मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा : सावधान! अब पुलिस मंच पर भी है


‘सावधान! पुलिस मंच पर है’  यह सुनकर पाठकगण डरें नहीं, क्योंकि यह मात्र एक पुस्तक का नाम है,  जो कि व्यंग्य कविताओं का संग्रह है और इसके रचनाकार हैं युवा कवि और लेखक सुमित प्रताप सिंह। इस कविता संग्रह में कटाक्ष करती हुईं  कुछ कविताएँ खड़ी बोली हिन्दी की हैं और कुछ कविताएँ  ग्रामीण भाषा के लबादे में हैं।   इस संग्रह में संकलित  व्यंग्य कविताएँ काफी रोचक और सजीव हैं कि पढ़ते हुए मानस पटल पर एक छायाचित्र खींचने में सफल होती हैं। अधिकतर कविताएँ सामाजिक विषयों पर आधारित है। मुसीबतों के आने पर पर हमारा समाज पुलिस पर ही आश्रित होता है। कवि के अनुसार पुलिस की भूमिका और कर्तव्य इस कदर बढ़ चुके हैं, कि पुलिस को अब मंचों को भी सम्भालना होगाऔर उसकी मर्यादा की रक्षा के लिए तत्पर रहना पड़ेगा। इस संग्रह की पहली कविता लोक सभा चुनाव के दौरान लिखी गयी थी। कवि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश के अच्छे भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ इस कविता को लिखा है। हालांकि पहली कविता से मोदी विरोधी थोड़े और नाराज हो सकते हैं, क्योंकि उनकी नाराजगी तभी से आरंभ हो चुकी होगी जब उन्होंने पुस्तक का समर्पण पृष्ठ खोलकर देखा होगा, क्योंकि कवि ने अपने इस कविता संग्रह को देश के प्रधानसेवक श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को सादर समर्पित किया है।
           कविता संग्रह की दूसरी कविता "कवि घंटाल" आज के लेखक समुदाय पर करारा प्रहार करती है। आज का लेखक क्या सोचता है उसकी मानसिकता कैसी है? वह खुद में स्वयंभू है और सम्मान पाने के लिये किस तरह से सांठ-गांठ करता है इस पर एक दृष्टि कविता की निम्न पंक्तियों के माध्यम से डालिएगा : -
"हमने लिख लईं कविता चार
अब करनो है इनको प्रचार
दुय-चार हमें सम्मान दिलाय देओ
किनके पांव छूने बताय देओ
मालिश करनी तो बऊ करएँ
पदमश्री तक हम नहीं टरएँ
आओ एक- दूजे की पीठ खुजाएँ
मिल-जुल के आगे बढ़ जाएँ।
यकीनन उपरोक्त पंक्तियाँ आज के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी सच्चाई है जिसको समाज जानते हुए भी स्वीकार करने से परहेज करता है। इस संग्रह की यह कविता मुझे बेहद पसंद आयी। चूंकि कवि पुलिस विभाग में कार्यरत है तो इसकी रचनाओं में इसका असर भी दिखता है। कवि समाज और पुलिस दोनों की भूमिकाओं को तीसरी नजर से देखता और कम शब्दों में तीखे बाण तानता हुआ दिखा। कवि का पुलिसिया अनुभव भी इसकी कविताओं जगह बनाने में कामयाबी पाता है। जहाँ ये कविता के माध्यम से जेबकतरों से डरवाने के साथ-साथ सतर्क भी करता है। कवि कटाक्ष करने हेतु कहीं देवदास बन बैठा है तो कहीं बिंदास लड़का। असहिष्णुता की आड़ में राजनीति करने वाले साहित्यकार भी कवि की व्यंग्य दृष्टि  से बच नहीं पाए। सम्मान लौटाने की उत्कंठा इतनी कि उसके मन में विचार आता है : -
"हम अपुरस्कृत लोग
दुख व पीड़ा से
उदास और बेचैन हो
अक्सर छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।
इन पंक्तियों को पढ़कर कवि की मानसिक छटपटाहट को महसूस कर सकता है कि वह क्या सोचता है? कविताओं के अगले क्रम में ही एक कविता शीर्षक है "विनती सुन लो भगवान" जो कि देश में मँहगाई की समस्या पर लिखी गई है। टमाटर और प्याज के बढ़ते दामों से कवि इतना प्रभावित है कि वह अगले जनम खुद ही टमाटर और प्याज बनने की प्रार्थना भगवान से कर बैठता है।
           संग्रह की एक कविता " होली तो हो ली" समाज व हमारे तीज-त्यौहारों पर  सोशल मीडिया किस तरह से काबिज़ हो चुका है इस पर कवि ने इस कविता के द्वारा जोरदार व्यंग्य कसा है। यह एक ऐसा कविता संग्रह हैं जिसमें पाठक को हर क्षेत्र व विषय पर हँसातीं और गुदगुदातीं रचनाएँ मौजूद हैं। चूंकि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से बड़े से बड़े गम्भीर मुद्दों पर चोटिल प्रहार किया जाता है । कवि ने समाज में व्याप्त छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ी संजीदगी से उठाया  है और उठाकर आराम -आराम से धो-धो कर पछाड़ा है। अलबत्ता  इस संग्रह को मैं व्यंग्य कविताओं का मिक्स वेजिटेबल नाम देती हूँ जो थोड़ा मीठा-नमकीन और थोड़ा तीखा है। जिसको पढ़कर आपको भी उतना ही आनंद आयेगा जितना कि मुझे आया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, कुरीतियों व विद्रूपता को इस कविता संग्रह में इतने अच्छे ढंग से रखा गया है कि पाठकगण का ध्यान संग्रह पढ़ने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार- विमर्श के लिए बाध्य करेगा है। सुमित प्रताप सिंह को इस कविता संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ!
पुस्तक -  सावधान!पुलिस मंच पर है।
लेखक-   सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य -  200 रुपए
समीक्षक - शशि पाण्डेय, नई दिल्ली।
इस पुस्तक को आप निम्न लिंक पर क्लिक करके Online भी मँगवा सकते हैं : -

रविवार, 24 अप्रैल 2016

व्यंग्य : भेड़िया आया


    पुलिस कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए जिले अपने सहकर्मी नफे से बोला, "भाई नफे! वो औरत कौन सी थी जो आए दिन झूठी कॉल करके हम पुलिसवालों का जीना हराम किए हुए थी?"
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अरे भाई जिले! तूने भी सुबह-सवेरे किस मनहूस का जिक्र छेड़ दिया। उस औरत ने तो 100 नंबर को गॉसिप करने वाला नंबर बना लिया था। सुबह-शाम जब जी करे फोन मिला देती थी।" नफे ने नाराजगी से कहा।
जिले ने समझाया, "भाई शायद उसके दिमाग में कोई दिक्कत रही होगी?"
"
मुझे तो वो सनकी और पागल ही लगती है। कभी-कभी तो वो हम पुलिसवालों को इतनी गन्दी और भद्दी गालियाँ बकती है कि किसी को बताने में भी शर्म आती है।" नफे गुस्से में बोला।
जिले ने चाय का आखिरी घूँट सुड़कते हुए कहा, "भाई वो औरत ही क्यों पब्लिक में बहुत से ऐसे सिरफिरे हैं जो किसी न किसी बहाने 100 नंबर मिलाकर पुलिस की माँ-बहन एक करने से गुरेज नहीं करते हैं। जैसे कि हम उनकी भैंस चुराकर ले आए हों। इन सिरफिरों को ऐसा लगता है जैसे कि सारे ऐब हम पुलिसवालों में ही भरे हुए हैं और ये तो साक्षात् संत के रूप में ही इस धरती पर उतरें हैं। भाई अगर 100 नंबर पर कॉल करने के पैसे कटने लगें तो इनका एक भी फोन न आए।"
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सही कहा भाई। और यही बात परसों मैंने उसको बोली भी थी कि मैडम फ्री की कॉल है इसलिए तुम भी मजे ले रही हो। कभी इस बारे में सोचना कि जब तुम्हें वाकई में पुलिस की जरुरत पड़ेगी न तब पुलिस ये सोचकर तुम्हारी मदद को नहीं आएगी कि ये औरत तो झूठी कॉल करके फिरकी लेती है। और हाँ मैंने उसे बचपन में सुनी भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने वाले झूठे बच्चे की कहानी भी सुनाई थी और उस कहानी से उसको सबक लेने को कहा था।" नफे ने बताया।
जिले ने गंभीर हो पूछा, “तो भाई उस औरत ने उस झूठे लड़के की कहानी से सबक लिया या नहीं?”
नफे मंद-मंद मुस्कुराया, "सबक! भाई ये शब्द किसी जमाने में हमारे शब्दकोष में हुआ करता था, लेकिन अब तो इस शब्द से शायद इस युग के प्राणियों ने दुश्मनी मोल ले ली है और खासकर इस शहर के लोगों ने।“
जिले ने झल्लाते हुए कहा, “भाई मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये लोग हमसे ऐसा व्यवहार करते क्यों है?"
"
भाई इन लोगों ने अपने दिमाग में एक ही बात भर रखी है कि पुलिसवाले ठीक नहीं होते। देखा जाए तो हर विभाग में अच्छे और बुरे लोग मौजूद हैं। इसमें पुलिस ही अपवाद नहीं हैं।" नफे शिकायती लहजे में बोला।
जिले बोला, "भाई बात तो तेरी ठीक है। इन लोगों का पुलिस के प्रति ये उदासीन रवैया अपराधियों के हौसले बुलंद किए हुए है। अपराधी इन लोगों की आड़ में पुलिसवालों के साथ मारपीट तक करने से बाज नहीं आते।"
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और जब अपराधियों के साथ पुलिस कड़ी कार्यवाही करे तो ये लोग ही उनके रक्षक बनकर खड़े हो जाते हैं।" नफे ने कहा।
जिले नफे की बात का समर्थन करते हुए, "फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब ये अपराधी ही अपने रक्षक बने इन लोगों की ऐसी-तैसी करने से बाज नहीं आते।"
"
तब ये भले लोग ही अपनी छाती पीटते हुए शिकायत करते हैं कि पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती है। अब ये और बात है कि जनता में मौजूद ये भले लोग ही ही पुलिस के हाथ बाँधने के लिए उत्तरदायी है।" नफे खिलखिलाया।
जिले बोला, "अब ये बात इन भले लोगों को भला कौन समझाए?"
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भाई वक़्त की मार कभी न कभी अपने आप समझा देगी।" नफे ने घोषणा की।
जिले ने पूछा, "खैर छोड़ इस बात को। तू ये बता कि कल रात को उस औरत का फिर से फोन आया था या नहीं?"
"
आया था। भाई कुत्ते की पूछ कभी सीधी हुई है? कल वो खूब फोन मिलाती रही पर मैंने उसका फोन उठाया ही नहीं। परसों उसने गालियों की इतनी खेप दे दी थी कि कई दिनों का कोटा पूरा हो गया था। और यार वैसे भी कल मेरा जन्मदिन था और अपने जन्मदिन पर उस पागल औरत की भद्दी गालियाँ काहे को सुनता?" नफे ने बेफिक्री से कहा।
जिले बोला, "भाई तेरी बात सही निकली। कल वाकई में भेड़िया आ गया।"
"
मैं तेरी बात का मतलब नहीं समझा।" नफे ने हैरान हो कहा।
जिले ने गंभीर हो बताया, "कल रात उस औरत के घर में घुसकर कुछ लोगों ने लूटपाट की और उसे जान से मार दिया। ये देख अख़बार में उस औरत के घर हुई लूटपाट की खबर छपी हुई है।"
यह सुन नफे ने जिले से हड़बड़ाहट में अख़बार लिया और बेचैनी से अख़बार में छपी उस खबर को पढ़ने लगा।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

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