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सोमवार, 19 अगस्त 2024

नॉस्टैल्जिया का गुलदस्ता है सिक्स ऑफ कप्स


    युवा कवयित्री सुश्री नेहा बंसल के हाल ही में प्रकाशित दूसरे अंग्रेजी कविता संग्रह 'सिक्स ऑफ कप्स' को पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले कवयित्री साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी कविताओं के संग्रह 'हर स्टोरी' के माध्यम से पाठकों के लिए उन नारियों की कहानियाँ लेकर आयीं थीं, जिनके बारे में समाज ने लिखना उचित नहीं समझा और यदि लिखा भी है तो उसे नगण्य की श्रेणी में ही रखा जाएगा। दूसरे कविता संग्रह में उन्होंने अपनी भूली-बिसरी यादों को स्थान दिया है। इस पुस्तक को कवयित्री ने अपने बाबा और अपने आईपीएस अधिकारी पति श्री दीपक यादव को समर्पित किया है। पुस्तक की भूमिका में कवयित्री ने इस कविता संग्रह को पाठकों के बीच लाने के उद्देश्य को बताने के लिए पत्रकार डौग लार्सन के कथन का उल्लेख किया है कि नॉस्टैल्जिया एक फाइल है जो अच्छे पुराने दिनों की खुरदरी धारों को हटा देती है। कवयित्री पुस्तक का शीर्षक सिक्स ऑफ कप्स रखने के प्रति पाठकों की जिज्ञासा का समाधान करते हुए बतातीं है, कि इसका शीर्षक एक छोटे आर्काना टैरो कार्ड के नाम पर रखा गया है।  भूमिका के उपरांत दो पृष्ठों में कवयित्री ने इस कविता संग्रह के प्रकाशित होने तक सहयोगी रहे मित्रो, बंधुओं व सहकर्मियों का आभार प्रकट किया है।

    इस कविता संग्रह में कुल 49 कविताएं एवं 3 हाइकु संकलित हैं। कवयित्री ने जहां इस पुस्तक की पहली कविता अपने दादा जी पर लिखी है, वहीं उनकी दूसरी कविता पुरानी दिल्ली में स्थित नानी जी के घर पर केंद्रित है, जो कि उनके अपने बड़े-बुजुर्गों के प्रेम व आदर तथा अपनी जड़ों से जुड़ाव को दर्शाती है। कवयित्री का अपने दादा जी से लगाव का ही परिणाम है कि उनकी उपस्थिति इस कविता संग्रह की कई कविताओं में दर्ज हुई है।  कवयित्री ने  विभिन्न त्योहारों, दूरदर्शन, जीवन में पहली बार खाए डोसे, गुड़िया, पिकनिक, भौतिकी विषय, प्रेम गीत, कलकत्ता में साड़ी खरीदने, बचपन की रामलीला, चंडीगढ़ के रॉक गार्डन, मूंग दाल के हलवे, घर के माली शिवचरण, सांची स्तूप, जन्मदिन की पार्टी, अंधविश्वास, पुदीना की चटनी, कागज की नाव इत्यादि विभिन्न विषयों पर बहुत सुंदर तरीके से अपनी कलम चलाई है। इस कविता संग्रह की कविताओं में कवयित्री द्वारा बीते हुए दिनों को फिर से जीवंत करने का प्रयास किया गया है। संवेदना, भावुकता एवं मार्मिकता से परिपूर्ण कविताएं हृदय को गहराई से छू लेती हैं। इस कविता संग्रह की माय ग्रैंड पा, नानी हाउस इन देल्ही-6, सिक्स ऑफ कप्स और महाशिवरात्रि इत्यादि कविताएं तो बहुत ही प्रभावशाली बन पड़ी हैं। इस कविता संग्रह की अंतिम कविता वीकेंड इन कार निकोबार को पढ़कर समाप्त करने के पश्चात ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पाठक को कवयित्री के बचपन से युवावस्था के सफर में साथ यात्रा करते हुए शरारत से भरे, मनोरंजक, भावपूर्ण, उत्साह से भरपूर और संघर्षमय जीवन से साक्षात्कार करने का अवसर प्राप्त हुआ हो। दूसरे शब्दों में कहें तो सिक्स ऑफ कप्स नॉस्टैल्जिया का गुलदस्ता है।

    प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी कवयित्री का संवेदना, भावुकता और समाज के प्रति कर्तव्य की भावना दर्शाता लेखन साहित्य जगत के लिए सुखद अनुभूति का आभास करवाता है। आशा है कि अंग्रेजी काव्य जगत कवयित्री की पिछली पुस्तक हर स्टोरी की भांति उनकी दूसरी पुस्तक सिक्स ऑफ कप्स को भी प्रसन्नता व उत्साह के साथ स्वीकार करेगा। मेरी ओर से सिक्स ऑफ कप्स की लेखिका सुश्री नेहा बंसल को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!

पुस्तक - सिक्स ऑफ कप्स

लेखिका - नेहा बंसल, नई दिल्ली

प्रकाशक - हवाकाल प्रकाशन, दिल्ली

पृष्ठ - 107

मूल्य - 400 रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

शनिवार, 2 जुलाई 2022

साहित्य धर्म का निर्वहन करते विजय उपाध्याय

     हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में बतौर सिविल इंजीनियर कार्यरत विजय उपाध्याय को बीस वर्ष की आयु में साहित्य पढ़ते-पढ़ते एक दिन अनुभव हुआ, कि लेखक नामक जीव इनके मन-मस्तिष्क में भी वास कर रहा है। इस अनुभूति के पश्चात इन्होंने कलम उठायी और लिखने लगे। इनकी पहली रचना राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित भी हुई। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर देखना अनुचित समझा। एक दशक तक इन्होंने दैनिक ट्रिब्यून, अजीत समाचार एवं अमर उजाला में पत्रकारिता की। इनकी रचनाएँ देश के जाने-माने समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं। जहाँ इनके पुरखों ने पंडिताई करके सनातन धर्म का पालन किया, वहीं विजय उपाध्याय वर्षों से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपनी नौकरी के साथ-साथ साहित्य धर्म का निर्वहन कर रहे हैं। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

विजय उपाध्याय - लेखन का रोग तो बीस बरस की उम्र में लग गया था, मगर उससे पहले पढ़ने का रोग लग गया। कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती। जब अक्षर ज्ञान हो गया तो पाठ्यक्रमों में लगी पुस्तकों में से कहानियां छांट कर पढ़ने लगा। फिर भाई-बहनों की किताबों से कहानियां ढूंढ कर पढ़ने लगा। घर में पुरखे पंडिताई करते आ रहे हैं इसलिये गीता प्रैस से कल्याण और बाकी किताबें घर आती थी। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने तक गीता, रामायण, सुख सागर, महाभारत, गरूड़ पुराण और कुछ ज्योतिष की किताबें पढ़ चुका था। हाई स्कूल में पहुंचते और मैट्रिक करने तक पुराण पढ़ने की तीव्र इच्छा हुई तो पिता जी से अनुग्रह किया कि मुझे पुराण पढ़ने हैं। उन्होंने प्रबंध कर दिया तो वो भी पढ़े। बाद में कालेज पहुंचा तो मैग्ज़ीनों से वास्ता पड़ा। लाइब्रेरी में किताबें मिलने लगीं तो जो भी हाथ लगा वह पढ़ डाला। उस के बाद बड़ों और गुरूजनों ने जो सुझाया वह पढ़ डाला। कुख्यात और विख्यात लेखकों को पढ़ना आदत बन गयी। इसी बीच अनुभूति हुई कि आजकल जो कुछ अखबारों और पत्रिकाओं में छ्प रहा है वह तो मैं भी लिख सकता हूँ। पहले फीचर लिखे। जब वो छपे तो हौंसला बढ़ गया फिर लघुकथा और व्यंग्य लिखने लग गया। प्रतिक्रियाएं मिलती तो मन प्रफुल्लित हो जाता। तब तक पत्रकारिता में आ चुका था फिर तो सिलसिला ही चल निकला। लिखने और पढ़ने के अलावा कुछ और नही सूझा। पहली कहानी लघुकथा थी जो बीस बरस की उम्र में लिखी और उस वक्त दैनिक ट्रिब्यून में छपी थी। मैं सोच-समझ कर या जानकर कभी नहीं लिख सका। जब भी कोई बात या मुद्दा मुझे अंदर तक झकझोर देता है, तब लिखने की प्रेरणा देता है। एक तरह से ऊबकाई या प्रसव की तरह। जब तक मैं उसे शब्दों में ढालकर लिख नहीं देता तब तक भीतर की बेचैनी खत्म नहीं होती।

लेखन से आप पर कौन सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

विजय उपाध्याय - लिखने-पढ़ने का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक छोटे से गाँव में, जहाँ ज्ञान प्राप्ति का कोई साधन नहीं रहा, किताबें ही मेरी दोस्त, हमसफर और मार्गदर्शक बन गयीं। ज्ञान चक्षु खुले तो आभास हुआ मुझे कुछ नहीं आता। ज्ञान पिपासा से पीड़ित हुए तो लिखने का भी उबाल आने लगा। इसका फायदा यह रहा कि हम जब भी किसी महफिल या विद्वानों के सानिध्य में बैठे और जब हमने संदर्भ सहित लेखन की बात की तो हमें सराहा गया और ज्ञान से आत्मविश्वास पैदा हुआ जो जीवन में बहुत जरूरी है।

क्या आपको लगता है कि लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

विजय उपाध्याय - लेखन और पठन से ज्ञान की प्राप्ति होती है मगर समाज में उससे बदलाव हुआ इस बारे कुछ नहीं कहा जा सकता। बदलाव लोगों की मानसिकता पर निर्भर है। बीड़ी, सिगरेट और शराब जैसी कई चीजों पर लिखा रहता है कि यह सेहत के लिए हानिकारक है, मगर लोग पढ़ कर भी कहाँ मानते हैं। यही स्थिति लेखन पर भी लागू होती है। लोग पढ़ते हैं मनोरंजन के लिए और फिर उससे सबक तो लेते हैं मगर उपयोग बहुत कम करते हैं। लेखन से हर दिशा का पता चलता है। लेखन हर देश काल का आईना होता है। समझदार लोग उस पर अमल कर अपना जीवन सरल बनाते हैं। अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि लेखन का प्रभाव नहीं होता। कम से कम मानसिक स्थिरता और शांति तो रहती ही है।

आपकी सबसे प्रिय स्वरचित रचना कौन सी है और क्यों?

विजय उपाध्याय - मेरी साहित्यिक रूचि कहानियों में है। अपनी लिखी कहानी की बात करुं तो मुझे 'पापा के नाम' कहानी बहुत प्रिय है। ये बहुत ही मार्मिक कहानी है। सात पोस्ट कार्ड पर बिना कोई शब्द गंवाए कसी हुई कहानी है। इसमें गरीबी और आर्थिक तंगी में फूटती कोंपल है तो बीमारी और बेरोजगारी की लाचारी भी है। ये कहानी निजी स्कूलों के खोखले आदर्शों  और छोटे बच्चों की संवेदनाओं को ताक पर रखती व्यवस्था की भी पोल खोलती है। दूसरी कक्षा की बच्ची के शब्दकोष के हवाले से कहानी कहना आसान नहीं है। अभी तक आलोचना के लिए इस में से कुछ मिला नहीं है। मेरी बेटी जब स्कूल जाने लगी तो वह हर दिन वहाँ घटने वालीं कुछ न कुछ घटनाएं शेयर करती और मैं बडे़ ध्यान से सुनता। इस कहानी का कथानक मेरी बेटी की ही देन है, मैने तो बस पत्र शैली में गूँथा है। ये छोटी और मारक कहानी है इसलिए मुझे सर्वाधिक प्रिय है।

आप अपने लेखन से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

विजय उपाध्याय - मैं अपने लेखन से यह संदेश देना चाहता हूं कि जीवन से कृत्रिमता को हटा दीजिए। सरल और प्राकृतिक जियें। आडंबर और दिखावे से दूर रहें, जो व्यवहार आप को पसंद नहीं वह दूसरों से न करें, सरल और विनम्र रहें। जीवन बहुत छोटा है इसे किसी घमंड की छाया में बैठकर बर्बाद न करें।

बुधवार, 29 मई 2019

व्यंग्य - दौरा बनाम दौर


- भाई नफे!
हाँ बोल भाई जिले!
- जो मैं देख रहा हूँ, क्या तू भी वो सब देख पा रहा है?
- तू भला क्या दिखाने की कोशिश में है?
- अरे उसी को जो धड़ाधड़ जारी है।
- क्या धड़ाधड़ जारी है?
- भाई इन दिनों विभिन्न राजनीतिक दलों में धड़ाधड़ इस्तीफों का सिलसिला चल रहा है। अब तो ये हाल है कि किसी नेता के हाथ में कोई कागज दिखे तो एक पल को ऐसा लगता है कि कहीं वह उसका इस्तीफा न हो।
- हा हा हा अच्छा लतीफा है।
- भाई अब तो इस्तीफे और लतीफे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। इस्तीफे इतने धड़ल्ले से दिए जा रहे हैं, जितने धड़ल्ले से कवि सम्मेलनों में कविता के नाम पर लतीफे श्रोताओं को झिलवाये जाते हैं।
- भाई ये  शायद इस्तीफ़ा रूपी लतीफ़ों का दौर है।
- पर ये दौर आया कैसे?
- ये दौर दौरों के फलस्वरूप आया है।
- मैं कुछ समझा नहीं। जरा खुलके बता।
- चुनावों के दौरान नेताओं को विभिन्न प्रकार के दौरे पड़े।
- एक-दो उदाहरण तो दे।
- किसी को अपनी छिन चुकी सत्ता को बचाने का दौरा पड़ा, किसी को तानाशाही का दौरा पड़ा तो किसी को राष्ट्रवाद का दौरा पड़ा।
- भाई पहले दो दौरे तो समझ में आते हैं पर ये तीसरा दौरा भला दौरा कैसे हुआ? जहाँ तक मेरा मानना है कि राष्ट्रवाद एक पवित्र भावना है, जो अपने देश से प्रेम करने वाले हरेक व्यक्ति के दिल में बसती है।
- ये बात तेरे-मेरे जैसे लोग ही तो समझते हैं। बाकी के लिए तो राष्ट्रवाद केवल दौरा है, जो इस देश को विनाश की ओर ले जा रहा है। 
- मतलब कि राष्ट्रवाद को दौरा मानने वालों के अनुसार हमें राष्ट्रवाद को तिलांजलि देकर दुश्मन देश के चरण छूकर उससे शांति की याचना करनी चाहिए, वो अगर हमारे एक गाल पर तमाचा मारे तो अपना दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए और देश की थाली में खाकर उसी में छेद करने वाले महानुभावों को ससम्मान अपना कार्य करते देना चाहिए।
- बिलकुल भाई, जो इन सबको स्वीकार न करे, तो उनके अनुसार उसे राष्ट्रवाद के दौरे ही पड़ते हैं। 
- भाई देश का नागरिक अब इतना बौरा नहीं रहा, कि वो कह दें और राष्ट्रवाद दौरा कहलाया जाने लगे।
- तो फिर राष्ट्रवाद को किस नाम से परिभाषित किया जाना चाहिए?
- राष्ट्रवाद ऐसा भयंकर तूफान है जिसमें देश के प्रति दुर्भावना रखने वाले सही-सलामत नहीं बचेंगे।
- तेरे कहने का अर्थ है कि राष्ट्रवाद दौरा नहीं, बल्कि अब राष्ट्रवाद का दौर है।
- बिलकुल भाई, और अब ये दौर देश में अनवरत चलता रहेगा।
- एवमस्तु!

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

व्यंग्य : एक पत्र आँसू गैंग के नाम


प्यारे आँसू गैंग
सादर दोगुलस्ते!

आशा है सकुशल होंगे और अपने-अपने बिलों में चैन से सो रहे होंगे। जानता हूँ बीते दिनों आप सबने कठिन परिश्रम करके अपना पसीना बहाया था सो थकान होना अवश्यम्भावी है। पाकिस्तानी गवैये के कार्यक्रम पर प्रतिबन्धमालदा दंगेअसहिष्णुता व आतंकी याकूब प्रेमी छात्र की आत्महत्या इत्यादि बहुतेरे मुद्दे थे जिनमें आप सब कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहे। सो इतनी व्यस्तता और परिश्रम के पश्चात् आराम करना तो बनता है। पर आप तो स्वयं को न्याय के लिए आवाज बुलंद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं इसलिए मैंने सोचा कि आपकी निंद्रा में खलल डालने की कोशिश कर ही दूँ। शायद आपको पता चल गया हो कि हमारे एक कलाकार को पड़ोस के अति शांतिप्रिय देश ने अपने देश में आने के लिए वीसा देने से इंकार कर दिया है। अब ये और बात है कि उस अति शांतिप्रिय देश के शांति दूत आए दिन बिना वीसा के हमारे देश में शांति में वृद्धि करने में समय-समय पर अपना अतुलनीय योगदान देते रहते हैं। क्या कहा आपको ये समाचार मिल गया थाफिर आपकी आँखों में आँसुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं करवाई और न ही आपके मोमबत्ती गैंग व धरना विशेषज्ञ बंधुओं की इस समाचार पर मोमबत्ती मार्च और धरना दिए जाने की घोषणा करने की कोई खबर मिली। अच्छा तो ये बात है। आप असली वाले धर्मनिरपेक्ष प्राणी हैं जो सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके अल्पसंख्यकों और देश की ऐसी-तैसी करनेवाले सदपुरुषों के पक्ष में ही आवाज उठाते हैं और उस कलाकार ने उन अल्पसंख्यकों द्वारा खुद के बंधुओं पर हुए अत्याचार और कत्लेआम के विरोध में आवाज उठाने का घोर पाप किया है। ओहो मतलब आप भी विवश हैं। यदि आप ऐसे छोटे-मोटे मुद्दे पर विरोध का झंडा उठायेंगे तो अरब के तेलियों और यूरोप के मिशनरीज से आप सबके कटोरों में नियमित रूप से डाली जानेवाली भीख बंद हो जाएगी। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो ये पापी पेट का मामला है। खैर छोडिए किसी के पेट पर लात मारना अपने स्वभाव में भी नहीं है। हम आपकी सहायता के बिना ही ये समस्या सुलझा लेंगे। आपकी नींद में खलल डाला इसके लिए माफ़ कीजिएगा। आप तब तक चैन से सोइए जब तक कोई देशद्रोही मुसीबत में न फँस जाए या फिर कोई शांतिप्रिय आतंकी देश में शांतिपूर्ण कार्य करते हुए 72 हूरों के लालच में अपनी पवित्र देह को त्याग न दे। तब तक हम राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद की अलख जगाते हुए अपने और अपने बंधुओं के हृदय में सो चुके राष्ट्रप्रेम को जगाने का प्रयत्न करते हैं ताकि आनेवाले समय में आप सबकी नींद में कभी भी व्यवधान न पड़ सके।
आपके यूँ ही सोये रहने की आशा करता हुआ
आपके अनुसार असहिष्णु देश का वासी
एक असहिष्णु भारतीय।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

व्यंग्य : एक पत्र रायते के नाम


प्यारे रायते
सादर फैलस्ते!
       और सब कुशल मंगल है नअरे नाराज मत हो मैं भली-भाँति जानता हूँ तुम्हारे साथ कुछ भी कुशल मंगल नहीं है इसीलिए तो तुम्हें ये पत्र लिख रहा हूँ। अब पत्र के आरंभ में कुशल क्षेम पूछने की अपनी पुरानी परंपरा जो ठहरी सो मैं भी उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन कर रहा था। अब ये और बात है कि इन दिनों कुछ महानुभाव आधुनिकता की दुहाई देते हुए प्राचीन परंपरा और संस्कृति से किनारा करने में ही अपना बड़प्पन समझने लगे हैं। पर हम ठहरे पुराने विचारों के आधुनिक लोग जो चाहकर भी अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं छोड़ सकते। खैर छोड़ो इन बातों को तुम तो ये बताओ कि आजकल काहे को इतना उदास रहते होइतने स्वादिष्ट व्यंजन को यूँ उदास और गुमसुम रहना भी भला कहीं जँचता है। एक तुम्हीं तो हो जिसे भोजन में ग्रहण करके पेट की गर्मी से राहत मिलती है और पाचन भी दुरुस्त रहता है। तुम्हारे भिन्न-भिन्न रूप स्वाद से भरपूर होते हैं। बूँदी का रायताबथुए का रायताकद्दू का रायता और घीये का रायता तो खाते-पीते हुए जी ही नहीं भरता। सच कहूँ तो तुम तो हमारे भोजन का अभिन्न अंग हो। अरे देखो तो तुम्हारे विभिन्न रूपों का स्मरण करते ही जीभ से लार टपकने लगी। जीभ में हींगजीरेकाले नमक और चाट मसाले का स्वाद लार के साथ तैरने लगा। जिस प्राणी ने तुम्हारा स्वाद नहीं लिया उसने भला जीवन जिया भी तो क्या जिया। अरे-अरे तुम तो रोने लगे। अब रोना बंद भी करो। मैं तुम्हारी पीड़ा अच्छी तरह जानता और समझता हूँ। तुम्हें भोजन में ग्रहण करने की बजाय इन दिनों बिना-बात में निरंतर फैलाए जाने से तुम्हारा हृदय जिस अपमान और पीड़ा से गुज़र रहा है वो किसी से छिपा नहीं है। तुम्हारे स्वाद के दीवाने उस दिन को कैसे भूल सकते हैं जब एक माननीय महोदय आए और रैलियों के महानगर की सत्ता हथियाकर सड़कों पर रायता फैलाने की परम्परा आरंभ कर दी। अपनी हर असफलता का ठीकरा दूसरे के सिर पर फोड़ने में सिद्धहस्त उन माननीय महोदय का अनुसरण भेड़ बनकर तूफ़ान की मार से अपने जहाज डुबो चुके अन्य माननीय महोदय भी कर रहे हैं। अब जनता के हित में क्या ठीक है सोचने की बजाय ये महोदय नित्य किसी न किसी ऐसे मुद्दे की खोज में रहते हैं जिसके बल पर रायता फैलाया जा सके। कभी जाति मुद्दा बनती है तो कभी धर्म। कभी मंदिर मुद्दा बनता है तो कभी मस्जिद। आजकल इनका सारा समय रायता फैलाकर शोर-शराबा करने में ही बीतता है। इनका शायद एकमात्र उद्देश्य है कि न कुछ खुद करो न किसी को कुछ करने दो। विकास की माँग पर हो-हल्ला मचाकर रायता फैलानेवाले इन महोदयों का प्रयास रहता है कि इनके द्वारा फैलाए गए रायते से विकास का पैर फिसल जाए और वो फिसलकर ऐसा गिरे कि उसकी कमर टूट जाए तथा वो थोड़ा-बहुत भी चलने-फिरने के लायक न रहे। इन्हें ये अंदाजा नहीं है कि जिस दिन तुम सही तरीके से फैलने पर आ गएउस दिन ये सब ऐसे फैलकर फेल होंगे कि कोई इन्हें पास करनेवाला भी नहीं मिलेगा। इसलिए यदि ये सब तुम्हें समय-असमय बिना-बात के फैलाकर बर्बाद करते हैं तो तुम निराश और दुखी मत होना क्योंकि जैसे कि कहावत है कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद वैसे ही रायता फैलानेवाले क्या जाने रायता खाने का स्वाद। सो जो तुम्हारे स्वाद के प्रेमी हैं वो तुम्हें पहले जितना ही प्यार और आदर देते रहेंगे और जो तुम्हारे स्वाद और गुणों से अनभिज्ञ हैं वो तुम्हें फैलाते ही रहेंगे। इसलिए अब टेंशन-वेंशन छोड़कर झट से अपने उसी रूप में फिर से वापस लौट आओ क्योंकि तुम्हारा स्वाद लेने को जी बहुत मचल रहा है।

तुम्हारे जैसे थे की स्थिति में वापस लौटने की प्रतीक्षा की आस लिए हुए तुम्हारे स्वाद का दीवाना 

एक रायता प्रेमी भारतीय
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


बुधवार, 27 जनवरी 2016

व्यंग्य : अगला विश्वयुद्ध पार्किंग के लिए होगा


    विश्व अब तक दो विश्वयुद्धों की मार झेल चुका है। हम सभी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि विश्व की महाशक्तियों ने किस प्रकार निजी स्वार्थों के लिए बाकी संसार को दो विश्वयुद्धों की आग में झोंक दिया था। पर शायद दो-दो विश्व युद्धों से हम लोगों का जी नहीं भरा है सो अक्सर हम अपने मस्तिष्क को कष्ट देते हुए विचारमग्न रहते हैं कि अगला अर्थात तीसरा विश्व युद्ध किस कारण होगा? विभिन्न रायवीरों ने तीसरा विश्व युद्ध भड़कने के लिए विभिन्न कारण बताये हैं। उनमें से ही एक कारण है कि तीसरा विश्व युद्ध जल यानि पानी के लिए होगा। यह कारण अधिकांश महानुभावों द्वारा स्वीकार भी किया जा चुका है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि दिन-प्रतिदिन विश्व की आबादी बढ़ती ही जा रही है और एक दिन ऐसा भी आएगा जब आबादी के अनुपात में पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं होगा। हालाँकि उनके इस तर्क में थोड़ी-बहुत सच्चाई भी अनुभव होती है, क्योंकि जिन नारियों का कलेजा घर में कॉकरोच को ही देखकर बुरी तरह काँप उठता है वे पानी के टैंकर पर खड़ी होकर इतनी वीरता से युद्ध करती हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि न पहले कभी इतनी वीर नारियाँ जन्मी होंगी और न ही जन्म लेंगी। पर पानी के लिए होनेवाली ये छिटपुट लड़ाइयाँ तो गर्मी के मौसम में होनेवाली लड़ाइयों के कुछेक उदाहरण मात्र हैं। सर्दी का मौसम आते ही ये सभी युद्धप्रेमी स्वेटर अथवा रजाई की ओट में छिपे हुए पानी से अधिकाधिक दूरी बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। कई महानुभाव तो इन दिनों ठंडे पानी के प्रकोप से डरकर नहाने से ही सन्यास ले लेते हैं। बेचारा पानी भी इन दिनों निराश और उदास रहता और कामना करने लगता है कि जल्द से जल्द गर्मी का आगमन हो और उसकी प्रतिष्ठा फिर से स्थापित हो जाए।
      अब सोचनेवाली बात ये है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध पानी के कारण नहीं होगा तो फिर किस कारण से होगा? फिर एक बार को ख्याल आता है कि तीसरा विश्व युद्ध होना क्या इतना जरूरी है कि उसके सोच-विचार में अपना बहुमूल्य समय ख़राब किया जाए। अचानक मन ये विचार करने लगता है कि यदि विश्व युद्ध नहीं हो पायेगा तो फिर दुनिया के ठेकेदार देशों की रोजी-रोटी कैसे चल पायेगी। उनके द्वारा प्रेमपूर्वक बनाये गए विध्वंशक हथियार बिना युद्ध के जंग नहीं खा जायेंगे। इसलिए युद्ध होने बहुत जरूरी हैं ताकि हथियारों का सदुपयोग होता रहे तथा हम जैसे दुखी मानवों को इस जीवन मुक्ति मिलती रहे। बहरहाल हम अपने मुद्दे पर जैसे थे कि स्थिति में फिर से आते हैं और अपने मस्तिष्क को कष्ट देकर मिलजुलकर ये विचार करते हैं कि ये ससुरा तीसरा विश्वयुद्ध आखिर किस वजह से होगा?
       अब आप चाहे जो भी उल्टा-सीधा सोचते रहें पर मेरे अनुपजाऊ मस्तिष्क में एक अनुपजाऊ सा विचार कबड्डी खेल रहा है कि अगला विश्वयुद्ध पार्किंग के लिए होगा। अब भला इसमें चौंकने जैसी बात कहाँ से आ गयी? पूरे संसार में कंक्रीट के जंगल तेजी से पनपते जा रहे हैं और उन जंगलों में वास करनेवाले भले लोगों के दिल भी कंक्रीट जैसे ही हो गए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनायें दम तोड़ती जा रही हैं। इन्हीं संकुचित दिलों वाले भले मानुषों ने अपने घर के आजू-बाजू वाली सड़क को अपहृत करके अपने बड़े-बड़े फ्लैटों का आकार बढ़ाने का अद्भुत कार्य किया है और ये सब इन्होंने सरकारी सड़क को अपनी बपौती समझकर किया है। इसके अलावा बाकी बची सड़क को भी ये अपने पुश्तैनी अधिकार की श्रेणी में रखकर उसपर अपने गाड़ियों के संग्रह की प्रदर्शनी लगाये हुए मिल जाते हैं। इनके घरों में रहनेवाले विभिन्न सदस्य गणों की निजी वाहन की चाहत गाड़ियों के संग्रह में वृद्धि रुपी योगदान देती रहती है। हालाँकि उनका काम एक वाहन से भी चल सकता है किन्तु इसके लिए एकता की भावना भी होनी आवश्यक है किन्तु एकता नामक अवगुण हमारे दिलों से जाने कबका लापता हो चुका है। वाहनों की भीड़ और बोझ से सड़कें हाँफती रहती हैं लेकिन वाहनों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। वाहनों की इस भीड़-भाड़ में जाने-अनजाने एक-दूसरे के वाहनों में हलकी-फुलकी खरोंच आ ही जाती है, जिसका बदला वाहन चालक एक-दूसरे को खरोंचों से भरकर लेते हैं। पार्किंग के मुद्दे पर लोग सड़कों, गलियों, मोहल्लों और अपने आस-पड़ोस में कर्मठता से लड़ते-झगड़ते हुए मिल रहे हैं। कई बार कर्मठता से लड़ते हुए वे एक-दूसरे का राम नाम सत्य भी कर डालते हैं। एक बार के लिए विचार करें तो असल में यह तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी चल रही है, जिसके लिए हम भले लोग निरंतर अभ्यासरत हैं। अब देखते हैं कि किस शहर के किस कोने में पार्किंग विवाद पर छिड़ा संघर्ष बढ़ते-बढ़ते विश्व युद्ध का रूप धारण करता है। अब आप सभी के मन में यह प्रश्न कौंध रहा होगा कि विश्व युद्ध का शुभारंभ किसी शहर से ही क्यों होगा? इसका शुभारंभ किसी गाँव से भी तो हो सकता है। तो गौर करनेवाली बात ये है कि यदि गाँवों को किसी भी देश की राजनीति में इतना महत्त्व मिल पाता तो गाँव का किसान इतना गरीब न होता और न ही उसे इस मोहमाया के बंधन से मुक्त होने के लिए किसी पेड़ पर फाँसी के फंदे में झूलकर बेमौत मरना पड़ता। खैर हम भी कहाँ महत्वहीन किसान की दुखभरी व्यथा में उलझ गए। उसका जीवन तो कर्ज के भंवर में फँसने से आरंभ होता है और किसी पेड़ की डाली पर फाँसी के फंदे पर झूलते हुए ही समाप्त होता है। अब आप ही सोचिये कि भला गाँव शहर द्वारा किये जानेवाले विश्व युद्ध के शुभारंभ जैसे पुनीत कार्य में व्यवधान डालने की धृष्टता कैसे करेगा। इसलिए इस पावन कार्य की अगुवाई का सर्वाधिकार तो शहर के पास ही सुरक्षित रहेगा। इसलिए आप सब शहरियों से निवेदन है कि इस पावन यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए तैयार रहें और इसके लिए कर्मठता और परिश्रम से अभ्यास करते रहें। ॐ अशांति!  

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 23 जनवरी 2016

यादगार रहा विश्व पुस्तक मेला 2016



-भाई नफे!
-हाँ बोल भाई जिले!

-कैसे उदास बैठा है?
-उदास नहीं हूँ भाई मैं तो यादों में खोया हुआ हूँ।
-कौन है वो खुशनसीब हसीना जिसकी यादों में खोया हुआ है?
-भाई किसी हसीना की यादों में नहीं मैं तो विश्व पुस्तक मेले की मधुर यादों में खोया हुआ था।
-अच्छा तो ये बात है। तो हमें भी विश्व पुस्तक मेले की मधुर स्मृतियों से रूबरू करवा।
-भाई विश्व पुस्तक मेला 9 जनवरी, 2016 को शुरू हुआ। शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा आयोजित शोभना सम्मान समारोह में देश के गिने-चुने लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए शोभना सम्मान-2015 से विभूषित किया गया।
-अरे वाह! भाई शोभना सम्मान किस-किसको दिया गया?
- साहित्य में शोभना सम्मान प्राप्त करने वाले प्रसिद्द कथाकार बल राम, मुम्बई के कहानीकार सूरज प्रकाश, पंजाब के लघुकथाकार श्याम सुंदर अग्रवाल व लखनऊ के व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव को दिया गया। संपादन में प्रवासी संसार के डॉ. राकेश पाण्डेय, हल्द्वानी के अनूप वाजपेयी, बिहार के रणविजय राव, अट्टहास की शिल्पा श्रीवास्तव, दिल्ली के आशीष कंधवे व मेरठ के प्रदीप कुमार को मिला। समाज सेवा के क्षेत्र में युवाओं के लिए कार्यरत झारखण्ड के गोपाल भगत व बाल शिक्षा के लिए जयपुर व गुड़गाँव में संघर्षरत डॉ. अनुभूति भटनागर को शोभना सम्मान प्रदान किया गया। आलोचना के क्षेत्र में रांची के डॉ. रमेश तिवारी को तथा व्यंग्य के क्षेत्र में शोभना सम्मान 'पैकेज का पपलू' व 'दोराहे पर जिंदगी' के लेखक हल्द्वानी के गौरव त्रिपाठी को दिया गया वहीँ कला के क्षेत्र में अर्चना शाह अग्रवाल को सम्मानित किया गया तथा इटावा के नितिन जैन को कंप्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में शोभना सम्मान दिया गया।
-इसका मतलब है विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत शोभना सम्मान से ही हुई।
-नहीं यह विश्व पुस्तक मेले का दूसरा कार्यक्रम था। पर हाँ इसमें लोकार्पित हुई पुस्तक 'सावधान पुलिस मंच पर है' मेले में सबसे पहले लोकार्पित होनेवाली पुस्तक थी।
-अरे वाह! भाई इस कार्यक्रम के अतिथि कौन-कौन थे?
-भाई कार्यक्रम की अध्यक्षता व्यंग्य यात्रा के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय ने की, मुख्य अतिथि डॉ. हरीश नवल रहे तथा विशिष्ट अतिथि प्रताप सहगल थे। वक्ता के रूप में डॉ. शशि सहगल उपस्थित रहीं। सानिध्य सोसाइटी की अध्यक्षा शोभना तोमर का रहा तथा कार्यक्रम का संचालन अपने सुमित प्रताप सिंह ने किया।
-तो मेले में उपस्थित जनसमूह की क्या प्रतिक्रिया रही?
-प्रतिक्रिया अच्छी रही। श्रोताओं ने सभी अतिथियों व वक्ताओं को सुना एवं सराहा।
-ये तो बहुत बढ़िया बात है। अच्छा वहाँ किन-किनसे मिलने का अवसर मिला?
-बहुत से जाने-अनजाने लोग मिले। नरेंद्र कोहली, ज्ञान चतुर्वेदी, गिरिराजशरण अग्रवाल, सुधाकर अदीब, लालित्य ललित, सुभाष चंदर, अशोक मिश्र, कौशलेन्द्र प्रपन्न, मलय जैन, अनुज त्यागी, सुधांशु माथुर, प्रदीप राय, विजय शंकर चतुर्वेदी, हरीश अरोड़ा, मीना अरोड़ा, अलका अग्रवाल, नेहा शरद, संगीता कुमारी, दीपक सरीन इत्यादि सुधीजनों से मिलने और खिलने का अवसर मिला।
-भाई मेले में भीड़ कैसी रही?
-भीड़ खूब रही। इस बार बड़ी संख्या में पुस्तक प्रेमी पुस्तक मेले में आए और अपने साथ पुस्तकों से भरे थैले लेकर गए।
-कमाल है। डिजिटल युग में भी थैला भर किताबें ले गए?
-हाँ भाई क्योंकि पुस्तक के पन्नों को उँगलियों से स्पर्श कर पढ़ने की अनुभूति का आनंद वो भली-भाँति जानते हैं। इसलिए डिजिटल युग में भी अपने-अपने पसंद के लेखक की पुस्तकें खरीदने की चाहत लिए हुए वो भागे-भागे पुस्तक मेले घूमने पहुँचे थे।
-ये तो अच्छी बात है। अच्छा मेले में और क्या-क्या हुआ?
-मेले में अनेक लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। भिन्न-भिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन हुआ। लेखकों व पाठकों का आपसी परिचय हुआ। कुछ नए लेखकों के लेखन को जहाँ प्रतिष्ठा मिली वहीँ पुराने व वरिष्ठ लेखकों के अनुभवों से युवा हस्ताक्षरों को कुछ सार्थक सीखने को मिला। व्यंग्य यात्रा पत्रिका द्वारा आयोजित व्यंग्य की तीन पीढ़ियों के बीच संवाद द्वारा व्यंग्य विधा ने विश्व पुस्तक मेले में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज़ करवाई। इसके अलावा कुछ लोगों ने मंच से चिपकने का व कुछ ने शाल ओढ़ने में रिकॉर्ड भी बनाया। 
-हा हा हा तू ये बता कि तूने कोई रिकॉर्ड बनाया या नहीं?
-हाँ बिलकुल बनाया।
-वो भला क्या?
-इस बार सबसे ज्यादा पुस्तक मेले में घूमने का। 
-हा हा हा ये भी सही है। इसका मतलब है कि तूने पुस्तक मेले का खूब मजा लूटा।
-हाँ भाई और अगले साल भी इसका पूरा मजा लूटने की योजना है।
-अगली बार तू पूरा मजा नहीं लूट पाएगा।
-वो कैसे?
-क्योंकि अगले विश्व पुस्तक मेले में नफे के साथ आधा मजा जिले भी लूटनेवाला है।
-ऐसा क्या?
-हाँ भाई बिलकुल। अगली बार मैं भी तेरे विश्व पुस्तक मेले में मौजूद रहूँगा।
-अरे वाह भाई फिर तो मेले में घूमने का मजा दुगुना हो जाएगा।

-----------समाप्त----------

लेखक : सुमित प्रताप सिंह



सोमवार, 28 दिसंबर 2015

छोटे शहर के बड़े दाज्यू


- भाई नफे!
- हाँ बोल भाई जिले!
- हल्द्वानी की सैर कैसी रही?
- भाई बहुत बढ़िया रही। छोटे शहर के बड़े दाज्यूओं के संग दो दिन बहुत शानदार बीते।
- भाई ये दाज्यू का मतलब क्या है?
- कुमाऊनी भाषा में दाज्यू का अर्थ होता है भाई।
- तो नफे दाज्यू अब खोलके बता कि वहाँ दो दिन क्या-क्या किया?
- जिले दाज्यू 24 दिसंबर की रात हम दिल्ली से हल्द्वानी पहुँचे। वहाँ हमारा स्वागत देश के चर्चित युवा कवि एवं व्यंग्यकार दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने किया। दाज्यू गौरव हल्द्वानी में अमर उजाला में वरिष्ठ उपसंपादक हैं। हल्द्वानी में अमर उजाला के संपादक दाज्यू अनूप वाजपेयी ने दाज्यू गौरव त्रिपाठी को शहर में पर्वतीय उत्थान मंच द्वारा आयोजित होनेवाले मेले में कवि सम्मेलन को संयोजित करने की कमान सौंपी थी। जिस होटल में दाज्यू गौरव हमें ठहराने के लिए ले गए वहाँ आगरा से गीतकार दाज्यू दीपक सरीन भी पहले से पहुँचे हुए थे। आधी रात के बाद वहाँ अगले दिन होनेवाले कवि सम्मेलन का पूर्वाभ्यास ऐसा चला कि सुबह होटल के संचालक ने उलझन में पूछ डाला कि रात को इतनी तेज आवाजें क्यों आ रही थीं। तो दाज्यू गौरव ने उसे समझा दिया कि दिल्ली और आगरा से दो कवि आए हैं और रात को कविता सम्मेलन से पहले एक कवि गोष्ठी चल रही थी।
- हा हा हा दाज्यू मतलब कि तीनों कवियों ने आधी रात को हल्द्वानी के उस होटल को अपनी कविताओं से कँपा डाला।
- हाँ बिलकुल दाज्यू जोश में तीनों कवि ऐसे बहके कि उन कुछ घंटों के दौरान होटल के उस कमरे में बस कविता ही कविता छाई रही।
- अच्छा दाज्यू अब अगले दिन का हाल बता कि कवि सम्मेलन कैसा रहा?
- कवि सम्मेलन बहुत ही शानदार रहा। हल्द्वानी बेशक छोटा शहर है लेकिन यहाँ के लोग दिल से बड़े हैं।
- अच्छा तूने तभी मेरे पूछने पर इनके लिए कहा था छोटे शहर के बड़े दाज्यू।
- हाँ बिलकुल! शहर के सभी कवियों व कवियित्रियों ने इस कवि सम्मेलन को ऊर्जावान बना दिया। दाज्यू दीपक सरीन ने जहाँ अपने हसीन गीतों से शमा बाँधा, वहीं हल्द्वानी की युवा कवियित्री गौरी मिश्रा 'काजल' के मधुर स्वर में सुनाए गीतों ने श्रोताओं के दिलों में हलचल पैदा कर दी। वरिष्ठ और सबसे सेहतमंद हास्य कवि दाज्यू राजुकुमार भंडारी ने खूब हँसाया और इस कवि सम्मेलन के संयोजक दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं से हम सबके दिलों को गुदगुदाया। विवेक वशिष्ठ ‘नीलकंठ’, वेद प्रकाश ‘अंकुर’, मंजू पांडेय ‘उदिता’ व वीणा जोशी ‘हर्षिता’ इत्यादि कवियों और कवियित्रियों ने भी अपने-अपने अंदाज में श्रोतागणों का मनोरंजन किया।
- और दाज्यू सुमित प्रताप सिंह का कविता पाठ कैसा रहा?
- अगर उनका कविता पाठ बढ़िया न रहता तो क्या उनकी कलम हमें बोलने देती?
- हा हा हा दाज्यू बात तो तूने पते की कही है।
- दाज्यू सुमित प्रताप सिंह और दाज्यू दीपक सरीन के प्रस्तुतीकरण का अंजाम ये रहा कि हल्द्वानी की जनता ने उन्हें जल्द ही फिर से किसी कवि सम्मेलन में बुलाने की इच्छा जताई है।
- अरे वाह! इसका मतलब है कि हल्द्वानी की जनता कविताप्रेमी है।
- हाँ दाज्यू हल्द्वानीवाले कविताप्रेमी होने के साथ-साथ बहुत अच्छे श्रोता भी हैं। कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथि हल्द्वानी के मेयर दाज्यू जोगेन्द्र सिंह रौतेला, पी.एफ. सहायक आयुक्त दाज्यू एम.सी. पांडेय, युवा व्यापार मंडल जिलाध्यक्ष दाज्यू जसविंदर भसीन इत्यादि अतिथिगण श्रोताओं के साथ कवि सम्मेलन में आखिरी समय तक बने रहे। कवि सम्मेलन के सूत्रधार व अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक दाज्यू अनूप वाजपेयी ने प्रसन्नतापूर्वक कवि सम्मेलन के सफलतापूर्ण समापन की घोषणा की। इसकी व्यवस्था देख रहे इवेंट मैनेजर दाज्यू नागेश दुबे तो इसकी सफलता के बाद दुबे से चौबे हो गए।
- दाज्यू हल्द्वानी से कोई परिचित आकर मिला या नहीं?
- हल्द्वानी से व्यंग्य यात्रा की सहयात्री मीना अरोड़ा मिलने आयीं थीं और हम सबके लिए  प्रेम और स्नेह से भरा उपहार भी लायीं थीं।
- अरे वाह! अच्छा दाज्यू ये बता कि कवि सम्मेलन के तुम सबने मेला घूमा कि नहीं?
- हाँ दाज्यू मेला घूमने का सुख भला कैसे छोड़ते। जहाँ हम कवियों ने मेले में विवेक वशिष्ठ 'नीलकंठ' द्वारा आयोजित चटपटी भेलपूरी पार्टी और दाज्यू गौरव त्रिपाठी द्वारा दी गयी स्वादिष्ट मुंगोड़ों की पार्टी का आनंद लिया वहीं मुख्य अतिथि दाज्यू जोगेन्द्र सिंह रौतेला ने ऊँट की सवारी का लुफ्त उठाया।
- चटपटी भेलपुरी और मुंगोड़ों का सुनके तो मुँह में पानी आ गया। और ऊँट की सवारी। दाज्यू ये रेगिस्तान का जहाज पहाड़ों में कहाँ से पहुँच गया?
- दाज्यू ऊँट की सवारी ही तो इस मेले का मुख्य आकर्षण थी।
- तो तुम सबने ऊँट की सवारी की या नहीं?
- नहीं दाज्यू फुरसत ही नहीं मिली। हम मेले से निकलकर अगले दिन की योजना बनाकर होटल के कमरा नंबर 102 में रात को बिस्तर में गोल हो गए।
- अच्छा दाज्यू अगले दिन कहाँ घूमे-फिरे?
- दाज्यू दीपक सरीन का बावरा मन हल्द्वानी में नहीं लगा और वो सुबह जल्दी ही आगरा को रफू-चक्कर हो गए। वो बता रहे थे कि उनके घर से कुछ दूर स्थित पागलखाने से बहती हुई हवा उनके घर के बगल से होकर गुजरती है और उनका बावरा मन उस हवा से बिछोह ज्यादा दिन नहीं झेल सकता है सो उन्हें तो जल्द से जल्द आगरा पहुँचना ही था।
- दाज्यू वाकई में अजब-गजब हैं दाज्यू दीपक सरीन का बावरा मन। खैर छोड़ दाज्यू ये बता कि तुम सब कहाँ-कहाँ घूमने गए?
- दाज्यू पहले तो हमारा मन नैनीताल घूमने का था पर दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने बताया कि नैनीताल में बहुत भीड़ चल रही है सो हम भीमताल घूमने निकल पड़े।
- भीमताल में कहाँ-कहाँ घूमे और क्या-क्या किया?
- सबसे पहले हमने स्वादिष्ट मोमो का स्वाद लिया फिर भीमताल के आजू-बाजू फोटोग्राफी की। इसके बाद हमने भीमताल में बोटिंग का आनंद लिया। फिर दाज्यू सुमित प्रताप सिंह का मन बादशाह बनने का हुआ और वो अचानक बादशाह के वस्त्र धारण कर शाही अंदाज में आ गए। इसके कुछ पलों के बाद उन्होंने बगावत कर दी और बागी का वेश धर उन्होंने दाज्यू गौरव त्रिपाठी पर बंदूक तान दी।
- बंदूक तान दी! पर दाज्यू क्यों?
- दाज्यू सुमित प्रताप सिंह ने दाज्यू गौरव त्रिपाठी के सीने पर बंदूक की नली लगा पूछा कि उत्तराखंड में जल्दी ही कवि सम्मेलन करवाओगे या नहीं?
- हा हा हा! तो फिर दाज्यू गौरव त्रिपाठी ने क्या कहा?
- उन्होंने हाथ जोड़कर घोषणा की कि हल्द्वानी और उत्तराखंड में कविता और व्यंग्य को और अधिक समृद्ध करने के लिए समय-समय पर कार्यक्रम होते रहेंगे।
- जे बात! तो भीमताल भ्रमण के साथ ही तुम्हारे दो दिवसीय यात्रा कार्यक्रम का समापन हो गया।
- नहीं भीमताल के बाद हम फिर से हल्द्वानी के मेले में गए।
- मेला दोबारा घूमने का कोई खास मकसद था?
- हाँ बिलकुल ख़ास मकसद ही था। दाज्यू सुमित प्रताप सिंह की ऊँट सवारी की तीव्र इच्छा को पूर्ण करना था और उन्हें मेले में कुछ खरीदारी भी करनी थी। अंततः दाज्यू गौरव त्रिपाठी द्वारा दिए गए स्वादिष्ट रात्रि भोज के साथ दूसरे दिन की समाप्ति हुयी। अगले दिन दाज्यू गौरव त्रिपाठी के पहले व्यंग्य संग्रह 'पैकेज का पपलू' और दूसरी पुस्तक 'दोराहे पर जिंदगी', जो कि कहानी व व्यंग्यों का कॉम्बो पैक है, को प्राप्त करने के साथ ही हल्द्वानी यात्रा का समापन संपन्न हुआ। दाज्यू गौरव त्रिपाठी हमें हल्द्वानी रेलवे स्टेशन तक इस भय से अपनी कार से छोड़ कर गए कि कहीं हम हल्द्वानी में ही न बस जाएँ।
- हा हा हा! दाज्यू हो सकता है हल्द्वानी से तुम्हें लगाव हो गया हो और यह लगाव ही उनके भय का कारण हो। वैसे तू हल्द्वानी से मेरे लिए कुछ लाया है या नहीं?
- दाज्यू तेरे लिए भी कुछ लाना था?
- देख दाज्यू अगर तू मेरे लिए कुछ नहीं लाया होगा तो आज से तेरी-मेरी कट्टी।
- अरे दाज्यू तेरे लिए हल्द्वानी की स्पेशल बाल मिठाई लाया हूँ। अब रूठना छोड़के मान जा और ले ये मिठाई खा।
- एक शर्त पर मानूँगा।
- कौन सी शर्त दाज्यू?
- अगली बार अपने साथ मुझे भी हल्द्वानी ले चलेगा। 
- हाँ हाँ क्यों नहीं दाज्यू। चल इसी बात पर बाल मिठाई से अपना मुँह मीठा कर।
- दाज्यू तो फिर हम एक-दूसरे को बाल मिठाई खिलाकर एक-साथ मुँह मीठा करते हैं।
- ठीक है दाज्यू।
 लेखक : सुमित प्रताप सिंह

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