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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

चौथा पुतला



    स बार दशहरे के अवसर पर स्त्रियों से पीड़ित पुरुषों की इच्छा है कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के साथ रावण का स्त्री स्वरूप एक चौथा पुतला भी दहन के लिए खड़ा किया जाए। 

इस पुतले का दसवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसे उसके पति ने अपनी जमापूंजी खर्च करके खूब पढ़ाया-लिखाया हो और उसके बाद वह इस काबिल हो गई कि किसी सरकारी विभाग में अफसर चुनी गई हो और अफसर बनते ही अपने पति को लात मारकर किसी अफसर के साथ ही प्यार की पींगे बढ़ा रही हो।

इस पुतले का नौंवा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसका शादी से पहले ही किसी और पुरुष से पक्का वाला याराना चल रहा हो और मा-बाप के द्वारा विवशता में शादी करने के बाद जो अपने पति को पहाड़ों पर हनीमून मनाने के बहाने ले जाकर किसी ऊंचे पहाड़ से उसको धक्का देकर उसका राम नाम सत्य कर चुकी हो।

इस पुतले का आठवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने त्रिया चरित्र को नया आयाम देकर अपने पति को इतना अधिक परेशान कर उसका जीना मुश्किल कर चुकी हो, कि अंततः उसे वीडियो बनाकर अपनी दुःख भरी आपबीती बताने के बाद आत्महत्या करने के लिए विवश कर चुकी हो।

इस पुतले का सातवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो पतिव्रता का अभिनय करने में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की दावेदारी करे और पति के घर से बाहर होने पर पराए मर्दों संग प्रेम का नया अध्याय लिखे। या यूं कहें कि ऐसी स्त्री जो सबके सामने सती सावित्री बनने का ढोंग करे और अपने कर्मों से नगर वधुओं को मात दे।

इस पुतले का छठा सिर ऐसी स्त्री का हो जो यौन शोषण के झूठे आरोप लगा कर अधिक से अधिक पुरुषों के जीवन की नैया डुबो चुकी हो।

इस पुतले का पांचवां सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों को धीमा विष खिलाते हुए पुण्य कमाने के उपक्रम में लगी हुई हो।

इस पुतले का चौथा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो दहेज मांगने का झूठा आरोप लगा शादी के मंडप पर पुलिस को बुला कर दूल्हे और उसके परिवार वालों को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान की यात्रा पर भिजवा कर अपने बॉय फ्रेंड संग गुलछर्रे उड़ाए।

इस पुतले का तीसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जो स्वयं को चोटिल करके पुलिस वालों को नियमित रूप से अपने ससुराल में चाय पीने का अवसर प्रदान कर ससुराल पक्ष की ढंग से इज्जत उतरवाए।

इस पुतले का दूसरा सिर किसी ऐसी स्त्री का हो जिसने केवल इस उद्देश्य से शादी की हो कि कुछ दिनों बाद अपने पति से तलाक़ लेकर उससे अच्छी खासी संपत्ति एल्युमनी के रूप झटक कर अपना बाकी जीवन अय्याशी से व्यतीत करे।

इस पुतले का पहला अर्थात मुख्य सिर प्रतीक रूप में किसी ऐसी स्त्री का हो जो मां, बहन या सहेली की भूमिका निभाते हुए उपरोक्त वर्णित स्त्रियों को उनके पुरुष मिटाओ पावन अभियान में भरपूर सहयोग करे।

रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले पर अग्नि बाण चलाने का सौभाग्य किसी ऐसे पुरुष को प्रदान किया जाए जो किसी स्त्री द्वारा झूठे आरोप में फंसाए जाने के बाद वर्षों तक जेल में रहने का सुख भोग कर आया हो। इस पुतले के थोड़ी दूरी पर एक डांस फ्लोर भी बनवाया जाए ताकि जब रावण के स्त्री स्वरूप इस पुतले का दहन किया जाए तो स्त्रियों द्वारा पीड़ित पुरुष नाचते हुए "सियापति रामचंद्र की जय!" का जयकारा पूरी उमंग व जोश के साथ लगा सकें।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह 

चित्र - Meta AI से साभार 

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

भुतहा सरकारी मकान

     जैसे एक आम आदमी के लिए सरकारी नौकरी पाने की तीव्र इच्छा होती है वैसे ही सरकारी नौकरी वाले जीव को सरकारी मकान पाने की दिली चाहत होती है। अब चूंकि सरकारी वेतन उसको और उसके परिवार को पालने में ही दम तोड़ देता है इसलिए निजी मकान के सपने देखना छोड़ सरकारी मकान को खोजना उसकी विवशता हो जाती है। वैसे देखा जाए तो सरकारी जीव के लिए सरकारी मकान अलॉट करवाना आसमान से तारे तोड़ कर लाने जितना ही आसान होता है। इस आसान काम को बहुत आसानी से पूरा करने के बाद जब उस बेचारे को इस बात का पता चलता है, कि जिस सरकारी मकान को उसने दुनिया भर के आसान उपायों को आजमा कर हासिल किया है वह तो भुतहा है तो उसका हाल धोबी के कुत्ते की भांति हो जाता है। सरकारी मकान अलॉट होने के बाद वह सरकारी जीव जिस मकान में किराए पर रह रहा होता है उसके मालिक को जल्द से जल्द मकान खाली कर सरकारी मकान में जाने की बात कह कर वह उसे धमकाते हुए एडवांस किराया देने से साफ इंकार कर चुका होता है। फलस्वरूप उसके मकान का मालिक अपने मकान को दूसरे किरायेदार से एडवांस लेकर उसके लिए बुक कर चुका होता है। अब उस सरकारी जीव के सामने केवल दो ही परिस्थितियां होती हैं कि या तो वह उस भुतहा सरकारी मकान में बस कर भूतों से दो – दो हाथ करे या फिर दूसरा किराए का मकान तलाशने के लिए जूते घिसे।

इससे पहले कि सरकारी जीव दोनों परिस्थितियों में से किसी एक का चुनाव करे आइए हम सरकारी मकान के भुतहा बनने की प्रक्रिया पर दृष्टि डाल लेते हैं।

सरकारी मकान जब कई सालों तक खाली रहता है तो उसके दो परिणाम होते हैं। पहला परिणाम होता है कि वह आसपड़ोस के लिए बहुत ही काम की वस्तु हो जाता है। पहले परिणाम के स्वरुप दूसरा परिणाम ये होता है, कि वह मकान आसपड़ोस वालों के अतिरिक्त बाकी कॉलोनी वासियों के लिए भुतहा घोषित हो जाता है।

उस भुतहा मकान में अंधेरा होते ही अजीबोगरीब आवाजें आने लगती हैं, जिनके बारे में ये बताया जाता है कि वो भूतों की आवाजें हैं। जबकि उस मकान में कभी आसपड़ोस के बेवड़े नशे में धुत्त होने के बाद लड़ते हुए कुटने-कूटने की ध्वनि उत्पन्न करते हैं तो कभी अगल–बगल के प्रेमी युगल जिगर से बीड़ी जलाने के उपक्रम में जुट कर रोमांटिक ध्वनियों के उत्सर्जन में अपना पावन योगदान देते हैं। पड़ोस के मकानों का आलतू–फालतू सामान उस भुतहा पड़े मकान की शोभा बढ़ाता है। रात में पड़ोस की भली नारियां अपना फालतू सामान भुतहा मकान में धरने के दौरान कभी–कभार जब फिसल कर धम्म से फर्श पर गिरती हैं तो गिरने के परिणामस्वरूप निकलीं उनकी चीखों को चुड़ैल की चीखें मान कर कॉलोनी के वीर निवासियों द्वारा उस स्थान से निकलने से बिलकुल परहेज कर लिया जाता है। आसपड़ोस के घरों के सामान रूपी कचरे की अधिकता से जब वायुदेव उस मकान से आवागमन करने को तिलांजलि दे देते हैं तो उस भुतहा मकान में सड़ांध के व्यवसाय में बहुत तेजी से वृद्धि होने लगती है।

अब चूंकि सरकारी जीव सरकारी कार्यालय और आम जीवन में जीवित भूतों से निरंतर जूझते हुए ही जीवन व्यतीत कर रहा होता है, इसलिए वह पहली परिस्थिति को ही स्वीकार कर सरकारी मकान में आने का निश्चय कर लेता है। उसे उस भुतहा सरकारी मकान के आसपड़ोस के भले लोगों द्वारा बहुत समझाया जाता है, लेकिन वह सरकारी जीव अपने निर्णय पर अटल रहता है। उसके अटल निर्णय के परिणामस्वरूप उस सरकारी मकान से भुतहा आवाजें आनी धीमे–धीमे बंद हो जाती हैं और उस सरकारी जीव व उसके परिवार द्वारा उस सरकारी मकान में गृह प्रवेश करने के साथ ही भुतहा आवाजें वहां से अपना बोरिया–बिस्तर समेटकर किसी अन्य खाली सरकारी मकान में जाकर डेरा डाल लेती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

चित्र गूगल से साभार 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

व्यंग्य की कढ़ाही चढ़ाते रामस्वरूप दीक्षित

    त्तर प्रदेश के महोबा जिले में जन्मे रामस्वरूप दीक्षित रीवा विश्वविद्यालय से कला स्नातक हैं। वह देश के विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में अपनी साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ - साथ लगभग एक दर्जन साझा संग्रहों के सहभागी बन चुके हैं तथा अपनी तीन स्वतंत्र पुस्तकों का सृजन कर रचनाकर्म में निरन्तर रत रहते हुए इन दिनों वह समकालीन व्यंग्य व्हाट्सएप समूह में वरिष्ठ व्यंग्यकारों के साथ बैठकर व्यंग्य की कढ़ाई चढ़ा उसमें रचना रुपी जलेबियां तलने में मग्न हैं। विसंगतियां, विद्रूता, भ्रष्टाचार, अश्लीलता इत्यादि सामाजिक बुराइयां जलेबियों का वेश धर व्यंग्य की कढ़ाही में इस दुर्भावना से कूदने को आतुर हैं, कि वे सब मिलकर उस कढ़ाही का राम नाम सत्य कर डालें, किंतु रामस्वरूप दीक्षित व उनके साथियों के साथ देश - विदेश के लेखक - साहित्यकार उनकी इस कुत्सित योजना के फलीभूत होने से पहले ही उन सबको तलकर करारी जलेबी के रूप में साहित्य प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं। रामस्वरूप दीक्षित से हमने व्यंग्य की कढ़ाही में जलेबियां तलने से थोड़ी देर के लिए विराम लेकर हमारे कुछ प्रश्नों का समाधान करने का आग्रह किया, ताकि पाठक जन उनकी जलेबी तलने की यात्रा अर्थात साहित्यिक यात्रा को जानने का सुख प्राप्त कर सकें।

आपको जलेबी तलने माफ कीजिए लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रामस्वरूप दीक्षित - लेखन को मैं रोग नहीं, रोगों का इलाज मानता हूं। 1984 से लेखन के क्षेत्र में हूं। देश और समाज में हर क्षेत्र में मनुष्य या व्यवस्था निर्मित करुणाजनक व त्रासद स्थितियों में वांछित बदलाव के प्रति लोगों में चेतना जाग्रत करने के उद्देश्य से कुछ करने के विचार ने लेखन में प्रवृत्त किया। सफर जारी है और शरीर में शक्ति रहने तक जारी रहेगा।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रामस्वरूप दीक्षित - लेखन को अगर आप सोद्देश्य कर रहे हैं तो इसका प्रभाव आप या पाठकों पर सकारात्मक ही होता है। मेरे लेखन ने मुझे एक बेहतर व चेतनासम्पन्न मनुष्य बनने में मदद की।  अपने पूर्वाग्रहों से हमें हमारा लेखन ही मुक्त करता है। लेखन खुद से भी मुक्ति का मार्ग है। अपने व्यक्ति से परे जाकर ही आप ईमानदार लेखन कर पाते हैं। लेखन आपके भीतर साहस और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की ताकत पैदा करता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

रामस्वरूप दीक्षित - निश्चित ही लगता है। अगर यह न लगे तो लिखना व्यर्थ है। समाज में आज तक जो भी अच्छे बदलाव आए वे लेखन की वजह से ही। लेखन बदलाव का सबसे कारगर उपाय है। यद्यपि बदलाव की गति बहुत बार दिखाई नहीं देती क्योंकि वह , बाहरी न होकर अंतर्निहित चेतना के स्तर पर होता है , जिसका बहुत स्थूल रूप से पता लगाना संभव नहीं हो पाता। समय जैसे जैसे बीतता है , यह बदलाव साफ दिखाई देने लगता है। जरूरी नहीं कि लेखक अपने जीवन में अपने लिखे से होने वाले परिवर्तन को देख पाए। यह बात प्रतिबद्ध और ईमानदार लेखन के संदर्भ में ही कही जा रही है, क्योंकि प्रतिगामी व यथास्थितिवादी लेखन भी हर काल में होता रहा है, आज भी हो रहा है।

आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रामस्वरूप दीक्षित - मैं अपनी हर रचना से बराबर प्रेम करता हूं । रचना हमारी संतान की तरह है जिसे जन्म देने में रचनाकार को , चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, गहरी और पीड़ादाई प्रसव वेदना सहन करनी होती है। फिर जन्म लेने वाली संतान कुरूप या विकलांग ही क्यों न हो उससे वैसा ही प्रेम जन्मदाता का होता है जैसा सुंदर ,सुडौल व ताकतवर संतान से। तमाम रचनाओं में से किसी एक रचना का प्रिय होना रचनाकार का खुद की अन्य रचनाओं को अप्रिय सिद्ध करना है। हर रचना की अपनी अलग पहचान, अलग व्यक्तित्व और अलग प्रभाव और रूतवा होता है। बहुत बार कोई रचना अपने रचयिता से भी बड़ी हो जाती है। किसी लेखक की सबसे प्रिय रचना उसके पाठक जी बेहतर बता सकते हैं और उसकी सबसे ताकतवर रचना के बारे में आलोचक।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

रामस्वरूप दीक्षित - वही जो मेरी रचनाओं में सन्निहित है। लेखक जो भी संदेश समाज को देना चाहता है वह उसकी प्रायः हर रचना में अंतर्निहित होता है। अलग से दिया जाने वाला संदेश , संदेश न होकर उपदेश होता है और मेरे अपने विचार से किसी भी लेखक को उपदेशक की भूमिका से खुद को बचाए रखना चाहिए।उ पदेशकों ने समाज का जाने, अनजाने बहुत अहित किया है और अभी भी कर रहे हैं।ले खक समाज को उपदेश या संदेश न देकर उससे सीधा संवाद करता है। उसकी हर रचना लोक को ही संबोधित होती है।

रविवार, 14 अगस्त 2022

तिरंगे की निश्चिंतता

    तिरंगा इन दिनों प्रफुल्लित हो मुस्कुरा रहा है। मुस्कुराए भी क्यों न आखिरकार उसे हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत देश के चप्पे - चप्पे में लहराने का सुखद आनंद जो प्राप्त होने जा रहा है। जहां अधिकांश देशवासी तिरंगे को प्रसन्नता पूर्वक अपने - अपने घरों में फहराने की योजना बना रहे हैं, वहीं कुछ देशवासी विवशता व अनिच्छा का अपने मन-मस्तिष्क में घालमेल कर तिरंगा न फहराने की जुगत भिड़ा रहे हैं। इन दिनों जिस ओर भी दृष्टि दौड़ाओ वहां तिरंगा ही दिखाई दे रहा है। सड़कों पर वाहन चालकों से किसी न किसी प्रकार धन ऐंठने वालों ने भी आजकल तिरंगे की शरण ले ली है। उनके द्वारा भावनाओं का व्यापार कर वाहन चालकों को औने-पौने दामों में तिरंगे सौंपे जा रहे हैं। दुकानों पर बिकने को आतुर तिरंगे बाजारों की शोभा बढ़ा रहे हैं और साथ ही साथ कई बेचारों का जी कोयले की भांति जला रहे हैं। तिरंगा इन दिनों व्यस्त होने का एक माध्यम भी बन गया है। सरकारी कार्यालयों में छोटे - बड़े कर्मचारी तिरंगे के संसार में व्यस्त हैं। बड़े कार्यालयों से छोटे कार्यालयों में धड़ाधड़ तिरंगों की खेप भिजवाई जा रही है। आदेशानुसार छोटे कार्यालयों से कर्मचारियों की घर पर लहराते तिरंगे के साथ मनमोहक फोटो व सेल्फियां बड़े कार्यालयों की ओर सावधानी से मार्च करती हुईं पहुंच रहीं हैं। इस बार तिरंगा कुछ निश्चिंत सा है। उसका निश्चिंत होना स्वाभाविक भी है। अब परिस्थितियां जो उसके अनुकूल हैं। अब न तो उसे सरेआम जलाए जाने का डर है और न ही फाड़ कर अपमानित किए जाने का भय। इन दिनों निश्चिंतता उसका स्वभाव बन गई है। अब वह निर्भय और निश्चिंत हो हवा संग अठखेलियां खेलते हुए जमकर लहरा रहा है। देश में आयोजित किए जा रहे अमृत महोत्सव में तिरंगे को अमृत चखे जाने की अनुभूति हो रही है।

     अचानक कुछ कर्कश ध्वनियों को सुन तिरंगा विचलित हो उठता है। "मेरे दिल में देशभक्ति कूट - कूट कर भरी हुई है ये जरूरी तो नहीं कि मैं अपनी देशभक्ति का झूठा दिखावा करने के लिए अपने घर में तिरंगा फहराने का ड्रामा करूं।" "ये लोग घर-घर तिरंगा फहराने के षड्यंत्र के अनुसार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं।" "बाबू जी, हर गली शराब की दुकान योजना ने हमारी हालत पतली कर दी। शराब ने हमारा सबकुछ बिकवा दिया। हम तिरंगा घर पर फहराएंगे पर पहले हम बेघरों को घर तो दो, वरना हम नहीं फहराने वाले तिरंगा - विरंगा।" ये सब सुन कर तिरंगा सकुचाते हुए उदास हो धीमी गति से लहराने लगता है। तभी तिरंगे को जय हिंद और वंदे मातरम का घोष करती हुई भीड़ दिखाई देती है। उसे दिखाई देता है कि भीड़ के बीच में अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर सैनिक का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ उसके अपनों को अपने अंतिम दर्शन देने के लिए चला आ रहा है। ये दृश्य देखकर तिरंगा द्रवित हो उठता है और अचानक वह तन कर ये सोच कर गर्व से पुलकित हो लहराने लगता है कि जब तक देश की खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूत हैं तब तक तिरंगे के सम्मान को कोई आंच नहीं आ सकती।

शनिवार, 2 जुलाई 2022

साहित्य धर्म का निर्वहन करते विजय उपाध्याय

     हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में बतौर सिविल इंजीनियर कार्यरत विजय उपाध्याय को बीस वर्ष की आयु में साहित्य पढ़ते-पढ़ते एक दिन अनुभव हुआ, कि लेखक नामक जीव इनके मन-मस्तिष्क में भी वास कर रहा है। इस अनुभूति के पश्चात इन्होंने कलम उठायी और लिखने लगे। इनकी पहली रचना राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित भी हुई। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर देखना अनुचित समझा। एक दशक तक इन्होंने दैनिक ट्रिब्यून, अजीत समाचार एवं अमर उजाला में पत्रकारिता की। इनकी रचनाएँ देश के जाने-माने समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं। जहाँ इनके पुरखों ने पंडिताई करके सनातन धर्म का पालन किया, वहीं विजय उपाध्याय वर्षों से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपनी नौकरी के साथ-साथ साहित्य धर्म का निर्वहन कर रहे हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

विजय उपाध्याय - लेखन का रोग तो बीस बरस की उम्र में लग गया था, मगर उससे पहले पढ़ने का रोग लग गया। कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती। जब अक्षर ज्ञान हो गया तो पाठ्यक्रमों में लगी पुस्तकों में से कहानियां छांट कर पढ़ने लगा। फिर भाई-बहनों की किताबों से कहानियां ढूंढ कर पढ़ने लगा। घर में पुरखे पंडिताई करते आ रहे हैं इसलिये गीता प्रैस से कल्याण और बाकी किताबें घर आती थी। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने तक गीता, रामायण, सुख सागर, महाभारत, गरूड़ पुराण और कुछ ज्योतिष की किताबें पढ़ चुका था। हाई स्कूल में पहुंचते और मैट्रिक करने तक पुराण पढ़ने की तीव्र इच्छा हुई तो पिता जी से अनुग्रह किया कि मुझे पुराण पढ़ने हैं। उन्होंने प्रबंध कर दिया तो वो भी पढ़े। बाद में कालेज पहुंचा तो मैग्ज़ीनों से वास्ता पड़ा। लाइब्रेरी में किताबें मिलने लगीं तो जो भी हाथ लगा वह पढ़ डाला। उस के बाद बड़ों और गुरूजनों ने जो सुझाया वह पढ़ डाला। कुख्यात और विख्यात लेखकों को पढ़ना आदत बन गयी। इसी बीच अनुभूति हुई कि आजकल जो कुछ अखबारों और पत्रिकाओं में छ्प रहा है वह तो मैं भी लिख सकता हूँ। पहले फीचर लिखे। जब वो छपे तो हौंसला बढ़ गया फिर लघुकथा और व्यंग्य लिखने लग गया। प्रतिक्रियाएं मिलती तो मन प्रफुल्लित हो जाता। तब तक पत्रकारिता में आ चुका था फिर तो सिलसिला ही चल निकला। लिखने और पढ़ने के अलावा कुछ और नही सूझा। पहली कहानी लघुकथा थी जो बीस बरस की उम्र में लिखी और उस वक्त दैनिक ट्रिब्यून में छपी थी। मैं सोच-समझ कर या जानकर कभी नहीं लिख सका। जब भी कोई बात या मुद्दा मुझे अंदर तक झकझोर देता है, तब लिखने की प्रेरणा देता है। एक तरह से ऊबकाई या प्रसव की तरह। जब तक मैं उसे शब्दों में ढालकर लिख नहीं देता तब तक भीतर की बेचैनी खत्म नहीं होती।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

विजय उपाध्याय - लिखने-पढ़ने का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक छोटे से गाँव में, जहाँ ज्ञान प्राप्ति का कोई साधन नहीं रहा, किताबें ही मेरी दोस्त, हमसफर और मार्गदर्शक बन गयीं। ज्ञान चक्षु खुले तो आभास हुआ मुझे कुछ नहीं आता। ज्ञान पिपासा से पीड़ित हुए तो लिखने का भी उबाल आने लगा। इसका फायदा यह रहा कि हम जब भी किसी महफिल या विद्वानों के सानिध्य में बैठे और जब हमने संदर्भ सहित लेखन की बात की तो हमें सराहा गया और ज्ञान से आत्मविश्वास पैदा हुआ जो जीवन में बहुत जरूरी है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

विजय उपाध्याय - लेखन और पठन से ज्ञान की प्राप्ति होती है मगर समाज में उससे बदलाव हुआ इस बारे कुछ नहीं कहा जा सकता। बदलाव लोगों की मानसिकता पर निर्भर है। बीड़ी, सिगरेट और शराब जैसी कई चीजों पर लिखा रहता है कि यह सेहत के लिए हानिकारक है, मगर लोग पढ़ कर भी कहाँ मानते हैं। यही स्थिति लेखन पर भी लागू होती है। लोग पढ़ते हैं मनोरंजन के लिए और फिर उससे सबक तो लेते हैं मगर उपयोग बहुत कम करते हैं। लेखन से हर दिशा का पता चलता है। लेखन हर देश काल का आईना होता है। समझदार लोग उस पर अमल कर अपना जीवन सरल बनाते हैं। अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि लेखन का प्रभाव नहीं होता। कम से कम मानसिक स्थिरता और शांति तो रहती ही है।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

विजय उपाध्याय - मेरी साहित्यिक रूचि कहानियों में है। अपनी लिखी कहानी की बात करुं तो मुझे 'पापा के नाम' कहानी बहुत प्रिय है। ये बहुत ही मार्मिक कहानी है। सात पोस्ट कार्ड पर बिना कोई शब्द गंवाए कसी हुई कहानी है। इसमें गरीबी और आर्थिक तंगी में फूटती कोंपल है तो बीमारी और बेरोजगारी की लाचारी भी है। ये कहानी निजी स्कूलों के खोखले आदर्शों  और छोटे बच्चों की संवेदनाओं को ताक पर रखती व्यवस्था की भी पोल खोलती है। दूसरी कक्षा की बच्ची के शब्दकोष के हवाले से कहानी कहना आसान नहीं है। अभी तक आलोचना के लिए इस में से कुछ मिला नहीं है। मेरी बेटी जब स्कूल जाने लगी तो वह हर दिन वहाँ घटने वालीं कुछ न कुछ घटनाएं शेयर करती और मैं बडे़ ध्यान से सुनता। इस कहानी का कथानक मेरी बेटी की ही देन है, मैने तो बस पत्र शैली में गूँथा है। ये छोटी और मारक कहानी है इसलिए मुझे सर्वाधिक प्रिय है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

विजय उपाध्याय - मैं अपने लेखन से यह संदेश देना चाहता हूं कि जीवन से कृत्रिमता को हटा दीजिए। सरल और प्राकृतिक जियें। आडंबर और दिखावे से दूर रहें, जो व्यवहार आप को पसंद नहीं वह दूसरों से न करें, सरल और विनम्र रहें। जीवन बहुत छोटा है इसे किसी घमंड की छाया में बैठकर बर्बाद न करें।

शनिवार, 18 जून 2022

आसमां छूने का जोश जगाते सुयश कुमार द्विवेदी

 

      त्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सुयश कुमार द्विवेदी पेशे से सहायक लोक अभियोजन अधिकारी हैं, लेकिन हृदय से रचनाकार हैं। अब तक दो पुस्तकें लिख चुके सुयश अपनी कलम पाठकों में उत्साह बढ़ाने के लिए चला रहे हैं। इनकी पहली पुस्तक 'सपनों को अपने जी ले रे' जहाँ आपको अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित करेगी, वहीं शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही इनकी दूसरी पुस्तक 'छू ले आसमां' आपके भीतर ऊंचाइयों का आकाश छूने का जोश जगाएगी। सुयश की रचनाएँ विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा लेखन के लिए शोभना सम्मान-2020 समेत अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

सुयश कुमार द्विवेदी -  मुझे हिंदी साहित्य पढ़ने का शौक बचपन से ही है। जब मैं कक्षा चौथी में था, तभी से मेरी दिलचस्पी कहानियों, कविताओं एवं नाटकों के प्रति काफी गहरी हो गयी। जब मैं कोई भी कहानी या काव्य की पुस्तक पाता तो उसे एक बार में पढ़ कर ही साँस लेता था। पढ़ते-पढ़ते कब मैंने लिखना शुरू कर दिया, मुझे ठीक से याद नहीं है। जहाँ तक मुझे याद है मैंने आठवीं कक्षा में अपनी  पहली कविता 'प्रेरणा' की रचना की थी।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

 सुयश कुमार द्विवेदी - लेखन से मेरे जीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मुझे यह लगता है कि व्यक्ति के जीवन में सबसे अच्छा दोस्त कोई होता है, तो वो होती है पुस्तकें। मैंने अपने अब तक जीवन में सैकड़ों कहानियां, कविताएँ एवं दर्जनों उपन्यासों को पढ़ा है। आत्मकथा, यात्रा वृतांत, लघुकथाएं एवं नाटकों की कोई गिनती नहीं है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी की सहजता और सरलता का मैं कायल रहा हूं। लेखन से व्यक्ति के जीवन में नए-नए विषयों के अध्ययन की जिज्ञासा, चिंतन की गुणवत्ता, व्यक्तित्व का निखार, समय की पाबंदी, आत्म अनुशासन एवं सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है और ऐसा मैंने अनुभव भी किया है। 

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

सुयश कुमार द्विवेदी - कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेखन से समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है। हर काल में समाज के चिंतकों, मनीषियों, ऋषियों, लेखकों एवं कवियों ने अपने लेखन के माध्यम से समाज को जागृत करने का पुरजोर यत्न किया है और वे काफी हद तक समाज में व्यापक परिवर्तन लाने में सफल रहे। जब-जब समाज को जरूरत पड़ी, इन लोगों ने समाज का मार्ग प्रशस्त किया है एवं अपनी लेखनी चलाकर समाज को दर्पण दिखाया है। संत कबीर का लेखन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

सुयश कुमार द्विवेदी - मैंने अब तक दो सौ से अधिक कविताओं और गीतों की रचना की है। मुझे मेरी सभी रचनाएँ पसंद हैं, क्योंकि मैं रचनाएँ व्यवसाय के लिए नहीं अपितु आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे लिखना पसंद है। मेरी सबसे प्रिय रचना 'सुबह का अखबार' है। इस रचना के लिए मुझे गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रथम पुरस्कार भी मिल चुका है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

सुयश कुमार द्विवेदी - सच कहूँ तो मैं अपने लेखन से समाज से कोई संदेश अभी नहीं दे सकता, क्योंकि मैं अपने आपको इस योग्य ही नहीं समझता। समाज को संदेश देने का कार्य बड़े लेखकों एवं कवियों का है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि मैं आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ और अगर मेरे लेखन से यदि कोई व्यक्ति प्रेरणा पा सके तो यह मेरे लिए गौरव का विषय होगा।

शनिवार, 4 जून 2022

साहित्य की संदूकची भरतीं रुपाली सक्सेना

      ध्यप्रदेश के भोपाल के हर्षवर्धन नगर क्षेत्र की रुपाली सक्सेना की हिंदी साहित्य से भेंट एक पाठक के रूप में हुई थी। पेशे से वस्त्र सज्जाकार रूपाली सक्सेना का साहित्य से इतना लगाव हो गया, कि एक दिन इन्होंने लिखना भी आरंभ कर दिया। इनकी लेखन यात्रा का शुभारंभ इतना धुंआधार हुआ, कि इनकी रचनाएं देश भर के समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाने लगीं। इनके द्वारा किए गए साहित्यिक परिश्रम के फलस्वरूप इनकी पहली पुस्तक 'स्नेह की संदूकची' प्रकाशित हुई व कुछ साझा संकलनों में भी इनकी रचनाओं ने अपनी दमदार भागीदारी सुनिश्चित की। अब तक रुपाली सक्सेना अपने लेखन के लिए कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त कर चुकीं हैं तथा अपनी साहित्य की संदूकची में नित प्रतिदिन नई-नई रचनाओं एवं सम्मान व पुरस्कारों को भरने में रत हैं। हमने इनसे कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रुपाली सक्सेना - मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि साहित्यिक है अतः साहित्य से मेरा जुड़ाव बचपन से ही था। स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी मैं साहित्यिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया करती थी। मैं लिखती तो थी, लेकिन अपने मन के उद्गारों को लिखकर मैं अपनी डायरी में छिपा दिया करती थी। विवाह होने के कई वर्षों के बाद अपनी बड़ी बहनों के प्रोत्साहन के बाद मैंने फिर से लिखना आरंभ कर दिया।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रुपाली सक्सेना - लेखन से मुझ पर बुरा नहीं बल्कि हमेशा की तरह सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। जिंदगी जीने का और उसे समझने का एक नया दृष्टिकोण मुझे लेखन से ही मिलता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन से समाज में कुछ बदलाव लाया जा सकता है?

रुपाली सक्सेना - जी बिल्कुल, मेरा विश्वास है कि लेखनी में जो शक्ति होती है वो किसी और में नहीं होती है।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रुपाली सक्सेना - 'आसान नहीं है औरतों के लिए कविता ग़ज़ल या गीत लिखना' मेरी सबसे प्रिय रचना है। मेरी यह रचना उन सभी गृहणियों को समर्पित है, जो अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर सृजन कार्य कर रहीं हैं।

आप अपने लेखन से पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगीं?

रुपाली सक्सेना - मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपने लेखन से समाज में व्याप्त कुरीतियों और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता का संचार करूँ।

मंगलवार, 31 मई 2022

नेपाल में हिंदी की पताका फहरातीं सुमी लोहनी


      सुमी लोहनी काठमांडू, नेपाल के भाटभेटनी क्षेत्र में निवास करते हुए पिछले कई वर्षों से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। कविता, कहानी, नाटक, हाइकू, हास्य व्यंग्य, लेख, जीवनी व संस्मरण इत्यादि विधाओं में उनकी लेखनी निरंतर चल रही है। लेखन के साथ-साथ वह अनुवाद व संपादन में भी रत हैं। उनकी अब तक कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। नेपाली भाषा में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक मासिक पत्रिका शब्द संयोजन व ऑनलाइन पत्रिका दीपश्री उनके संपादन में कई वर्षों से फलफूल रही हैं। इस समय सुमी लोहनी ऑस्ट्रेलिया प्रवास पर हैं। हमने उनके व्यस्त समय में कुछ क्षण लेकर कुछ प्रश्नों के माध्यम से उनकी लेखन यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

सुमी लोहनी - मेरा बचपन मेरे ननिहाल में बीता। परिवार में मेरे बुजुर्ग नाना-नानी और मैं ही थे । मेरे साथ बातें करने व हँसने-बोलने के लिए कोई नहीं था । मुझे बहुत अकेलापन अनुभव होता था । उसी अकेलेपन ने मेरी पुस्तकों से दोस्ती करवा दी । ननिहाल में पढ़ने का या यूँ कहें कि साहित्यिक माहौल बिलकुल भी नहीं था। पर मुझे तो अपने नये दोस्तों यानि कि पुस्तकों से प्यार हो गया था । पुस्तक, समाचारपत्र या जो कुछ भी मुझे पढ़ने को मिलता था, मैं पढ़ती थी । अक्सर मैं छिपकर ही पढ़ा करती । मेरे नाना-नानी मुझे पुस्तकें पढ़ते देखते तो बहुत गुस्सा करते थे । मेरे द्वारा कोर्स की पुस्तकों के अलावा दूसरी कोई पुस्तक पढ़ना उन्हें पसन्द नहीं था । पर क्या करती मुझे तो साहित्य को पढ़े बिना चैन ही नहीं मिलता था। वे दोनों जितना मना करते, मुझे उतनी ही अधिक पढ़ने की इच्छा होती थी । सो छिपकर ही पढ़ती थी । इस तरह मुझे पढ़ने की लत लग गई । जब पढ़नेकी लत लगी तो लिखने का भी मन हुआ । फिर मेरे मन में जो आता, उसे मैं लिखने लगी। शायद आरंभिक दिनों के मेरे लेखन को  साहित्यिक लेखन नहीं कहा जा सकता पर लेखन का आरंभ तो कह ही सकते है । चिप-छिप कर लिखते-लिखते कब साहित्यिक लेखन की शुरुआत हो गई पता ही नहीं चला।  इस तरह अनजाने में ही साहित्यिक राह पर मेरे कदम चल पड़े। इस तरह लिखने का ये लाइलाज रोग उम्र भर के लिए मुझे लग गया।  

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

 सुमी लोहनी - मुझे नहीं लगता कि मेरे लेखन से मुझपर कुछ भी बुरा प्रभाव पडा हो । मुझ जैसी अन्तर्मुखी महिला के लिए लेखन से अच्छी बात और हो भी क्या सकती है।

 क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

सुमी लोहनी - हाँ, निसंदेह मुझे लगता है कि लेखन समाज में बदलाव ला सकता है ।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

सुमी लोहनी - जैसे माँ के लिए सभी सन्तानें प्रिय होती हैं, उसी प्रकार मुझे भी अपनी सभी रचनाएं प्रिय हैं। किसी एक को अधिक प्रिय बताकर मैं बाकी रचनाओं के साथ नाइंसाफी नहीं कर सकती । हाँ पाठकों को मेरी किसी भी रचना को गुण-दोष के आधार पर अच्छा या बुरा कहने का पूर्ण अधिकार है।

शनिवार, 10 जुलाई 2021

Chilren Story : Thick Glasses


  Seeing Parth sitting sad on the stairs, Hemu uncle went to him and asked him the reason for his sadness.

Hemu uncle - Parth son, why are you so sad today?

Parth - Uncle, no one in the house loves me.

Hemu uncle - What happened after all, why are you talking like this?

Parth - Everyone in the house keeps scolding me

Hemu uncle - Son, there must be some reason to scold.

Parth - Uncle, I love watching cartoons.

Hemu Uncle - All children watch cartoons. What's wrong with that?

Parth - Nothing, but who should explain it to my mom? She always keeps me away from watching cartoons. If I do not listen her, she scolds me.

Hemu uncle - Well, how long do you watch cartoons in a day?

Parth - Uncle, I watch cartoons all day.

Hemu Uncle - All day?

Parth - Yes uncle, on this matter first mom scolds and then dad gets me beaten.

Hemu Uncle - Your scolding and beating is absolutely right.

Parth - Uncle, you too turned out like mom and dad.

Hemu uncle - You will realize your mistake when you will grow up.

Parth - What a mistake uncle?

Hemu Uncle - When I was in your age, I used to use mobile and watch TV a lot. Grandparents, parents and elders interrupted me a lot, but I did not listen to anyone, for which I got a lot of punishment.

Parth - What kind of punishment did you get?

Hemu uncle - My eyes became very weak, due to which I got such thick glasses on my eyes. Now I can neither study nor do any other work without glasses.

Saying this Hemu uncle became very sad.

Parth - Uncle, is it so dangerous to operate the mobile phone?

Hemu uncle - Yes Parth, if you still don't improve then be ready to wear thick glasses like me.

Parth gets nervous hearing this.

Parth - Uncle, I do not want to wear such thick glasses. From today mobile phone is completely stopped.

Hemu Unlce - Well done son.

Writer : Sangeeta Singh Tomar

Translated by : Sumit Pratap Singh

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

खाकीधारियों ने शुरू किया पुस्तकालय अभियान


        देश के भीतर समाज की सुरक्षा व्यवस्था संभालने के साथ-साथ अब खाकी धारियों ने गाँव के नौनिहालों के अध्ययन करने के लिए पुस्तकालय के निर्माण की व्यवस्था का भी जिम्मा संभाला है। ये कार्य ग्राम पाठशाला के अंतर्गत किया जा रहा है। ग्राम पाठशाला का विचार कोविड 19 लोकडाउन के दौरान आया। लोनी कस्बे के गांव गनौली के कुछ युवा साथियों ने लॉकडाउन के दौरान ये विचार किया कि इस खाली समय का इस्तेमाल कर गांव के लिए कुछ करना चाहिए। गांव के युवा साथियों ने गांव में एक आधुनिक पुस्तकालय (लाइब्रेरी) बनाने का सुझाव इंस्पेक्टर (एनएचआरसी) श्री लाल बहार जी के सामने रखा। चूंकि इस टीम के सभी सदस्य दिल्ली पुलिस, यूपी पुलिस व अन्य संस्थाओं में काम कर रहे हैं और शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते हैं, उन्होंने हर संभव मदद का आश्वासन देकर पुस्तकालय का कार्य शुरू करने के लिए कहा। बस फिर क्या था, सभी ने मिलकर बहुत कम समय में एक बेहतरीन पुस्तकालय का निर्माण कर दिया। यहां देखने लायक बात ये है कि ये पुस्तकालय सरकारी जगह में, गांव वालों के सहयोग से और गांव के सर्वसमाज के लिए बनाई गई। इस पुस्तकालय में 65 बच्चों के बैठने की व्यवस्था है, लेकिन ये कैपेसिटी पहले दिन से ही कम पड़ने लगी क्योंकि आसपास के गांवो के बच्चे भी पुस्तकालय आने लगे। टीम ने बैठकर विचार किया कि क्यों ना दूसरे गांव में भी जाकर लोगों को पुस्तकालय बनाने के लिए प्रेरित किया जाए। और यहां से ही शुरुआत हुई 'ग्राम पाठशाला' मिशन की।

ग्राम पाठशाला टीम का विजन स्टेटमेंट है 'शिक्षा से रोजगार'। इसका मतलब है कि युवा कोई भी काम शुरू करने से पहले अच्छी शिक्षा ग्रहण करें ताकि एक शिक्षित समाज का निर्माण हो और समाज को नई दिशा मिले। ग्राम पाठशाला टीम का मिशन है 'गांव में, गांव के लोगों द्वारा, गांव के लोगों के लिए पुस्तकालय' बनाने के लिए गांव के लोगों से अपील करना। ग्राम पाठशाला टीम का मूलभूत सिद्धांत है कि वह किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन व किताबों के वितरण में शामिल नहीं होगी। गांव के लोग ही सारी व्यवस्था करेंगे और अपने गांव के युवाओं को पढ़ने के लिए एक बढ़िया पुस्तकालय बना कर देंगे जहां बच्चों को पढ़ने के लिए अनुकूल माहौल मिल सके। गांव में एक बार शिक्षा का माहौल बन गया तो गांव के बच्चे भी पढ़ लिख कर ऊंचे पदों पर पहुंच सकते हैं। गांव में फिर से आपसी भाईचारे और उन्नति का माहौल बन जाएगा। 

कहते हैं कि भारत गांव में बसता है तो फिर गांवों में भी शिक्षित लोगों का प्रतिशत बढ़ना चाहिए। गांव के लोग भी और ज़्यादा शिक्षित और उन्नत होने चाहिए। ग्राम पाठशाला मिशन के तहत दिल्ली एनसीआर में एक दर्जन के आस पास पुस्तकालय बन चुके हैं और लगभग एक दर्जन से भी ज़्यादा पुस्तकालयों का निर्माण कार्य चल रहा है।

पुस्तकालय का उद्घाटन कोई  राजनेता नहीं, अपितु गांव के ऐसे बेटे और बेटियां कर रहे हैं, जिन्होंने गत वर्ष बोर्ड की परीक्षा में गांव में अव्वल स्थान प्राप्त किया था। सबसे ज़्यादा उत्साहित करने वाली बात ये है कि गांव के इन पुस्तकालयों के उद्घाटन में अब आईएएस, आईपीएस व अन्य विभागों के अधिकारी पहुंच रहे हैं।बच्चे जो बनना चाहते हैं वो लोग खुद आकर बच्चों का उत्साहवर्धन कर रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पुस्तकालय बनाने कि एक लहर सी चल रही है और सुनहरे भविष्य का निर्माण हो रहा है। इसी मिशन के तहत ग्राम पाठशाला टीम के सदस्य प्रवीण बैंसला ने दिनांक 25 दिसंबर 2020 से एक साइकिल यात्रा शुरू की थी और यह यात्रा 1 जनवरी 2021 को पूरी हुई। इस यात्रा में प्रवीण बागपत, हापुड़, बुलंदशहर, गौतमबुद्ध नगर और गाज़ियाबाद जिले के तमाम गांवों में जाकर लोगों को शिक्षा व पुस्तकालय के महत्व को समझाया। और बड़े हर्ष की बात है उनकी ये मेहनत रंग ला रही है। तमाम गांवों के प्रधान व बड़े बुज़ुर्ग अपने-अपने गाँवों में पुस्तकालय बनाने के लिए राज़ी हो गए हैं। ग्राम पाठशाला टीम में अब सरकारी, प्राइवेट कॉरपोरेट, डॉक्टर, वकील, बिजनेसमैन, शिक्षक व अन्य विभागों में काम करने वाले लोग जुड़ रहे हैं। ग्राम पाठशाला का मिशन है देश के हर गाँव में एक लाइब्रेरी, यानी 6,64,369 लाइब्रेरी।


पुस्तकालय अभियान की इस टीम में लाल बहार (इंस्पेक्टर एनएचआरसी), जगबीर भाटी, अमर चौधरी (मोटिवेशनल स्पीकर) सोनू बैंसला (सब-इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस), कुलदीप बैंसला (सब-इंस्पेक्टर, यूपी पुलिस), प्रवीण (एडवोकेट) असिस्टेंट प्रोफेसर अजय पाल नागर, जितेंद्र नागर, शदेवराज नागर, अमर बैंसला (दिल्ली पुलिस), देवेंद्र बैंसला (दिल्ली पुलिस) रविंद्र बैंसला (दिल्ली पुलिस) रामवीर तंवर, योग गुरु मनदीप अवाना,  कुमार सतीश, अमित भाटी (दिल्ली पुलिस),  नितिन नागर (दिल्ली पुलिस), संदीप नागर (दिल्ली पुलिस) तथा हाल ही में यू. पी.एस. सी. परीक्षा में चयनित हुए एसीपी फिरोज़ आलम है।

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