्राण, ऊर्जा, शक्ति और जाने क्या-क्या प्रदान कर देते थे।

जिले : अच्छा तो उनकी चुस्ती-फुर्ती का ये राज था।

नफे : हाँ, उनकी इसी अदा पर मंच की कई कवयित्रियाँ भी उनकी प्राण प्यारी बन गयी थीं।

जिले : भाई, प्राण के साथ-साथ धन प्यारी भी बोल।

नफे : बिलकुल सही समझा। सब ठीक चल रहा था कि अचानक कोरोना महामारी का आगमन हुआ और कवि सम्मेलनों पर विराम लग गया।

जिले : फिर आगे क्या हुआ?

नफे : कवि सम्मेलनों में श्रोताओं द्वारा मिलने वाले प्राण, ऊर्जा और शक्ति इत्यादि का स्टॉक कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन ने बिलकुल समाप्त कर दिया।

जिले : ओह, ये तो कवि प्राण चंद के लिए प्राण हरने वाली बात हो गयी।

नफे : हाँ भाई, जैसे ही कवि प्राण चंद के पास प्राण, ऊर्जा और शक्ति इत्यादि का स्टॉक समाप्त हुआ यमदूत उनके निकट आए और उनके शरीर से प्राण खींचकर यमलोक की ओर निकल लिए।

जिले : अपने पिता की अकाल मौत होने पर सूबे तो बहुत उदास हुआ होगा।

नफे : उदास ही नहीं हुआ बल्कि फूट-फूट कर रोया पर सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए।

जिले : लोगों को दिखाने के लिए? तो क्या उसे अपने बाप की मौत का दुःख नहीं हुआ?

नफे : दुःख होता तो चुपचाप 101 रुपए का हनुमानजी का प्रसाद न बाँटता। अपने पिता के मरने पर उसके मन में तो मोतीचूर के लड्डू फूट रहे थे।

जिले : लड्डू तो फूटने ही थे। आखिर बाप की मौत के बाद उनकी ढेर सारी जायदाद जो उसे मिलने वाली थी।

नफे : हाँ, पर सूबे  की किस्मत इतनी अच्छी नहीं है।

जिले : वो कैसे?

नफे : सूबे ने पितृ भक्ति का ड्रामा करते हुए अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरी करने की तैयारी की।

जिले : कौन सी अंतिम इच्छा?

नफे : सूबे के पिता कवि प्राण चंद की अंतिम इच्छा थी, कि उनकी चिता को जलाने से पहले उनकी चिता के बगल में एक भव्य मंच स्थापित कर उस पर एक भव्य कवि सम्मेलन आयोजित करवाया जाए।

जिले : तो क्या फिर सूबे ने अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी की?

नफे : हाँ की और अब उसी अंतिम इच्छा के बाद हुए दुष्प्रभाव के लिए पछता रहा है।

जिले : कैसा दुष्प्रभाव?

नफे : सूबे ने अपने पिता की चिता के बगल में एक भव्य मंच को स्थापित कर एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया। उस कवि सम्मेलन में देश के जाने-माने कवियों एवं कवयित्रियों को बुलाया गया। ज्यों ही कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ कवि प्राण चंद के हाथ-पैर हिलने-डुलने लगे और कवि सम्मेलन ज्यों ही उफान पर पहुँचा वो माँ शारदे को नमन करते हुए उठ खड़े हुए।

जिले : अरे, ये तो बहुत बढ़िया हुआ। सूबे के प्रयास से उसके पिता को एक नया जीवन मिल गया।

नफे : हाँ, पर सूबे का जीवन बर्बाद हो गया।

जिले : वो कैसे?

नफे : सूबे के पिता ने अपनी जायजाद को उनकी चिता के पास कवि सम्मेलन में कविता पाठ करने वाली अपनी प्राण प्यारी कवयित्रियों के नाम करने की घोषणा कर डाली और सूबे के हिस्से में सिर्फ रहने के लिए पुराना घर बाकी बचाया।

जिले : ओहो, ये तो अंतिम इच्छा पूरी करने का वाकई में तगड़ा दुष्प्रभाव हो गया। भाई, एक बात तो बता।

नफे : पूछ!

जिले : ये सूबे रोते-रोते अचानक मुस्कुराने क्यों लगता है? कहीं वसीयत की घोषणा का दुष्प्रभाव इसके दिमाग पर तो नहीं पड़ गया है?

नफे : सूबे का रोते-रोते अचानक मुस्कुराने का कारण है कोरोना के डेल्टा प्लस वैरिएंट का आगमन।

जिले : तो उसके आने से सूबे को क्या फायदा होगा?

नफे : डेल्टा प्लस वैरिएंट से लोगों को बचाने के लिए सरकार द्वारा फिर से लॉकडाउन लगाया जाएगा और प्राण चंद के पास जमा प्राण, ऊर्जा और शक्ति इत्यादि के स्टॉक की फिर से समाप्ति होगी।

जिले : और फिर सूबे को अपने बाप की अंतिम इच्छा को पूरा करने के बाद उसके जीवन पर पड़े दुष्प्रभाव को ठीक करने का एक शानदार मौका मिल जाएगा। धन्य हैं प्राण चंद जो उन्हें ऐसा पूत मिला।

नफे : यथा पिता तथा पुत्र।

जिले : बिलकुल सही कहा भाई।

कार्टून गूगल से साभार

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

व्यंग्य : ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाई


    फे कहीं जाने के लिए निकल रहा थाकि तभी अचानक जिले का आना हुआ। जिले नफे को टोकते हुए बोला।

जिले : भाई नफे!

नफे : हाँ बोल भाई जिले!

जिले : इतनी तेजी में कहाँ को भागा जा रहा है?

नफे : भाई थोड़ा जल्दी में हूँ। कल फुर्सत में बताऊँगा।

जिले : इतनी भी जल्दी क्या हैजो अपने खास दोस्त के लिए दो मिनट भी नहीं निकाल सकता।

नफे : अरे नहीं भाईऐसी कोई बात नहीं है।

जिले : तो फिर जो बात है उसे बता डाल।

नफे : असल में मैं ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाई करवाने जा रहा हूँ।

जिले : ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाईये कब से होने लगीमैंने तो सुना है कि उसका उत्पादन ऑक्सीजन के प्लांट में होता है।

नफे : भाईहैरान मत हो ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाई भी होती है।

जिले : भाईया तो तूने सुबह-सवेरे चढ़ा ली है या फिर तू ये समझ रहा है कि मैं नशे में हूँ।

नफे : भाईतू गलत क्यों सोच रहा है?

जिले : गलत नहीं बल्कि सही सोच रहा हूँ। सुबह-सुबह उल्टी-सीधी बातें बनाकर तू मेरा दिमाग खराब कर रहा है।

नफे : अगर तुझे मेरी बात का विश्वास नहीं हो रहा है तो तू मेरे साथ चल कर देख ले, कि ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाई होती है या नहीं।

जिले : तो फिर चलआज दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

जिले नफे के साथ चल पड़ता है। वहाँ नफे उसकी मुलाक़ात पर्यावरण रक्षा दल के साथ करवाता है। कुछ देर बाद नफे पर्यावरण रक्षा दल के साथ मिलकर पौधरोपण करते हुए जिले से कहता है।

नफे : ये देख, ये हो रही है ऑक्सीजन सिलेंडर की रोपाई। 

नफे की बात को सुन कर जिले को गुस्सा आ जाता है।

जिले : नफे,  ये हद हो गयी।  पौधारोपण को तू ऑक्सीजन सिलेंडरों की रोपाई बता रहा है। इसका मतलब है कि तू मुझे बिलकुल बेवकूफ ही समझता है।

नफे : अरे नहीं भाईऐसा कुछ नहीं है।

जिले : तो फिर तूने मुझसे झूठ क्यों बोला?

नफे : मैंने झूठ कहाँ बोलाये पौधे ही एक दिन बड़े होकर वृक्ष बनेंगेजो वातावरण में नियमित रूप से ऑक्सीजन की सप्लाई किया करेंगे। दूसरी भाषा मे कहें तो ये पौधे भविष्य के ऑक्सीजन सिलेंडर ही तो हैं। 

जिले : ओहइस बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था।

नफे : इसमें तेरी सोच का दोष नहीं बल्कि दोष मानवीय प्रवृत्ति का है।

जिले : वो कैसे भला?

नफे : हम मानव प्रगति की अंधी दौड़ में कथित सफलता पाने की आस पाले हुए निरंतर दौड़े जा रहे हैं।

जिले : हम मानव आखिर किस तरह की सफलता को पाने के लिए इस अंधी दौड़ में भागीदारी कर रहे हैं?

नफे : ये कथित सफलता येन केन प्रकारेण अधिक से अधिक धन कमाने की है।

जिले : ओहमतलब कि प्रकृति के नाश की जड़ कथित सफलता पाने के लिए दौड़ी जा रही प्रगति की ये अंधी दौड़ ही है।

नफे : हाँ जिलेहम स्वार्थी मानवों ने अपने स्वार्थ से वशीभूत होकर अपनी जेबें भरने के लिए हरे-भरे पेड़ों का सफाया कर वहाँ फ्लैटोंमॉलों और मल्टीप्लेक्स बिल्डिंगों को खड़ा कर दिया है।

जिले : हाँये बात तो है।

नफे - और ये सब करते हुए हम मानवों ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त इन प्राकृतिक ऑक्सीजन सिलिंडरों की न तो कभी परवाह की और न ही इनका संरक्षण किया। हम मानव प्रकृति के इन अनमोल उपहारों का विनाश कर कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं। पर हम ये नहीं समझ पा रहे हैं, कि एक दिन ये कंक्रीट के जंगल ही मानव सभ्यता को लील जाएंगे। 

जिले - सही कहा भाईमुझसे भी ये भूल हुई है। मैंने अपनी खेती की जमीन बढ़ाने के लालच में एक बीघा जमीन में लगा आम का बगीचा सिर्फ इसलिए कटवा दियाक्योंकि उसमें आम की पैदावार कम होने लगी थी।

नफे : इसका मतलब है कि तू भी प्रगति की अंधी दौड़ में कथित सफलता पाने के लिए प्रतिभागी रह चुका है। 

जिले : हाँ भाईमैं भी प्रगति की इस अंधी दौड़ के चक्कर में एक बार फंस चुका हूँ।

नफे : और इस चक्कर में घनचक्कर बन तूने आम के बगीचे के रूप में ऑक्सीजन सिलिंडर के एक अच्छे-खासे प्लांट का सत्यानाश कर दिया।

जिले : हाँ भाईहो गयी थी गलती। पर अब मैं अपने उस पाप का प्रायश्चित करूँगा।

नफे : वैसे तूने अपने उस पाप का प्रायश्चित करने का क्या उपाय सोचा है?

जिले : मैं अपनी खेती की जमीन में से एक के बजाय दो बीघा जमीन में पौधों की रोपाई करूँगा। 

नफे : तेरा मतलब है कि तू ऑक्सीजन सिलेंडरों की रोपाई करेगा।

जिले : हाँ भाईमेरे द्वारा रोपे गए पौधे जब वृक्ष बनकर लोगों के फेफड़ों मे शुद्ध ऑक्सीजन की सप्लाई करेंगेतब कहीं जाकर मेरा प्रायश्चित पूरा हो पाएगा।

नफे : काशतेरी तरह बाकी लोग भी अपने पापों का प्रायश्चित करने लगेंतो फिर इस संसार में किसी भी इंसान की ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु नहीं होगी।

जिले : बाकी लोग भी कभी न कभी मेरी तरह पश्चाताप करते हुए इस नेक काम को अंजाम देंगे।

नफे : यदि सच में ऐसा हुआ तो मानवीय फेफड़ों और ऑक्सीजन में कभी भी संधिविच्छेद नहीं हो पाएगा।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

व्यंग्य : समझदारी की वैक्सीन

 

    जिले का साथी नफे अपनी बाँह को काफी देर से सहला रहा होता है, जिसे देखकर जिले उससे इस बारे में पूछताछ शुरू करता है।

जिले : भाई नफे!

नफे : हाँ बोल भाई जिले!

जिले : आज बाँह में भाभी ने ज्यादा जोर से बेलन जड़ दिया जो इसे इतनी देर से सहलाने में लगा हुआ है।

नफे : तेरी भाभी जब बेलन मारेगी तो सिर में ही मारेगी। फिलहाल उसकी इस विशेष कृपा से दूर ही हूँ।

जिले : हा हा हा, ऐसी विशेष कृपा कहीं पर अटकी रहे तो ही ठीक है। वैसे तेरी बाँह में हुआ क्या है?

नफे : दरअसल परसों मैंने कोरोना की वैक्सीन लगवायी थी, उसी से शरीर में दो दिनों तक हरारत सी रही और जिस जगह वैक्सीन लगवाई थी, वहाँ थोड़ी सूजन आ गयी है और उसमें दर्द भी हो रहा है।

जिले : शुक्र है कि मैं इस पचड़े में नहीं पड़ा।

नफे : तेरा मतलब है कि कोरोना की वैक्सीन लगवाना पचड़े में पड़ना है।

जिले : और नहीं तो क्या? सूबे ने मुझे पहले ही समझा दिया था कि कोरोना की वैक्सीन न लगवाऊँ। वरना मैं तो अब तक उसे लगवा भी चुका होता।

नफे : इसमें तेरा कोई दोष नहीं है। अगर समय से तुझे समझदारी की वैक्सीन लग जाती तो तू ऐसी हरकतें न करता।

जिले : समझदारी की वैक्सीन? भाई, इस नाम की वैक्सीन कबसे लगनी लगी?

नफे : ये वैक्सीन हर माँ-बाप द्वारा अपने बालक को बचपन में लगायी जाती है। अच्छे संस्कारों के संग अच्छे-बुरे की समझ की सीख को मिक्स करके समझदारी की वैक्सीन का निर्माण किया जाता है और फिर उसे नैतिकता की सिरिंज में भरकर माता-पिता द्वारा अपने नौनिहालों को लगा दिया जाता है।

जिले : भाई, मेरे अम्मा-बापू ने समझदारी की वैक्सीन तो पक्का मुझे भी लगवाई होगी।

नफे : तो फिर समझदारी की वैक्सीन लगवा कर भी तू ऐसी नासमझी क्यों कर रहा है? तुझे पता भी है कि जिस सूबे की बातों में आकर तू कोरोना की वैक्सीन लगवाने को पचड़े में पड़ना मान रहा है वो और उसका परिवार महीने भर पहले ही इसकी पहली डोज ले चुके हैं।

जिले : अरे, सूबे ने अपने परिवार संग कोरोना की वैक्सीन लगवा ली और हम सबको वैक्सीन न लगवाने के लिए बहका रहा है। 

नफे : और तुम सब बिना सोचे-समझे उसकी बातों में आकर बहक भी रहे हो।

जिले : भाई, बहुत बड़ी गलती हो गयी। मैं सूबे की बातों में आकर नासमझी कर बैठा।

नफे : नासमझी सिर्फ तूने ही नहीं की है, बल्कि सूबे जैसों के चक्कर में पड़कर जाने कितने समझदार नासमझ हो रखे हैं।

जिले : भाई, ये सूबे और उस जैसे लोग इस नासमझी के वायरस को क्यों फैला रहे हैं? क्या उन्होंने भी बचपन में समझदारी की वैक्सीन नहीं लगवाई थी?

नफे : उन्होंने तो समझदारी की वैक्सीन का डबल डोज लिया होगा। 

जिले : तो फिर वे सब ऐसी नासमझी क्यों कर रहे हैं?

नफे : वे सब ऐसी नामसमझी जानबूझकर कर रहे हैं।

जिले : जानबूझकर? वो क्यों भला?

नफे : दरअसल उनसे ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि अपना देश कोरोना से डटकर मुकाबला कैसे कर पा रहा है। 

जिले : तो उनके अनुसार कोरोना से मुकाबला करने के बजाय उसके आगे घुटने टेक दिए जाने चाहिए।

नफे : सूबे और सूबे जैसों के आका यही तो चाहते हैं। यदि देश कोरोना के आगे आत्मसमर्पण कर देगा तो ये महामारी अपना विकराल रूप ले मौत का तांडव दिखाएगी। फिर लाशों के ढेर लगेंगे और उन लाशों के ढेरों पर ही सूबे और सूबे जैसों के आकाओं की धराशायी हो चुकी इमारतें फिर से खड़ी हो पाएंगीं।

जिले : बात तो तूने पते की कही। चल अब मैं भी पता ढूँढने की तैयारी करता हूँ।

नफे : किसका पता?

जिले : कोरोना वैक्सीन लगा रहे सेंटर का पता। मैं कल ही अपने पूरे परिवार के साथ कोरोना वैक्सीन लगवाता हूँ।

नफे : लगता है कि समझदारी की वैक्सीन का खत्म हुआ असर फिर से असरदार हो रहा है।

जिले : हाँ भाई, लगता है कि ये समझदारी की वैक्सीन भी हनुमान जी की शक्ति के जैसी है। जब तक याद नहीं दिलावाओगे, बेअसर ही रहेगी।

नफे : जिले, अब तू सही लाइन पर आया है।

जिले : भाई, कल वैक्सीन लगवाने के बाद मैं भी नासमझ हो चुके लोगों को समझदारी की वैक्सीन का स्मरण करवाना शुरू करता हूँ। 

नफे : लगता है कि सूबे और सूबे जैसों के आकाओं की महत्वाकांक्षाओं की इमारत के थरथराने का समय आ गया है।

जिले : थरथराने का नहीं बल्कि भरभरा कर गिरने का समय आ गया है।

नफे : इस नेक कार्य के लिए मेरी ओर से तुझे अग्रिम शुभकामनाएं!

जिले : धन्यवाद भाई!

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

व्यंग्य : इंसानियत का पुराना वेरिएंट


     फे गंभीर सोच-विचार में डूबा हुआ था। जिले ने सोचा कि क्यों न वह भी उस सोच-विचार में भागीदारी कर ले। इसी प्रयास में वह नफे के पास जा पहुँचा।

जिले : भाई नफे!

नफे : हाँ बोल भाई जिले!

जिले : किस सोच-विचार में डूब रखा है?

नफे : भाई, अब तुझे क्या बताऊँ कि मैं किस गंभीर चिंतन में हूँ।

जिले : बता दे भाई, क्योंकि बताने से जी कुछ हल्का हो जाता है।

नफे : दरअसल मैं डेल्टा प्लस को लेकर चिंतित हूँ।

जिले : भाई, ये डेल्टा प्लस कौन है? कहीं इस नाम से पुलिस कंट्रोल रूम ने कोई नया कॉल साइन तो नहीं बना दिया?

नफे : ये पुलिस कंट्रोल रूम का नया कॉल साइन नहीं, बल्कि कोरोना का नया वेरिएंट है।

जिले : मैं कुछ समझा नहीं। जरा  खुल के बता।

नफे : कोरोना वायरस का नया वेरिएंट ‘डेल्टा प्लस’ डेल्टा वेरिएंट का ही विकसित रूप है। इससे पहले डेल्टा वेरिएंट मिला था। कोरोना की दूसरी लहर में अधिकतर लोग इसी डेल्टा वेरिएंट का शिकार हुए थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक, डेल्टा वेरिएंट ही विकसित होकर डेल्टा प्लस बन गया है।

जिले : पर इस डेल्टा प्लस की योजना क्या है?

नफे : इसकी योजना अधिक से अधिक लोगों को ऊपर पहुँचाने की है?

जिले : अरे बाप रे, भाई ये कोरोना के नए-नए वेरिएंट भला कहाँ से टपक रहे हैं?

नफे : इस देश में कुछ महान लोग हैं, जो ढीठता दिखाते हुए कोरोना गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ाते फिरते हैं, उनके योगदान से ही कोरोना के नए-नए वेरिएंट देश में मौत की चहलकदमी करने में सफल हो रहे हैं।

जिले : भाई, लोग बाहर तो निकलेंगे ही। आखिर कब तक घर में घुसे रहेंगे?

नफे : जब तक कि इस कोरोना का सफाया न हो जाये।

जिले : इसके सफाए में न जाने कितने साल लगें। तब तक लोग निठल्ले तो नहीं बैठ सकते।  जब वो कमायेंगे तभी तो खा पायेंगे। 

नफे : तेरी बात ठीक है, लेकिन जब लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर निकलें तो मास्क को सही तरीके से पहनें, समुचित दूरी का पालन करें और समय-समय पर हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं या फिर उन्हें सेनेटाइजर से सेनेटाइज करें।

जिले : और ऐसा अपने देश की कुछ महान आत्माओं को करना नहीं है। वैसे भाई इस नए वेरिएंट से बचने का कोई ठोस उपाय नहीं है?

नफे : है न।

जिले : तो जल्दी बता ना।

नफे : इसका उपाय इंसानियत का पुराना वेरिएंट है।

जिले : इंसानियत का पुराना वेरिएंट? 

नफे : हाँ, पुराने समय में इंसानियत एक-दूसरे के सुख-दुख की साथी थी। इंसान के प्रति वह जिम्मेदारी का भाव रखती थी। कोई जरूरमंद हो या कोई भूखा-प्यासा मिले तो उनकी मदद करते हुए वह उनके साथ फोटो नहीं खिंचवाती थी। वह संत कबीर के दोहे "साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥" को चरितार्थ कर भोगवादी चार्वाक दर्शन की उक्ति "जब तक जियो सुख से जियो, कर्ज लेकर घी पियो।" को अपनाने के बजाय भविष्य के लिए बचत करने में विश्वास करती थी।

जिले : सही कहा भाई, आज के समय लोग रोज कमाने और रोज खाने के सिद्धांत को अपना कर भविष्य के लिए कुछ नहीं बचाते और झूठे दिखावे की खातिर हर चीज लोन पर ले रहे हैं। 

नफे : अगर ये खाने-पीने के साथ बचत पर भी ध्यान देते तो शायद हमें ये दिन न देखने पड़ते। इसके साथ लोग इस बात को भी समझें कि कोरोना पर सरकार की गाइडलाइंस का पालन करना उनकी नैतिक जिम्मेवारी है। जब इंसानियत का पुराना वेरिएंट फिर से शक्तिशाली होगा तो उसके आगे ये कोरोना और इसके नए-नए वेरिएंट नहीं ठहर पाएंगे।

जिले : भाई, हम सब मिलकर इंसानियत के पुराने वेरिएंट को फिर से लाने की कोशिश करेंगे।

नफे : बिलकुल करेंगे भाई, क्योंकि मैंने सुना है कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

जिले : तू फिकर मत कर हमारी भी हार नहीं होगी।

नफे : अगर ऐसा हुआ तो इंसानियत फिर से मुस्कुराएगी।

गुरुवार, 24 जून 2021

व्यंग्य : ज़िंदगी का कोका कोला


    फे बहुत देर से उदास बैठा हुआ था। जिले से नफे की उदासी बर्दाश्त नहीं हुई और उस उदासी का कारण जानने के लिए उसने नफे से पूछताछ शुरू की।

जिले : भाई नफे!

नफे : हाँ बोल भाई जिले!

जिले : आज इतना उदास क्यों है?

नफे : उदास होने का कारण जिंदगी का कोका कोला होना है।

जिले : ज़िंदगी का कोका कोला? भाई मैं कुछ समझा नहीं।

नफे : मतलब कि ज़िंदगी की ऐसी-तैसी हो रखी है।

जिले : अब ये ज़िंदगी की ऐसी-तैसी की जगह ज़िंदगी का कोका-कोला होना कहावत कब ईजाद हो गयी?

नफे : इस कहावत का जन्म कुछ दिन पहले ही हुआ है।

जिले : किसने जन्म दिया इस कहावत को?

नफे : दरअसल बात ये है कि पुर्तगाली सुपरस्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो के यूरोपीय चैम्पियनिशप में प्रेस कांफ्रेस के दौरान अपने सामने से कोका-कोला की बोतलों को एक तरफ खिसका कर पानी की बोतल को उठाया और पुर्तगाली भाषा में कहा 'अगुआ' मतलब पानी। ऐसा लग रहा था कि वह कोल्ड ड्रिंक्स के बजाय पानी को अपनाने की सलाह दे रहे थे।

जिले : रोनाल्डो ने सलाह तो अच्छी दी थी।

नफे : पर उस अच्छी सलाह का भुगतान कोका कोला कंपनी को भुगतना पड़ा।

जिले : वो कैसे?

नफे : वो ऐसे कि इस घटना कोका कोला कंपनी के शेयर इतनी तेजी से नीचे गिरे कि चार अरब डॉलरों का राम नाम सत्य हो गया।

जिले : एक ओर रोनाल्डो है जो कोका कोला के बजाय पानी पीने की सलाह देता है, दूसरी ओर हमारे देश के खिलाड़ी और एक्टर हैं जो कभी टीवी पर पान मसाला बेचते मिलेंगे तो कभी कोल्ड ड्रिंक या शराब के ब्रांड की वकालत करते मिलेंगे।

नफे : वो बेचारे भी करें तो क्या करें, उनकी ज़िंदगी का भी इन दिनों कोका कोला हो रखा है। इसलिए वे सब पान मसाले, कोल्ड ड्रिंक और शराब इत्यादि के विज्ञापनों के सहारे गुजर-बसर करने की कोशिश कर रहे हैं।

जिले - अरे, उन्हें कम से कम रोनाल्डो को देखकर कुछ सीख लेनी चाहिए। उसने पैसे का मोह न देखकर लोगों के स्वास्थ्य की परवाह कर कोका कोला के बजाय पानी पीने की सलाह दी। इसे उसकी महानता ही कहेंगे।

नफे : हम भारतीयों में ये ही तो कमी है कि हम किसी को भी एकदम से भगवान बना देते हैं।

जिले : भाई, आखिर तू कहना क्या चाहता है?

नफे : यही कि तू जिस रोनाल्डो की शान में कसीदे पढ़ रहा है, वही रोनाल्डो कभी कोका कोला का ब्रांड एम्बेसडर रह चुका है।

जिले : क्या बात कर रहा है?

नफे : हाँ भाई, बाद में कोका कोला की प्रतिस्पर्धी कंपनी पेप्सी के स्वामित्व वाली केएफसी का प्रचार भी किया और ब्राज़ील की एक बीयर कंपनी का भी ब्रांड एंबेसडर रहा है। इसके अलावा उसने एनर्जी ड्रिंक्स और हेल्थ ड्रिंक्स के नाम से बिकने वाले कई और उत्पादों के भी विज्ञापन किए हैं।

जिले : भाई, फिर ऐसी क्या वजह थी जो रोनाल्डो ने कोका कोला का ही कोका कोला कर डाला?

नफे : होगा कोई कारण जिनके कारण रोनाल्डो और कोका कोला कंपनी के आपसी संबंधों का कोका कोला हो गया हो।

जिले : हूँ, अच्छा अब तू ये बता कि तेरी ज़िंदगी का कैसे कोका कोला हो रखा है?

नफे : पिछले एक साल से सरकार ने इंक्रीमेंट दिया नहीं, बल्कि कोरोना रिलीफ के नाम पर कुछ न कुछ काट और लेती है। ऊपर से फ्रंटलाइन वर्कर बना रखा है वो अलग से। इसे ज़िंदगी का कोका कोला होना नहीं तो भला और क्या कहेंगे।

जिले : भाई, इस कोरोना काल में सिर्फ तेरा ही नहीं बल्कि पूरे संसार का कोका कोला हो रखा है। विश्व की अर्थव्यवस्था को चीनी ड्रैगन के नाजायज बेटे ने बिलकुल चौपट कर दिया है।

नफे : सही कहा।

जिले : भाई, अब तू ये सब बातें छोड़ और पीने के लिए कोई ठंडी चीज मँगवा ले, क्योंकि ये भेजा बहुत गरम हो चुका है। 

नफे : कोका कोला मँगवाना है क्या?

नफे : अरे नहीं भाई, उसे पीकर अपनी आंतों का कोका कोला नहीं करवाना। 

नफे : हा हा हा तो फिर ठंडी लस्सी तो चलेगी न?

जिले : चलेगी नहीं भाई दौड़ेगी।

गुरुवार, 17 जून 2021

व्यंग्य : लहर चालू आहे


    नफे को विचारों में खोया हुआ देख कर जिले ने उससे पूछा।

जिले - भाई नफे!

नफे - हाँ बोल भाई जिले!

जिले - और आजकल क्या चल रहा है?

नफे - आजकल लहर चल रही है।

जिले - अब तक तो मैंने फॉग, स्वैग वगैरह के चलने के बारे में ही सुना था, पर तूने तो नई बात बता दी। वैसे इस लहर के चलने के बारे में कुछ बता।

नफे - भाई, लहर तो अपने देश में कई सालों से चल रही है। अब तूने देखी नहीं तो इसमें भला लहर का क्या दोष है।

जिले - भाई, भूल हो गयी जो देख नहीं पाया। अब तू अपनी आँखों से दिखा दे न।

नफे - आजादी से पहले अपने देश में देशभक्ति की लहर चलनी शुरू हुई थी। इस लहर में अंग्रेजी सत्ता उखड़कर उड़ते-उड़ते अपने मूल स्थान पर जा पहुँची और इस देश को लूट कर ले जाए गए माल के ब्याज पर अंग्रेजों की अय्याशी अब तक जारी है।

जिले - अंग्रेजी सत्ता के जाने के बाद अपने देश में कौन सी लहर चली थी?

नफे - उसके बाद देश को कथित स्वतंत्रता दिलवाने वालों के सत्ता सुख भोगने की लहर चली, जिसमें आजादी की खातिर मर-मिटने वालों और उनके परिवारों को विवशता के आँसू बहाते हुए देशवासियों ने देखा।

जिले - मतलब कि जिन्होंने देश के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया, वे और उनका परिवार आजादी के बाद लुटी-पिटी हालत में ही रहे। अच्छा उसके बाद कौन सी लहर आयी?

नफे - उसके बाद भारत के बहादुर लाल की कुछ दिनों के लिए लहर चली, जिसने पापी पड़ोसी देश को कुछ पलों के लिए काल के साक्षात दर्शन करवा दिए। 

जिले - पर देश के उस बहादुर लाल को सत्ता पिपासुओं ने साजिश के तहत काल के गाल के हवाले कर दिया गया। खैर, उसके बाद कौन सी लहर आयी?

नफे - उसके बाद इमरजेंसी की लहर आयी, जिसमें अच्छे-अच्छे सूरमा उड़ कर जेल की सलाखों के पीछे जाकर गिरे।

जिले - बाद में उनमें से कई सूरमाओं ने सत्ता का सुरमा लगा कर देश को जमकर चूना लगाया। नेक्स्ट प्लीज!

नफे - उसके बात सत्ता बदलाव की लहर चली। फिर सत्ता वापसी की लहर चली। फिर बड़े पेड़ के गिरने के बाद विध्वंसक प्रतिक्रिया की लहर चली। उसके बाद छोटी-मोटी लहरों के चलने का सिलसिला चलता रहा। फिर एक लहर ऐसी आयी जिससे देश और दुनिया हिल गयी।

जिले - भाई, बोलते जा, इन लहरों के इतिहास को सुनकर मन लहरा रहा है।

नफे - इस मजबूत लहर ने जाने कितनों की राजनीति की दुकानों को उड़ा कर समुद्र में ले जाकर डुबो दिया और उन दुकानदारों को छाती पीटकर रोते रहने को छोड़ दिया।

जिले - अब उनके बाकी दिन यूँ ही छाती पीटते हुए ही बीतेंगे। अब तू आगे की बता।

नफे - इस मजबूत लहर के बाद चीनी ड्रैगन की अवैध संतान की विध्वंसक लहरों का आगमन हुआ।

जिले - चीनी ड्रैगन की अवैध संतान की लहरें? भाई, मैं कुछ समझा नहीं।

नफे - चीनी ड्रैगन की अवैध संतान यानि कि कोरोना। इसकी अब तक दो लहरें दुनिया में मौत का तांडव मचा चुकी हैं।

जिले - सही कहा भाई, चीनी ड्रैगन की इस अवैध संतान ने दुनिया की ऐसी-तैसी कर डाली। सुन रहे हैं कि कुल मिलाकर इस मुएँ कोरोना की पाँच लहरें आयेंगीं। अब न जाने ये तीसरी लहर कब आएगी।

नफे - संभावना तो ये है कि अपने देश में इसकी तीसरी लहर जल्द ही आएगी।

जिले - तू इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकता है?

नफे - तुझे हो न हो पर मुझे अपने देश के कुछ महान लोगों पर पूरा विश्वास है, कि वे सब मिलकर इस तीसरी लहर को जल्द ही ले आयेंगे।

जिले - वो भला कैसे?

नफे - इसके लिए उन्होंने तैयारी शुरु कर दी है। वे सब बिना मास्क के बिना बात के घर से बाहर घुमक्कड़ी का आनंद ले रहे हैं और सोशल डिस्टेन्सिंग की हत्या तो उन्होंने पहले ही उसका गला दबा कर दी है। 

जिले - भाई, मैं तो चला।

नफे - कहाँ को चला?

जिले - अगर ये महान लोग तीसरी लहर लाने की तैयारी शुरू कर चुके हैं, तो मैं भी जाकर इनसे बचने तैयारी आरंभ करता हूँ।

नफे - ईश्वर तेरी कोरोना से रक्षा करे।

जिले - भाई, ईश्वर सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि तेरी और सारी दुनिया की इस कोरोना से रक्षा करे।

नफे - एवमस्तु!

गुरुवार, 10 जून 2021

हास्य व्यंग्य : कोरोना काल की बहुएं

    पुलिस कर्मी जिले-नफे पुलिस पिकेट पर तैनात हो जनता को कोविड गाइडलाइन्स का पालन करवाने की ड्यूटी में व्यस्त हो रखे हैं।
जिले - भाई नफे!
नफे - हाँ बोल भाई जिले! 
जिले - आज सड़क पर ऐसा क्या देख लिया जो तेरी बाछें इतनी ज्यादा खिली हुई हैं?
नफे - भाई, कोरोना काल की बहुओं को देख कर ये बाछें खिली हुई हैं।
जिले - कोरोना काल की बहुएं? पर भाई मुझे तो कहीं कोई बहू-वहू दिखाई नहीं दे रही है।
नफे - ध्यान से देखेगा तो वो बहुएं तुझे दिख जायेंगीं।
जिले - भाई, तू पहेली मत बुझा। साफ-साफ बता कि कहाँ हैं कोरोना काल की बहुएं?
नफे - सामने देख, वो आ रहीं हैं कोरोना काल की बहुएं।
जिले - भाई, लगता है तुझ पर पुलिस की नौकरी की थकान का कुछ ज्यादा ही असर हो गया है, तभी तू सामने आ रहे आदमियों की जगह औरतों को देख रहा है।
नफे - जो मैं तुझे दिखाना चाह रहा हूँ, उसे तू देख कर भी नहीं देखना चाह रहा है। 
जिले - भाई, अब तू दिमाग का दही मत कर और जल्दी से कोरोना काल की बहुओं को दिखा।
नफे - सामने से आ रहे लोगों को और उनके घूँघट को ध्यान से देख।
जिले - हे भगवान, लगता है कि तू मुझे पागल करके ही छोड़ेगा। सामने से आदमी आ रहे हैं और उन्होंने कोई घूँघट-वूंघट नहीं ओढ़ रखा है। उन्होंने मुँह पर मास्क लगा रखा....लगा भी नहीं रखा बल्कि अपने-अपने गले में लटका रखा है।
नफे - वो ही तो कोरोना काल की बहुएं हैं और उन्होंने जो मास्क गले में लटका रखा है वो है उनका घूँघट।
जिले - मैं कुछ समझा नहीं।
नफे - भाई, ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। तू बस तैयार रह क्योंकि कोरोना काल की बहुएं अपने जेठ और ससुर को देख कर झट से घूँघट ओढ़ लेंगीं। इससे पहले कि बहुएं घूँघट ओढ़ें, हमें उनसे उनकी मुँह दिखाई का नेग ले लेना है।
जिले - एक मिनट, कोरोना काल की बहुओं के जेठ और ससुर हम हैं क्या? 
नफे - ठीक समझा!
जिले - देख भाई, बेशक तेरी और मेरी जन्मतिथि कागजों में समान हो पर मेरे बापू ने मेरे जन्म प्रमाणपत्र में मेरी उम्र ज्यादा लिखवा रखी है। सो कोरोना काल की बहुओं का तू ससुर है और मैं हूँ जेठ।
नफे - ठीक है बहुओं के जेठ जी!
जिले - और एक बात और सुन, बहुओं से मुँह दिखाई का नेग लिया नहीं जाता बल्कि दिया जाता है।
नफे - जेठ महाराज, कोरोना काल की बहुओं से मुँह दिखाई का नेग लिया ही जाता है, ताकि  वो यूँ सरेआम घूँघट उठाने से बाज आयें।
जिले - हूँ, वैसे इन बहुओं को घूँघट गिराने का इतना चाव क्यों रहता है?
नफे - दरअसल इनके दिलों में कोरोना सनम से गलबहियां करने की कुछ ज्यादा ही चाहत रहती है। पर इन्हें ये नहीं पता होता, कि इनकी चाहत के चक्कर में इनका कोरोना सनम इनके अगल-बगल के लोगों से भी गलबहियां कर डालेगा।
जिले - फिर तो इन्हें कोरोना सनम से दूर रखने के लिए दिलबर लट्ठ से मिलवाना पड़ेगा।
नफे - दिलबर लट्ठ से मिलवाने का कार्यक्रम इनसे नेग वसूलने के बाद ही रखेंगे। अगर सही मात्रा में नेग न मिला तो इनकी दादी सास बुरा मान जाएगी।
जिले - अब ये इनकी दादी सास कौन है?
नफे - दादी सास बोले तो सरकार।
जिले - भाई, दादी सास को बिलकुल भी बुरा नहीं मानने देंगे। तू बस नेग वसूलने की तैयारी रख मैं कुछ देर में ही इन कोरोना काल की बहुओं को पकड़ कर तेरे पास लाता हूँ।
इतना कह कर जिले ने दिलबर लट्ठ को उठाया और कोरोना काल की बहुओं की ओर तेजी से चल पड़ा।
चित्र गूगल से साभार

गुरुवार, 3 जून 2021

व्यंग्य : आपदा के देव


      कोरोना संक्रमण से ठीक होकर जिले ड्यूटी जॉइन करने के बाद इमरजेंसी ड्यूटी पर नफे के साथ मोटरसाइकिल पर अपने थाना क्षेत्र में विचर रहा है। 
जिले - भाई नफे!
नफे - हाँ बोल भाई जिले!
जिले - आज सरकारी मोटरसाइकिल के पहिए किस मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं?
नफे - ये आज एक विशेष परिवार से मिलने जा रहे हैं।
जिले - ऐसा कौन सा विशेष परिवार है जो मोटरसाइकिल के पहिए पूरे जोश से भागे जा रहे हैं।।
नफे - वो विशेष परिवार पुलिस का खूनी परिवार है।
जिले - पुलिस का खूनी परिवार? भाई, यहाँ बड़ी मुश्किल से कोरोना से जान बचा के आया हूँ, अब तू पुलिस के खूनी परिवार के लफड़े में काहे को फँसा रहा है?
नफे - पुलिस के खूनी परिवार से डरने की जरूरत नहीं है।
जिले - भाई, एक तो वो पुलिस का खूनी परिवार है ऊपर से तू कह रहा है कि उससे डरने की जरूरत नहीं है।
नफे - हाँ, क्योंकि वो परिवार किसी का खून नहीं करता।
जिले - तो फिर क्या करता है? जरा खुल के बता।
नफे - पुलिस का खूनी परिवार अपनी धमनियों में दौड़ रहे रक्त को जरूरतमंदों को दान कर उनके जीवन की रक्षा करता है।
जिले - फिर तो भाई इस परिवार का नाम पुलिस का रक्तदाता परिवार होना चाहिए।
नफे - होना तो चाहिए पर आज के युग में लोग सकारात्मकता से एक कोस दूरी बनाकर रखना ही अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं। इसलिए रक्तदाता परिवार ने खूनी परिवार नाम ही अपनाना उचित समझा।
जिले - भाई, जहाँ दुनिया वाले पुलिस वालों का खून चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ते, वहीं पुलिस का ये खूनी परिवार लोगों को खून दान कर रहा है। वैसे ऐसा करके इस परिवार को मिलता क्या है?
नफे - रक्तदान के बाद आत्मिक संतुष्टि और लोगों का आशीर्वाद व दुआएँ।
जिले - इस कलियुग में आत्मिक संतुष्टि, आशीर्वाद व दुआएं तो बहुत कीमती चीजें हैं।
नफे - हाँ भाई, इन कीमती चीजों के लिए पुलिस के इस खूनी परिवार के कई सदस्य तो रक्तदान करने में शतक लगा चुके हैं।
जिले - नमन है ऐसे शतकवीरों को! जिस समय कुछ लोग कुटिलता और स्वार्थ का नगाड़ा पीटने में मस्त हैं, उस समय ये रक्तदानी मानवता की शहनाई बजा रहे हैं। (कुछ सोचते हुए) भाई, मैं एक बात सोच रहा हूँ।
नफे - जो सोच रहा है बोल दे।
जिले - मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी पुलिस के इस खूनी परिवार की सदस्यता ले लूँ। 
नफे - बिलकुल अच्छा सोचा है। जिले, उस दिन तू पूछ रहा था न कि देव कैसे होते हैं?
जिले - हाँ भाई, पूछा था पर तूने इसके बारे में बाद में बताने को कहा था।
नफे - अपने रक्त से मानव जीवन की रक्षा करने वाले देव नहीं तो और क्या हैं। इनके साथ-साथ वे सब मानव, देव की श्रेणी में रखे जा सकते हैं, जो ऐसे विकट काल में मानव जाति की सेवा और रक्षा में कर्मठता से जुटे हुए हैं।
जिले - सही कहा भाई, ऐसे मानव आपदा के देव ही हैं। इनके परिवार में सम्मिलित होकर मानवता की सेवा करना मेरा सौभाग्य ही होगा।
नफे - जिले, ये तेरा बहुत ही नेक विचार है।

गुरुवार, 27 मई 2021

व्यंग्य : कोरोना काल में गब्बर का नीतिशास्त्र

 

     नफे के फोन की रिंग टोन बजी। नफे ने फोन उठाया। फोन जिले का था।

जिले - हैलो भाई नफे!

नफे - हाँ बोल भाई जिले!

जिले - भाई, अब बोलने लायक कुछ बाकी नहीं बचा।

नफे - क्यों क्या हो गया?

जिले - हमारे पूरे परिवार की कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है। 

नफे - एक समय था जब 'बी पॉजिटिव' का संदेश दिया जाता था। अब तो पॉजिटिव होना भी किसी विडंबना से कम नहीं है।

जिले - भाई, यहाँ जान आफत में आ रखी है और तुझे प्रवचन सूझ रहे हैं।

नफे - अरे भाई, बुरा मत मान। वैसे तुझ जैसे जागरूक इंसान को कोरोना ने कैसे पकड़ लिया?

जिले - सब तेरी भाभी की कृपा है।

नफे - भाभी की कृपा?

जिले - हाँ सब उसी का किया धरा है।

नफे - जरा खुल के बता।

जिले - तेरी भाभी घर से बाहर कहीं भी जाती थी, तो बिना मास्क के जाती थी। सोशल डिस्टेन्सिंग और हाथ सेनेटाइज करने में उसकी नानी मरती थी। वो अपने साथ-साथ मुझे भी ये सब करने के लिए दुष्प्रेरित करती थी।

नफे - और तू दुष्प्रेरित हो परिवार सहित कोरोना के चंगुल में फंस गया। कम से कम तुझसे तो ये उम्मीद नहीं थी।

जिले - आखिर क्या करता? तेरे जैसे किसी साथी ने व्हाट्सएप्प पर एक मैसेज भेजा था।

नफे - कैसा मैसेज?

जिले - पत्नी से बहस, जीवन तहस-नहस।

नफे - और फिर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिले ज्ञान को मानकर पत्नी से बहस न करके कोरोना का उपहार ले लिया।

जिले - भाई, अब जो होना था सो हो गया। अब तो इस बीमारी से निजात पाने का कोई उपाय सुझा। हमारे पूरे परिवार का डर के मारे बुरा हाल हो रखा है।

नफे - इसका तो यही इलाज है कि डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवा और सलाह को मान, घर के भीतर निश्चित समय के लिए क्वारंटाइन रह और गब्बर के नीति शास्त्र का पालन कर।

जिले - गब्बर का नीति शास्त्र? इसके के बारे में तो पहली बार सुन रहा हूँ। कब छपा ये?

नफे - भाई, गब्बर का नीति शास्त्र व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर प्रकाशित कई भागों में बिखरी हुई किताब है। 

जिले - भाई, मुझे न पढ़नी कोई किताब-विताब। तू तो बस इस गब्बर के नीति शास्त्र का वो सिद्धांत बता दे, जिससे हम सबके प्राण बच जायें।

नफे - जो डर गया, समझो मर गया।

जिले - मतलब?

नफे - मतलब ये कि कोरोना से डर कर नहीं आशावादी सोच रखते हुए हिम्मत से मुकाबला करना है। 

जिले - भाई, पर इस सिद्धांत का तो खुद गब्बर ने ही पालन नहीं किया था।

नफे - इसीलिए तो मर गया।

जिले - (कुछ देर शांत रहने के बाद)  पर तेरा ये दोस्त जिले और उसका परिवार इतनी आसानी से मरने के बजाय गब्बर के नीतिशास्त्र के डर से संबंधित सिद्धांत को अपना कर निडरता से लड़ते हुए कोरोना की जंग को जीतेगा।

नफे - शाबास मेरे गब्बर शेर।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल बाबा से साभार 

शुक्रवार, 21 मई 2021

व्यंग्य : आपदा के असुर


     जिले ने नफे को आते  देखा तो मंदिर की सीढ़ियों से झटपट उतर कर नीचे आया और मोटरसाइकिल पर नफे के पीछे जाकर बैठ गया।

नफे – जिले भाई, आज बहुत टाइम लगा दिया पूजा में।

जिले – भाई, आज पंडित जी के श्रीमुख से देवासुर संग्राम की कथा में खो गया था।

नफे- अच्छा तो चल फिर अब अपने काम पर चलते हैं।

जिले – भाई, जहाँ चलना है चल पड़।

नफे - ड्यूटी अफसर ने एस.एच.ओ. साहब के आदेश से इमरजेंसी कॉल अटेंड करने को बोला है। 

जिले- तो फिर चल एस.एच.ओ. साहब के आदेश का पालन करते हैं।

इतना सुनते ही नफे ने मोटरसाइकल भगानी शुरू कर दी।

जिले- भाई नफे!

नफे- हाँ बोल भाई जिले!

जिले- आज के समय भी असुर और देव होते हैं क्या?

नफे- बिलकुल होते हैं।

जिले- तनिक उदाहरण देकर समझा।

नफे- आज के हालातों पर नज़र डाल तो चारों तरफ असुर आसुरी प्रवृत्ति का पालन करते हुए मिल जायेंगे।

जिले- भाई शब्दों में उलझाने के बजाय सीधे-सादे ढंग से समझा।

नफे - इन दिनों कोरोना महामारी ने देश-दुनिया में तबाही मचा रखी है। ऐसे समय में जहाँ अधिकतर लोग एक-दूसरे की मदद करने में लगे हुए हैं, वहीं कुछ धूर्त लोग इस आपदा में भी अवसर तलाशने में जुटे हुए हैं।

जिले - वो कैसे?

नफे- ये धूर्त लोग कालाबाजारी कर फल, सब्जी, घर के जरूरी सामान की कालाबाजारी कर जरूरतमंदों को औने-पौने दामों में बेच रहे हैं। जहाँ बीमार ऑक्सिजन की कमी के कारण अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं, वहीं ये धूर्त लोग ऑक्सिजन के सिलिंडरों को छिपा कर रख रहे हैं। रेमिडिसिवर इंजेक्शनों व कोरोना के इलाज में लाभदायक अन्य दवाइयों व मेडिकल से संबंधित सामान को अपने-अपने स्टोरों में भरकर इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि ये सब कालाबाजारी कर पैसा कमाने की अपनी हवस को पूरा कर सकें। 

जिले- भाई, मैंने भी सुना है कि जितनी दूरी तक जाने के लिए एम्बुलेंस से पाँच-छह हजार रुपये लगते हैं, उतनी दूरी के एक से डेढ़ लाख रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

नफे- बिलकुल ठीक सुना है। इन दिनों ये हर चीज के दस गुने दाम तक ये धूर्त लोग वसूल रहे हैं।

जिले- तेरे कहने का अर्थ है कि ये धूर्त लोग ही आज के असुर हैं।

नफे- हाँ भाई, वैसे इन्हें आपदा के असुर कहना ज्यादा बेहतर होगा। 

जिले- आपदा के असुर, अच्छा है इन धूर्तों के लिए ये नाम बहुत अच्छा है। अच्छा भाई, जो लोग इन दिनों बिना मास्क घूम रहे हैं, सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन नहीं कर रहे हैं और लॉकडाउन होने के बावजूद घर के बाहर भटक रहे हैं, उन्हें छोटे-मोटे असुरों की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं?

नफे- उन्हें आपदा के जूनियर असुर कहा सकता है। 

जिले- हा हा हा ये नाम उनके लिए उपयुक्त रहेगा। अच्छा ठीक है। आज के असुरों का तो पता चल गया अब आज के देवों के बारे में भी कुछ बता दे।

नफे- उनके बारे में बाद में बताऊँगा पहले इन आपदा के असुरों को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान में पहुँचाने की तैयारी करते हैं। 

इतना कहकर नफे ने बाइक रोक कर उसके साइड में लगा लट्ठ निकाला और ऑक्सिजन सिलिंडर की कालाबाजारी कर रहे आपदा के असुरों के बदन की मालिश करनी आरंभ कर दी। इस नेक कार्य में नफे का साथ जिले ने पूरी ईमानदारी से दिया।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 12 मई 2021

व्यंग्य : नफे का पड़ोसी धर्म


     फे टीवी पर पर कोरोना महामारी और उससे पीड़ित लोगों की  खबरों को सुनते-सुनते जब ज्यादा दुःखी हो गया तो उसने टीवी बंद करके रिमोट को एक तरफ फैंका और अपना सर पकड़ कर विचारमग्न हो सोफे पर बैठ गया। तभी उसकी पत्नी भागते हुए आयी और चुगलाये अंदाज में बोली।

पत्नी - सुनते हो जी?

नफे - सुनाओ जी!

पत्नी - अपने पड़ोसी जिले भाई साहब के पूरे परिवार को कोरोना हो गया है। डॉक्टर ने उन्हें अपने घर में ही 14 दिन क्वारंटाइन होने के लिए कहा है।

नफे - अरे, ये तो बहुत बुरा हुआ। मैं जिले को फोन कर पूछता हूँ कि अगर उसे किसी चीज की जरूरत हो तो पहुँचा देंगे।

पत्नी - पागल मत बनो। पता भी है कि ये कितनी खतरनाक बीमारी है। अगर लग गयी तो फिर भगवान ही मालिक है। आप उनसे दूर ही रहना। समझे कि नहीं? 

नफे - बहुत अच्छी तरह समझ गया। जिले की पत्नी और तुम तो बहुत अच्छी सहेलियाँ हो। आज जब दोस्ती निभाने का समय आया तो कृतघ्नता दिखाने लगीं।

पत्नी - अरे, दोस्ती, रिश्ते-नाते बाद में निभा लेंगे। अभी तो बस अपनी जान बच जाए।

नफे - तुम्हारा मतलब है कि जिले के परिवार की मदद करके हम सब मर जाएंगे।

पत्नी - ओहो, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे। 

नफे - मैं तुम्हें और तुम्हारी नीयत को अच्छी तरह समझ रहा हूँ। ठीक है मैं जिले के परिवार की कोई मदद नहीं करूँगा। 

धीरे-धीरे समय बीता और नफे का पड़ोसी जिले और उसका परिवार क्वारंटाइन का टास्क भली-भाँति पूरा करके स्वास्थ्य के अखाड़े में दंड पेलने लगा। कुछ दिन बाद नफे की पत्नी उसके पास आयी और बेजान आवाज में बोली।

पत्नी - सुनते हो जी?

नफे - सुनाओ जी!

पत्नी - हम लोगों ने जो कोरोना का टेस्ट करवाया था न।

नफे - हाँ तो?

पत्नी (सुबकते हुए) - उस टेस्ट में हम सबकी रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है।

नफे - (धीमे से) ओहो, तुम जैसी नेगेटिव नारी की भी रिपोर्ट पॉजिटिव आ गयी।

 पत्नी - कुछ कहा आपने?

 नफे- मैं कह रहा था कि अब 14 दिन घर से बाहर निकलने से छुट्टी।

पत्नी - हाँ, अब अपने पूरे परिवार को 14 दिन तक क्वारंटाइन रहना पड़ेगा।

नफे - हाँ, वो तो रहना ही पड़ेगा।

पत्नी - पर इतने दिन हमें जरूरत का सामान कौन लाकर देगा?

पति - अपना पड़ोसी  जिले लाकर देगा।

पत्नी - पर जब उनका परिवार क्वारंटाइन हुआ था। तब हमने तो उसकी कोई मदद नहीं की थी।

नफे - किसने कहा कि मदद नहीं की थी। तुम कृतघ्न हो गयीं पर मैं नहीं हुआ। मैंने जरूरत पड़ने पर जिले के परिवार को सभी जरूरी सामान उपलब्ध करवाया था। अब मदद करने की बारी उसकी है।

पत्नी - इसका मतलब है कि आपने मेरी बात न मान कर जिले भाई साहब के परिवार की मदद की थी।

नफे - हाँ, की थी। क्या मैंने कुछ गलत किया?

पत्नी - कुछ भी गलत नहीं किया। गलत तो मैं ही थी। मुसीबत के समय एक-दूसरे के काम आना ही पड़ोसियों का सच्चा धर्म है। और मुझे इस बात की खुशी है कि आपने अपना पड़ोसी धर्म अच्छी तरह निभाया। मुझसे जो इतनी बड़ी गलती हुई उसके लिए मुझे माफ़ कर देना।

नफे - अब आयीं न लाइन पर।

पत्नी - हाँ, और अब हमेशा लाइन पर रहूँगी।

तभी उन्हें अपने पड़ोस में रहने वाले सूबे के घर कुछ आवाज सुनाई दीं। सूबे की पत्नी उससे जोर-जोर से चिल्ला कर लड़ने में लगी हुई थी।

सूबे की पत्नी - खबरदार जो नफे भाई साहब के घर की ओर झाँक भी लिया तो तुम्हारी खैर नहीं।

सूबे - काहे को आसमान सर पर उठा रखा है। 

सूबे की पत्नी - आसमान सिर पर उठाऊँ तो और क्या करूँ। तुम अपनी आदतानुसार नफे भाई साहब से गुटर-गूँ किए बिना मानोगे नहीं। उस गुटर-गूँ के बाद कोरोना तुम्हारे संग आकर अपने पूरे परिवार से गुटर-गूँ करेगा। इसलिए कृपा करके अपने परिवार की सलामती के लिए उनके घर से कुछ दिन के लिए दूर ही रहना।

सूबे - ठीक मेरी माँ, मैं आज से नफे के घर की ओर मुँह करके सांस भी नहीं लूँगा।

नफे की पत्नी - सुन रहे हो? इस बदमाश औरत की जितनी मैंने मदद की होगी, उतनी तो इसके किसी सगे-संबंधी ने भी नहीं की होगी। फिर भी इसकी बातें हमारे लिए इतनी ज़हरीली हो रखीं हैं।

नफे - शायद सूबे की पत्नी पर तुम्हारी संगत का असर हो गया है।

नफे की पत्नी एक बार को गुस्से में नफे को देखती है और फिर ठहाका मार कर हँसने लगती है। नफे भी उस ठहाकों की दुनिया में ठहाके लगाते हुए शामिल हो जाता है। उन ठहाकों में नफे की पत्नी की आवाज सुनाई देती है "काश! सूबे भाई साहब पर आपकी संगत का असर हो और वो  भी आपकी तरह पड़ोसी धर्म निभाना न भूलें।" "बिलकुल असर होगा।" ठहाकों के बीच नफे का जवाब गूँजा।

गुरुवार, 6 मई 2021

व्यंग्य : मास्क और सोशल डिस्टेन्सिंग की मशक्कत


लॉकडाउन में पुलिस कर्मी जिले सिंह और नफे सिंह एक कॉलोनी में कॉलोनी वालों को बिना मास्क के लापरवाही से घूमते देखकर विचारमग्न हो खड़े हुए हैं।

जिले - भाई नफे!

नफे - हाँ बोल भाई जिले!

जिले - भाई हमने कॉलोनी के नोटिस बोर्ड पर सरकारी आदेश लगा दिया कि मास्क पहनकर रहो, सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करो और बिना-वजह घर से बाहर मत निकलो। इस बात को हमने कई बार लाउडस्पीकर पर बोल कर भी सुना दिया पर पब्लिक है कि मानती ही नहीं। देख तो कैसे लोग बिना मास्क और बिना सोशल डिस्टेन्सिंग के बेशर्मी से घूम रहे हैं।  

नफे- भाई हम आखिर कर भी क्या सकते हैं, देशवासियों की फितरत ही ऐसी हो गयी है, कि किसी सही काम को करने के लिए कहो तो उसे मानने में इनकी नानी मरती है। इनका चाहे जितने बार चालान कर लो पर ये सुधरने वाले नहीं हैं। सरकारी आदेश के विपरीत काम करने में शायद इन्हें कुछ ज्यादा ही मजा आता है।

जिले- सही कहा भाई, नियम तोड़ना तो देशवासियों की फितरत में शामिल हो गया है। पर हमें भी तो अपनी ड्यूटी पूरी करनी है। इसलिए इन बिना मास्क के घूम रहे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों को मास्क पहना कर सोशल डिस्टेन्सिंग में रखने का उपाय खोजना पड़ेगा।

नफे - इनका तो कुछ और ही इंतज़ाम करना पड़ेगा।

जिले - क्या इंतज़ाम सोचा है? ज़रा मुझे भी तो बता।

नफे - इधर कान ला।

नफे, जिले को कान में योजना समझाता है।

जिले नोटिस में 'मास्क पहनना व सोशल डिस्टेन्सिंग में रहना मना है। जो मास्क पहनेगा अथवा सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करता मिलेगा उसका जुर्माना किया जाएगा।' लिखकर लगा देता है और लाउडस्पीकर पर भी इस आदेश को  बोल कर पब्लिक को सुना देता है। 

कुछ देर बाद लोग सोशल डिस्टेन्सिंग में रहते हुए मुँह पर मास्क लगाकर घूमते हुए मिलते हैं।

जिले - भाई नफे!

नफे - हाँ बोल भाई जिले!

जिले - योजना काम कर गयी।

नफे - काम करनी ही थी। दुनिया में लोगों की फितरत ही ऐसी है। जिस काम को करने को कहोगे उसका उल्टा ही करते हैं।

जिले - ये बात तूने बिलकुल सही कही।

नफे - चल अब तू भी अपनी फितरत बदल।

जिले - मैं कुछ समझा नहीं।

नफे - इतनी देर से मास्क को नाक से नीचे कर रखा है। चल जल्दी से मास्क को ठीक तरह से पहन ले।

जिले - अरे भाई, इन उल्लुओं के चक्कर में मैं खुद ही अपने मास्क पर ध्यान देना भूल गया। 

जिले अपने मास्क को ठीक करके पहनता है।

नफे - अब ठीक है।

जिले - वियर मास्क, कीप सोशल डिस्टेन्सिंग, स्टे होम, स्टे सेफ! 

जिले उत्साह के साथ मुस्कुराते हुए नफे से बोलता है।

नफे - पहले दो नियम तो हम पुलिस वाले अपना ही रहे हैं, पर हम पुलिस वालों की किस्मत में घर में रहना कहाँ लिखा है। (अपनी लाठी उठाते हुए) चल अब निकलते हैं।

जिले - अब कहाँ चलना है?

नफे - भाई, दूसरी कॉलोनी के ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों को भी मास्क पहनवाने और सोशल डिस्टेन्सिंग में रखने की मशक्कत करनी है।

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