बुधवार, 8 जून 2022

कलम घिसतीं संगीता सिंह तोमर

      संगीता सिंह तोमर दिल्ली में ही जन्मीं व पढ़ी-लिखीं। जब संगीता स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद कॉलेज में पहुँचीं तो उनके हृदय में साहित्य के प्रति प्रेम जाग्रत हुआ। रचना को पढ़ कर उसकी  समालोचना करना उनकी आदत में शुमार हो गया । समालोचना करते-करते एक दिन संगीता लेखिका बन गयीं। इनके लेखन का शुभारंभ ब्लॉग लेखन से हुआ। ऐसा समय भी आया कि इनका ब्लॉग 'कलमघिस्सी' इतना चर्चित हुआ, कि विश्व की चर्चित महिला हिंदी ब्लॉगरों में सूची में संगीता का नाम सम्मिलित किया गया। लघुकथा, आलेख, कहानी, बाल कहानी, व्यंग्य व कविता इत्यादि विधाओं में संगीता कई वर्षों से अपनी कलम घिस रही हैं। फिलहाल साहित्य सेवा करते हुए संगीता उच्च शिक्षा प्राप्त करने में व्यस्त हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

संगीता सिंह तोमर - मुझे साहित्य पढ़ने का बचपन से शौक रहा है। पढ़ते-पढ़ते एक दिन लिखने लगी। शुभचिंतकों की शुभकामनाओं से मेरी रचनाओं को प्रकाशन का सौभाग्य मिला और इस प्रकार मेरी लेखन की गाड़ी चल पड़ी।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

संगीता सिंह तोमर - जहाँ तक मेरा अनुभव है कि लेखन से मेरे व्यक्तित्व पर अभी तक तो कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा है, बल्कि ये कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मुझ पर लेखन से अच्छा प्रभाव ही पड़ा है।  जीवन में सकारात्मकता आयी है और नकारात्मकता दूर हुई है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

संगीता सिंह तोमर - बिलकुल लगता है। मेरे विचारानुसार लेखन में वह शक्ति है जो समाज में बदलाव लाने की भूमिका का निर्वहन कर सकती है।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

संगीता सिंह तोमर - वैसे तो मुझे अपनी सारी रचनाएँ ही प्रिय हैं, किंतु मुझे मेरी कविता 'मुझे जन्म दो माँ' विशेष रूप से प्रिय है। भ्रूण हत्या से व्यथित होकर इस रचना का सृजन हुआ था। इस कविता का विषय मेरे मन को बहुत ही अधिक भाता है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

संगीता सिंह तोमर - प्रत्येक लेखक अपने लेखन से समाज को संदेश देना चाहता है। मैं भी उनमें से एक हूँ। अब ये समाज पर निर्भर करता है कि वह मेरी रचनाओं से संदेश लेना भी चाहता या नहीं।

शनिवार, 4 जून 2022

साहित्य की संदूकची भरतीं रुपाली सक्सेना

      ध्यप्रदेश के भोपाल के हर्षवर्धन नगर क्षेत्र की रुपाली सक्सेना की हिंदी साहित्य से भेंट एक पाठक के रूप में हुई थी। पेशे से वस्त्र सज्जाकार रूपाली सक्सेना का साहित्य से इतना लगाव हो गया, कि एक दिन इन्होंने लिखना भी आरंभ कर दिया। इनकी लेखन यात्रा का शुभारंभ इतना धुंआधार हुआ, कि इनकी रचनाएं देश भर के समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाने लगीं। इनके द्वारा किए गए साहित्यिक परिश्रम के फलस्वरूप इनकी पहली पुस्तक 'स्नेह की संदूकची' प्रकाशित हुई व कुछ साझा संकलनों में भी इनकी रचनाओं ने अपनी दमदार भागीदारी सुनिश्चित की। अब तक रुपाली सक्सेना अपने लेखन के लिए कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त कर चुकीं हैं तथा अपनी साहित्य की संदूकची में नित प्रतिदिन नई-नई रचनाओं एवं सम्मान व पुरस्कारों को भरने में रत हैं। हमने इनसे कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

रुपाली सक्सेना - मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि साहित्यिक है अतः साहित्य से मेरा जुड़ाव बचपन से ही था। स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी मैं साहित्यिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया करती थी। मैं लिखती तो थी, लेकिन अपने मन के उद्गारों को लिखकर मैं अपनी डायरी में छिपा दिया करती थी। विवाह होने के कई वर्षों के बाद अपनी बड़ी बहनों के प्रोत्साहन के बाद मैंने फिर से लिखना आरंभ कर दिया।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

रुपाली सक्सेना - लेखन से मुझ पर बुरा नहीं बल्कि हमेशा की तरह सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। जिंदगी जीने का और उसे समझने का एक नया दृष्टिकोण मुझे लेखन से ही मिलता है।

क्या आपको लगता है कि लेखन से समाज में कुछ बदलाव लाया जा सकता है?

रुपाली सक्सेना - जी बिल्कुल, मेरा विश्वास है कि लेखनी में जो शक्ति होती है वो किसी और में नहीं होती है।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौन सी है और क्यों?

रुपाली सक्सेना - 'आसान नहीं है औरतों के लिए कविता ग़ज़ल या गीत लिखना' मेरी सबसे प्रिय रचना है। मेरी यह रचना उन सभी गृहणियों को समर्पित है, जो अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर सृजन कार्य कर रहीं हैं।

आप अपने लेखन से पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगीं?

रुपाली सक्सेना - मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपने लेखन से समाज में व्याप्त कुरीतियों और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता का संचार करूँ।

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