शनिवार, 5 नवंबर 2016

व्यंग्य : देशी ड्रैगन


- भाई नफे!
- हाँ बोल भाई जिले!
- किन हसीन ख्यालों में खोया हुआ मुस्कुरा रहा है?
- भाई मैं तो चीनी ड्रैगन की हालत देखकर मुस्कुरा रहा था।
- क्यों क्या हुआ चीनी ड्रैगन को?
- होना क्या है बेचारा अधमरा हो रखा है।
- वो भला कैसे?
- भाई इस दिवाली देशवासियों ने देशभक्ति का दम दिखाया और चीनी माल का बहिष्कार कर चीनी ड्रैगन की हालत खस्ता कर दी।
- सुना है भाई कि इस बार व्यापारी वर्ग ने इस काम में बड़ी भूमिका निभाई।
- हाँ भाई इस बार व्यापारी भाइयों ने चीनी ड्रैगन की नैया डुबोने में पूरी भूमिका निभाई। इस बार दिवाली पर चीनी सामान की खपत में 60% की गिरावट दर्ज की गई, जिसके कारण  चीनी ड्रैगन अधमरा हो रखा है।
- मतलब कि अभी भी अपने देश में 40% ऐसे महान लोग मौजूद हैं, जो चीनी सामान को इस्तेमाल करने में गर्व करते हैं।
- हाँ भाई दुर्भाग्यवश ऐसे महान लोग भी इस देश में मौजूद हैं।
- वैसे कौन हैं ये महान लोग?
- ये महान लोग देशी ड्रैगन  हैं।
- देशी ड्रैगन?
- हाँ भाई देशी ड्रैगन।
- भाई अब तू कंफ्यूज मत कर, बल्कि इनके बारे में खुलके बता।
- भाई देशी ड्रैगन ऐसे महान लोग हैं जो इस देश में रहते और यहाँ का खाते बेशक हैं लेकिन इन्हें इस देश और इसके नफे-नुकसान से कोई मतलब नहीं है। ये लोग तो हमेशा इस चिंता में डूबे रहते हैं कि इन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए बल्कि इनका स्वार्थ सिद्ध होते रहना चाहिए।
- भाई इन देशी ड्रैगनों की पहचान क्या है?
- भाई इन देशी ड्रैगनों को आसानी से पहचाना जा सकता हैं। हर गली-मोहल्ले और नुक्कड़ पर इनकी उपस्थिति मिल जाएगी। इनमें से कुछ लोग दिवाली से पहले और बाद में चीनी सामान खरीदने की वकालत करते हुए मिल जाते हैं और कुछ पड़ोसी देश के कलाकारों के लिए आँसू बहाते दिख जाते हैं। कुछ आतंकियों के जनाजों में छाती पीटते हुए देश विरोधी नारे लगाते हुए मिल जाते हैं तो कुछ किसी मुठभेड़ में अपराधियों के मारे जाते ही सेना अथवा पुलिस के विरुद्ध मोर्चा ले जाँच आयोग बिठाने की सिफारिश करते हुए दिख जाते हैं।
- आखिर कैसे लोग हैं ये?
- लोग नहीं भाई देशी ड्रैगन बोल।
- हाँ भाई ये लोग सही मायने में ड्रैगन ही हैं। भारत की पवित्र भूमि में पल रहे अपवित्र देशी ड्रैगन।
- अब तू ठीक से इन्हें समझा।
- हाँ भाई बिलकुल समझ गया। पर ये तो बता कि इन दिनों इन देशी ड्रैगनों के हाल क्या हैं?
- इन दिनों बेसुध होकर पड़े हुए हैं बेचारे।
- हालत ज्यादा नाजुक तो नहीं हो गई इनकी।
- भाई इस समय देश के हालात ही ऐसे हो रखे हैं कि इनकी हालत नाजुक होना लाजिमी है। मुझे तो इस बात का डर है कि कहीं आए दिन लगनेवाले सदमों से ये मर न जाएँ।
- हा हा हा भाई अगर ऐसा हुआ तो बढ़िया ही रहेगा। कम से कम इस देश की धरती से फालतू का कुछ बोझ तो कम हो जाएगा। 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

व्यंग्य : कंस का प्रतिशोध


 विष्णु जी को उदास हो किन्हीं ख्यालों में खोए देखकर लक्ष्मी जी से रहा नहीं गया और उनसे पूछ ही लिया।
-
प्रभु किन विचारों में खोए हुए हैं?
-
बस ऐसे ही कुछ सोच रहे थे।
-
कुछ न कुछ तो बात है प्रभु। आप यूँ ही गुमसुम और उदास नहीं हो सकते।
-
नहीं-नहीं देवी ऐसी कोई विशेष बात नहीं है।
-
प्रभु शायद मेरी सेवा में कोई कमी रह गयी है।
-
मैंने कहा न लक्ष्मी ऐसी कोई बात नहीं है।
-
तो जो भी बात है कृपया मुझे बताएँ।
-
द्वापर युग में हमने कृष्ण का अवतार लिया था।
-
हाँ तो उस युग में हमने भी रुकमणि के रूप में आप संग अवतार लिया था।
-
हाँ बिलकुल! उस युग में हमने अपने अत्याचारी मामा कंस और उसके दुष्ट सहयोगियों का वध किया था।
- 
तो!
-
तो हुआ ये कि कंस ने मरते हुए चुपके से हमारे पाँव पकड़कर अपने कर्मों के लिए क्षमा माँगी और हमसे धोखे से एक वरदान ले लिया।
- 
धोखे से! किन्तु मैंने तो ये सुना है कि भोले शंकर ही भोलेपन के कारण धोखे में फँसते हैं पर आप भी...।
-
अब क्या करते? उस समय मानवातार में कुछ पल के लिए बुद्धि भी मानवीय हो गयी थी इसलिए धोखे में फँस गए।
-
आप तो फँस गए और साथ ही मुझे भी फँसवा दिया।
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वो कैसे?
-
अभी तक तो मैं और सरस्वती अपनी सहेली पार्वती का उनके पति के भोलेपन के लिए मजाक उड़ाती थीं, लेकिन अब सरस्वती और पार्वती मुझे जीने नहीं देंगी।
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अरे भई भूल हो गयी सो हो गयी।
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वैसे कंस ने आपसे वो कौन सा वर लिया था जिसने आपको इतनी परेशानी में डाल दिया?
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उसने वर माँगा था कि अगले युग उसका जन्म कंस के रूप में न हो।
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कंस के रूप में नहीं तो फिर किस रूप में वह जन्म लेना चाहता था?
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वह मेरे रूप में जन्म लेना चाहता था।
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इसका अर्थ है कि मरते समय उसको वास्तव में सद्बुद्धि आ गयी थी।
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देवी जैसे कि कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती, उसी तरह दुष्ट प्रवृत्ति के लोग अपनी दुष्टता से कभी भी बाज नहीं आ सकते।
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अब इसमें दुष्टता वाली बात क्या हो गयी? उस बेचारे ने तो तुम्हारे आदर्शों से प्रभावित होकर तुम्हारे रूप में जन्म लेने का वर माँगा और आप उसे दुष्ट मानने पर तुले हुए हैं।
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देवी यही तो उसकी दुष्टता थी।
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वो भला कैसे?
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उसने मरते समय अपने साथियों व अपनी मृत्यु का बदला लेने के लिए षड़यंत्र रचा था।
-
कैसा षड़यंत्र प्रभु?
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कंस द्वापर युग में तो हमारा बाल-बांका नहीं कर सका, किन्तु कलियुग में उसने हमारे नाम पर पूर्व योजनानुसार ऐसी कालिख पोती है कि लोग हमारा  नाम लेने से भी कतराने लगे हैं और जो लोग नाम ले भी रहे हैं वो अभद्रतापूर्वक ले रहे हैं।
-
अच्छा ऐसी बात है। वैसे प्रभु कंस ने कहाँ और किस नाम से जन्म लिया है?
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उस दुष्ट ने भारत देश में मेरे पर्यावाची नाम से जन्म लिया है और इस समय वहाँ के एक तथाकथित राष्ट्रभक्त विश्वविद्यालय में अपने हरकतों से मेरे नाम का मानमर्दन करने में लगा हुआ है।
इतना कहकर विष्णु जी ने गहरी साँस छोड़ी और उदास हो फिर से ध्यान मग्न हो गए।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 



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