व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह का उपन्यास “जैसे थे” केवल हँसी का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा आईना है जिसमें उत्तर भारत के ग्रामीण समाज का चेहरा अपनी पूरी सच्चाई, अपनी मासूमियत और अपनी विडंबनाओं के साथ उभरकर सामने आता है। यह उपन्यास हँसी के हल्के रंगों से आरम्भ होकर धीरे-धीरे पाठक को उन सच्चाइयों तक ले जाता है, जो भीतर कहीं गहराई तक चुभ जाती हैं।
लेखक ने अत्यंत
सहजता और आत्मीयता के साथ गाँव के जीवन,
वहाँ के लोगों
की मानसिकता, उनके भोलेपन और उनकी सरल आस्थाओं को चित्रित किया
है। लेकिन यही आस्थाएँ किस प्रकार कई बार उनके शोषण का कारण बन जाती हैं — यह
तथ्य उपन्यास में बड़ी सूक्ष्मता और प्रभावशीलता के साथ सामने आता है। धर्म, परंपरा
और सामाजिक संरचनाएँ — जिन पर ग्रामीण जीवन टिका हुआ है — उन्हीं
के भीतर छिपे विरोधाभासों को लेखक ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया है।
इस उपन्यास की
सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यंग्य कटु नहीं बनता, बल्कि
मुस्कान के साथ सच कहता है। पाठक हँसता भी है और उसी क्षण सोचने को भी विवश हो
जाता है कि यह हँसी दरअसल किस पर है —
पात्रों पर, समाज
पर, या स्वयं हम पर। यही द्वंद्व इस उपन्यास को
साधारण हास्य रचना से ऊपर उठाकर एक गंभीर सामाजिक दस्तावेज़ बना देता है।
उपन्यास में
ग्रामीण व्यक्ति की शहर के प्रति कल्पना और आकर्षण को भी बड़े रोचक और मानवीय ढंग
से उकेरा गया है। शहर उसके लिए केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि
एक सपना है — एक ऐसी दुनिया, जहाँ
अवसर भी हैं और भ्रम भी। यह द्वंद्व —
आकर्षण और
वास्तविकता के बीच — लेखक ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया
है।
आज भी उत्तर
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हमें ऐसे अनेक चरित्र मिल जाते हैं, जिन्हें
लेखक ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है। “नारद”
जैसा पात्र, जो
चलते-फिरते सीसीटीवी कैमरे की तरह पूरे गाँव की गतिविधियों पर नज़र रखता है, केवल
हास्य का स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण अंग है।
वह सूचना का माध्यम भी है और सामूहिक मानसिकता का दर्पण भी।
इसी प्रकार “कड़क
सिंह” जैसे पुलिस दारोगा भी हमारे समाज में आज भी मौजूद
हैं। वे भले ही पुलिस मैनुअल के कठोर नियमों का अक्षरशः पालन न करते हों, लेकिन
उनके भीतर मानवीय संवेदनाओं की प्रचुरता होती है। वे कई बार औपचारिक कानूनी
प्रक्रिया से हटकर, मौके पर ही मानवीय स्तर पर समस्याओं का समाधान कर
देते हैं। यही कारण है कि वे जनसामान्य के बीच लोकप्रिय हो जाते हैं। कहीं न कहीं, वे
हमें उस आदर्शवादी छवि की याद दिलाते हैं, जहाँ
व्यवस्था और संवेदना साथ-साथ चलती हैं।
उपन्यास का एक
महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह केवल सामाजिक यथार्थ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि
साहित्यिक जगत की विडंबनाओं को भी सामने लाता है। “तोप
सिंह” जैसे कवियों के माध्यम से लेखक उस प्रवृत्ति पर
व्यंग्य करते हैं, जहाँ कुछ लोग दूसरों की रचनाओं को तोड़-मरोड़ कर
अपनी बताकर प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार गाँवों में मौजूद ऐसे
पुजारी और मजारों के खादिम,
जिनकी वास्तविक
गतिविधियों से समाज पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं है, फिर
भी मौन बना रहता है — यह सब उपन्यास को और अधिक यथार्थपूर्ण बनाता है।
इस उपन्यास की
सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यह पाठक को केवल हँसाता नहीं, बल्कि
सोचने के लिए बाध्य करता है। यह हमें यह एहसास कराता है कि समाज जिन विडंबनाओं के
बोझ तले साँस ले रहा है,
वे आज भी उतनी
ही प्रासंगिक हैं जितनी पहले थीं।
मेरे लिए यह
उपन्यास केवल एक साहित्यिक कृति नहीं,
बल्कि एक निजी
अनुभव भी है। सुमित प्रताप सिंह से मेरा लगभग पच्चीस वर्षों का परिचय है। हम दोनों
ने एक साथ दिल्ली पुलिस में कदम रखा था। वह हर बात में हास्य का रंग घोल देने वाले, और
मैं जीवन को गंभीरता की चादर में लपेटकर जीने वाला व्यक्ति। फिर भी न जाने कैसी
कड़ी थी कि पहली ही मुलाक़ात ने हमें मित्रता के ऐसे धागे में बाँध दिया, जो
समय के साथ और अधिक सुदृढ़ होता गया।
शायद यही कारण
है कि इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि
एक मित्र का मन दिखाई देता है —
वह मन जो जीवन
की कठिनाइयों को हँसी में बदल देना जानता है, और
उसी हँसी के सहारे सबसे गहरी बात कह देता है।
“जैसे थे” अंततः
हमें यही एहसास कराता है कि समय बदलता है, परिस्थितियाँ
बदलती हैं, लेकिन मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ व चरित्र अक्सर
वैसे ही बने रहते हैं —
जैसे थे।
यह उपन्यास याद
दिलाता है कि हास्य-व्यंग्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि
एक गहरा सामाजिक संवाद भी हो सकता है। यह हँसाते हुए उन सच्चाइयों की ओर संकेत
करता है, जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते और शायद यही
इस रचना की सबसे बड़ी सफलता है
कि इसे पढ़ने के
बाद पाठक के चेहरे पर मुस्कान के साथ-साथ मन में एक प्रश्न भी रह जाता है।
पुस्तक : जैसे थे (उपन्यास)
लेखक : सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
प्रकाशक : सी.पी. हाउस, दिल्ली
मूल्य : 120 रुपए पृष्ठ : 100
समीक्षक : इंशाद अली, फ़्लैट नं.-ए 4, प्लॉट नं.-4/10, सेक्टर 2, राजेंद्र नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद (उ.प्र.)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें