शुक्रवार, 24 मार्च 2023

विसंगतियों को सोटा लगाते हलीम आईना

 


     राजस्थान के कोटा शहर के हलीमा आईना पिछले चार दशकों से लेखन कर्म में जुटे हुए हैं। अब तक इनके तीन व्यंग्य कविता संग्रह क्रमशः 'हंसो भी, हंसाओ भी', 'हंसो मत हंसो' एवं 'आईना बोलता है' प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी रचनाएं देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा अब तक ये कई पुरस्कार व सम्मानों से अपनी झोली को भर चुके हैं। सदैव की भांति हलीम आईना अपने एक हाथ में व्यंग्य कविता का सोटा और दूसरे हाथ में आईना लिए चहलकदमी करते हुए समाज में फैली हुईं विसंगतियों को पहले तो कस कर सोटा लगाते हैं फिर उसके बाद उनके विद्रूप चेहरे को आईना दिखाने का कार्य करते है। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

हलीम आईना - देखिए सुमितजी! मैं कविता लेखन को रोग नहीं मानता, यह तो ईश्वर प्रदत्त अति संवेदनशील मनोस्थिति से उपजता है जो दिल की आवाज बनकर लोगों के दिलों में उतर जाता है तथा मनोरंजन के साथ मार्गदर्शन भी करता है। यदि आप व्यंग्य की भाषा में इसे रोग माने तो मुझे ये रोग आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही लग गया था। हमारे हिन्दी के गुरूजी कहानियाँ लिखते थे तथा हमें अपनी कहानियों के समाचारपत्रो में प्रकाशित होने तथा आकाशवाणी में प्रसारित होने के विषय में समय-समय पर सूचित किया करते थे। इसके साथ ही साथ हमारे कोटा शहर के दहशरे मेले में जब मैं काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, शैल चतुर्वेदी व मणिक वर्मा जैसे हास्य व्यंग्य कवियों को सुनता था तो मेरे मन में आता था कि यार ऐसा तो अपन भी लिख सकते हैं। यही सोचकर पहले कुछ कहानियाँ लिखीं फिर सोचा कि किसी एक विधा में ही अपनी पहचान बनानी चाहिए और फिर मैने हास्य व्यंग्य कविता को चुना। मेरी पहली रचना राष्ट्रदूत (साप्ताहिक ) में छपी उसके बाद विभिन्न मंचों पर मेरे काव्य पाठ का सिलसिला भी शुरू हो गया।

लेखन से आप पर कौन -सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

हलीम आईना - सुमित भाई! कविता लेखन से मुझ पर अच्छा ही प्रभाव पड़ा है। बुराईयों से बचे रहने के संस्कार तो सूफ़ी परिवार में जन्म लेने से जन्मजात थे ही, लेखन ने मुझे एक अच्छा पाठक भी बना दिया। मैं निरंतर अच्छा से अच्छा पढ़ने लगा। ईश्वर की कृपा से समय सीमा में काम करने, शुद्ध लेखन और सामाजिक सरोकार से जुड़े लेखन की तमीज मुझमें धीरे-धीरे विकसित होती चली गयी।

क्या आपको लगता है लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

हलीम आईना - सुमितजी! जिस कवि या लेखक की कथनी और करनी में अन्तर न हो और मानवता का हित उसके लेखन का उद्देश्य हो तो उसका लेखन निश्चित रूप से समाज में बदलाव लाने का काम करता है। सूफ़ी और संत कवियों ने यह काम किया भी है। इस बात का इतिहास गवाह है। आज भी कुछ लोग हैं जो इस कार्य में जुटे हुए हैं।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौनसी है और क्यों?

हलीम आईना - मूलत : मैं हास्य व्यंग्य कवि हूँ या नहीं यह तो आप सब जानते ही होंगे। कवि या लेखक को अपनी हर रचना प्रिय होती है फिर भी आप पूछते हैं तो बता देता हूँ कि 'माँ ' पर लिखा मेरा एक दोहा है जिसे मैंने अपनी माँ के स्वर्गवास के बाद लिखा था मुझे सर्वाधिक प्रिय है -

माँ है मन्दिर का कलश, मस्जिद की मीनार।

ममता माँ का धर्म है, और इबादत प्यार।।

आप अपने लेखन से समाज को क्या सन्देश देना चाहते हैं?

हलीम आईना - सुमितजी! प्रश्न बहुत अच्छा है। मैं अल्प दृष्टि का नाचीज कवि बस इतना सा कहना चाहता हूँ कि कविता विश्व समुदाय को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। हम भी इसे जोड़ने का ही काम करें। विश्व में प्रेम, शान्ति, सद्भावना, समता, भाईचारा कायम करें। हर हाल में जीवन की चुनौतियों से डटकर मुकाबला करते रहें। सारे गमों को भूल कर हँसते, मुस्कुराते रहें और आनन्द की नदी में डुबकी लगाते रहें।

साक्षात्कारकर्ता - सुमित प्रताप सिंह 

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

ऑस्ट्रेलिया में लेखन कौशल दिखातीं रीता कौशल



     स्ट्रेलिया के पर्थ शहर में रह रहीं रीता कौशल मूलरूप से आगरा, उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं। इस समय  वह ऑस्ट्रेलियन गवर्नमेंट की लोकल काउन्सिल में फाइनेंस ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं तथा इसके साथ ही साथ हिंदी लेखन में कौशलता का नियमित रूप से प्रदर्शन कर रहीं हैं। 2002 से 2005 ईसवी तक सिंगापुर में हिंदी शिक्षण कर चुकीं रीता कौशल अब तक चार पुस्तकों का सृजन कर चुकीं हैं एवं इनके कई साझा संग्रह व इनके संपादन में 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियाँ ऑस्ट्रेलिया नामक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। इसके अतिरिक्त हिंदी समाज ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की वार्षिक पत्रिका ‘भारत-भारती’ के संपादन की जिम्मेवारी भी इन्होंने 2015 से 2020 ईसवी तक बखूबी संभाली है। इनकी रचनाएँ निरंतर विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की शोभा बढाती रहतीं हैं एवं इन्हें इनके लेखन के लिए अनेकों पुरस्कार-सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रीता कौशल - जब से पढ़ना-लिखना सीखा तबसे। जहाँ तक मेरी याददाश्त जाती है ऐसा जान पड़ता है कि मैं खिलौनों की दुनिया की सदस्य कभी नहीं थी। हाँ पुस्तकें मुझे होश सम्भालने से ही प्रिय रही हैं व आज भी मेरी सर्वप्रिय मित्र हैं। मैं पुस्तकों के बीच में बेहद ख़ुशी महसूस करती हूँ। मैं ख़रीदकर, माँगकर, दूसरों से अदल-बदल कर हर तरह से पढ़ती रही हूँ। अब जिसे पढ़ने का इतना चस्का हो तो वह लेखन से कैसे अछूता रह सकता है।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रीता कौशल - मैंने जहाँ विज्ञान, गणित व लेखाकारी जैसे विषयों का ज्ञान जीवन बसर करने के लिए अर्जित किया, वहीं कविता, कहानी, भाषा, साहित्य मेरी आत्मा की खुराक बन कर मेरा जीवन तत्व बने हैं। अब जो चीज जीवन तत्व बन गई है और माँ सरस्वती के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त हुई है उसका कोई बुरा प्रभाव कैसे हो सकता है? लेखन ने मुझे एक अलग पहचान, मान-प्रतिष्ठा दी है। साथ ही समय के सदुपयोग का साधन दिया है। तो कुल मिलाकर सब अच्छा ही अच्छा हुआ है बुरा कुछ नहीं।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

रीता कौशल - जी बिलकुल ला सकता है। जो हम पढ़ते हैं, सोचते हैं उसका सीधा असर हमारी मानसिकता पर पड़ता ही है। और व्यक्ति की सोच से ही समाज की सोच का निर्माण होता है।

आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रीता कौशल - वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर देना किसी भी लेखक के लिए बेहद कठिन होता है। फिर भी आपने पूछा है तो मैं कहूँगी कि हाल ही में प्रकाशित मेरा उपन्यास ‘अरुणिमा’ मेरी सबसे प्रिय रचना है। ये मुझे इसलिए प्रिय है क्योंकि एक तो ये मेरा पहला-पहला उपन्यास है दूसरे इसमें एक अछूते विषय को कलमबद्ध किया गया है जो कि पाठकों के द्वारा खूब सराहा जा रहा है।    

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

रीता कौशल - मैंने अपने लेखन के माध्यम से समाज की सोच में बदलाव लाने का प्रयास किया है। हर कहानी में समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हुआ दृष्टिकोण देने की कोशिश की है, जो समाज को एकजुट होने का, अच्छी सभ्यता और संस्कृति, अच्छे संस्कार देने का संकेत देता है। मैंने अपने लेखन में अगर समस्या को उठाया है तो उसके समाधान की बात भी अवश्य की है।

साक्षात्कारकर्ता - सुमित प्रताप सिंह

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