शनिवार, 1 अप्रैल 2017

व्यंग्य : रोमियो तुम कब आओगे




     आजकल बहुत परेशान हैं वो और काफी नाराज भी। वो चिंता में डूबकर विचार कर रहे हैं कि आखिर क्यों उन्हें शिकार बनाकर उन पर शिकंजा कसा रहा है। अभी तक तो कितने निश्चिन्त थे वे सब। न कोई रोक-टोक थी और न ही कोई बंधन था। बस उनकी मनमर्जी चलती थी। प्यार के नाम पर एक तो अय्याशी करने का मौका मिलता था ऊपर से ये सब करने के बदले जन्नत का दरवाजा खुलने का वादा भी। इस नेक काम में उन्हें बड़े-बड़ों का पूरा समर्थन और संरक्षण भी प्राप्त था। जिंदगी कितने मजे से बीत रही थी और अचानक यूँ मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उन्हें रोमियो बता उनके खिलाफ बाकायदा अभियान चलाकर उनके प्रेम के धंधे को दफ़न करने की गहरी साजिश रची गयी। इस बार उनके आकाओं की चिल्ल-पौं भी कुछ काम न आ सकी। उनके शुभचिंतक चीखते रहे, चिल्लाते रहे और वो रोमियो को अपने  जाल में फँसाते रहे। वैसे तो ये लोग पश्चिमी संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं, पर अभियान चलाया तो पश्चिम के प्रेमी रोमियो के नाम पर। क्या मजनू और राँझे के प्यार में कोई कमी थी? क्या उन्होंने प्यार की खातिर क़ुरबानी नहीं दी थी? कम से कम मजनू और राँझे के नाम पर अभियान चलता तो उन पर सांप्रदायिक होने का दोष तो मढ़ा जा सकता था। पर नहीं उनके आदर्श तो पश्चिमवाले जो ठहरे। ये सोचते हुए वो अपने माथे पर चन्दन का तिलक लगाते हैं, अपने हाथों में पवित्र कलावा बाँधते हैं, हिन्दू देवी-देवताओं के लॉकेट गले में टाँगते हैं और पूरी तैयारी के साथ मँहगे कपड़े पहनकर अपनी फंडेड चमचमाती बाइक पर किक मारकर अपने इश्क़ मिशन पर रवाना हो जाते हैं। ये देखकर रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू, हीर-राँझा प्रेम में क़ुर्बान हुए बाकी प्रेमी-प्रेमिकाओं संग मुस्कुराते हैं। पर उनकी मुस्कराहट में दुःख भरी उदासी है। वो आधुनिक रोमियो को धिक्कार रहे हैं। पर आधुनिक रोमियो इन सब बातों से बेपरवाह हैं। उन्हें तो बस उनके प्यार में फँसी हुईं मुर्गियाँ दिखाई दे रही हैं जिनको हलाल करना ही उनका मकसद है। उनका इंतज़ार उनके मकड़जाल  में फँसी हुईं अकलमंद आधुनिक जुलियटें पलकें बिछाकर कर रही हैं। उनके संग-संग अपने-अपने लट्ठ को तेल पिलाकर तैयार कर रोमियो की राह तकते हुए एंटी रोमियो स्क्वैड के सभी जवान बार-बार एक ही सवाल कर रहे हैं 'रोमियो! तुम कब आओगे?"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 18 मार्च 2017

व्यंग्य : इन दिनों


    इन दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही उसके द्वारा कर्मठता से किए गए कार्यों से पूरे विश्व में देश की चर्चा हुई। उन विशेष कार्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो इसके द्वारा अल्पसंख्यकों पर इतनी कृपा की गयी कि वो वोट बैंक बनने से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पाए। इस वोट बैंक के सहारे उसने खूब मजे काटे पर इन दिनों इस परंपरागत वोट बैंक ने भी इसका बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के संसाधनों का सदुपयोग करते हुए घोटालों की जमकर खेती की गयी और फसल से जो आय हुई उसे स्विस बैंक के चरणों में अर्पित कर दिया गया। देश के विकास का नारा देते-देते अपने परिवार की वंशबेल में पानी देकर पोषित किया जाता रहा। पर वो कहते हैं न कि किसी भी बात की होती है तो हद पार हुई और उसी वंशबेल से एक अनुपयोगी पौधा उपज गया जिसने अपने पुरखों के परिश्रम का राम नाम सत्य कर डाला। उस पौधे की संगत में आकर कुछ नए पौधे, जो जोश में आकर खुद को वटवृक्ष समझकर उछल रहे थे, वो भी अपना तिया-पाँचा करवा बैठे। अब क्या करें इन दिनों देश में ऐसी आंधी चल रही है जो देश के लिए अनुपयोगी पौधों व वृक्षों को जड़ से हिलाकर अपनी अंतिम साँसे गिनते हुए अपना शेष जीवन बिताने को विवश किए हुए है। इस आँधी ने सिर्फ राजनीति की वंशबेल को ही बेजान नहीं किया, बल्कि इसके परमप्रिय समर्थकों, जिन्हें लोग भूलवश चमचा समझ लेते हैं, का भविष्य भी दाँव पर लगा दिया। बीते दिनों इन परमप्रिय समर्थकों ने असहिष्णुता राग गाते हुए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया था ताकि इस माध्यम द्वारा ही उस आँधी को रोका जा सके और उनके पापी पेट पर लात न पड़े। पर आँधी इतनी बेरहम निकली कि उसकी रफ़्तार के आगे उन परमप्रिय समर्थकों की भी कुछ न चली। फलस्वरूप इन दिनों परमप्रिय समर्थक अपने भविष्य को अंधकारमय पाते हुए सुबकने को विवश हैं। ऐसे गर्म माहौल में भी एक ये सर्दी है जो जाने का नाम नहीं ले रही। लगता है कि सर्दी ने भी ये सोच रखा है कि ये इन दिनों आँधी के मारे उन बेचारों को सर्द-गर्म की सौगात देकर उनके अंजर-पंजर ढीले करते हुए ही रवाना होगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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