सोमवार, 18 अप्रैल 2016

कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर हैजितना अनोखा इस पुस्तक का नाम है, उतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहीं, अपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूं, जब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंग, मुसीबतो की रेनिंगप्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया है, उसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर हैको पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविता, कहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर हैमें भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया है, जिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी है, जो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती है, साथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा है, लेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर हैके जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए
तू लड़की झकास, अपुन लड़का बिंदास,
तेरी आंखें कुछ खास, अपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोली, तुझे देख नीयत डोली,
मेरे दिल की खाली खोली, आ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ा, तेरे वेट में कबसे खड़ा,
तेरे वास्ते सबसे लड़ा, तुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, संभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर हो, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकी, अपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापनकविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,
मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,
आ आ मुझे काट,
जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,
तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,
इलाके में हो गया है दंगा,
सेना ने कस लिया शिंकजा,
मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,
यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,
उसने अपने बचपन के यार,
सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,
सूरज के बेटे ने आकर,
गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,
हम इन इंसानों से अच्छे हैं,
इनसे कई गुना सच्चे हैं,
कभी कोई बकरा या मुर्गा,
किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटता, लूटता या जलाता नहीं,
आज मुझे हुआ यह अहसास है,
मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैं, लेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपननामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय है, क्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?
लालाजी कुछ कहिए,
सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,
इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,
जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?
मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,
जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार है, जो हमारा मनोरंजन तो करती है, साथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी है, जो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशी, रोहिणी, दिल्ली।


रविवार, 17 अप्रैल 2016

बाबा के चरण



"दद्दू गजब हो गया।" घीसू भागता हुआ आया।
दद्दू ने घबराते हुए पूछा, "क्या हुआ बेटा?"
"
दद्दू बाबा के चरणों में जगह-जगह छेद हो गए हैं।" घीसू ने दुखी हो बताया।
दद्दू भी दुखी हो गए, "बेटा अभी कुछ रोज पहले तो बाबा के चरण ठीक-ठाक थे। ये अचानक छेद कैसे हो गए।"
"
दद्दू बाबा के जन्मदिन पर उनकी मूर्ति के सामने पूरे दिन भक्तों की भीड़ लगी रही। हर कोई अपने को बाबा का सबसे बड़ा भक्त सिद्ध करने की होड़ में  था।" घीसू बोला।
दद्दू मुस्कुराए, "अच्छा ऐसी बात है?"
"
हाँ दद्दू! इस होड़ में हर कोई बाबा के चरण चाटना शुरू करता था तो तब तक चाटता ही रहता था जब तक कि लाइन में लगा दूसरा भक्त अपनी बारी की याद न दिलाए।"
दद्दू ने पूछा, "पुराने भक्त ही आए थे या फिर कुछ नए भी?"
"
पुराने भक्त तो सबसे पहले आए और सबसे बाद में ही गए। कुछेक नए भक्त भी आए थे पर पुराने भक्तों ने अपने पुराने होने के कारण बाबा पर अपना अधिकार दिखा उन्हें बाबा के चरण छूते ही एक ओर बिठा दिया और खुद बार-बार बाबा के चरण चाटने में लगे रहे।" घीसू बोला।
दद्दू ने समझाया, "तो बेटा उन्हें बोलना था न कि बाबा के चरणों को आराम से चाटें। अगर तुम्हारी बात नहीं मान रहे थे तो मुझे ही बुला लेते।"
"
मैंने उन्हें बोला था पर उन्होंने मुझे डपट दिया और बोले कि वो लोग हम लोगों के कल्याण के लिए कार्य आरम्भ करने के लिए बाबा का आशीर्वाद ले रहे हैं। और रही बात आपको बुलाने की तो आपकी तबियत वैसे भी ठीक नहीं थी ऊपर से अगर आप बाबा के भक्तों की हरकतें देख लेते तो जाने क्या होता?" घीसू बोला।
दद्दू ने तंज कसा, "इतने दशक बीत गए अब तक तो हम लोगों का उन्होंने कल्याण नहीं किया अब क्या ख़ाक करेंगे। अच्छा हमारी सबसे बड़ी शुभचिंतक आयीं थीं या नहीं?"
"
आयीं थीं और चीख-चीखकर सभी भक्तों से कह रहीं थीं कि बाबा सिर्फ और सिर्फ उनके हैं। लेकिन उनके भारी बटुए ने उन्हें अधिक देर संघर्ष नहीं करने दिया। सो विवश हो बाबा के बगल में वो स्वयं भी इस आस से अपना बटुआ खोलकर बुत बनकर खड़ी हो गयीं कि शायद कोई भक्त आकर उनके बटुए में दक्षिणा डालकर उनके भी चरण चाट ले।"
दद्दू यह सुन खिलखिला उठे, "हा हा हा वो भरे बटुए और बुत के बिना शायद रह भी नहीं सकतीं। खैर चल उठ अपना काम शुरू करते हैं।"
"
कौन सा काम दद्दू?" घीसू ने हैरानी से पूछा।
दद्दू ने तसला उठाया और उसे सिर पर रखते हुए बोले, "गाँव के किसी घर से कुछ सीमेंट माँगकर लाते हैं, ताकि बाबा के पैरों में हुए छेदों को भरा जा सके जिससे कि बाबा के भक्त अगली बार भी उनके चरण पूरे भक्ति भाव से चाट सकें।"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

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