शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

व्यंग्य : वायरल होने की चाहत


 इन दिनों वायरल होने का ज़माना है कोई सी चीज कब और कैसे वायरल होकर चर्चित हो जाए कि पता ही नहीं चलता कुछ खुशकिस्मत लोग होते हैं जो स्वयं ही वायरल होकर दुनिया में छा जाते हैं, वहीं कुछ लोग अपने तिकड़मी दिमाग का इस्तेमाल कर खुद को वायरल कर डालते हैं ये वायरलपना नए युग के मीडिया अर्थात सोशल मीडिया की विशेष उपलब्धि है वायरल नामक हथियार या तो किसी को रातों-रात चर्चित करके उसकी किस्मत खोल देता है या फिर उसका डिब्बा गोल कर डालता है पर वो कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? इसलिए कभी-कभी इच्छा होती है कि काश! हम या हमारी कोई रचना भी वायरल हो जाए पर सोचने से भला क्या होता है जब राम चाहेंगे तभी तो कुछ होगा, मतलब कि कुछ वायरल होगा

पिछले दिनों कई खबरें वायरल हुईं जैसे हिरन जैसे तुच्छ जीव की हत्या के झूठे केस में फँसे अपने हुड़हुड़ दबंग भाई कोर्ट से बाइज्जत बरी हो गए इससे जहाँ भारतीय न्यायप्रणाली की निष्पक्षता का खुलासा हुआ वहीं दबंग अभिनेता के भीतर छिपे ह्यूमन से सबका साक्षात्कार हुआ इस खबर के वायरल होते ही दबंग अभिनेता के दबंग प्रशंसकों की बद्दुआओं से बचने के लिए हिरन की आत्मा ने आसमान से अपनी भूल के लिए माफ़ी माँगी और खुद ही गोली से आत्महत्या करने की बात कबूल ली

यू.पी. में अगले साल चुनावी महायुद्ध छिड़नेवाला है लेकिन अभी से उसके पूर्वाभ्यास की ख़बरें वायरल होने लगीं हैं और उनके साथ कलियुगी संस्कृति को समृद्ध करनेवाले वचन और गालियां भी अभी हाल ही में खुद को राजा हरीश चंद्र की संतान माननेवाले एक प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद की हत्या होने की खबर वायरल कर डाली अब जाने इसके पीछे उनकी कौन सी जेड प्लसीय योजना रही होगी? इसके साथ-साथ एक पहलवान को डोप नामक दाँव से ओलंपिक से पहले ही देशी पटकनी देने की बात भी वायरल हो चुकी है

यह सब देख हम जैसे लाख टके के लेखक अक्सर सोचते हैं कि हमारी कोई रचना कभी वायरल होकर हमें प्रसिद्धि नामक सिद्धि से मिलवाएगी भी कि नहीं? लेकिन हम जैसे लोग ऊपरवाले से वायरल होने की कामना भी करें तो वायरल फीवर मिल जाता है वायरल होने की चाहत की हद तो देखिए वायरल फीवर से ग्रस्त होते हुए भी मन में ये उधेड़बुन मची हुई है कि अपना ये व्यंग्य पाठकों के बीच वायरल हो पाएगा कि नहीं?   


लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 26 जुलाई 2016

व्यंग्य : देवी का अट्टहास



   देवी अत्यधिक क्रोध में हैं। अपने महल में चहल-कदमी करते हुए वो कुछ बुदबुदा रही हैं। ध्यान से सुनने पर ज्ञात होता है कि वो 'तिलकतराजू और तलवार/इनके मारो जूते चारनामक अपने साम्राज्य के पवित्र मन्त्र का बेचैनी से जाप कर रही हैं। उनके हाथ में टंगे भारी-भरकम बटुए में पाँच पैसेदस पैसेबीस पैसेचवन्नी व अठन्नी के रूप में उनके मातहत देवों ने उछल-कूद करते हुए आसमान सिर पर उठा रखा है। यह देख देवी एक पल को मुस्कुराती हैं और अगले पल फिर से उस पावन मन्त्र को जपना आरम्भ कर देती हैं।

अचानक देवी के बटुए से पाँच पैसे की तेज आवाज गूँजती है "पेश करो पेश करो अपनी बेटी करो।" पाँच पैसे का समर्थन उनके मातहत देवों का पूरा दल पूरे जोर-शोर से करता है। देवी गर्वित मुस्कान के साथ पाँच पैसे को देखती हैं और उसे शाबासी देती हैं। देवी की शाबासी पाकर पाँच पैसा आनंदित हो नृत्य करने लगता है और वह अपनी माँग को फिर से चीख-चीखकर उठाना आरम्भ कर देता है। पाँच पैसे के संग पूरा दल भी मस्ती में नाचते हुए गाने लगता है "पेश करो पेश करो अपनी बेटी करो।" गाने को सुनकर देवी भी आनंदित हो झूमने लगती हैं। यह देख एक चवन्नी अत्यधिक उत्साहित हो जीभ काटने के बदले 50 लाख का ईनाम घोषित कर डालती है। चवन्नी की घोषणा सुन एक पल को तो देवी अचंभित हो जाती हैं फिर अगले ही क्षण वो चवन्नी को उठाकर उसे प्यार से चूम लेती हैं। अब चवन्नी ख़ुशी के मारे झूमने लगती है। उसके साथ पूरा दल भी झूमना शुरू कर देता है।

उधर दूसरी ओरजिस बेटी को पेश करने की माँग करते हुए देवी और उनके मातहत देवों ने हल्ला मचा रखा थाउसकी माँ देवी से पूछती है कि उसकी बेटी को कैसे पेश किया जाएउसे दिग्विजयी कल्पना के अनुसार पेश किया जाए या फिर शरदीय चाहत के अनुसारउसे आज़मीय पसंद के अनुसार सजाकर प्रस्तुत किया जाए या लालुई स्वप्न के स्टाइल मेंइसके अलावा बेटी की माँ देवी से ये भी पूछती है कि उनके मातहत देवों से गलती से कोई गलती तो नहीं होगी?

बेटी की माँ के प्रश्नों को सुनकर देवी अट्टहास करने लगती हैं। उनके संग-संग उनके बटुए में चिल्लर के रूप में मौजूद उनके मातहत देव भी अट्टहास करना आरम्भ कर देते हैं। उनके अट्टहास के फलस्वरूप उनका महल अचानक जोर-जोर से हिलने लगता है। यह देख देवी और उनके मातहत देव घबरा जाते हैं। देवी को कुछ-कुछ आभास होने लगता है कि शायद उनके स्वनिर्मित दैवीय तिलिस्म के चकनाचूर होने का निश्चित समय आ गया है।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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