रविवार, 18 दिसंबर 2022

जैसे थे उपन्यास के द्वितीय संस्करण का हुआ लोकार्पण

   शोभना सम्मान समारोह के बीच सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुमित प्रताप सिंह के बहुचर्चित उपन्यास 'जैसे थे' के द्वितीय संस्करण का मंचासीन विद्वजनों द्वारा लोकार्पण किया गया। जैसे थे पर वक्तव्य की शुरुआत युवा लेखक अमित श्रीवास्तव द्वारा की गई। उन्होंने सुमित के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बोलने के पश्चात् जैसे थे पर चर्चा करते हुए कि इस उपन्यास को बहुत रोचक शैली में लिखा गया है। सुमित हर परिस्थिति का सामना जैसे थे के साथ करते हैं। जब भी इनसे पूछो कि कैसे हैं तो इनका उत्तर होता है जैसे थे। हम आशा करते हैं कि सुमित 8 पुस्तकों की सीमा रेखा को पार कर शीघ्र ही पुस्तकों का शतक लगाएं।

इसके बाद इंस्पेक्टर सुरेंद्र शर्मा ने जैसे थे पर बोलते हुए कहा कि सुमित का जैसा व्यक्तित्व है वैसा ही उनका लेखन है। हम दोनों एक ही विभाग के हैं और जब हम एक यूनिट में साथ थे और जब भी मेरी इनसे मुलाकात होती थी तो ये अपने चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ ही मिलते थे। इनके उपन्यास में इनकी मुस्कुराहट का प्रभाव दिखता है और अपने पात्रों व परिस्थियों से उपन्यास हास्य मिश्रित व्यंग्य को उत्पन्न करता है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सुयश कुमार द्विवेदी ने सुमित को उनके उपन्यास के द्वितीय संस्करण के लिए बधाई देते हुए कहा कि जैसे थे एक पठनीय उपन्यास है जिसे एक बार पढ़ना आरंभ करें तो समाप्त किए बिना छोड़ा नहीं जा सकता। इसकी कहानी व इसके पात्र पाठक वर्ग में रोचकता बढ़ाते हैं जो उपन्यास को अंत तक पढ़ने को विवश कर देते हैं। कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. अनीता यादव ने जैसे थे पर वक्तव्य देते हुए कहा इस उपन्यास में कई कहानियां एक साथ सफर करतीं हैं। सुमित ने केवल 100 पृष्ठ के इस उपन्यास में जितने विषयों पर कटाक्ष किया है उतने विषयों को किसी 500 पृष्ठों के उपन्यास में भी नहीं उठाया गया होगा। चाहे खाली गांव वालों की कथित व्यस्तता हो या फिर शहर व शहरी जनमानस की संवेदनहीनता हो, चाहे प्रेम के नाम पर बाजारवाद हो या फिर धार्मिक आडंबर हो। सुमित की लेखनी ने इस उपन्यास में लगभग प्रत्येक विषय को लेकर कटाक्ष किया है।

मुख्य अतिथि ने कहा कि सुमित में लेखन की अपार संभावनाएं हैं।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए श्रीकांत सक्सेना ने कहा कि पुलिस में रहकर भी सुमित की व्यंग्य की सूक्ष्म दृष्टि है जो उनके लेखन में साफ दिखाई देती है। उनका यह उपन्यास रोचक एवं पठनीय उपन्यास है। इसमें व्यंग्य एवं हास्य की प्रचुरता है। उनका व्यंग्य में भविष्य उज्ज्वल है। 

कार्यक्रम के अंत में युवा लेखिका रुपाली सक्सेना ने सुमित को उपन्यास के द्वितीय संस्करण के लिए बधाई देते हुए निरंतर सृजन करने का आह्वान किया।

रिपोर्ट - संगीता सिंह तोमर  


रविवार, 16 अक्टूबर 2022

भुतहा सरकारी मकान

     जैसे एक आम आदमी के लिए सरकारी नौकरी पाने की तीव्र इच्छा होती है वैसे ही सरकारी नौकरी वाले जीव को सरकारी मकान पाने की दिली चाहत होती है। अब चूंकि सरकारी वेतन उसको और उसके परिवार को पालने में ही दम तोड़ देता है इसलिए निजी मकान के सपने देखना छोड़ सरकारी मकान को खोजना उसकी विवशता हो जाती है। वैसे देखा जाए तो सरकारी जीव के लिए सरकारी मकान अलॉट करवाना आसमान से तारे तोड़ कर लाने जितना ही आसान होता है। इस आसान काम को बहुत आसानी से पूरा करने के बाद जब उस बेचारे को इस बात का पता चलता है, कि जिस सरकारी मकान को उसने दुनिया भर के आसान उपायों को आजमा कर हासिल किया है वह तो भुतहा है तो उसका हाल धोबी के कुत्ते की भांति हो जाता है। सरकारी मकान अलॉट होने के बाद वह सरकारी जीव जिस मकान में किराए पर रह रहा होता है उसके मालिक को जल्द से जल्द मकान खाली कर सरकारी मकान में जाने की बात कह कर वह उसे धमकाते हुए एडवांस किराया देने से साफ इंकार कर चुका होता है। फलस्वरूप उसके मकान का मालिक अपने मकान को दूसरे किरायेदार से एडवांस लेकर उसके लिए बुक कर चुका होता है। अब उस सरकारी जीव के सामने केवल दो ही परिस्थितियां होती हैं कि या तो वह उस भुतहा सरकारी मकान में बस कर भूतों से दो – दो हाथ करे या फिर दूसरा किराए का मकान तलाशने के लिए जूते घिसे।

इससे पहले कि सरकारी जीव दोनों परिस्थितियों में से किसी एक का चुनाव करे आइए हम सरकारी मकान के भुतहा बनने की प्रक्रिया पर दृष्टि डाल लेते हैं।

सरकारी मकान जब कई सालों तक खाली रहता है तो उसके दो परिणाम होते हैं। पहला परिणाम होता है कि वह आसपड़ोस के लिए बहुत ही काम की वस्तु हो जाता है। पहले परिणाम के स्वरुप दूसरा परिणाम ये होता है, कि वह मकान आसपड़ोस वालों के अतिरिक्त बाकी कॉलोनी वासियों के लिए भुतहा घोषित हो जाता है।

उस भुतहा मकान में अंधेरा होते ही अजीबोगरीब आवाजें आने लगती हैं, जिनके बारे में ये बताया जाता है कि वो भूतों की आवाजें हैं। जबकि उस मकान में कभी आसपड़ोस के बेवड़े नशे में धुत्त होने के बाद लड़ते हुए कुटने-कूटने की ध्वनि उत्पन्न करते हैं तो कभी अगल–बगल के प्रेमी युगल जिगर से बीड़ी जलाने के उपक्रम में जुट कर रोमांटिक ध्वनियों के उत्सर्जन में अपना पावन योगदान देते हैं। पड़ोस के मकानों का आलतू–फालतू सामान उस भुतहा पड़े मकान की शोभा बढ़ाता है। रात में पड़ोस की भली नारियां अपना फालतू सामान भुतहा मकान में धरने के दौरान कभी–कभार जब फिसल कर धम्म से फर्श पर गिरती हैं तो गिरने के परिणामस्वरूप निकलीं उनकी चीखों को चुड़ैल की चीखें मान कर कॉलोनी के वीर निवासियों द्वारा उस स्थान से निकलने से बिलकुल परहेज कर लिया जाता है। आसपड़ोस के घरों के सामान रूपी कचरे की अधिकता से जब वायुदेव उस मकान से आवागमन करने को तिलांजलि दे देते हैं तो उस भुतहा मकान में सड़ांध के व्यवसाय में बहुत तेजी से वृद्धि होने लगती है।

अब चूंकि सरकारी जीव सरकारी कार्यालय और आम जीवन में जीवित भूतों से निरंतर जूझते हुए ही जीवन व्यतीत कर रहा होता है, इसलिए वह पहली परिस्थिति को ही स्वीकार कर सरकारी मकान में आने का निश्चय कर लेता है। उसे उस भुतहा सरकारी मकान के आसपड़ोस के भले लोगों द्वारा बहुत समझाया जाता है, लेकिन वह सरकारी जीव अपने निर्णय पर अटल रहता है। उसके अटल निर्णय के परिणामस्वरूप उस सरकारी मकान से भुतहा आवाजें आनी धीमे–धीमे बंद हो जाती हैं और उस सरकारी जीव व उसके परिवार द्वारा उस सरकारी मकान में गृह प्रवेश करने के साथ ही भुतहा आवाजें वहां से अपना बोरिया–बिस्तर समेटकर किसी अन्य खाली सरकारी मकान में जाकर डेरा डाल लेती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

चित्र गूगल से साभार 

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