शनिवार, 25 जून 2022

राजा राम की महिमा गाते जयपाल सिंह परमार

     मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के जयपाल सिंह परमार की साहित्यिक यात्रा सन् 1981 ईसवी से सामान्य शब्द संयोजन के साथ आरम्भ होकर आकाशवाणी एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं की पगडंडियों से होते हुए 'कल्पवृक्ष सेंहुड़ लगता है' नामक काव्य संग्रह के पड़ाव तक पहुंच गई है। इनके अनुसार साहित्य के सागर में इनकी लेखकीय नौका के आगे का सफर ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। राजा राम की महिमा गाते हुए जयपाल सिंह परमार निरंतर साहित्य सृजन में जुटे हुए हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

जयपाल सिंह परमार - सन् 1981 ईसवी में पहली बार महाविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष बनने पर मंच से कुछ पंक्तियाँ पढ़ने से मिली प्रशंसा से इस रोग का जन्म हुआ था। इसके बाद यह रोग उम्र के साथ साथ बढ़ने लगा फिर जैसा कि आप जानते है कुछ दिन बाद यह रोग लाइलाज हो गया। अब तो यह स्थिति है कि पुरानी खांसी की तरह जब चाहे उभर आता है।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

जयपाल सिंह परमार - लेखन कार्य से मेरे ऊपर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि यह तो माँ सरस्वती की आराधना है और आराधना से किसी का बुरा नहीं होता बल्कि समय का सदुपयोग करने का एवं समाज में अपनी पहचान बनाने का अच्छा अवसर प्राप्त होता है। यही मेरे साथ हुआ है क्योंकि ग्रामीण परिवेश से महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए महानगर आने पर मेरी जो पहचान बनी वह माँ सरस्वती की कृपा से मेरे लेखन की वजह से ही है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

जयपाल सिंह परमार - यदि हम युगों-युगों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था के बदलाव का अध्ययन करें तो देख सकते हैं कि समाज में बदलाव का जन्म लेखन की कोख से ही हुआ है। हर बड़े सामाजिक बदलाव के मूल में उस समय का लेखक और लेखन ही रहा है। हाँ लेखन के द्वारा इस बदलाव के लिए आवश्यक है, कि जिम्मेदारी के साथ इसे उस व्यक्ति तक पहुंचाया जाए जिसके लिए उसे लिखा गया है। समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विसंगतियों से व्यथित हो कर जो पीड़ा होती है, उसी से कुछ लिखने के लिए कलम उठ जाती है इस उम्मीद के साथ कि शायद इस व्यवस्था में कुछ बदलाव ला सकूं।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

जयपाल सिंह परमार - मेरी सर्वाधिक प्रिय रचना मेरे काव्य संग्रह 'कल्पवृक्ष सेंहुड़ लगता है' की दूसरे क्रम की रचना 'महिमा राम राजा की' है, जो ईश्वर के प्रति मेरा समर्पण है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

जयपाल सिंह परमार - प्रत्येक लेखक की भांति मैं भी समाज में भाईचारे एवं देश प्रेम की भावना को बनाए रखने का सन्देश देना चाहता हूँ। यदि मेरे इस प्रयास से समाज में थोड़ा सा भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।

मंगलवार, 21 जून 2022

साहित्य के बंधु कुमार गौरव अजीतेन्दु

      बिहार की राजधानी पटना के कुमार गौरव अजीतेन्दु नौकरी के लिए संघर्ष करते-करते निराशा व अवसाद के भंवर में फँसकर डूबने ही वाले थे कि अचानक उनकी मुठभेड़ साहित्य से हो गयी। इस मुठभेड़ का सुखद परिणाम यह निकला कि अजीतेन्दु साहित्य के बंधु बन गए और गीत-नवगीत, छंद, कहानी, लघुकथा, मुक्तक, हाइकु इत्यादि विधाओं में लिखने और प्रकाशित होने लगे। इनकी हाइकू की एक पुस्तक मुक्त उड़ान प्रकाशित हुई है व गीत-नवगीत, छंद, कहानी, लघुकथा, मुक्तक, हाइकु समेत सभी विधाओं में इनके अनेक संयुक्त साहित्यिक संकलन आ चुके हैं। अजीतेन्दु देश के विभिन्न समाचारपत्रों-पत्रिकाओं व रेडियो स्टेशन पर अपनी नियमित उपस्थित दर्शा रहे हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

कुमार गौरव अजीतेन्दु - अपनी बात कहूँ तो ये शौक जन्म से है। बचपन से ही मैं तुकबंदी करता रहा हूँ। हाँ अगर विधागत लेखन और नियमित रूप से बतौर लेखक काम करने की बात हो तो ये चीज तब शुरू हुई जब मैं निराशा में था और अवसाद में बस डूबने ही वाला था। 2011-12 के समयकाल में कई बार सरकारी नौकरी की परीक्षा पास की, लेकिन आगे चलकर काम नहीं बन सका। उसी समय इंटरनेट पर सर्फिंग करते हुए मुझे जागरण जंक्शन वेबसाइट दिखी, जो ब्लॉग लिखने की सुविधा देती है। जागरण जंक्शन पर लिखना शुरू किया और बस तब से ही ये लेखन यात्रा चल रही है। 

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

कुमार गौरव अजीतेन्दु - जी, जैसा कि मैंने अभी बताया कि लेखन मैंने तब शुरू किया जब मैं अवसाद के अंधेरे में डूबने वाला था तो सबसे पहला लाभ तो मुझे यही लगता है कि लेखन ने मुझे अवसादित होने से बचा लिया इसके अलावा लेखन से जो अनुभूति का दायरा और बल बढ़ता है, वो तो एडिशनल प्रॉफिट रहता है। बुरा प्रभाव ये कहा जा सकता है कि लेखन आपके मन को कोमल कर देता है। ये दुनिया ऐसी है कि हर जगह कोमलता के साथ आप नहीं चल सकते। सर्वाइवल के लिए थोड़ी कठोरता भी जरूरी है। 

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

कुमार गौरव अजीतेन्दु - लेखक ही तो बदलाव लाता है। लेखन के जरिए जो वैचारिक यातायात की परिस्थिति बनती है, उससे समाज सीधे प्रभावित होता है। लेखन का विस्तार केवल हम भावुक कविताओं तक नहीं मान सकते बल्कि ये अखबार से लेकर रंगमंच और चलचित्रों की दुनिया जैसे सभी वृहत पक्षों में अपना दखल रखता है। इतिहास भी तो लेखन ही होता है। 

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

कुमार गौरव अजीतेन्दु - अपनी तो सभी रचनाएँ प्रिय हैं। हाँ जिन रचनाओं पर माँ से खास तारीफ मिलती है, उनसे विशेष जुड़ाव हो जाता है। ऐसी ही एक कहानी प्यार नहीं खोना है, जो कि दो पीढ़ियों की लव स्टोरी है। वैसे तो क्राइम और सस्पेंस थ्रिलर लिखना पसंद करता हूँ, लेकिन कभी-कभी कुछ स्पेशल मूड में लव भी लिखा जाता है। 

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

कुमार गौरव अजीतेन्दु - मैं खुद भी काफी प्रैक्टिकल रहने वाला इंसान हूँ और वही भाव लिखना भी चाहता हूँ। संदेश मेरा अपने पाठकों के लिए जीवन की वास्तविकता को समझाना है। मैं फिल्मी अंदाज का लेखन नहीं करता।


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