गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

ब्लॉग को मीत बनातीं सुमन कपूर 'मीत'



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो आज आपको ले चलता हूँ हिमाचल प्रदेश के मनमोहक स्थान मंडी शहर में| मंडी को प्राचीन काल में मांडव नगर तथा सहोर के नाम से जाना जाता था| मंडी हिमाचल प्रदेश का एक मुख्य शहर है| यह  हिमाचल  प्रदेश की राजधानी शिमला से 143 किलोमीटर उत्तर की ओर बसा हुआ है| मंडी शहर की सुखदायक गर्मियाँ (दिल्ली की तरह दुखदायक नहीं) और ठंडी सर्दियाँ (हमारी दिल्ली जैसी ठंडी हैं क्या?) प्रसिद्द हैं |  यह हिमाचल प्रदेश के बड़े शहरों में से एक है | इस शहर में नारी जाति के लिए इतना स्नेह और सम्मान है कि यहाँ लिंगानुपात अधिकतम (1013 महिलाएं प्रति हज़ार पुरुषों पर) है|

अब मंडी की ऐतिहासिकता बात करें तो मंडी राज्य की स्थापना बाहु सेन ने 1200 ईसवी में की थी, किन्तु अजबर सेन ने ऐतिहासिक रूप से मंडी शहर की स्थापना 1526 ईसवी में की| वर्तमान मंडी जिला दो राज्यों मंडी राज्य और सुकेत (सुन्दर नगर)  के मिलन से 15 अप्रैल, 1948 में, जब हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना हुई, आस्तित्व में आया (आप सबका ज्यादा दिमाग तो नहीं खा रहा हूँ?) आज हम मिलने जा रहे हैं इसी मंडी शहर में डटी हुईं सुश्री सुमन कपूर 'मीत' से |  अब जाने किसकी किस्मत में उनका मीत बनना लिखा है? (आप तो अपना ख्याल छोड़ ही दें) किन्तु सुमन जी ने हिंदी को अपनी माँ और ब्लॉग को अपना मीत बना लिया है| 


 सुमन जी के बारे में क्या कहूँ ...हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत शहर मण्डी में एक साधारण परिवार में जन्म लिया माता पिता ने बहुत अच्छी शिक्षा दिलवाई कि आज अपने पैरों पर खड़ी होने के काबिल बनी हैं (आप और हम कब बनेंगे? काबिल)  और सरकारी सेवा में कार्यरत हैं| विज्ञान की छात्रा होते हुए भी हिंदी और साहित्य की तरफ रुझान था मन के जज्बातों को कलम से पन्नों पर लिखने की कोशिश करती हैं पहले लेखन डायरी के पन्नों तक ही सीमित था करीब एक साल पहले अपने पहले ब्लॉग "बावरा मन" से ब्लॉग जगत में   कदम रखा और कुछ समय बाद दूसरा ब्लॉग "अर्पित सुमन" शुरू किया ब्लॉग जगत से प्रोत्साहन मिला  और बस कारवां चल पड़ा शब्द पथ पर .......

 इन्हें इनकी कविता की इन पंक्तियों से ही पहचानने का प्रयास करते हैं..

पूछी है मुझसे मेरी पहचान
भावों से घिरी हूँ इक इंसान
चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ
वादा है मेरा न छोडूगी हाथ
जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत
इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी मीत”!!

सुमित प्रताप सिंह- सुमन जी कैसी हैं आप? (सुमन जी के मीत के बारे में पूछूँ कि नहीं?)

 सुमन कपूर 'मीत'- सुमित जी मैं ठीक हूँ. आप कैसे हैं?

 सुमित प्रताप सिंह- गूगल बाबा के आशीर्वाद से हम भी ठीक-ठाक हैं. कुछ प्रश्न लाया हूँ आपके लिए?

 सुमन कपूर 'मीत'- (अपनी हँसी रोकते हुए. काश इस समय वंदना गुप्ता जी और भैया अजय कुमार झा होते तो यह क्षेत्र ठहाकों से गूँज जाता) गूगल बाबा का आशीर्वाद सभी ब्लॉगरों पर बना रहे (इस सरकार के राज में तो मुश्किल सा लग रहा है) यही प्रार्थना करते हुए अपने प्रश्न पूछ डालिए.                                           



सुमित प्रताप सिंह- जी अवश्य ! आपको ब्लॉग लेखन नामक बीमारी कबकैसे और किसके माध्यम से लगी?

सुमन कपूर 'मीत'- जनवरी 2010 मेरे एक दोस्त के प्रोत्साहन पर मैंने अपना पहला ब्लॉग बावरा मन शुरू किया |

सुमित प्रताप सिंह- किसी भी रचना को अच्छा सिद्ध करने हेतु कितनी टिप्पणियाँ काफी हैंएक या फिर सौ?

सुमन कपूर 'मीत'- किसी भी रचना को सिद्ध करने के लिए टिप्पणियों की संख्या निर्भर नहीं करती बल्कि टिप्पणी में उस रचना पर की गई समीक्षा निर्भर करती है | लेखन तब सार्थक हो जाता है जब उसका लिखा पाठक के मन तक पहुँच जाता है | कुछ ब्लोग्स पर बहुत अच्छी रचनाएँ है पर टिप्पणी नहीं है, इससे ये तो नहीं मान सकते कि वो रचना अच्छी नहीं है | जो पुराने ब्लोगर्स हैं उनकी टिप्पणियां ज्यादा होती हैं क्योंकि उन्हें लंबे समय से पढ़ा जा रहा है, नए ब्लोगर्स को स्थापित होने में समय लगेगा पर रचनाएँ उनकी भी बहुत अच्छी हैं पर टिप्पणियां कम |

सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?


सुमन कपूर 'मीत'- मैंने अपनी पहली रचना 1993 में लिखी उस इंसान के लिए जिसे मैं अपनी जिंदगी में सिर्फ दो बार मिली हूँ | मुकेश अंकल जिनसे बिछडने का मुझे बहुत दुःख हुआ था और वो मेरी कलम में उतर आया था मेरी पहली रचना के रूप में न जाने क्यूँ | 

सुमित प्रताप सिंह- आपको लगता है कि आपका लिखना ज़रूरी हैवैसे आप लिखती क्यों हैं?

सुमन कपूर 'मीत'- मैं अपने मन के लिए लिखती हूँ | सारा खेल मन का ही होता है |
कुछ क़तरे हैं
ये जिन्दगी के
जो जाने अनजाने
बरबस ही
टपकते रहते हैं
मेरे मन के आंगन में................



सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है?

सुमन कपूर 'मीत'- जो मन में विचार आ जाये उस पर लिख लेती हूँ |
                 (अमां ये क्या बात हुई?)
सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

 सुमन कपूर 'मीत'- इस शिक्षित दुनिया को एक कवि क्या सन्देश देगा ...बस यही कहना चाहती हूँ कि आज कि इस भागदौड  वाली जिंदगी मे हर इंसान खुद से दूर चला गया है ..भावनाएं बस नाम भर की रह गई हैं ... मानव ह्रदय अटूट प्रेम से भरपूर है ....उसे मशीनी ना बनने दें ...

(जो मशीन बन गए हैं उन्हें कैसे सुधारें?)


सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न. "ब्लॉग पर हिंदी लेखन द्वारा हिंदी का विकास"  इस विषय पर आप अपने कुछ विचार रखेंगी?

सुमन कपूर 'मीत'-  ये बात बिल्कुल सही है कि ब्लॉग के जरिये हिन्दी का बहुत विकास हुआ है |ब्लॉग जगत ने नए कवियों और लेखकों  को एक अलग पहचान दी है | उन्हें एक ऐसा मंच दिया है जिनसे उनकी छिपी प्रतिभा दुनिया के सामने आई है | लोग हिंदी की तरफ विमुख हों रहें थे पर ब्लॉग के जरिये एक और जहां उनके लेखन को मंजिल मिली वही दूसरी और हिन्दी को बढ़ावा भी मिला |

(अचानक ही सुमन 'मीत' जी प्रेम से कम्प्यूटर महाराज की ओर देखने लगीं हम समझ गए कि अपने मीत से मिलने का उनका समय हो गया है... उन्हें उनके मीत के साथ छोड़ चल दिए किसी और से जय सिया राम करने)

सुमन कपूर 'मीत' के मीत से मिलना हो तो पधारें http://www.sumanmeet.blogspot.in/ पर...

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

चिट्ठी लिखतीं सुष्मिता सिंह




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो कभी आपने सोचा है कि पहले चिट्टी किसने लिखी होगी? अगर पता चल जाए तो मुझे भी बताना |  अभी हाल के कुछ सालों तक चिट्ठी एक-दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख स्रोत थी प्रेमी-प्रेमिकाओं के जीवन का तो यह एक अभिन्न भाग थी और उन्होंने डाकिया चचा को देवदूत का पद प्रदान कर रखा था | किन्तु समय ने करवट बदली और चिट्टियों का युग भी बदला और बदल गई डाकिया चचा की किस्मत थी  | अब लोगों ने डाकिया चचा को मक्खी मारने का काम सौंपकर इंटरनैट पर चिट्ठियां लिखनी आरंभ कर दी हैं तथा इन चिट्टियों को संबंधित व्यक्ति तक पहुँचाने का जिम्मा भी स्वयं ही संभाल लिया है | मतलब कि खुद ही अंतरजातीय डाकिया बन गये हैं  | आज हम मिलने जा रहे है एक ऐसे हिंदी ब्लॉगर से जो इंटरनैट पर चिट्टियाँ लिखने में मस्त रहती हैं | मजे की बात यह है कि इनके ब्लॉग का नाम भी चिट्टी जगत है | सुष्मिता सिंह ने  मास कम्यूनिकेशन में एम.फिल किया है और अभी सोपान स्टेप पत्रिका के साथ काम करती हैं, जो हम दिलवालों की दिल्ली से निकलती है और उस दुनिया के बारे में होती है जिसे गाँव कहते हैं | इनके ब्लॉग का नाम  है तो चिट्ठीजगत लेकिन वो सिर्फ इनकी नहीं आप और हम सब की चिट्ठी है| चलिए मिलते हैं सुष्मिता सिंह से...

सुमित प्रताप सिंह- नमस्कार सुष्मिता सिंह कैसी हैं आप?

सुष्मिता सिंह- जी मैं ठीक चिट्ठी लिखने में मस्त हूँ |  आप कैसे हैं?

सुमित प्रताप सिंह- हम भी ठीक हैं. कुछ प्रश्न लाया हूँ आपके लिए.

सुष्मिता सिंह- जी पूछिए.

सुमित प्रताप सिंह- आपने अपनी पहली कागजी चिट्ठी कब और किसे लिखी?

सुष्मिता सिंह- जी मैंने पहली चिट्ठी दसवीं कक्षा में अपने दादा जी को लिखी थी|

( दादा जी को या फिर किसी और को? अरे आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?)

सुमित प्रताप सिंह- आपने अंतिम कागजी कब और किसे लिखी?

सुष्मिता सिंह- जी मैंने अंतिम कागजी चिट्ठी करीब तीन साल पर अपने एक भैया को लिखी थी|

( भैया को या फिर? हद हो गई पहले आप मुस्कुरा रहे और अब शर्माने भी लगे...खैर...)
   



सुमित प्रताप सिंह- आपको ब्लॉग लेखन करने के बारे में कैसे सूझा?

सुष्मिता सिंह- ब्लॉग के बारे में सुना था कि ये कोई बला है तो मैंने इसके बारे में और दिलचस्पी दिखाई और मेरा एम. फिल. का विषय ही न्यू मीडिया और ब्लॉगिंग बना इसलिए ब्लॉग लेखन और नए पुराने ब्लॉग, ब्लोगरों के बारे में जानना भी मुझे अच्छा लगने  लगा | जब मैंने ब्लॉग के बारे में जाना तो लिखना भी सूझ गया | जब लिखना सूझ ही गया तो अब लिखते रहते हैंअब ये न पूछियेगा कि क्या लिखते हैं |  थोडा हमारे ब्लॉग की सैर भी कर लीजिए | 





सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?

सुष्मिता सिंह- रचना वो भी पहली ये तो ठीक है लेकिन कहाँ ये नहीं पूछा आपने| मैं फिर भी बता देती हूँ| स्कूल की मैगज़ीन में विदाई नाम से एक कविता छपी थी जब स्कूल से हमारी विदाई होने वाली थी | तब लिखने का शौक नहीं बल्कि दोस्तों से विदाई के गम में कविता बन गई | और  ब्लॉग पर  पहली रचना मेरी न हो कर मेरे दोस्त की आठवी में पढने वाली  छोटी बहन की एक कविता थी जो मेरे ब्लॉग पर आई | वह कविता एक भिखारी पर लिखी गई थी | उसके बाद जब मेरी रचना मेरे ब्लॉग पर आई तो आज तक आ ही रही है | पहली तो आ गई आखिरी का पता नहीं... 





सुमित प्रताप सिंह- आप लिखती क्यों हैं?

सुष्मिता सिंह- लिखते क्यों है, ये क्या बात हुई | अब हम लिखते क्यों है ये बता कर लिखेंगे क्या? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें भी है |  हमारे मन के विचारों को साकार रूप देने के लिए| कभी अपने लिए कभी आपके लिए | अभिव्यक्ति के लिए | लिखेंगे हमेशा लिखेंगे | ब्लॉग पर और भी लिखेंगे | आप को कमेन्ट करना है तो करें, मैं भी करुँगी | आप भी लिखे हम भी लिखे| सब लिखे पढ़े और आगे बढ़ें | 




सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है?

सुष्मिता सिंह-- अब विधा कौन सी बताऊ | जिस विधा में हमारी लेखनी फिट बैठ जाये वही प्रिय है | विधाता ने इतनी विधाएँ बनाई है किसका किसका नाम ले | कभी कवि, कभी लेखक तो कभी शायर बनने का भी मन करता है पर शायरी आती कहाँ हमें | अगर ब्लॉग की बात करे तो आज हर विधा में ब्लॉग मौजूद है बशर्ते आप क्या पढ़ना पसंद करेंगे | और लेखन को किसी विधा में बाँटना जरुरी तो नहीं | 


(ये लो जी हमने तो विधा पूछी थी सुष्मिता ने प्रवचन ही दे डाला| राम-राम जपो...) 




सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

सुष्मिता सिंह- हमारी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश मिला ये तो समाज बेहतर बता पायेगा (तो आप क्या बाएंगिन?)  हम तो सिर्फ लिखने का काम करते हैं | अगर समाज का आइना बनते है हमारे लेख तो कुछ देखते ही होंगे समाज में रहने वाले इस आईने में | सन्देश तो हर वो चिट्ठी देती है जो पढ़ते ही याद दिलाती है वो यादे जो कही खो गई हैं दुनियादारी में | 
(लो फिर प्रवचन शुरू... अब श्याम-श्याम जपो...)




सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न "ब्लॉग पर हिंदी लेखन और हिंदी की प्रगति में युवाओं का योगदान" इस विषय पर आप कुछ विचार रखेंगी?

सुष्मिता सिंह- 55 युवा आबादी है भारत की | युवा शक्ति से तो सभी वाकिफ होंगे ही | जहां इनकी चाह होगी वहां राह बना ही लेते हैं | युवा मूवी तो याद है ना | जहाँ तक ब्लॉग की बात है यह एक तरह से सिटिज़न पत्रकारिता का भी एक रूप है | जब युवा भारत अपनी सशक्त अभिव्यक्ति के लिए तैयार है तो ब्लॉग उनका साथ कैसे छोड़ सकता है | बस एक माध्यम चाहिये आगाज के लिए अंजाम तक तो खुद ब खुद पहुँच जाते हैं ईश्वर के दूत | स्वागत है युवा ब्लोगरों का...कदम कदम बढ़ाये जा... 

( सुष्मिता सिंह का मन चिट्ठी लिखते-लिखते शायद गीत गाने का कर रहा था सो उन्हें यूँ गुनगुनाते और निरंतर चिट्ठी लिखते रहने की शुभकामनाएँ देते हुए राह पकड़ी अपने डगर की )


सुष्मिता सिंह की चिट्ठियाँ पढ़नी हों तो पधारें http://chitthijagat.blogspot.in/  पर...
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