गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

आलेख : समकालीन यथार्थ और व्यंग्य



   समकालीन समय में लेखन सकरात्मकता को तड़ीपार कर नकरात्मकता से गलबहियाँ कर रहा है। अब लेखन का दायरा सिकुड़कर एक निश्चित सीमा में सिमटकर रह गया है। अब उसके विषय आम नहीं ख़ास हो गए हैं। इसका आरंभ नरेंद्र मोदी के महँगे सूट से होता है, राहुल गाँधी की बातों पर असमंजस में पड़ते हुए, लालू प्रसाद यादव के मसखरेपन पर खीसें निपोरते हुए और मुलायम सिंह के परिवादवाद एवं नीतियों पर जाकर समाप्त हो जाता है। इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते हए ही लेखन आरंभ होता है और इन्हीं के आसपास ही ये दम तोड़ देता है।

लेखक को अब रिक्शेवाले द्वारा अपने से चार गुना बोझ की सवारियां बिठाकर रिक्शा खींचने पर उसकी सिकुड़ी हुईं पेट की आतड़ियाँ नहीं दिखतीं न इसे मज़दूर की ईंटों के बोझ से फूलती हुईं माथे की नसें दिखाई देती हैं।ये इच्छुक नहीं रहता भूख से तड़पते लोगों द्वारा कूड़े के ढेर से रोटी बीनकर खाने को देखने के लिए न इसे परवाह है कि उस मासूम लड़की का भविष्य क्या होगा जिसे उसका प्रेमी प्रेमजाल में फंसाकर घर से भगाकर ले गया और छल से उसे किसी तवायफ के कोठे पर जाकर बेच दिया।

आजकल लेखन के विषय तो पंचसितारा में ऐयाशी करते नेताजी, दफ्तर के बड़े साहब या फिर प्रेमी-प्रेमिका की प्रेमलीलाओं में ही उलझे हुए हैं। आज का लेखक कुछ भी लिखने से पहले कई बार विचार करता है कि फलां विषय पर लिखने से उसे कितना नफा और कितना नुकसान होगा? और इस नफे-नुकसान की भावना की गुलाम होकर ही आज के लेखक की कलम चलती है। ऐसा करना शायद आज के लेखक की व्यावसायिकता से ओतप्रोत विवशता भी है। उसे लेखन के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर प्रसिद्धि पाने की लालसा होती है और गरीबों, वंचितों व अक्षमों पर लिखकर अपनी कलम तोड़नेवाले भला क्या हासिल कर पाते हैं। वैसे भी इस वर्ग की समस्याओं को दर्शाता लेखन भला कौन पढना चाहता हैं। भौतिकता आज के लेखक के मन-मस्तिष्क पर निरंतर हावी होती जा रही है। इसे हीरो-हीरोइन के गॉसिप चाहिए, सास-बहू की साजिशें, महिला-पुरुष के अनैतिक संबंध और राजनीतिक गलियारों के षड्यंत्रों से हमारा ध्यान ही नहीं हटता तो ये भला कैसे देख पायेगा कि किसी किसान ने आखिर किस विवशता में अपनी गर्दन फाँसी के फंदे में लटकाकर आत्महत्या की अथवा खेत से लौट रही किसी भोली लड़की को क्यों कुछ दरिंदों ने बलात्कार करके जान से मार डाला। अब चूँकि ये विषय आज के लेखक के हृदय को द्रवित कर देते हैं इसलिए इन पर लिखना एक प्रकार से रिस्क लेना है और आज के लेखक ये रिस्क लेने के कतई इच्छुक नहीं रहते। जाने इसके कौन से शब्दों से सत्ता व प्रशासन का हृदय दुःख जाए और इसकी अच्छी-खासी तैरती नैया उनके क्रोध के परिणामस्वरूप निर्मित भँवर में फँसकर अचानक ही डूब जाए। जो कलम कभी तलवार की धार लिए बुराई और अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत रहती थी आज वो ही स्वार्थवश भोथरी हो चुकी है। परिणामस्वरूप सामाजिक विषमता की खाई दिनों-दिन निरंतर चौड़ी होती जा रही है। अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और अधिक गरीब। यही लेखन का समकालीन यथार्थ है। 


“हम अपुरस्कृत लोग
अक्सर दुःख से
बेचैन हो छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।”

मेरी उपरोक्त लघु कविता मुझ जैसे अनेक व्यक्तियों की पीड़ा है जो इन दिनों चल रहे सम्मान लौटाए जाने के स्वांग से द्रवित हैं। अब लेखकों को सार्थक लेखन करने की बजाय राजनीति करने में आनंद आने लगा है। वे येन केन प्रकारेण चर्चा में बने रहना चाहते हैं। पहले सम्मान लेकर चर्चा और वाहवाही बटोरी और जब उनके सम्मान पर धूल जमने लगी तो उसे लौटाकर फिर से चर्चा में आ गए। लेकिन इस चर्चा बटोरने के खेल में कहीं खोकर रह गयी है शोषित और वंचित वर्ग की पीड़ा और विवशता। 
ऐसे कठिन समय में व्यंग्य की असली परीक्षा होती है और इस समय व्यंग्य का कर्तव्य बनता है कि वह आगे आये और अपनी भूमिका का ठीक से निर्वहन करे। और हमें आशा के साथ-साथ पूर्ण विश्वास है कि व्यंग्य अपनी भूमिका को बखूबी निभाएगा। एवमस्तु! 


लेखक : सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

व्यंग्य : एक पत्र आँसू गैंग के नाम


प्यारे आँसू गैंग
सादर दोगुलस्ते!

आशा है सकुशल होंगे और अपने-अपने बिलों में चैन से सो रहे होंगे। जानता हूँ बीते दिनों आप सबने कठिन परिश्रम करके अपना पसीना बहाया था सो थकान होना अवश्यम्भावी है। पाकिस्तानी गवैये के कार्यक्रम पर प्रतिबन्ध, मालदा दंगे, असहिष्णुता व आतंकी याकूब प्रेमी छात्र की आत्महत्या इत्यादि बहुतेरे मुद्दे थे जिनमें आप सब कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहे। सो इतनी व्यस्तता और परिश्रम के पश्चात् आराम करना तो बनता है। पर आप तो स्वयं को न्याय के लिए आवाज बुलंद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं इसलिए मैंने सोचा कि आपकी निंद्रा में खलल डालने की कोशिश कर ही दूँ। शायद आपको पता चल गया हो कि हमारे एक कलाकार को पड़ोस के अति शांतिप्रिय देश ने अपने देश में आने के लिए वीसा देने से इंकार कर दिया है। अब ये और बात है कि उस अति शांतिप्रिय देश के शांति दूत आए दिन बिना वीसा के हमारे देश में शांति में वृद्धि करने में समय-समय पर अपना अतुलनीय योगदान देते रहते हैं। क्या कहा आपको ये समाचार मिल गया था? फिर आपकी आँखों में आँसुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं करवाई और न ही आपके मोमबत्ती गैंग व धरना विशेषज्ञ बंधुओं की इस समाचार पर मोमबत्ती मार्च और धरना दिए जाने की घोषणा करने की कोई खबर मिली। अच्छा तो ये बात है। आप असली वाले धर्मनिरपेक्ष प्राणी हैं जो सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके अल्पसंख्यकों और देश की ऐसी-तैसी करनेवाले सदपुरुषों के पक्ष में ही आवाज उठाते हैं और उस कलाकार ने उन अल्पसंख्यकों द्वारा खुद के बंधुओं पर हुए अत्याचार और कत्लेआम के विरोध में आवाज उठाने का घोर पाप किया है। ओहो मतलब आप भी विवश हैं। यदि आप ऐसे छोटे-मोटे मुद्दे पर विरोध का झंडा उठायेंगे तो अरब के तेलियों और यूरोप के मिशनरीज से आप सबके कटोरों में नियमित रूप से डाली जानेवाली भीख बंद हो जाएगी। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो ये पापी पेट का मामला है। खैर छोडिए किसी के पेट पर लात मारना अपने स्वभाव में भी नहीं है। हम आपकी सहायता के बिना ही ये समस्या सुलझा लेंगे। आपकी नींद में खलल डाला इसके लिए माफ़ कीजिएगा। आप तब तक चैन से सोइए जब तक कोई देशद्रोही मुसीबत में न फँस जाए या फिर कोई शांतिप्रिय आतंकी देश में शांतिपूर्ण कार्य करते हुए 72 हूरों के लालच में अपनी पवित्र देह को त्याग न दे। तब तक हम राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद की अलख जगाते हुए अपने और अपने बंधुओं के हृदय में सो चुके राष्ट्रप्रेम को जगाने का प्रयत्न करते हैं ताकि आनेवाले समय में आप सबकी नींद में कभी भी व्यवधान न पड़ सके।
आपके यूँ ही सोये रहने की आशा करता हुआ
आपके अनुसार असहिष्णु देश का वासी
एक असहिष्णु भारतीय।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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