शनिवार, 18 जून 2022

आसमां छूने का जोश जगाते सुयश कुमार द्विवेदी

 

      उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सुयश कुमार द्विवेदी पेशे से सहायक लोक अभियोजन अधिकारी हैं, लेकिन हृदय से रचनाकार हैं। अब तक दो पुस्तकें लिख चुके सुयश अपनी कलम पाठकों में उत्साह बढ़ाने के लिए चला रहे हैं। इनकी पहली पुस्तक 'सपनों को अपने जी ले रे' जहाँ आपको अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित करेगी, वहीं शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही इनकी दूसरी पुस्तक 'छू ले आसमां' आपके भीतर ऊंचाइयों का आकाश छूने का जोश जगाएगी। सुयश की रचनाएँ विभिन्न समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा लेखन के लिए शोभना सम्मान-2020 समेत अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

सुयश कुमार द्विवेदी -  मुझे हिंदी साहित्य पढ़ने का शौक बचपन से ही है। जब मैं कक्षा चौथी में था, तभी से मेरी दिलचस्पी कहानियों, कविताओं एवं नाटकों के प्रति काफी गहरी हो गयी। जब मैं कोई भी कहानी या काव्य की पुस्तक पाता तो उसे एक बार में पढ़ कर ही साँस लेता था। पढ़ते-पढ़ते कब मैंने लिखना शुरू कर दिया, मुझे ठीक से याद नहीं है। जहाँ तक मुझे याद है मैंने आठवीं कक्षा में अपनी  पहली कविता 'प्रेरणा' की रचना की थी।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

 सुयश कुमार द्विवेदी - लेखन से मेरे जीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मुझे यह लगता है कि व्यक्ति के जीवन में सबसे अच्छा दोस्त कोई होता है, तो वो होती है पुस्तकें। मैंने अपने अब तक जीवन में सैकड़ों कहानियां, कविताएँ एवं दर्जनों उपन्यासों को पढ़ा है। आत्मकथा, यात्रा वृतांत, लघुकथाएं एवं नाटकों की कोई गिनती नहीं है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी की सहजता और सरलता का मैं कायल रहा हूं। लेखन से व्यक्ति के जीवन में नए-नए विषयों के अध्ययन की जिज्ञासा, चिंतन की गुणवत्ता, व्यक्तित्व का निखार, समय की पाबंदी, आत्म अनुशासन एवं सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है और ऐसा मैंने अनुभव भी किया है। 

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

सुयश कुमार द्विवेदी - कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेखन से समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है। हर काल में समाज के चिंतकों, मनीषियों, ऋषियों, लेखकों एवं कवियों ने अपने लेखन के माध्यम से समाज को जागृत करने का पुरजोर यत्न किया है और वे काफी हद तक समाज में व्यापक परिवर्तन लाने में सफल रहे। जब-जब समाज को जरूरत पड़ी, इन लोगों ने समाज का मार्ग प्रशस्त किया है एवं अपनी लेखनी चलाकर समाज को दर्पण दिखाया है। संत कबीर का लेखन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

सुयश कुमार द्विवेदी - मैंने अब तक दो सौ से अधिक कविताओं और गीतों की रचना की है। मुझे मेरी सभी रचनाएँ पसंद हैं, क्योंकि मैं रचनाएँ व्यवसाय के लिए नहीं अपितु आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे लिखना पसंद है। मेरी सबसे प्रिय रचना 'सुबह का अखबार' है। इस रचना के लिए मुझे गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रथम पुरस्कार भी मिल चुका है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

सुयश कुमार द्विवेदी - सच कहूँ तो मैं अपने लेखन से समाज से कोई संदेश अभी नहीं दे सकता, क्योंकि मैं अपने आपको इस योग्य ही नहीं समझता। समाज को संदेश देने का कार्य बड़े लेखकों एवं कवियों का है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि मैं आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हूँ और अगर मेरे लेखन से यदि कोई व्यक्ति प्रेरणा पा सके तो यह मेरे लिए गौरव का विषय होगा।

बुधवार, 15 जून 2022

हिंदी लेखन जगत की सलामी बल्लेबाज रेनू सैनी

     दिल्ली के पंचशील विहार की निवासी रेनू सैनी लेखन जगत की सलामी बल्लेबाज हैं। सोलहवें वसंत में जब किशोर-किशोरियां किशोरावस्था के मद में खोए रहते हैं, उस समय रेनू सैनी ने लेखन में डूबकर अपनी पहली रचना का सृजन किया और इनकी वो रचना देश के प्रमुख समाचारपत्र में प्रकाशित भी हुई। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के जाने-माने समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ अब तक इनकी कुल 25 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है तथा इनका अगला लक्ष्य पुस्तकों का अर्द्ध शतक जड़ने का है। इन्हें लेखन के क्षेत्र में अनेकों सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं तथा इनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका है। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रेनू सैनी - मुझे बचपन से ही लिखना और पढ़ना बेहद पसंद था। केवल दस वर्ष की आयु से अपने आप ही विचारों को कॉपी में क्रमबद्ध करना आरंभ कर दिया था। स्कूल में हिन्दी की शिक्षिका लिखने व पढ़ने के लिए बहुत प्रेरित करती थीं। संयोगवश हिन्दी की शिक्षिका और मैं हमनाम थे। इसलिए मुझे उनकी हर बात को पूरा करने में एक विशेष आनंद की अनुभूति होती थी । जब वह मेरे लेखन की प्रशंसा करतीं थीं तो बहुत अच्छा लगता था । इसी तरह लिखना और पढ़ना चलता रहा । पहली रचना सोलह वर्ष की आयु में नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई थी । उसके बाद तो रचनाएं प्रकाशित होने का सिलसिला चल पड़ा । 

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ा?

रेनू सैनी - लेखन से मुझ पर सदैव अच्छा प्रभाव पड़ा है। लेखन हमारी कल्पना एवं तर्कशक्ति को बेहद मजबूत कर देता है । लेखन करने और पढ़ने से व्यक्ति के अंदर परिपक्वता आती है । लेखन ने मेरा शारीरिक एवं बौद्धिक विकास किया है ।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

रेनू सैनी - जी बिल्कुल,  साहित्य समाज का दर्पण होता है । लेखन से केवल समाज ही नहीं बदलता अपितु भाषा को भी एक नवीन पहचान मिलती है । जैसा कि हाल ही में प्रसिद्ध साहित्यकार गीताजंलि श्री के वृहद् हिन्दी उपन्यास ‘रेत समाधि’ को अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है । इससे हिन्दी भाषा एक नए फलक पर स्थापित हुई है । प्रेमचंद की कहानियों से लेकर चित्रा मुद्गल, मन्नू भंडारी, ममता कालिया, सत्य व्यास और दिव्य प्रकाश दुबे जैसे लेखकों ने साहित्य को समाज के यथार्थ से जोड़ा है । 

आपकी अपनी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों है?

रेनू सैनी - मेरे द्वारा रचित मेरी सबसे प्रिय रचना ‘आखरदीप’ नामक कहानी है । यह कहानी शिक्षा के ऊपर है । इसमें एक बच्चा निम्न वर्ग के सब लोगों के अंदर शिक्षा की अलख जगाता है और वे सभी बच्चे एक दूसरे को शिक्षित करने लग जाते हैं । 

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

रेनू सैनी - मैं अपने लेखन से समाज को यही संदेश देना चाहती हूँ, कि सभी लोग सकारात्मक रहें। देश की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में अपनी योग्यता दर्शाएं । मैं सेल्फ हेल्प की रचनाएं अधिक लिखती हूं ताकि मैं स्वयं भी विपरीत परिस्थितियों का सामना हिम्मत और धैर्य से कर सकूं । मैंने यही अनुभव  किया है कि यदि हम पढ़ते-लिखते रहें और विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक साहित्य हाथ में हो तो हर कठिन से कठिन बाधा पर विजय पायी जा सकती है ।

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