गुरुवार, 30 जून 2022

हिंदी साहित्य की आस आशा शर्मा

     राजस्थान के बीकानेर जिले की आशा शर्मा पेशे से इंजीनियर और दिल से साहित्यकार हैं। इन्होंने 2014 ईसवी में लेखन आरंभ किया और इनकी लेखनी ने अनवरत चलते हुए सात पुस्तकों का सृजन कर डाला। इनकी रचनाओं ने जहाँ देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में स्थान बनाया, वहीं अनेकों पुरस्कार-सम्मान इनकी झोली में आकर चैन की सांस ले रहे हैं। हिंदी साहित्य को बड़ी आस है कि आशा शर्मा नित्य नई रचनाओं से उसे समृद्ध करती रहेंगीं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

आशा शर्मा - लेखन से भी बहुत पहले मुझे पढ़ने का रोग लगा था। लिखना शायद उसी रोग का साइड इफेक्ट है, जिसके लक्षण पहली बार 2014 ईसवी में दिखाई दिए थे। इसके बाद यह साइड इफेक्ट मुख्य रोग में बदल गया और तब से ही यह रोग लाइलाज बना हुआ है।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

आशा शर्मा - जिंदगी में जब कोई नया अध्याय जुड़ता है तो जीवन पर उसका प्रभाव पड़ना लाज़िमी है। लेखन से भी बहुत से प्रभाव पड़े जिन्हें अच्छे या बुरे में बांटना मेरे लिए संभव नहीं। लेखन से जुड़ने के बाद मेरा सामाजिक दायरा बहुत बढ़ गया, जो कि एक अच्छा प्रभाव माना जा सकता है, लेकिन सामाजिक दायरा बढ़ने से निश्चित ही मेरा भी टाइम अर्थात व्यक्तिगत समय कम हो गया, जिसे बुरा प्रभाव कहा जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

आशा शर्मा - क्यों नहीं बदलाव ला सकता? कभी आपने देशभक्ति के गीत सुने हैं? उन गीतों को सुनकर सीमा पर खड़े सैनिकों की बाजुएं फड़कने लगती हैं। दर्दभरी कविताएं आंखों में पानी ला देती हैं। कितने ही ऐसे बड़े-बड़े सामाजिक आंदोलन हुए हैं, जो कलम की शक्ति से ही सफल हुए हैं। लेखक अपने समय से आगे चलते हैं। समाज में उठ रही नित नई समस्याओं के सकारात्मक समाधान कलम के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचते हैं। लेखन से ही बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण होता है। कुल मिलाकर मैं तो इस कथ्य से पूरी तरह सहमत हूँ, कि समाज में यदि कोई बदलाव ला सकता है वो कलम है।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौनसी है और क्यों?

आशा शर्मा - ये तो आपने वैसा ही प्रश्न पूछ लिया, कि आपको अपनी संतानों में से सबसे अधिक प्रिय कौन सी है? लेखक को अपनी हर रचना संतान जैसी ही प्रिय होती है, लेकिन जैसे कोई संतान अपनी किसी विशेष योग्यता के कारण दिल के जरा अधिक नजदीक होती है उसी तरह कुछ रचनाएं भी हमारे दिल में अपना विशेष स्थान रखती हैं। मुझे अपनी बहुत सी रचनाएं समान रूप से प्रिय हैं। जिनमें से मैं अपनी कहानी 'साढ़े आठ बजे की कॉल'  का नाम ले सकती हूँ। इस रचना को मैंने एक अलग अंदाज में लिखा है। इसके अतिरिक्त मुझे अपनी एक पद्य रचना भी विशेष प्रिय है, जिसे मैंने दर्द के अतिरेक में लिखा था। बच्चों की बहुत सी कविताएं एवं कहानियां और कुछ लघुकथाएं भी मेरे दिल के बहुत करीब हैं।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

आशा शर्मा - मैं किसी को कोई संदेश नहीं देना चाहती, लेकिन चूंकि मैं बच्चों के लिए अधिक लिखती हूँ इसलिए मेरी इच्छा है कि हमारे बच्चे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनें। मेरा प्रयास रहता है कि मैं अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें अच्छी आदतें, अच्छा व्यवहार और अच्छा आचरण सिखाऊं। यदि बचपन संस्कारित होगा तो हर पीढ़ी आदर्श होगी। मैं यही कहना चाहती हूं कि हर परिवार अपने बच्चों को वो सभी संस्कार आवश्यक रूप से दे जो समाज को सही राह दिखाएँ और राष्ट्र की उन्नति में सहायक हों।

शनिवार, 25 जून 2022

राजा राम की महिमा गाते जयपाल सिंह परमार

     मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के जयपाल सिंह परमार की साहित्यिक यात्रा सन् 1981 ईसवी से सामान्य शब्द संयोजन के साथ आरम्भ होकर आकाशवाणी एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं की पगडंडियों से होते हुए 'कल्पवृक्ष सेंहुड़ लगता है' नामक काव्य संग्रह के पड़ाव तक पहुंच गई है। इनके अनुसार साहित्य के सागर में इनकी लेखकीय नौका के आगे का सफर ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। राजा राम की महिमा गाते हुए जयपाल सिंह परमार निरंतर साहित्य सृजन में जुटे हुए हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

जयपाल सिंह परमार - सन् 1981 ईसवी में पहली बार महाविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष बनने पर मंच से कुछ पंक्तियाँ पढ़ने से मिली प्रशंसा से इस रोग का जन्म हुआ था। इसके बाद यह रोग उम्र के साथ साथ बढ़ने लगा फिर जैसा कि आप जानते है कुछ दिन बाद यह रोग लाइलाज हो गया। अब तो यह स्थिति है कि पुरानी खांसी की तरह जब चाहे उभर आता है।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

जयपाल सिंह परमार - लेखन कार्य से मेरे ऊपर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि यह तो माँ सरस्वती की आराधना है और आराधना से किसी का बुरा नहीं होता बल्कि समय का सदुपयोग करने का एवं समाज में अपनी पहचान बनाने का अच्छा अवसर प्राप्त होता है। यही मेरे साथ हुआ है क्योंकि ग्रामीण परिवेश से महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए महानगर आने पर मेरी जो पहचान बनी वह माँ सरस्वती की कृपा से मेरे लेखन की वजह से ही है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

जयपाल सिंह परमार - यदि हम युगों-युगों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था के बदलाव का अध्ययन करें तो देख सकते हैं कि समाज में बदलाव का जन्म लेखन की कोख से ही हुआ है। हर बड़े सामाजिक बदलाव के मूल में उस समय का लेखक और लेखन ही रहा है। हाँ लेखन के द्वारा इस बदलाव के लिए आवश्यक है, कि जिम्मेदारी के साथ इसे उस व्यक्ति तक पहुंचाया जाए जिसके लिए उसे लिखा गया है। समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विसंगतियों से व्यथित हो कर जो पीड़ा होती है, उसी से कुछ लिखने के लिए कलम उठ जाती है इस उम्मीद के साथ कि शायद इस व्यवस्था में कुछ बदलाव ला सकूं।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

जयपाल सिंह परमार - मेरी सर्वाधिक प्रिय रचना मेरे काव्य संग्रह 'कल्पवृक्ष सेंहुड़ लगता है' की दूसरे क्रम की रचना 'महिमा राम राजा की' है, जो ईश्वर के प्रति मेरा समर्पण है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

जयपाल सिंह परमार - प्रत्येक लेखक की भांति मैं भी समाज में भाईचारे एवं देश प्रेम की भावना को बनाए रखने का सन्देश देना चाहता हूँ। यदि मेरे इस प्रयास से समाज में थोड़ा सा भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।

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