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बुधवार, 24 जून 2026

रहस्य और रोमांच से भरपूर उपन्यास कालदंड


    कालदंड उपन्यास युवा लेखक लोकेश कौशिक की पहली पुस्तक है। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस उपन्यास में लोकेश पाठकों को आरंभ से अंत से बांधे रहते हैं। उपन्यास में लेखक ने प्रत्येक वस्तु, स्थान, व्यक्ति के व्यक्तित्व व मानसिक स्थितियों का जो गहराई से वर्णन किया है वो लेखक के लेखकीय कौशल का कमाल है।

उपन्यास की कहानी बलि के नाम पर किसी तांत्रिक द्वारा दो बच्चों की निर्मम हत्या से आरंभ होती है। उपन्यास के मुख्य पात्र विशु के माध्यम से उपन्यास के कथ्य को गढ़ा गया है। इसमें दर्शायी गयी कथा के माध्यम से लेखक ने समाज में फैले अंधविश्वास व जादू, टोना-टोटका जैसी कुप्रथाओं पर अपनी लेखनी के माध्यम से प्रहार किया है। लेखक ने ये दर्शाने का प्रयास किया है कि बलि के नाम पर किसी की हत्या कर अपने इष्ट से कुछ प्राप्त करने की लालसा करना मूर्खता और भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

उपन्यास में जहाँ कुछेक स्थान पर सारंग व सावित्री के प्रेम दृश्यों की उपस्थिति पाठकों के हृदयों को कोमलता से छूती हुई उनमें प्रेम के अनेक कमल खिला देती है, वहीँ माखन, भूरा व उसके साथियों द्वारा क्रूरतापूर्वक सारंग के कबीले के पुरुषों, महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गों का निर्ममता से किया जाने वाला संहार पाठकों को मन-मस्तिष्क को उद्वेलित कर देता है।

कुल मिला कर ‘कालदंड’ पठनीय उपन्यास है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकेश कौशिक में हिन्दी लेखन जगत में अच्छी ओपनिंग की है और मुझे आशा के साथ पूर्ण विश्वास है कि लोकेश कौशिक हिन्दी लेखन जगत में लंबी पारी खेलेंगे। मेरी ओर से उन्हें लेखन में स्वर्णिम भविष्य हेतु हार्दिक शुभकामनाएं एवं शुभाशीष!

सुमित प्रताप सिंह 


रविवार, 12 अप्रैल 2026

हँसी के बहाने समाज का सच दर्शाता उपन्यास



            व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह का उपन्यासजैसे थेकेवल हँसी का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा आईना है जिसमें उत्तर भारत के ग्रामीण समाज का चेहरा अपनी पूरी सच्चाई, अपनी मासूमियत और अपनी विडंबनाओं के साथ उभरकर सामने आता है। यह उपन्यास हँसी के हल्के रंगों से आरम्भ होकर धीरे-धीरे पाठक को उन सच्चाइयों तक ले जाता है, जो भीतर कहीं गहराई तक चुभ जाती हैं।

लेखक ने अत्यंत सहजता और आत्मीयता के साथ गाँव के जीवन, वहाँ के लोगों की मानसिकता, उनके भोलेपन और उनकी सरल आस्थाओं को चित्रित किया है। लेकिन यही आस्थाएँ किस प्रकार कई बार उनके शोषण का कारण बन जाती हैं यह तथ्य उपन्यास में बड़ी सूक्ष्मता और प्रभावशीलता के साथ सामने आता है। धर्म, परंपरा और सामाजिक संरचनाएँ जिन पर ग्रामीण जीवन टिका हुआ है उन्हीं के भीतर छिपे विरोधाभासों को लेखक ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यंग्य कटु नहीं बनता, बल्कि मुस्कान के साथ सच कहता है। पाठक हँसता भी है और उसी क्षण सोचने को भी विवश हो जाता है कि यह हँसी दरअसल किस पर है पात्रों पर, समाज पर, या स्वयं हम पर। यही द्वंद्व इस उपन्यास को साधारण हास्य रचना से ऊपर उठाकर एक गंभीर सामाजिक दस्तावेज़ बना देता है।

उपन्यास में ग्रामीण व्यक्ति की शहर के प्रति कल्पना और आकर्षण को भी बड़े रोचक और मानवीय ढंग से उकेरा गया है। शहर उसके लिए केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक सपना है एक ऐसी दुनिया, जहाँ अवसर भी हैं और भ्रम भी। यह द्वंद्व आकर्षण और वास्तविकता के बीच लेखक ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।

आज भी उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हमें ऐसे अनेक चरित्र मिल जाते हैं, जिन्हें लेखक ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है। नारदजैसा पात्र, जो चलते-फिरते सीसीटीवी कैमरे की तरह पूरे गाँव की गतिविधियों पर नज़र रखता है, केवल हास्य का स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण अंग है। वह सूचना का माध्यम भी है और सामूहिक मानसिकता का दर्पण भी।

इसी प्रकार कड़क सिंहजैसे पुलिस दारोगा भी हमारे समाज में आज भी मौजूद हैं। वे भले ही पुलिस मैनुअल के कठोर नियमों का अक्षरशः पालन न करते हों, लेकिन उनके भीतर मानवीय संवेदनाओं की प्रचुरता होती है। वे कई बार औपचारिक कानूनी प्रक्रिया से हटकर, मौके पर ही मानवीय स्तर पर समस्याओं का समाधान कर देते हैं। यही कारण है कि वे जनसामान्य के बीच लोकप्रिय हो जाते हैं। कहीं न कहीं, वे हमें उस आदर्शवादी छवि की याद दिलाते हैं, जहाँ व्यवस्था और संवेदना साथ-साथ चलती हैं।

उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह केवल सामाजिक यथार्थ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि साहित्यिक जगत की विडंबनाओं को भी सामने लाता है। तोप सिंहजैसे कवियों के माध्यम से लेखक उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हैं, जहाँ कुछ लोग दूसरों की रचनाओं को तोड़-मरोड़ कर अपनी बताकर प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार गाँवों में मौजूद ऐसे पुजारी और मजारों के खादिम, जिनकी वास्तविक गतिविधियों से समाज पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं है, फिर भी मौन बना रहता है यह सब उपन्यास को और अधिक यथार्थपूर्ण बनाता है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यह पाठक को केवल हँसाता नहीं, बल्कि सोचने के लिए बाध्य करता है। यह हमें यह एहसास कराता है कि समाज जिन विडंबनाओं के बोझ तले साँस ले रहा है, वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी पहले थीं।

मेरे लिए यह उपन्यास केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक निजी अनुभव भी है। सुमित प्रताप सिंह से मेरा लगभग पच्चीस वर्षों का परिचय है। हम दोनों ने एक साथ दिल्ली पुलिस में कदम रखा था। वह हर बात में हास्य का रंग घोल देने वाले, और मैं जीवन को गंभीरता की चादर में लपेटकर जीने वाला व्यक्ति। फिर भी न जाने कैसी कड़ी थी कि पहली ही मुलाक़ात ने हमें मित्रता के ऐसे धागे में बाँध दिया, जो समय के साथ और अधिक सुदृढ़ होता गया।

शायद यही कारण है कि इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक मित्र का मन दिखाई देता है वह मन जो जीवन की कठिनाइयों को हँसी में बदल देना जानता है, और उसी हँसी के सहारे सबसे गहरी बात कह देता है।

जैसे थेअंततः हमें यही एहसास कराता है कि समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ व चरित्र अक्सर वैसे ही बने रहते हैं जैसे थे।

यह उपन्यास याद दिलाता है कि हास्य-व्यंग्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि एक गहरा सामाजिक संवाद भी हो सकता है। यह हँसाते हुए उन सच्चाइयों की ओर संकेत करता है, जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते और शायद यही इस रचना की सबसे बड़ी सफलता है
कि इसे पढ़ने के बाद पाठक के चेहरे पर मुस्कान के साथ-साथ मन में एक प्रश्न भी रह जाता है।

पुस्तक : जैसे थे (उपन्यास)

लेखक : सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

प्रकाशक : सी.पी. हाउस, दिल्ली

मूल्य : 120 रुपए     पृष्ठ : 100

समीक्षक : इंशाद अली, फ़्लैट नं.-ए 4, प्लॉट नं.-4/10, सेक्टर 2, राजेंद्र नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद (.प्र.)

 

रविवार, 17 जुलाई 2022

रूपाली सक्सेना के लेखन की संदूकची

      रूपाली सक्सेना का उनकी प्रथम पुस्तक 'स्नेह की संदूकची' के साथ हिंदी लेखन जगत में आगमन हुआ है। किसी भी लेखक की जब प्रथम कृति आती है तो उसके हृदय में इस बात की आशंका रहती है कि न जाने लेखक व पाठक जन की स्वीकृति उसको मिल पाएगी अथवा नहीं। संभवतः कुछ ऐसी ही आशंका रूपाली सक्सेना के हृदय में भी हो रही होगी। 58 कविताओं के इस कविता संग्रह का आरंभ लेखिका ने गणेश स्तुति रचना से किया है। इसके उन्होंने अपने आसपास उपस्थित प्रत्येक विषय पर अपनी कलम चलाने का प्रयास किया है।  

इस कविता संग्रह की शीर्षक कविता 'स्नेह की संदूकची' वास्तव में शीर्षक कविता बनने के योग्य है। इस कविता में उपस्थित भाव पक्ष हृदय स्पर्शी है एवं ये कविता संवेदना से ओतप्रोत है। शीर्षक कविता के अतिरिक्त इस कविता संग्रह में संग्रहित राजपूत रानी के अमर त्याग पर केंद्रित उनकी हाड़ी रानी रचना इस बात का आभास करवाती है, कि ऐतिहासिक पात्रों पर उनकी कलम कुछ और लोकप्रिय रचनाओं का सृजन कर सकती है। इन दोनों रचनाओं के अतिरिक्त इश्क़, मेरा बेटा बड़ा हो गया है, मेरी ख्वाहिशें, विक्षिप्त, पर्यावरण हमारा है, गर तुम कान्हा होते, स्तनपान इत्यादि रचनाओं के माध्यम से रूपाली सक्सेना लेखन जगत के मन ये आस जगाती हैं, कि वह भविष्य में अच्छी व सार्थक रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य सृजन में अपना सक्रिय योगदान देंगीं। 

पाठकजन रूपाली सक्सेना की इस कृति की कुछ रचनाओं की कुछेक भाषायी त्रुटियों व सशक्तता के थोड़े-बहुत अभाव को ये सोच कर अनदेखा कर सकते हैं, कि यह उनका प्रथम साहित्यिक प्रयास है और लेखन की इस लंबी दौड़ को पूरा करने के लिए अभी उन्हें बहुत लंबी यात्रा  करनी है। जिस दिन रूपाली सक्सेना इस यात्रा को पूरा करेंगीं उस दिन उनके लेखन की संदूकची में कोई न कोई ऐसी साहित्यिक रचना होगी जो उन्हें अमरत्व प्रदान कर देगी।

पुस्तक - स्नेह की संदूकची

लेखिका - रूपाली सक्सेना

प्रकाशक - संदर्भ प्रकाशन, भोपाल (म.प्र.)

पृष्ठ - 104

मूल्य - 250/- रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

बुधवार, 4 मई 2022

नारियों की अनछुई दास्तां है हर स्टोरी

"आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य,

मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य।"

कवि गोपालदास नीरज की उक्त पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए काव्य परिवार में एक नए सदस्य का आगमन हुआ है और उस सदस्य का नाम है सुश्री नेहा बंसल। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी कविताओं के संग्रह 'हर स्टोरी' के माध्यम से कवयित्री नेहा बंसल पाठकों के लिए उन नारियों की कहानियाँ लेकर आयीं हैं, जिनके बारे में समाज ने लिखना उचित नहीं समझा और यदि लिखा भी है तो उसे नगण्य की श्रेणी में ही रखा जाएगा। द्रोपदी, हिडिम्बी, अहिल्या, सूर्पनखा, मंदोदरी, रेणुका, यशोदा व उर्मिला जैसे ऐतिहासिक पात्रों के साथ-साथ कवयित्री ने नारी जीवन से जुड़े प्रत्येक विषय पर अपनी कलम चलायी है। वह विषय चाहे अपने स्वार्थ के लिए नारी को डायन घोषित कर मार डालने वाले समाज का हो, या वासना से अभिभूत सिरफिरों द्वारा तेजाब फेंककर किसी मासूम लड़की का चेहरा जलाकर उसका जीवन बर्बाद कर देने की घृणित मानसिकता हो या फिर नारी के शोषण के लिए अपनायी जाने वालीं सामाजिक कुरीतियों का वर्णन हो। कवयित्री ने प्रत्येक विषय को बड़े ही संवेदनशील व मार्मिक ढंग से अपने इस कविता संग्रह में उठाया है। नारी से संबंधित छोटे-बड़े विषयों को जिस गहराई व संवेदनशीलता से कवयित्री ने उस संग्रह में संकलित अपनी 39 कविताओं द्वारा प्रस्तुत किया है वह प्रशंसनीय हैं। हिडिम्बी पर केंद्रित कविता के साथ-साथ इस कविता संग्रह की कुछ अन्य कविताएं तो इतनी मार्मिक हैं, कि उन्हें पढ़कर पाठक का हृदय संवेदना से भर उठता है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी कवयित्री का संवेदनशील लेखन पाठकों को इस बात के प्रति आश्वस्त करता है, कि कवयित्री लेखन के साथ-साथ प्रशासनिक सेवा का संवहन करते हुए समाज की बेहतरी में निश्चित रूप से अपना भरपूर योगदान देंगीं। इसलिए मुझे आशा के साथ-साथ पूर्ण विश्वास है, कि सरस्वती कुल के सभी सम्मानित सदस्यगण एवं गंभीर पाठकगण कवयित्री के इस प्रथम प्रयास के लिए उनका हृदय खोलकर स्वागत करेंगे तथा साथ ही ये कामना करेंगे कि कवयित्री नेहा बंसल एक न एक दिन लेखन के आकाश में ध्रुव तारा बनकर  चमकें। एवमस्तु!

पुस्तक - हर स्टोरी

लेखिका - नेहा बंसल, नई दिल्ली

प्रकाशक - साहित्य अकादमी, दिल्ली

पृष्ठ - 78

मूल्य - 100 रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

मंगलवार, 16 मार्च 2021

समाज को आईना दिखाता उपन्यास जैसे थे

     जीवन की वास्तविकता को दर्शाते हुए ‘जैसे थे’ उपन्यास अपनी सजीवता और स्वाभाविकता को दुनिया की सत्यता के साथ पिरोये रखता है। यह किसी भी उपन्यास का वांछनीय तत्व होता है, जिसके बिना न तो उपन्यास की कथावस्तु का निर्माण हो सकता है और न ही चरित्रों का उद्घाटन। ‘जैसे थे’ को पढ़कर लगता है कि यह सारी घटना हमारे ही आस-पास कहीं घटित हो रही है I व्यंग्यात्मक रूप में लिखी गयी व्यस्तपुरा की कहानी हमारे जीवन की व्यस्तता की व्याख्या करती हुई असाधारण तरीके से पात्रों के सुख-दुःख को वर्णित करती है।

कड़क सिंह से लेकर चांदनी चौक के चंदू सभी पात्र पाठकों को बांधे रखने में सफल हैं। गाँव के सामान्य जीवन और शहर की भाग-दौड़ को सहजता से प्रस्तुत किया गया है, वहीं वैलेंटाइन जैसे शब्द को व्यंग्यात्मक प्रेम कहानी के रूप में चरितार्थ कर उसकी महत्ता को बताया गया है। धर्म के नाम पर लूट मचाने वाले पुजारी और खादिम की मानसिकता को बताते हुए उनकी सच्चाई सबके सामने लाने का बेहतरीन प्रयास समाज को चेतना प्रदान करने में समर्थ है।
अतएव व्यंगात्मक उपन्यास ‘जैसे थे’ समसामयिक समस्याओं और तत्संबंधी निवारण की ओर केन्द्रित है। नदी के प्रवाह की तरह कहानी आगे बढ़ती रहती है। लेखन में मारक क्षमता तभी आती है जब आपने अपने लिखे को स्वयं जिया हो या महसूस किया हो। इस उपन्यास में कुछ ठहराव है, कुछ रहस्य है तो मानवीय परिवेश एवं लोक जीवन की नई परिभाषाएं भी हैं, जो पाठकों की जिज्ञासा को बनाये रखती है। आवश्यकतानुसार शब्दों व बोलियों का सटीक चयन आत्मीयता बनाये रखते हुए समाज के कड़वे सत्य को सामने लाते हैं I वास्तव में उपन्यास  की रचना किसी निश्चित उद्देश्य के लिए की जाती है जिसमें लेखक सुमित प्रताप सिंह सफल रहे हैं।
उदाहरणार्थ उपन्यास का एक अंश- ‘अब बारी चौथे कर्मचारी की थी। अरे महाराज ! संसार की रीत है इस हाथ दें और उस हाथ लें। अब अधिकारी व्यवसायी और नेता अथवा उनके सगे सम्बन्धी हमारा ध्यान रखते हैं तो बदले में हम उनका ध्यान रखते हैं। उनके द्वारा दी गयी सहायता या सेवा के बदले हम उनके लिए कवि सम्मेलनों में भागीदारी की व्यवस्था करते हैं, उनकी उल्टी-सीधी रचनाओं को भी श्रेष्ठ साबित कर उनकी पुस्तकों का प्रकाशन करवाते हैं और समय-समय पर उनके सम्मान में उनके ऊपर केन्द्रित कार्यक्रमों का आयोजन भी करवाते हैं।
इस प्रकार प्रस्तुत उपन्यास ‘जैसे थे’ सकारात्मक रचनाधर्मिता को जीवन प्रदान करती हुई लेखनी है I लेखक सुमित प्रताप सिंह को समाज को अपनी वास्तविकता का आईना दिखाने हेतु कोटिशः बधाई। उम्मीद है कि सुमित प्रताप सिंह का साहित्यिक शुद्धि यज्ञ यूूँ ही निरंतर प्रदीप्त रहेगा।

समीक्षक - सुषमा सिंह, स्वतंत्र पत्रकार एवं ब्लॉगर


गुरुवार, 13 जून 2019

रोचक शीर्षक वाली अनूठी पुस्तक ये दिल सेल्फ़ियाना


      पुलिस का नाम लेते ही आमतौर पर लोगों के मन में किसी भ्रष्ट, कामचोर या क्रूर व्यक्ति की छवि उभरती है; कोई ऐसा व्यक्ति, जिससे गुंडे-बदमाश तो साँठगाँठ कर लेते हैं और आम आदमी घबराता है, लेकिन सब उंगलियां बराबर नहीं होतीं। अपवाद हर जगह होते हैं और सुमित प्रताप सिंह ऐसे ही एक अपवाद हैं। अपवाद इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि पुलिस की रूखी, ऊबाऊ, बेरंग नौकरी करने के बावजूद भी कोई व्यक्ति उत्कृष्ट व्यंग्यकार और कुशल कवि भी हो सकता है। वर्दी वाले कठोर चेहरे के पीछे कोई कोमल हृदय वाला संवेदनशील कवि भी छिपा हो सकता है। बन्दूक चलाने वाले शक्तिशाली हाथ उतनी ही कुशलता से कलम भी चला सकते हैं और अपराधियों को रुलाने वाले लोग अपने व्यंग्य की गुदगुदी से पाठकों को हंसाकर लोटपोट भी कर सकते हैं। ऐसे दो विपरीत ध्रुवों के बीच कुशलता से सन्तुलन बना सकने वाले और दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से सफल हो सकने वाले लोग बहुत विरले ही होते हैं, इसीलिए सुमित को मैंने अपवाद कहा था।
ये विचार मेरे मन में इसलिए आए क्योंकि आज मैंने उनका व्यंग्य संग्रह 'ये दिल सेल्फ़ियाना' पढ़ा। इस पुस्तक का नाम जितना रोचक है और उस पर श्याम जगोता का बनाया हुआ मुखपृष्ठ जितना आकर्षक है, इस पुस्तक की विषय-वस्तु और सामग्री भी उतनी ही अनूठी है।
पुस्तक के प्रस्तावना में ही सुमित ने 'सेल्फ़ी रोग' के लक्षण, कारण, प्रभाव और लाभ गिनवाए हैं। उन्होंने यह भी स्वीकारा है कि इस सेल्फ़ी रोग की 'दुष्प्रेरणा' से ही उन्हें इस व्यंग्य संग्रह को ऐसा नाम देने की बुद्धि सूझी।
लेकिन यह संग्रह केवल सेल्फ़ी की महिमा बताने तक सीमित नहीं है। इसमें चुगलखोरी का वर्णन भी है, महान चित्रकार पिकासो को टक्कर देने वाले गुटखेबाजों की प्रशंसा भी है, मच्छर तंत्र की चुनौतियां भी हैं और खर्राटों वाली रेलयात्रा का वृत्तांत भी है। ऐसे विभिन्न विषयों को बड़ी कुशलता से समेटने वाले और समाज की निष्क्रियता, लापरवाही और दुर्गुणों पर करारी चोट करने वाले कुल 37 व्यंग्य लेख इसमें हैं, जो पाठक को कभी गुदगुदाते हैं, कभी अचानक कुछ याद दिलाते हैं, तो कभी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर भी कर देते हैं। मुझे लगता है कि हर संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति को इस पुस्तक में कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा।
युवा लेखक, व्यंग्यकार और कवि सुमित की अनेक पुस्तकें, काव्य संग्रह और व्यंग्य रचनाएँ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तकों का अनेक भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी में भी अनुवाद हो चुका है। अपनी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें अब तक अनेक विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है और उनका लेखन-कार्य अभी भी अनवरत जारी है। अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी वे अक्सर अपने विचार व्यक्त करते हैं, और वे कई सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं।
पुलिस की तनावपूर्ण और कठिन नौकरी के बावजूद भी सुमित अपने लेखन और काव्य रचना के लिए सतत समय निकाल पाते हैं, यह वाकई अद्भुत और प्रशंसनीय है।
उनके भावी लेखन और सफलताओं के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं!

पुस्तक : ये दिल सेल्फ़ियाना
लेखक : सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
प्रकाशक : सी.पी. हाउस, दिल्ली - 110081
मूल्य : 160 रुपए     पृष्ठ : 127
समीक्षक : सुमंत विद्वान्स, कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका



बुधवार, 16 मई 2018

पाठकों के लिए नायाब तोहफा है ये दिल सेल्फ़ियाना


   व्यंग्य का सामर्थ्य असीमित होता है। व्यंग्य के माध्यम से विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, नकारात्मकता, रुग्णता पर किया प्रहार एक तिलमिलाहट की रचना करता है।  वस्तुतः विकार के विरुद्ध आवाज उठाना पर एक विशिष्ट शैली व सीधे  बल्कि घुमा-फिराकर वही व्यंग्य के नाम से जानी जाती है। या यूँ कहें कि जूते को मखमल में लपेटकर मारने की कला का नाम है व्यंग्य। पर व्यंग का सृजन कोई सरल प्रक्रिया नहीं है। गहन चिंतन सामाजिक सर्वेक्षण विसंगति व अस्वस्थता  की खोज, फिर विषय वस्तु की तीक्ष्णता को यथावत रखते हुए उसे चाशनी में पागकर  प्रवाहमयता व संप्रेषणीयता के साथ पाठक के समक्ष परोसना कोई सुगम व आसान कार्य नहीं है। वस्तुतः व्यंग्य की रचना  श्रमसाध्यता, बुद्धिसाध्यता व धैर्यसाध्यता के उपरांत ही संभव होती है। इसीलिए व्यंग्यकार बन पाना कठिन ही होता है।

 इस समय जो युवा व्यंगकार समग्र ऊर्जस्विता व ओजस्विता के साथ व्यंग्य सृजन करके तीव्रता के साथ सफलता के सोपानों को नाप रहा है वह है सुमित प्रताप सिंह। जो कि 'ये दिल सेल्फ़ियाना' कृति के माध्यम से अपना चौथा (कुल छह पुस्तकें) व्यंग्य संग्रह लेकर पाठकों के समक्ष रूबरू हुए हैं।  एक से बढ़कर एक व्यंग्य, अनूठी मौलिकता, विषय वस्तु की उत्कृष्टता, शब्दों का शानदार मायाजाल, प्रस्तुतीकरण की विशेषता, अन्वेषणात्मक शैली, गुदगुदाते वाक्यकथ्य का बखूबी प्राकव्य समस्त असाधारण व अनुपम गुणधर्म हमें इस कृति के समस्त व्यंग्यों में दृष्टिगोचर होते हैं। 

गुटखे की पीक के माध्यम से यत्र-तत्र-सर्वत्र कलाकृतियों के निर्माता पिकासो को ढूंढकर पाठकों के समक्ष अत्यंत निपुणता से प्रस्तुत करके सुमित हम और हमारे 'स्वच्छता अभियान' की दशा/दुर्दशा का सहज ही मूल्यांकन करने में समर्थ दिखाई देते हैं। वे व्यंग बाण चलाकर लक्ष्य भेदने में सफल होते हैं। वे लिखते हैं - "देशी विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं।"  चाहे 'ढीले लंगोट वाले बाबा' की बात हो या फिर 'मुल्लाजी और शुभचिंतक लल्लाजी' का वृतांत व्यंग्यकार हर पिच पर सेंचुरी बनाते हुए दृष्टिगत होता है। 

 बेवफा सोनम गुप्ता के नाम पत्र लिखते समय तो व्यंग्यकार भाषा विज्ञानी ही नहीं, बल्कि भाषा अन्वेषक व शब्द विशेषज्ञ प्रतीत होता है जब वह इस पत्र का आरंभ ‘सादर दिल जलस्ते’ से संबोधित करते हुए करता है। 'अब तेरा क्या होगा कालिया' व ‘'नौटंकी उत्सव' में सुमित एक अलग ही प्रकार का प्रताप दिखाते हुए सुशोभित होते हैं।  चाहे कथ्य की बात हो, शिल्प की या फिर प्रस्तुति की वे नायाब हैं, बहुत खूब हैं, विशिष्ट हैं और उत्कृष्ट हैं। हँसने-हँसाने के मध्य अपना संदेश देने में जो व्यंग्यकार कदापि ना चूके वह चोखा है और वही अनोखा है। वे लिखते हैं -  "जिन संतानों में अपने माँ-बाप को सूखी रोटी देने में भी प्राण निकलते थे, वो ही श्राद्धों में कौओं को  पूर्वजों के नाम पर खीर- पूरी गर्वित होकर खिलाते हुए मिल जाते हैं।"
 'अल्लाह हू अकबर' में तो शुरु से ही उन्होंने छक्का जड़ दिया है। वे लिखते हैं - "अल्लाहू अकबर! कोई चीखा। इस चीख के साथ ही धड़ाधड़ बम फूटने आरंभ हो गए। बम धमाकों के बाद सुनाई दी जानेवाली चीत्कारों से हृदय द्रवित होने लगा।" यह पढ़कर बाकी व्यंग्य पढ़ने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। फर्क, मच्छर तंत्र व मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा में भी रचनाकार प्रांजल भाषा, लय, प्रवाह, अनुशासन, तीखेपन व गतिशीलता के साथ आगे बढ़ता हुआ नज़र आता है। पाठकों को अपने से जोड़ लेने व वशीभूत कर लेने की क्षमता व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह में निसंदेह विद्यमान है। 

यथार्थ तो यह है कि सफल व्यंगकार वही होता है, जो समाज और उसके हालातों को गहनता, सूक्ष्मता, संजीदगी, परिपक्वता व पैनेपन के साथ न केवल देखता है, बल्कि उन्हें समझ-बूझकर विश्लेषित भी करता है। जो व्यंग्यकार विसंगतियों की जाँच-पड़ताल जितनी सूक्ष्मता से कर लेता है, वह उतना ही अधिक समर्थ व्यंग्यकार माना जाता है।  सुमित में ऐसे ही लक्षण स्पष्टतः  नज़र आते हैं। उनके पास अभिधा, व्यंजना, लक्षणा शक्तियों का सामर्थ है, तो 'पिन पॉइंट' करने का मादा भी है। वे कहने के पूर्व स्वयं भी बहुत कुछ सोचते-समझते हैं और पाठकों को भी बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश कर देते हैं। कहीं वे पुलिस को रगड़ते हैं, तो कहीं दुपट्टे के सिसकने पर उसकी खबर लेते हैं। पिता दिवस की कलई खोलते हुए वे जो लिखते हैं वो सीधा कलेजे में बिंध जाता है। भले ही बिंधे, घाव करे या पीड़ा दे पर यह तो वही है जो सुमित प्रताप सिंह 'माफ कीजिएगा पिताजी' में लिखते हैं।  वे लिखते हैं - "कोई वृद्धाश्रम में जाकर अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ अमूल्य क्षण निकालकर अपने पिता के साथ पितृ दिवस मनाकर अपने पुत्र होने के कर्तव्य को निभायेगा, तो कोई भला मानव आज घर के कोने में अपने जीवन के अंतिम दिन गुज़ार रहे पिता को एक दिन ताजा और स्वादिष्ट भोजन खिलाकर अपने अच्छे बेटे होने का सबूत देते हुए मिल जाएगा।"  

उनके जन्मदिवस पर, चाँद सीढ़ी का खेलबाबा के चरण, भेड़िया आया व बलि जैसे व्यंजनों का  खरापन व चोखापन पाठक को तिलमिला देता है। पर है  तो सत्य व प्रमाणित यथार्थ। 'बलि' व्यंग्य का समापन अत्यंत मर्मस्पर्शी है - "राम समूह अपने माथे का पसीना पोंछते हुए भर्राए हुए स्वर में बोले - गांधी की बलि चढ़ा कर आया हूँ। वो भी एक नहीं सैकड़ों की, ताकि पेंशन का बाकी पैसा आराम से मिल जाए और हमारी बेटी दहेज की बलि न चढ़ सके।" साफगोई व सरलता के साथ हमारे समाज के नंगेपन को चित्रित करता है यह व्यंग्य अद्वितीय व असाधारण है। जहाँ 'साहित्यिक बगुले' में वे व्यावसायिकता पर करारी चोट करते हैं, तो वहीं 'दुशासन का लुंगीहरण' में वे एक अनूठा व उत्कृष्ट आयाम लिए हुए नज़र आते हैं।  श्रीकृष्ण दुशासन की पुकार सुनकर लुंगी की लंबाई बढ़ाने में लग जाते हैं। शायद नारी मुक्ति का यही परिणाम होगा, कि पुरुष को अपनी लुंगी को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो जाएगा। विषय वस्तु की असाधारणता व प्रस्तुति की कोमलता, माधुर्य व सरसता ने सभी व्यंग्यों को  रससिक्त बना दिया है।

 शीर्षक व्यंग्य 'ये दिल सेल्फ़ियाना' में वे सेल्फी लेने की लत / जुनून पर चोट करते हैं। इसे वे 'सेल्फ़ीसाइड' रोग का नाम देते हैं। सेल्फ़ी लेने में होने वाली दुर्घटनाओं की बात भी वे करते हैं।  इसकी तुलना वे सनक से करते हैं। 'लव फ़ॉर सेल्फ़ी' की खबर लेते व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह वास्तव में छिद्रावलोकन करने का सामर्थ्य रखते हैं।  वे लिखते हैं - "जहाँ घराती और बाराती विभिन्न पकवानों का आनंद ले रहे होते हैंवहीं सेल्फ़िया सेल्फ़ी से अपनी भूख मिटा रहा होता है।"

यह यथार्थ है कि सुमित प्रताप सिंह का व्यंग्य लेखन धमाकेदार है।  वस्तुतः वे परिपक्व हैं, सिद्ध हैं, समर्थ हैं और सक्षम भी। उनके पास एक मौलिक नज़रिया है और प्रस्तुतीकरण का असाधारण सामर्थ्य है। उनकी शैली में एक विशिष्टता है और ताज़गी भी है। वे आभासी दुनिया, असंवेदनशीलता, निष्ठुरता, असामाजिकता व मूल्य पतन पर बेहतरीन कलम चला रहे हैं। हर व्यंग्य को रोचक बनाने का उनमें सामर्थ्य है।  मैं उनके प्रति अनंत शुभकामनाएं अर्पित करते हुए उनके सारस्वत यश की मंगलकामना करता हूँ। 

'सुमित' आजकल लिख रहे, विभिन्न व्यंग्य अभिराम।
हो प्रताप हरदम 'शरद', आये नहीं विराम।।

- प्रो. शरद नारायण खरे
विभागाध्यक्ष, इतिहास
शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय,
मंडला (म.प्र.)

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