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रविवार, 24 जुलाई 2022

गधों का फैसला

जब एक इंसान ने 

दूसरे इंसान को गधा कहा 

तो एक गधे से 

ये सहा न गया 

गधा नाराज हो बोला

बेशक हम खोता है

पर अपुन फैंकता नहीं

बल्कि कुछ न कुछ ढोता है

इंसानी फितरत को 

एक मासूम गधे पे मढ़ते हो

पक्का तुम सब इंसान 

हम गधों से जलते हो

तुम सब हम गधों का

गिराना चाहते हो हौसला

तो गधा बिरादरी भी 

करती है ये फैसला

अबकी बार किसी गधे से

कोई भूल हुई तो हम

ये नेक काम करेंगे

उस गधे को डांटेंगे-फटकारेंगें

दो-चार दुलत्ती मारेंगे

फिर उसे बेइज्जत कर

बेवकूफ इंसान कहेंगे।

* चित्र गूगल से साभार

बुधवार, 22 दिसंबर 2021

कविता : ऊहापोह

कभी-कभी सोचता हूँ कि 

यदि पुस्तकें होती रहीं 

यूँ ही प्रकाशित तो

ये दृश्य कहीं 

विलुप्तप्राय न हो जाएं

फिर सोचता हूँ कि  

पुस्तकें प्रकाशित होनी

हो गयी जो बंद तो

इस जग में विचार 

मूर्तरूप  कैसे ले पायेंगे

और वे विचार भी तो 

पुस्तकों के बिना

बेमौत मर जायेंगे

जिनमें ये सीख होगी कि

हरे-भरे वृक्ष काटने से 

हो सकता है

पर्यावरण का विनाश

और यूँ ही वृक्ष

जो कटते रहे तो फिर

ऐसे दृश्य देखने को

कहीं ये नैन न तरस जायें।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

(चित्र में हमारे लाडले पार्थ भविष्य में झाँकने का प्रयत्न कर रहे हैं।)

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

कविता : बोनस की आस


स-नस पूछ रही खुश हो

बोनस किस दिन आएगा

खाली पड़ा बैंक एकाउंट 

कुछ पल फिर मुस्काएगा


जाने कितने सपने पाले

वेतन के संग हम सबने 

पर वो आया और उड़ा

कुछ दिन के ही छल में

अब आगे की नैया को

बोनस ही पार लगाएगा

खाली पड़ा बैंक एकाउंट 

कुछ पल फिर मुस्काएगा


इस दीवाली दीप जलेंगे

बोनस के घी के बल पर

और कितनी बोनस से दूरी

दफ्तर बाबू जल्दी हल कर 

इस दिवाली कहीं दिवाला

नच के तो न ढोल बजाएगा

खाली पड़ा बैंक एकाउंट 

कुछ पल को तो मुस्काएगा


पत्नी को धनतेरस की रट है

बच्चे माँगें फुलझड़ी-पटाखे

लक्ष्मी पूजा की खातिर 

लाने हैं घर पे खील-बताशे

इन सभी योजनाओं को पूरा

बस बोनस ही कर पाएगा

और खाली पड़ा बैंक एकाउंट 

भर के फिर खाली हो जाएगा।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 4 अगस्त 2021

कविता : मैं बहुत बहादुर हूँ

(ये कविता उन दिनों की है, जब मैं हॉस्पिटल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा था।)

मुझे मरने से 

डर नहीं लगता

क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ

पर जब भी लगता है कि

मैं मर भी सकता हूँ तो 

मुझे अपने जाने के

मतलब मरने के 

बाद की परिस्थितियां 

अचानक से ही 

दिखाई देने लगती हैं

जिसमें मैं अपने

बिलखते माँ-बाप को

बार-बार देखता हूँ

जिनके बुढ़ापे का 

मैं ही हूँ सहारा

जिनके सपनों और 

ढेर सारी आशाओं को

पूरा करने का किया है

मैंने उनसे वायदा

मेरे जाने के बाद

क्या होगा उन आशाओं

और सपनों का 

और क्या होगा

उनसे बार-बार किए

मेरे उन वायदों का 

कैसे जिएंगे 

मेरे बिना 

मेरी ऊँगली पकड़कर 

मुझे चलना सिखानेवाले 

सच कहूँ

यही सोचकर 

मैं अचानक डर जाता हूँ

और अगले ही पल

मैं जीवन के रण को 

जीतने के लिए

उठ खड़ा होता हूँ

क्योंकि मैं बहुत बहादुर हूँ

हूँ न?

रचना तिथि : 11 अगस्त, 2016

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

कविता : उपक्रम


प्रिये, इन दिनों मैं

शब्दों को बचाने के 

उपक्रम में लगा हूँ

इसलिए यदि मैं 

मितभाषी रहूँ 

अथवा मौन का 

अनुसरण करता मिलूँ

तो तुम चिंतित मत होना 

क्योंकि मेरा ये उपक्रम 

भविष्य में हम दोनों के लिए 

सुखकारी साबित होगा

जब सबकी तिजोरियों में 

शब्दों का अकाल पड़ जाएगा

तब हमारी तिजोरी 

शब्दों के खजाने से 

भरी पड़ी होगी 

और फिर हम उस खजाने से

समय-समय पर शब्दों को 

निकाल कर खर्च करते हुए 

अपने प्रेम की कथा को 

संपूर्णता प्रदान कर रहे होंगे।

शनिवार, 8 मई 2021

कविता - नन्ही परी का आगमन


क मुस्कुराती नन्ही परी का

घर में हमारे शुभ आगमन हुआ

उसकी भोली खिलखिलाहट ने 

हर किसी के दिल को छुआ


नन्हें-नन्हें हाथों से करके इशारे 

वो सबको अपने पास बुलाती है

जो भी आ जाए पास उसके तो

झट से उसकी गोद में चढ़ जाती है

तुतला के कभी बाबा-अम्मा कहती

कभी बोलती पापा, मम्मी या बुआ

एक मुस्कुराती नन्ही परी का

घर में हमारे शुभ आगमन हुआ


दिन भर वो व्यस्त रहती है

करती रहती नई-नई शरारत

जिद कर अपनी माँगें मनवाती

हासिल कर ली जिद में महारत

शरारती गुड़िया रानी के लिए

हम रब से करते हैं प्रार्थना-दुआ

एक मुस्कुराती नन्ही परी का

घर में हमारे शुभ आगमन हुआ।

मंगलवार, 30 जून 2020

सॉरी ज़िंदगी


ब भी मैं ज़िंदगी से 
बेहद उदास हो जाता हूँ
तब मेरे दिमाग में 
ये ख्याल आता है कि
क्यों न खत्म कर लूँ खुद को 
और चला जाऊं 
इस दुनिया से बहुत दूर
ये सोचते-सोचते मुझे
रास्ते में मिल जाता है
मंदिर पर भीख माँगने वाला 
दुर्घटना में अपनी दोनों टाँगें 
गँवा बैठा कलवा भिखारी
जो चंद रुपयों की भीख पा
समझता है खुद को
इस दुनिया का
सबसे खुशहाल आदमी
कुछ दूर और चलने पर 
मिल जाती है वो लड़की
जो एक सिरफिरे के 
एक तरफा प्यार में
तेजाब से जलवा चुकी है 
अपना खूबसूरत चेहरा
अपने सारे गमों को भुला 
जब वो हँसती है न तो
उसकी हँसी बहुत हसीन लगती है
और मुझे अपनी उदासी पर 
घिन सी आने लगती है
कुछ और आगे चलने पर 
मिलता है बचपन में
अपनी आँखें खो चुका श्यामू
जो मेरी आँखों का सहारा ले
इस दुनिया को देखकर
जी भरके खिलखिलाता है
अचानक जाने मुझे क्या होता है कि 
मैं भागकर अपने 
घर की ओर जाता हूँ
और अपनी माँ की गोद में 
अपना सिर रखकर सो जाता हूँ
माँ ममता भरे हाथों से
मेरे सिर को सहलाती है तो
एक बार फिर से 
जीने का मन करता है
और मैं पछता कर कहता हूँ 
मैंने तुम्हारा मोल न समझा
सॉरी ज़िंदगी।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 1 मई 2020

हास्य कविता - टहलू इंसान



र कोई इंसान भला 
घर में कहाँ बहलता है
इसलिए विवश हो वह
घर से बाहर जा टहलता है
घर में वह रुक जाए 
ये भी भला कोई बात है
उसकी तो एक अलग ही 
टहलू नाम की जमात है
बेशक कैसी भी रोक हो
कोई भी सरकारी टोक हो
वह इंसान हर रोक-टोक को
बड़ी बेदर्दी से नकार देगा
जब तक आप उसे टोकेंगे
वह पार्क का एक चक्कर काट लेगा
जब अकेले टहलने से  
वह बहुत ऊब जाएगा
तब टहलू जमात के साथ
वह गप्प में डूब जाएगा
जब रंगे हाथों वह पकड़ा जाएगा
तो झट से ढेरों बहाने बनाएगा
मैं तो आया था माँ की दवाई लेने
या फिर बच्चे की जिद पर मिठाई लेने
पत्नी के आदेश से रौशनाई लेने 
या फिर ओढ़ने को नई रजाई लेने 
उसका कोई न कोई बहाना
आखिर काम कर ही जाएगा 
और पकड़े जाने से वह
बाल-बाल बच जाएगा
यूँ बच जाने पर वह 
खुशी के मारे ऊल जाएगा
और कुछ देर बाद टहलने को 
फिर किसी पार्क में कूद जाएगा।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह



सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

कविता : सच्ची दिवाली


इस दिवाली दिये जलाना
देश की सौंधी माटी के 
भूल के भी तुम मत लाना
लड़ियाँ-बल्ब चीन घाती के

अपना पैसा अपने घर में
हमें छिपा के रखना है
लघु उद्योगों की सांसों को 
हमें बचा के रखना है

लड़ी-बल्बों से कीट-पतंगे
घर के भीतर बढ़ते हैं
दिये जलाना घी के तुम 
बीमारी को ये हरते हैं

चीनी बल्बों से भारत की 
अर्थव्यवस्था टिमटिम करती है
देशी दिये अपना के देखो
कैसे ये सरपट भगती है

मँहगे मॉलों में जा-जाकर
पैसा न व्यर्थ लुटाना तुम
देसी बनिये से कर खरीदारी 
उसका आस्तित्व बचाना तुम

तब ही मनेगी देश में अपने
अच्छी और सच्ची दिवाली
अर्थव्यवस्था झूमेगी खुश हो
और फैलेगी देश में खुशहाली।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 

सोमवार, 26 अगस्त 2019

कविता - नन्हा फरिश्ता


मेरे घर में आया है 
एक नन्हा-मुन्ना फरिश्ता
उसके मासूम चेहरे से 
बस प्यार ही प्यार टपकता

पूरे घर में घूमा करता 
खूब वो धूम मचा के 
उससे रखना पड़ता है
घर का सामान बचा के
मंद-मंद मुस्कुरा के वो 
जब प्यार से देखा करता
तो उसके खिले चेहरे पर
दिल जाकर ये अटकता 

मायूसी को कर दिया विदा
अब खुशी ही घर में हँसती है
उस नन्हे-मुन्ने फरिश्ते में
जान सभी की बसती है
जब पापा-पापा कहके 
वो सीने से आ चिपटता
तो पापा के दिल में फिर
स्नेह का भँवर उमड़ता।

शुक्रवार, 24 मई 2019

कविता - घर


घर तब घर बनता है
जब माँ-बाप की
स्नेहिल छाया इसमें
प्रसन्न हो रहती हो
घर तब घर बनता है
जब पति-पत्नी का
विश्वास और समर्पण
एक-दूजे की बाहों में
बड़े प्रेम से रहते हों
घर तब घर बनता है
जब भाई-बहन का
स्नेह-प्रेम दृढ़ता से
इसमें टहला करता है
घर तब घर बनता है
जब संतान के हृदय में
बड़ों के आदर संग जिम्मेवारी
गहराई से बसती हो
ये सब न हों तो
घर, घर न होकर
केवल मकान ही रहता है
जिसको सदैव
प्रतीक्षा रहती  है कि
आदर, विश्वास, समर्पण
स्नेह, प्रेम और जिम्मेवारी
उससे आकर मिलें कभी
और वो मकान का चोगा तज
एक प्यारा सा घर हो जाये।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

स्मार्ट आदमी


हमें नहीं मतलब
अपने आसपास कुछ भी 
घटित होने से 
किसी के जीने-मरने 
हँसने या रोने से 
न ही हमें 
ये जानने की है इच्छा कि
प्रकृति की सुंदरता का 
वध करके कैसे रोज
उग रहे हैं कंक्रीट के
नए-नए जंगल 
और भला कैसे 
प्राकृतिक संसाधनों का
गला घोंट कर 
उगाई जा रही है
विनाश की लहलहाती फसल
हमें नहीं पड़ता फर्क कि
प्रगति की आग का धुआँ
प्रदूषण का भेष धर
फूँके जा रहा है 
मानव सभ्यता के कलेजे को 
हम वास्तव में नहीं हैं
बिलकुल भी चिंतित
ऐसी-वैसी फालतू की
किसी भी बात पर 
क्योंकि हमें भली-भांति 
भान है इस तथ्य का कि
स्मार्ट फोन की संगत में
दरअसल हमारी तरह 
अब हर आदमी
स्मार्ट हो गया है।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 2 दिसंबर 2018

नन्हे कदम


नन्हे कदम पड़ें जो घर में
खुशहाली आ जाती है
रौनक सी घर में रहती है
नव ऊर्जा इसमें समाती है

बालक का रोना-धोना भी
मन-मस्तिष्क को सुख देता है
छोटे-मोटे कष्टों को तो
ये सुख यूँ ही हर लेता है
हृदय में हिलोरें उठती हैं
खुशी से फूलती छाती है

बेफिक्री कर जाती है कट्टी
जिम्मेदारी गले आ मिलती है
भावी जीवन की योजनाओं में  
तन-मन की चक्की पिलती है
स्वप्न देख उन्हें सच करने को
मन की भावनाएं इठलाती हैं
लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

सोमवार, 16 जुलाई 2018

कविता - कविता का स्वामित्व

 
ये कविता है मेरी भगवान कसम
पर तू कहता है तेरी भगवान कसम
तो सुन ये कविता है केवल उसकी
जिसके ज्यादा चेरा-चेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

तूने कच्चा माल बनाया
मैंने उसे मस्तिष्क में पकाया
और गढ़ा अपने तरीके से
फिर उसको मंच-मंच घुमाया
कविता के मंच पे चलती है
इतनी तो हेराफेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

कविताबाजी ही अपना धंधा है
माना इसमें होता थोड़ा पंगा है
तुझको अपना कह सुना दिया
भला इसमें क्या गोरखधंधा है
बस इतने में ही स्वर्ग सिधारी
दादी-नानी तेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

चल गलती हुई तो फौरी सुन
मेरी भीमकाय सी सॉरी सुन
फिर भी नहीं मानता तो जा
जाके माँ शारदे की लोरी सुन 
कविता के मंच पे चलने की 
नहीं औकात तेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

शनिवार, 26 मई 2018

कविता - बोर्ड परीक्षा का खौफ


बोर्ड परीक्षा थी सर पर 
और हृदय काँपता रहता था 
अब क्या होगा 
तब क्या होगा 
यही जपता रहता था 
मन में भरकर हर्ष 
खेले पूरे वर्ष 
अब कुछ दिन में 
क्या कर पायेंगे 
यदि हुआ कुछ गड़बड़ घोटाला
हम तो लज्जा से नहायेंगे 
खौफनाक था बोर्ड का साया 
डरता था मन और कांपती काया 
कक्षा दस में हाल हुआ जो 
याद अचानक ही आया 
विज्ञान लेने की इच्छा थी 
पर कला विषय ही मिल पाया 
पुस्तक में रहतीं आँखें चिपकीं 
फ्यूचर लगने लगा था रिस्की 
विषयों को दिल से रटना था 
अच्छे काॅलेज का सपना था 
होना चाहते थे सफल 
सो सोते हुए भी करते थे प्रश्न हल 
मेहनत थी अपनी भरपूर 
बोर्ड परीक्षा अब नहीं थी दूर 
हर पेपर जाने लगा अच्छा 
मन में था संतोष सच्चा 
आया जब परिणाम 
छलका खुशी का जाम 
क्लास में किया था टाॅप 
भला हो बोर्ड परीक्षा का खौफ।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 8 मार्च 2018

कविता : धरती की परमेश्वर


जब भी बाहर मैं 
किसी स्त्री को देखता हूँ
तो उसे देखकर मैं
ठंडी आहें नहीं भरता
सीटी बजाकर या 
गंदे और फूहड़ इशारे कर
उसे लुभाने की बेकार और
घटिया कोशिश नहीं करता
उसपर अश्लील फब्तियां कसकर
उसकी गरिमा तार-तार नहीं करता
दूषित मन के साथ उसके घर तक
उसका पीछा नहीं करता
और मैं ऐसा कोई भी 
काम नहीं करता
जिससे किसी स्त्री को 
थोड़ी देर के लिए भी 
ये पछतावा हो कि 
उसने स्त्री रूप में 
इस सड़कछाप संसार में
आखिर जन्म क्यों लिया
हाँ जब भी मैं 
किसी स्त्री को देखता हूँ तो
उसे देखकर मैं 
नतमस्तक हो आभार जताता हूँ
उस परमपिता परमेश्वर का
जिसने जग की इस अनमोल
और पवित्र कृति का सृजन किया
जिसकी पावन कोख से 
मानव सभ्यता का सृजन हुआ
और जिसने माँ, बहिन, पत्नी 
और बेटी का रूप धर 
इस जग को प्रेम, वात्सल्य, सौंदर्य
और प्रसन्नता से भर दिया
और मैं पूरी श्रद्धा के साथ 
धरती की इस परमेश्वर के आगे 
नतमस्तक हो जाता हूँ।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार


सोमवार, 13 नवंबर 2017

कविता : दस रूपयों का आसरा


आज शाम को बाज़ार से 
मैं एक भुना मुर्गा लाया
उसमें स्वाद बढ़ाने को 
मैंने नमक-मिर्च लगाया
फिर छोटे-छोटे टुकड़ों में 
उसको मैंने तोड़ा
उसपर धीमे-धीमे 
नींबू एक निचोड़ा
फिर उसको फुरसत से
चबा-चबाके खाया
सच कहूँ तो मुर्गे का 
मैंने जमके लुत्फ़ उठाया
खाकर मुर्गा ली डकार
और होंठों पर जीभ को फेरा
तभी मेरे भीतर से
किसी ने मुझको टेरा
फिर उसने मुझको
जी भरके धिक्कारा
एक पल में पापी बन
घबराया मैं बेचारा
दूजे पल ही में
अंतर्मन मेरा जागा
और गली की दुकान में
गया मैं भागा-भागा
वहाँ से झट से खरीद लिया
दस रुपये का बाजरा
तीन सौ के मुक़ाबले
अब दस रुपयों का था आसरा
फिर मैं दौड़-भागके 
बगल के पार्क में आया
वहाँ बैठके नीचे मैंने
एक जगह बाजरा फैलाया
थोड़ी देर में उस जगह
गिलहरी-कबूतर आये
चुन-चुन खाया बाजरा उन्होंने
और खाकर वो हर्षाये
यूँ हुआ दूर अपराधबोध मेरा
जिसने अब तक था जकड़ा 
फिर मैं फुरसत में लगा सोचने
कल मुर्गा खाऊँ या बकरा?

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट


पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
थाना-चौकी की चारदीवारी
बैरक की खटमल से भरी खाटों
चिट्ठा-रोजनामचे के बंधन और
केस फ़ाइलों के बोझ से दूर
सुकून भरा एक खास दिन

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
बीबी की नशीली नज़रों में खोने
बच्चों की प्रेमभरी आँखों में झाँकने और
माँ-बाप की उम्मीद भरी निगाहों पर
खरा उतरने एक और सुनहरा अवसर

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
घर की साफ-सफाई करने
बाज़ार से सब्जी-फल लाने
बूढ़े माँ-बाप की दवाई खरीदने और
अनेकों छोटे-बड़े कामों को
निपटाने की एक छोटी सी कोशिश

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
भूले-बिसरे दोस्तों को याद करने
उनके संग कुछ पल बिताते हुये
बीते हुये मस्ती भरे पुराने दिनों को
याद करने का एक हसीन मौका

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
अपनी अधूरी पड़ी योजनाओं को पूरा कर
भविष्य के लिये कुछ नई योजनाओं को बुनने
और उनको साकार करने के लिये
जी-जान से जुट जाने का दिवस

पुलिसवाले का ड्यूटी रेस्ट होता है
दिन भर की भागदौड़ के बाद
एक पूरी रात जी-भरके आराम कर
थकान मिटाने के बाद
फिर से अपने कर्तव्य पर
निकल पड़ने का जज्बा।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

* चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कविता : घर में बुजुर्ग होने का अर्थ


('अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस' पर विशेष कविता)

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
जीवन की एक विशेष पाठशाला का होना
जिसमें मिल सकते हैं हमको
नित्य नए-नए सबक

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
तजुर्बों को अपने मस्तिष्क में संजोए हुए
एक तजुर्बेकार व्यक्तित्व की उपस्थिति
जो सिखा सकता है हमें
गलत और सही में सच्चा फर्क

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपनी जिम्मेवारियों को
बखूबी निभा लेने के बाद भी
जिम्मेवारियों का बोझ उठाए हुए
एक बहुत ही खास शख्सियत

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपने हृदय में
स्नेह का सागर भरे हुए
एक प्यारी सी मानव कृति

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
हमारे परिवार के चारों ओर
एक मजबूत चारदीवारी का होना
जो करती है सुरक्षा
हर असंभावित खतरे से

इसलिए बुजुर्ग आदणीय हैं, वंदनीय हैं
और हमारे घर के अभिन्न अंग हैं
यदि बुजुर्गों का आशीष हमारे संग है
तो फिर इस जीवन में उमंग ही उमंग है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

कविता : राम जाने

 एक विश्वविद्यालय में 
रावण के वंशजों ने 
राम के वंशज का 
पुतला जलाया
और जोर-जोर से
हो-हल्ला मचाया
देखो-देखो हमने
रावण को जलाया 
ये देख रावण ने
अपना सिर खुजाया
और उनकी मूर्खता पर 
मंद-मंद मुस्कुराया 
फिर अपने वंशजों से
हँसते हुए बोला 
बेटा राम से 
लिया था मैंने पंगा तो 
उन्होंने मुझको 
लगा दिया था ठिकाने 
अब तुमने उसके 
वंशज को छेड़ा है 
अब तुम्हारा क्या होगा
ये तो राम ही जाने।
 लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


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