गुरुवार, 24 मार्च 2022

रोचक है जैसे थे उपन्यास

    


     हाल ही में मेरे यशस्वी मित्र सुमित प्रताप सिंह की नवीनतम पुस्तक 'जैसे थे' जो कि उपन्यास के रूप में प्रकाशित हुई है उसे पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ।  अमूमन ज्ञानीजन पुस्तक पढ़कर उसकी समीक्षा करते हैं, जो कि एक नितांत अलग स्तर है पर मुझ जैसे साधारण पाठक जो कुछ भी पढ़ते हैं उस पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया ही दे सकते हैं। देखा जाए तो लेखक और पाठक के बीच में ही कहीं पर बैठा होता है समीक्षक जो वस्तुतः पाठक को बताता है कि अमुक पुस्तक में पढ़ने योग्य क्या अच्छा या बुरा है और वहीं लेखक को बताता है कि उसने उस पुस्तक के लेखन में कहां पर गलती की, पर बात यदि पाठक से सीधा लेखक तक पहुंच जाए तो कुछ और ही बात है। इसी क्रम में मुझे भी लगा कि मैं अपनी बात सीधा सुमित तक पहुंचाऊं।  वैसे तो सुमित अभी तक की लेखन यात्रा में अपने को एक विशिष्ट विधा में जिसे कि व्यंग्य कहा जाता है और जो कि सामाजिक जन-जागरण का सबसे सशक्त माध्यम है में अपने को स्थापित कर चुके हैं और एक मुकाम पर बैठे हुए दृष्टिगत होते हैं। अब बात करते हैं सुमित के उपन्यास 'जैसे थे' पर। चूंकि मैं स्वयं लंबे समय या यूं कहें कि बचपन से ही पढ़ने में एक अच्छा-खासा समय देते आया हूं तो प्रथम दृष्टि में ही यदि कोई पुस्तक मुझे आकर्षित न करे तो उसे फिर से हाथ में उठाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है परंतु सुमित की पुस्तक 'जैसे थे' मैंने वन-गो में पढ़ डाली। यह तो निश्चित है कि पुस्तक रोचक है और उतने ही रोचक है पुस्तक के कथानक के पात्र व स्थान। वह चाहे पत्रकार नारद कुमार हो, कवि तोप सिंह या कि विनम्रपुरा थाने का थानेदार कड़क सिंह। यहां तक कि उपन्यास के केंद्र में उल्लिखित गाँव ही अजब से नाम वाला व्यस्तपुरा है। सुमित ने इस उपन्यास में हास्य विनोद के प्रसंगों के साथ साथ पुलिस थाना, छिछले कवि, साहित्यिक अकादमियों, धार्मिक अंध श्रद्धा, समाज में व्याप्त अन्य विसंगतियों और पुजारी व दरगाह के खादिम के माध्यम से धार्मिक घालमेल पर भरपूर व्यंग्य किया है।  आशा करता हूँ सुमित इसी प्रकार से अपनी लेखनी तीक्ष्ण करते रहेंगे और निरंतर अपना लेखकीय योगदान देते रहेंगे।

- धर्मेंद्र गिरी, नई दिल्ली


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

व्यंग्य : चुनाव और पुलिस


    हर बार चुनाव आता है और आकर चला जाता है। इस दौरान समाज के हर वर्ग की सुध ली जाती है, पर बेचारी पुलिस पर कोई राजनीतिक दल और उसका नेता ध्यान नहीं देता। ऐसा भी हो सकता है कि बेचारी पुलिस किसी वर्ग की श्रेणी में आने के योग्य ही न हो। जब भी वेतन की वृद्धि की बात आती है तो आपसी कटुता को ताक पर रखकर सभी माननीय एक हो जाते हैं। अगर माननीय क्रमशः पार्षद, विधायक और सांसद बन जाते हैं तो वे तीन-तीन पेंशन के हकदार हो जाते हैं, पर पुलिसकर्मी इस मामले में इतना भाग्यशाली नहीं होता है। वह 24 घंटे ड्यूटी के बंधन में बँधे रहने के बावजूद समुचित वेतन पाने का भी हकदार नहीं है। एक पुलिसकर्मी को ऐसी-ऐसी परिस्थितियों व ऐसे-ऐसे स्थानों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है, कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कभी उसे जेठ की दुपहरी में जलना पड़ता है, कभी मूसलाधार बारिश में भीगते हुए काँपना पड़ता है तो कभी पूस की रात में हाड़ कंपाने वाली ठंड में ठिठुरना पड़ता है। सुनसान इलाके में अंधेरी रात में पिकेट पर आसपास कुछ भी खाने को न मिल पाने के बाद भूख को बर्दाश्त करता हुआ पुलिसवाला आकाश में पेंशन रुपी कल्पित तारे को देखकर इस बात का संतोष करते हुए  अपनी ड्यूटी में कर्मठता से जुटा रहता था, कि जब कभी वह सेवानिवृत्त होगा तो पेंशन के सहारे अपने परिवार संग अपना बाकी जीवन चैन की बंशी बजाते हुए बिताएगा,  पर अब तो नई पेंशन योजना के तहत वो आस भी कबकी टूट चुकी है। पुलिस चाहे लाख अच्छे कार्य कर ले, पर उन पर कभी  ध्यान नहीं दिया जाता, किंतु यदि उससे भूले से भी जरा सी चूक हो जाये तो उसकी आफत आ जाती है। कभी पुलिस के नाम से बदमाशों को पसीना छूट जाता था पर अब बदमाश तो बदमाश बल्कि आम आदमी भी बिना-बात के पुलिस को पीटने की फ़िराक में रहता है। पुलिस को संगठित होकर अपनी बात कहने का भी अधिकार नहीं है, जो संगठित होकर अपने दुःख और परेशानी सरकार के सामने बयाँ कर सके। इसीलिए  पुलिस से जब  कभी उसके वर्तमान हालात के बारे में पूछा जाता है तो पुलिस की बदहाल बैरकें, जर्जर स्टाफ क्वार्टर, थकी-मांदी वर्दी और नींद से भरी हुयी अलसाई हुईं आँखें एक साथ उदासी से मुस्कुराते हुए धीमे से स्वर में कहती हैं जैसे थे।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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