शनिवार, 16 सितंबर 2023

व्यंग्य : उपयोगिता का दौर

 


     आज का दौर उपयोगिता का दौर है। जब तक आप उपयोगिता की कसौटी पर खरे उतरते हैं आप सिरमौर हैं वरना किसी और का शुरू हो जाता दौर है। यूनानी विचारक प्लेटो के अनुसार एक गोबर से भरी टोकरी भी सुन्दर कही जा सकती, यदि वह उपयोगिता रखती है। इसलिए इस संसार में जीने के लिए आपको अपनी उपयोगिता समाज के समक्ष सिद्ध करनी ही पड़ेगी। यदि आपमें उपयोगिता का अभाव है, तो फिर आपको समाज में नहीं मिलना भाव है। अब आपके मस्तिष्क में ये प्रश्न कौंधेगा, कि इस ससुरी उपयोगिता का मानक भला है क्या? इस प्रश्न का बड़ा सरल सा उत्तर है, कि जब तक आप दूसरों के काम आ सकते हैं या उनकी सुख-सुविधा को बनाए रखने में सहयोगी बने रहने की योग्यता रखते हैं तब तक आपका सम्मान है। जिस दिन आपकी उपयोगिता समाप्त हुई उसी दिन आपको समाज के उपयोगिता प्रेमी जीवों का अंतिम प्रणाम है। एक छात्र को ही ले लीजिए। वह बेचारा दिन-रात परिश्रम करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। उसे आरंभ में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता का सामना करना पड़ता है। इन असफलताओं के दौर में वह समाज के लिए अनुपयोगी जीव होता है। उससे बात करना तो दूर उसे आजू-बाजू भी भटकने नहीं दिया जाता तथा साथ में उसे ताने मार-मार कर उसका जीवन दुष्कर कर दिया जाता है। जैसे ही उस छात्र का भाग्य करवट लेता है और वह किसी प्रतियोगी परीक्षा को उत्तीर्ण कर लेता है, तो उससे अनुपयोगी का पदक वापिस लेकर उसके सिर पर उपयोगिता का मुकुट सम्मान सहित धर दिया जाता है। अब अपनी हिन्दी भाषा की बात करें तो कुछ लोग हिन्दी के बल पर ही कमाएंगे और खाएंगे, किन्तु जब सम्मान देने का समय आएगा तो अंग्रेजी में बड़बड़ाते हुए अंग्रेजी के ही गुण जाएंगे। ऐसी दोहरी मानसिकता वाले जीवों के लिए जब तक हिंदी की उपयोगिता है, तभी तक वे उसके साथ रहते हैं। ऐसे जीवों के लिए हिंदी की उपयोगिता हिंदी पखवाड़े के बीच ही सर्वाधिक होती है। हिंदी पखवाड़े में ये जीव हिंदी के काँधे पर सवार हो हिंदी को समर्पित कार्यक्रमों में मंच पर विराजमान होने का सुख प्राप्त करेंगे, मानदेय राशि से भरे लिफाफे और हिंदी सेवी सम्मान व पुरस्कार बटोरेंगे, किंतु जैसे ही हिंदी पखवाड़ा समाप्त होगा ये जीव पखवाड़े के बीच मिली सुख-सुविधा को उपलब्ध करवाने वाले भले मानवों को थैंक यू वैरी मच का संदेश भेज कर पुनः अंग्रेजी के चरणों में लौटना आरंभ कर देंगे। वैसे इसमें इनका दोष नहीं है क्योंकि ये दौर ही उपयोगिता का है न कि अनुपयोगिता का। है कि नहीं?

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

रचना तिथि - १४ सितंबर, २०२३

चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 9 सितंबर 2023

जी-20 आला रे


     राजधानी दिल्ली और एनसीआर में उत्सव का माहौल है। जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन के उपलक्ष में दिल्ली एनसीआर दुल्हन की भांति सज चुके हैं। कूड़ा-करकट और गंदगी बहुत उदास हैं। उन बेचारों को उठा-उठा कर आयोजन स्थल से दूर ले जाकर पटका जा रहा है। गली-मोहल्ले और सड़कें चमचमा रहे हैं। कुरूपता अचानक से जाने कहां लापता हो गयी है। चहुं ओर उत्सव का माहौल है। ऐसा लगता है कि जैसे हर कोई गा रहा हो जी-20 आला रे। अभावों में भी सुखद स्वप्नों के सहारे जीने वाले देश को आस है, कि जी-20 शिखर सम्मेलन उनके भविष्य को स्वर्णिम बनाएगा। जी -20 आला रे गीत का गायन करते हुए जी-20 शिखर सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सभी देशवासी पूरे जी-जान से जुटे हुए हैं। देश की राजधानी के चप्पे-चप्पे में और इसकी सीमाओं पर सुरक्षा के लिए तैनात जवान अन्य एजेंसियों संग इस प्रयास में है कि ये आयोजन सफल हो जाए। विश्व बंधुत्व की ओर भारत को अग्रसर करने के लिए लोग कष्टों को सुख मान कर हर्षित व गर्वित हैं। राजधानी दिल्ली व एनसीआर लीप-पोत कर सजाए गए अपने आकर्षक रूप को लोगों के नैनों के दर्पण में निहारते हुए इस असमंजस में हैं कि वे इस पर इतराएं, इठलाएं या फिर से अपने पूर्व रुप में आने के लिए समय काटते जाएं। विदेशी मेहमानों के आगमन से उल्लास से भरी ये धरती विश्व बंधुत्व व प्रगति के स्वप्नों को साकार करने के लिए अत्यधिक उत्साहित है। अब जाने ये स्वप्न साकार होंगे या फिर बाहर से आया कोई बहुरूपिया अपने चेहरे पर बंधुत्व का मुलम्मा चढ़ा कर इस बंधुत्व को तार-तार करने के अपने कुत्सित उद्देश्य को पूर्ण कर लौट जाएगा। बहरहाल इस आयोजन को सफल बनाने के लिए कई रातों की नींद की बलि दे चुकीं आँखें मिलकर इसकी सफलता की आस के साथ निरंतर गुनगुना रही हैं जी-20 आला रे।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 

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