रविवार, 9 जुलाई 2023

बेवफाई के वक्तव्य का संशोधन

     ट्रेन से उतर कर प्लेटफार्म पर चलते हुए गला सूखने लगा तो वहीं दुकान से एक पानी की बोतल खरीद ली। फिर रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में  पहुंच कर अपने गले को पानी से तर किया और दुकानदार द्वारा लौटाए गए रुपयों को क्रम से लगा कर जेब में रखने लगा। तभी अचानक मेरा ध्यान एक दस रूपए के नोट पर गया तो उस पर सोनम गुप्ता बेवफा है लिखा पाया। ऐसा नोट मेरे पास दूसरी बार आया था। जब मुझे ऐसा पहला नोट मिला था तब पहली बार मेरा सामना सोनम गुप्ता की बेवफाई से हुआ था। हो सकता है कि ये शरारत किसी  कथित प्रेमी की हो जो अपने एक तरफ़ा प्रेम को  ठुकराए जाने का बदला सोनम गुप्ता नामक किसी मासूम लड़की से ले रहा हो। ऐसा भी हो सकता है कि किसी सोनम गुप्ता ने किसी मासूम छोकरे की प्रेम कहानी को बेवफाई की कटार से छील डाला हो। इसी उधेड़-बुन में डूबा हुआ था कि रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में लगे टेलीविज़न पर एक व्यक्ति रोते हुए दिखायी दिया। समाचार था कि उस बेचारे ने पाई-पाई जोड़कर अपनी पत्नी को पढ़ाया-लिखाया, लेकिन उस पढ़ाई-लिखाई का फल ये मिला कि उसकी पत्नी क्लास वन अफसर बन गयी और जब उस बेचारे का गर्व से सीना फुला कर जश्न मनाने का समय आया, तब उसे अपनी अफसर पत्नी की बेवफाई का मातम मनाना पड़ रहा है। हालाँकि ये पहला मामला नहीं है जब किसी पति ने अपनी पत्नी के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया और बदले में पत्नी की बेवफाई ही नसीब हुई। ऐसे अनेक मामले समाज में समय-समय पर आते रहते हैं। हालाँकि बेवफाई का मैडल केवल स्त्रियां ही नहीं जीततीं, इस मामले में पुरुष भी उनके तगड़े प्रतिस्पर्द्धी हैं। गाँव में जाने कितनी पत्नियां इस आस में अपना जीवन काट देतीं हैं, कि पढ़-लिख कर महानगर में नौकरी करने गया उनका पति एक दिन आएगा और उनके सारे सपनों को साकार करेगा। लेकिन उन बेचारी पत्नियों के सपनों को अपने स्वार्थ की भट्टी में झोंक कर उनके पढ़े-लिखे पति महानगरों में अपनी दूसरी सुंदर-सलोनी पत्नियों के पल्लुओं में खोये हुए बेवफाई का नया अध्याय लिख रहे होते हैं। रेलवे स्टेशन से निकल कर मैंने घर जाने के लिए ऑटो रिक्शा पकड़ा। ऑटो रिक्शा में सफर करते हुए कुछ सोच कर मैंने उस नोट पर लिखे वक्तव्य सोनम गुप्ता बेवफा है को संशोधित कर सिर्फ सोनम गुप्ता ही बेवफा नहीं है लिख दिया और ऑटो रिक्शा से उतर कर उस दस रूपये के नोट को अन्य नोटों के साथ ऑटो रिक्शा वाले के हवाले कर दिया। मैं घर में घुस ही रहा था, कि तभी अचानक एक बड़ी सी कार मेरे बगल में आकर रुकी। उसमें से हमारी कॉलोनी में सब्जी की रेहड़ी लगाने वाला संतोष उतरा और उतर कर मुझसे राम-राम किया। 

मैं उससे बोला - राम-राम संतोष, और सुनाओ कैसे हो?

संतोष ने बड़े ही संतोष के साथ उत्तर दिया - बाबू जी, राम जी की कृपा से बहुत अच्छे हैं।

अचानक मुझे शरारत सूझी और मैंने उससे पूछा - अरे भाई, तुम अपनी पत्नी को सिविल सर्विस की तैयारी करवा रहे थे। उसका कुछ परिणाम निकला?

संतोष के चेहरे पर अब संतोष के साथ मुस्कान भी आ गयी - हाँ बाबू जी, परिणाम बहुत शानदार निकला। श्रीमती जी, कलेक्टर बन गयीं हैं।

मैं प्रसन्न हो बोला - अरे वाह! ये तो बहुत अच्छा समाचार है। अच्छा ये बताओ कि अब तुम क्या कर रहे हो?

संतोष ने बताया - श्रीमती जी ने कलेक्टर बनने के बाद कपड़ों का एक शानदार शोरूम खुलवा दिया। और कभी सब्जी की  रेहड़ी लगाने वाला ये संतोष आज एक अच्छा-खासा बिजनेसमैन बन चुका है।

इतने सारे नकारात्मक समाचारों के बीच इस सुखद समाचार को सुनकर मन प्रफुल्लित हो उठा। मैंने ये सोच कर पीछे मुड़कर ऑटो रिक्शा वाले को देखा कि उसको दिए दस रुपए के नोट पर लिखे बेवफाई के वक्तव्य को फिर से संशोधित किए जाने की आवश्यकता है। पर वह ऑटो वाला जा चुका था। मैंने संतोष को  जलपान के लिए अपने घर में आमंत्रित किया, लेकिन उसने बताया उसके एक और कपड़ों के शोरूम का शहर के एक जाने-माने मॉल में उद्घाटन होना है। उसने किसी और दिन फुर्सत में आकर मिलने का वादा किया और राम-राम कर वहां से चला गया। घर के भीतर घुसते हुए अनायास जेब में हाथ गया तो वहां बीस रुपए का एक  मुड़ा हुआ नोट मिला। उसे खोल कर देखा तो उसमें भी सोनम गुप्ता की बेवफाई उपस्थित मिली। मैंने घर में घुसकर अपना बैग रखा और बाकी काम छोड़कर बीस रुपए के उस नोट में लिखे बेवफाई के वक्तव्य को संशोधित करने में जुट गया।

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 30 जून 2023

टमाटर महाराज की चिंता


     राजसभा सजी हुई थी। सिंहासन पर टमाटर महाराज अभिमान में चूर हो विराजमान थे। नगरवधू मंहगाई उनके चरणों की दासी बनी हुई उनकी सेवा में रत थी। सारी सब्जियां व फल बारी-बारी से टमाटर महाराज को प्रणाम कर राजसभा में स्थित आसनों पर उदास मन के साथ बैठ चुके थे। दालें अपने-अपने मुखों पर प्रसन्नता का झूठा आवरण चढ़ाए नृत्य करते हुए टमाटर महाराज का मनोरंजन कर रहीं थीं। प्याज देव से अदेव की श्रेणी में पहुंच टमाटर महाराज की भुजाओं को गीले नयनों संग धीमे-धीमे दबाने में व्यस्त थे। कालाबाजारियों के लिए टमाटर महाराज के निकट विशेष आसनों की व्यवस्था की गई थी। आम जनता को द्वारपाल बैगनों ने मुख्य द्वार पर ही रोक लिया था। आम जनता विवश हो दूर से ही टमाटर महाराज को देख कर दिवा स्वप्न में डूबी हुई लार टपका रही थी। तभी टमाटर महाराज ने सीसीटीवी ऑपरेटर भिंडी को आदेश दिया कि सीसीटीवी फुटेज देखकर हाल ही में सत्ता से पदच्युत हुए पेट्रोल महाराज की वर्तमान स्थिति का पता लगाया जाए। भिंडी त्वरित कार्यवाई कर पेट्रोल महाराज की वर्तमान स्थिति का पता लगा कर टमाटर महाराज के सम्मुख प्रस्तुत हुई।

टमाटर महाराज - कहो भिंडी क्या समाचार लाई हो?

भिंडी - महाराज, पेट्रोल के वर्तमान स्थिति प्याज की भांति बहुत खराब है।

प्याज के साथ दरबार में बैठे बाकी सभाजनों ने चौंक कर भिंडी को देखा। कभी प्याज को परमप्रिय महाराज से संबोधित करने वाली भिंडी के इस रूप को देखकर सभी ने उसे मन ही मन प्रणाम किया। बेचारे प्याज ने धीमे से सांस छोड़ते आह भरी और फिर से अपने कार्य में जुट गया।

तभी सेनापति कद्दू ने पेट्रोल को बंदी बनाकर राजसभा में प्रस्तुत किया।

सेनापति कद्दू - महाराज, ये दुष्ट डीजल और गैस के साथ आपको सिंहासन से हटाने का षड्यंत्र रच रहा था।

टमाटर महाराज ने पेट्रोल से पूछा - क्या ये सच है?

बेचारा पेट्रोल, टमाटर महाराज से दृष्टि नहीं मिला पा रहा था।

टमाटर महाराज - तू और तेरे साथी चाहे जितने भी प्रयत्न कर लें, किन्तु मुझे इस सिंहासन से नहीं डिगा पायेंगे।

इतना कहकर टमाटर महाराज ने जोर-जोर से हंसना आरंभ कर दिया।

टमाटर महाराज की हंसी में अनमने मन से राजसभा के बाकी सभाजनों ने भी साथ दिया।

तभी आकाशवाणी हुई - मूर्ख टमाटर, इस जग में कुछ भी चिरस्थाई नही है। जिस सिंहासन पर बैठ कर तू अभिमानित हो रहा है एक दिन उसी से औंधे मुंह नीचे गिरेगा।

टमाटर महाराज उस आकाशवाणी को सुनकर सकपका गए। फिर संभलकर उन्होने कड़क स्वर में राजसभा में पूछा - किसी ने कुछ सुना?

राजसभा में सभी ने एक स्वर में उत्तर दिया- नहीं महाराज!

टमाटर महाराज ने अनुभव किया कि सभी राजसभा जन मंद-मंद मुस्कुरा रहें हैं। तभी प्याज ने उत्साहित हो टमाटर महाराज की भुजाओं को और जोर-जोर से दबाने की प्रक्रिया अपनायी तथा दालों ने और अधिक आनंदित हो नृत्य करना आरंभ कर दिया। सभी ने कनखियों से देखा कि टमाटर महाराज के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं और वहां से अचानक पसीने की पतली धार बहने लगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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