शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

व्यंग्य : मच्छर तंत्र


    पिछले दिनों अपना पड़ोसी देश मलेरिया मुक्त घोषित कर दिया गया है। जैसे हर नेक पड़ोसी के दिल में अपने पड़ोसी की अच्छी खबर को सुनकर आग लगती है वैसे ही इस खबर को सुनकर हमारा भी कलेजा धधकने लगा है। देशवासी सोच रहे हैं कि एक छोटा सा देश इतना बड़ा काम कर गया और हमारा इतना बड़ा देश ये छोटा सा काम क्यों नहीं कर पाया? असल में देश तो अपना भी मलेरिया अथवा अन्य मच्छर जनित रोगों से अब तक मुक्त हो जाता लेकिन हमारे देश के सफेदपोश मच्छरों ने ऐसा होने ही नहीं दिया।  वे तो आपस में लड़ने-झगड़ने और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में भी ही व्यस्त रहे। उनकी व्यस्तता का लाभ पारंपरिक मच्छरों ने उठाया और जनता को अपने जहरीले डंक से इस दुनिया के मोह-माया और दुखों से मुक्ति दिलवाने में योगदान देते रहे। जनता तड़पते-तड़पते मरने को विवश होती रही, लेकिन सफेद्फोश मच्छरों को कोई फर्क नहीं पड़ा। फर्क पड़ता भी क्यों? सफेदपोश मच्छरों ने आंकड़ा नामक शस्त्र का ऐसा प्रयोग किया कि उनपर लगनेवाले सारे आरोप इस शस्त्र के सामने पल भर में धराशाही हो गए। आंकड़ा शस्त्र धारण किए हुए योद्धाओं ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि मच्छर जनित बीमारियों से हुईं मौतों की असली संख्या उस चक्रव्यूह से निकलकर कभी बाहर आ ही न सकी। भूले से किसी मौत की सच्चाई सामने आ भी गई तो जवाब में झट से आश्वासन का झुनझुना पकड़ा दिया गया। जनता बेचारी उस झुनझुने में उलझकर रह गई और मच्छरों ने निर्भय होकर फिर से अपने आदमी मारू मिशन के लिए कमर कस ली। मच्छरों को भी ये मालूम था कि अगर वो लाचार मानवों का खून चूसकर उनके शरीर में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया अथवा जीका इत्यादि बीमारियों का जहर भर रहे थे तो उसी प्रकार सफेदपोश मच्छरों ने भी देश का खून चूस-चूसकर उस ख़ून को स्विस बैंकों को सप्लाई कर बदले में गरीबी और बेकारी जैसी बीमारियों का जहर उसके शरीर में भर दिया था। हमेशा की तरह इस बार भी कागजों पर अब भी जमकर फोगिंग हो रही है और मच्छर जनित रोगों से लड़ने की विभिन्न योजनाएँ बन रही हैं। सफेदपोश मच्छर पारंपरिक मच्छरों के साथ मिलकर मच्छर राग गा रहे हैं और इस मच्छर राग के शोर में मरती जनता की करुण पुकार किसी को सुनाई नहीं दे पा रही है। कभी-कभी लगता है कि जैसे हम लोकतंत्र में नहीं बल्कि मच्छर तंत्र में जी रहे हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

व्यंग्य : चिट्ठी आई है



    चिट्ठी आई है। किसी के घर में नहीं बल्कि मीडिया में आई है। किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा के महानायक ने इसे लिखा है। इसलिए ये चिट्ठी स्वतः ही चिट्ठियों की महानायिका बन गई और मीडिया ने इसे हाथों-हाथ ले लिया। इसमें वास्तविक जीवन में नाना-दादा का डबल रोल कर रहे महानायक की भावनाओं का समंदर भरा हुआ है। एक जमाना था जब नाना और दादा के रूप में बुजुर्गों को नाती-पोते निष्ठा और आदर से सुनते थे पर अब इतना समय नाती-पोतों के पास है ही कहाँ जो वो अपने खूसट नाना या दादा की फालतू बातें सुन सकें। और यहाँ तो खुद नाना/दादा ही महाव्यस्त हैं। हालाँकि महानायक अपने अति व्यस्त समय में से कुछ पल निकालकर अपनी नातिन व पोती को बिना चिट्ठी लिखे भी जीवन के फलसफे समझा सकते थे, लेकिन वो महानायक जो ठहरे। सो कोई भी कार्य करेंगे भी तो महानायकीय अंदाज में। इसलिए उन्होंने चिट्ठी लिखकर समझाने का फैसला किया। पर उन्होंने चिट्ठी लिखकर सीधे नातिन और पोती को क्यों नहीं दी? कहीं उन्हें ये अंदेशा तो नहीं था कि वो दोनों चिट्ठी का हवाई जहाज बनाकर हवा-हवाई न कर दें। सोचिए ऐसा होने से महानायक के दिल को कितनी ठेस पहुँचती? इसीलिए शायद उन्होंने ये रिस्क नहीं उठाया। वैसे भी बड़े और चर्चित व्यक्ति कोई कार्य करें और दुनिया को पता न चले तो धिक्कार है उनके बड़े और चर्चित होने पर। जैसे घर की मुर्गी दाल बराबर होती है वैसे ही ऐसा भी हो सकता था कि ‘घर की चिट्ठी बेकार पर्ची बराबर’ जैसा कोई नया मुहावरा ईजाद हो जाता और चिट्ठी अपनी बेकद्री पर आँसू बहाती रहती। इसलिए शायद चिट्ठी ने ही अपने रचयिता के सम्मान में ये फैसला लिया हो कि नातिन या पोती के पास जाने से पहले दुनिया की सैर कर ली जाए और अपने रचयिता के महानायकीय सम्मान में थोड़ी और वृद्धि कर ली जाए। इधर चिट्ठी घुमक्कड़ बन मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर घूमने-फिरने में मस्त है और उधर बेचारी नातिन और पोती पलकें बिछाए चिट्ठी के आने की राह तक रही हैं। महानायक भी सोच रहे हैं कि चिट्ठी को तब तक व्यस्त रहने दो जब तक कि इसे दुनिया की हर नातिन और पोती न पढ़ ले। अपनी नातिन और पोती का क्या है उनके लिए कोई दूसरी चिट्ठी लिख दी जाएगी। पर क्या वास्तव में नातिन और पोती उस चिट्ठी को पढ़ना चाहेंगीं? फ़िलहाल तो यह एक यक्ष प्रश्न है।   

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


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