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सोमवार, 7 जून 2021

दोषी नहीं थे सम्राट पृथ्वीराज चौहान


     तिहास में चर्चित क्षत्रिय वंशों में एक चौहान वंश के शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय, जिनकी उपाधि रायपिथौरा थी तथा जिनका शासनकाल सन 1178 ईसवी से 1192 ईसवी था, हिंदुओं के सर्वाधिक चर्चित शासकों में से एक हैं। सम्राट पृथ्वीराज के पिता राजा सोमेश्वर चौहान थे। अपने पिता की मृत्यु के समय वह लगभग 11 वर्ष के थे तथा नाबालिग होने के कारण अपनी माँ के साथ राजगद्दी पर आसीन हुए थे। उन्होंने वर्तमान उत्तर-पश्चिमी भारत पर शासन किया। उनका वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों पर भी नियंत्रण था। उनके राज्य की राजधानी अजयमेरु, जिसे आधुनिक समय में अजमेर कहा जाता है, में स्थित थी। हालाँकि मध्ययुगीन लोक किंवदंतियों ने उन्हें भारत के राजनीतिक केंद्र दिल्ली के राजा के रूप में वर्णित किया है, जो उन्हें पूर्व-इस्लामी भारतीय शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित करते हैं।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान को उनके पराक्रम एवं वीरता के लिए स्मरण किए जाने के साथ-साथ इस बात की भी चर्चा की जाती है, कि यदि उन्होंने अपने चिर-परिचित शत्रु शहाब-उद-दीन मुहम्मद गौरी को युद्ध में पराजित करने के पश्चात् क्षमादान नहीं दिया होता, तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता। रायपिथौरा के राजपूत समाज में भी उनके द्वारा मुहम्मद गौरी को दिए गए क्षमादान के लिए उनकी दबे मुँह आलोचना की जाती है। बेशक उनकी कितनी भी आलोचना की जाए अथवा उन्हें भारत में मुस्लिम साम्राज्य की  स्थापना का दोषी माना जाएलेकिन इसमें उनका कोई दोष नहीं था।

इस बात को समझने के लिए हमें मध्यकाल की वैश्विक परिस्थितयों का गंभीरता से अध्ययन करना पड़ेगा अरब की भूमि पर इस्लाम धर्म के उदय होने के पश्चात् पूरे विश्व में इस्लाम की पताका फहराने के लिए क्रूर अरबी-तुर्की मुस्लिम हमलावरों की रक्त की प्यासी तलवार विश्व के किसी न किसी राज्य पर आक्रमण कर वहाँ रक्तपात, लूटमार व बलात्कार जैसे कुकर्म करके अपना नाम इतिहास के काले अक्षरों में लिखवा रही थी विधर्मियों से युद्ध में जीतने के लिए विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी हर उल्टे से उल्टा व गलत से गलत तरीका अपनाने में कोई संकोच नहीं करते थे उनका उद्देश्य किसी भी तरह से युद्ध जीतकर विधर्मियों का नाश करना अथवा उन्हें उनके धर्म को तिलांजलि दिलवा कर इस्लाम धर्म में धर्मान्तरित करना होता था जिस समय भारत की पश्चिमोत्तर सीमा इस्लामी आक्रमण को झेल रही थी, उस समय भारत में राजपूत युग चल रहा था भारत के इतिहास में सन 648 ईसवी से सन 1206 ईसवी  तक के समय को 'राजपूत युगकी संज्ञा दी गयी है। इस युग का आरंभ 648 ईसवी में सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु से हुआ तथा इसकी समाप्ति 1206 ईसवी में भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना से हुई। राजपूत शासक मुस्लिम आक्रान्ताओं से चारित्रिक रूप में अतिश्रेष्ठ थे। राजपूत शासकों में कुछ ऐसे विशिष्ट गुण थेजिनके कारण उनकी प्रजा उन्हें आदर की दृष्टि से देखा करती थी। एक राजपूत योद्धा अपने वचन का पक्का होता था और वह किसी के साथ विश्वाघात नहीं करता था। वह युद्ध क्षेत्र में अपने शत्रु को पीठ नहीं दिखाता था। वह रणभूमि में वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त करना पसंद करता था। राजपूत योद्धा निशस्त्र शत्रु पर प्रहार करना महापाप और शरणागत की रक्षा करना परम धर्म समझता था।

राजपूत योद्धाओं के गुणों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टॉड ने लिखा है, "यह स्वीकार करना पड़ेगा, कि राजपूतों में साहसदेशभक्तिस्वामिभक्तिआत्म-सम्मानअतिथि संस्कार तथा सरलता के गुण विद्यमान थे।“ डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है, "राजपूत में आत्म-सम्मान की भावना उच्च कोटि की होती थी। वह सत्य को बड़े आदर की दृष्टि से देखता था। वह  अपने शत्रुओं के प्रति भी उदार था और विजयी हो जाने पर उस प्रकार की बर्बरता नहीं करता थाजिसका किया जाना मुस्लिम विजय के फलस्वरूप अवश्यम्भावी था। वह युद्ध में कभी बेईमानी या विश्वाघात नहीं करता था और गरीब तथा निरपराध व्यक्तियों को कभी क्षति नहीं पहुंचाता था।“

इसके विपरीत विदेशी मुस्लिम आक्रांता बहुत ही क्रूर, बर्बर एवं अत्याचारी थे। वे युद्ध के दौरान व युद्ध के उपरांत निर्दयता व नीचता की सारी हदों को पार कर जाते थे। युद्ध के बाद पकड़े गए युद्धबंदियों को इस्लाम में धर्मांतरित होने के लिए विवश करना, इस्लाम को अपनाने से मना करने पर उनकी निर्दयतापूर्वक हत्या कर देना, उनके सिरों को काट कर उनकी मीनार बनवाना, स्त्रियों का सामूहिक बलात्कार करना, बच्चों व स्त्रियों को गुलाम बनाकर मुस्लिम सैनिकों को ईनाम स्वरुप बाँट देना अथवा विदेशी मंडियों में ले जाकर कौड़ी के भाव बेच देना उनके प्रिय कर्म थे। युद्ध के समय मुस्लिम शासक अपने सैनिकों में धार्मिक उत्साह भरते हुए युद्ध में उनके मारे जाने पर उन्हें इस्लाम के लिए शहीद होने का दर्जा दिए जाने व जन्नत मिलने तथा जन्नत में 72 हूरों के पाने का एवं युद्ध में जीते जाने पर ढेर सारा धन व अनेकों सुख-सुविधाओं के दिए जाने का लालच दिया करते थे, जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम सैनिक युद्ध में मर-मिटने के लिए तैयार हो जाते थे। एक प्रकार से हम कह सकते हैं, कि जिस समय अरबी-तुर्की मुस्लिम आक्रांता युद्ध जीतने के लिए हर प्रकार का निकृष्ट से निकृष्ट उपाय आजमा रहे थे, उस समय राजपूत शासक अपने आदर्शवादी नियमों के संग अपने शत्रुओं से युद्धभूमि में जूझ रहे थे।

अब सम्राट पृथ्वीराज चौहान के भारत में मुस्लिम सामाज्य की स्थापना के लिए दोषी मानने की बात की जाए,  तो इसमें उनका बिलकुल भी दोष नहीं था। अपनी शरण में आए शरणागत को शरण देना तथा युद्ध में हारे हुए शत्रु को क्षमा प्रदान करना राजपूतों की प्रवृत्ति में सम्मिलित है। सम्राट पृथ्वीराज ने तो केवल अपनी जातीय प्रवृत्ति के अनुसार कर्म करते हुए अपने पराजित शत्रु मुहम्मद गौरी को बार-बार क्षमा प्रदान की। इसी बात का लाभ उठाकर मुहम्मद गौरी ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान के साथ हुए युद्धों में कई बार असफलता मिलने के बावजूद बार-बार उनके राज्य पर आक्रमण किए और अंततः 1192 ईसवी में हुए तराइन के निर्णायक युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत देश की पावन भूमि को बर्बर विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने अपने खूनी शिकंजे में कस कर अपवित्र करना आरंभ कर दिया।

चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

...तो ये मुल्क़ बंट जाएगा


   न राजपूत किसी पंडित, जाट या गूजर को गाली देता है न पंडित, जाट अथवा गूजर किसी राजपूत को गाली देता है। न सवर्ण किसी दलित को गाली देता है और न दलित किसी सवर्ण को गाली देता है। परोक्ष और अपरोक्ष युद्ध में मुँह की खाने के बाद पड़ोसी दुश्मन देश ने अब सोशल मीडिया के माध्यम से भारत से युद्ध के लिए कमर कसी है और अपने कथित वीर सिपाहियों को हमारे देश के भाईचारे को खंडित करने के लिए सोशल मीडिया पर तैनात कर दिया है। ये कथित वीर सिपाही स्वयं को किसी न किसी जाति के नेता व हितेषी घोषित कर दूसरी जातियों के बारे में घृणित व अपमानजनक शब्द लिखकर हमारे आपसी सद्भाव को नष्ट करने की कोशिश में जी-जान से लगातार जुटे हुए हैं। कम पढ़े-लिखे व अल्पबुद्धि के लोग उनके प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं और उनकी कठपुतली बनकर अपने जाति बंधुओं के बीच इस घृणा को फैलाने में माध्यम बनने का कार्य करते हैं। विभिन्न जातियों के देवताओं व महापुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए लेख व चित्र सोशल मीडिया पर डालकर जातियों को आपस में उलझाने की निरंतर साजिश रची जा रही है। इस साजिश के परिणामस्वरूप लोग एक-दूसरे के जानी दुश्मन तक बनते जा रहे हैं और ये लोग भावनाओं में अंधे होकर हत्या तक करने से नहीं चूक रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुश्मन देश अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब होता दिख रहा है। इससे पहले कि  जातियों के बीच आपसी वैमनस्यता इतनी अधिक बढ़ जाए कि अपने देश में गृह युध्द की नौबत आ जाए और ये देश खंडित होने के कगार पर पहुँच जाए हम देशवासियों को जागना होगा। सोशल मीडिया पर जो भी व्यक्ति किसी जाति के देवता अथवा महापुरुष के विषय में कोई अभद्र टिप्पणी, लेख अथवा चित्र पोस्ट करे तो उसके बारे में सोशल मीडिया के उस प्लेटफार्म के प्रबंधन समूह को सूचना देकर आपत्ति दर्ज करवाई जाए। यदि ऐसा घृणित कार्य करनेवाला आपके आस-पास ही रहता है तो इस संबंध में निकटवर्ती थाने में लिखित शिकायत दी जाए। यदि आप उससे अपरिचित हैं तो साइबर क्राइम सेल को ई मेल द्वारा इसकी शिकायत भेजी जाए। आपका कोई मित्र घृणा फैलानेवाले ऐसे किसी संदेश को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उसे प्रेमपूर्वक समझाया जाए। यदि वह आपकी बात नहीं मानता है तो उसे अपनी मित्र मंडली से तड़ीपार कर अपने मित्र समूह को इस संबंध में पोस्ट के माध्यम से बाकायदा सूचित करते हुए जानकारी दी जाए। सोशल मीडिया को निरंतर प्रयोग में लानेवाले अपने मित्रों व संबधियों को दुश्मन देश के षड़यंत्र के बारे में बताया जाए।
ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे प्रयासों से हम अपने प्यारे देश भारत की अखंडता व संप्रभुता की रक्षा कर सकते हैं। इस बात को हम हमेशा याद रखें कि हर जाति के लिए उसके देवता व महापुरुष आदरणीय और वंदनीय हैं और हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम उनके देवताओं अथवा महापुरुषों के विषय में कुछ भी उल-जलूल लिखकर या फिर इस तरह की बातों को शेयर करके उनकी भावनाओं को ठेस पहुचाएं।

नफरत का ये नाग 
चैन-ओ-अमन को डस जाएगा
तू अब भी न जागा 
तो ये मुल्क़ बंट जाएगा।

याद रखिए यदि हमने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो ये अपना देश कई टुकड़ों में बंट जाएगा और कोई भी देशप्रेमी कभी भी  नहीं चाहेगा कि इस देश का कोई भी हिस्सा इससे अलग हो।
जय हिंद!
वंदे मातरम!
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

क्या दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई हैं


   कुछ साल पहले दिल्ली में रोजी-रोटी की खातिर बसने आये या फिर सालों से दिल्ली में निवास करने के बावजूद दिल्ली को अपना नहीं माननेवाले लोगों से अक्सर बिन माँगी राय मिलती जाती है कि दिल्ली की लड़कियों का चरित्र ठीक नहीं होता अर्थात वो बिगड़ी हुई होती हैं। इन तथाकथित रायवीरों को यह बताना जरूरी है कि दिलवालों के शहर दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैं। दिल्ली ही क्यों लड़कियाँ किसी भी शहर या कसबे या फिर गाँव की बिगड़ी हुई नहीं होतीं। अब चूँकि बात दिल्ली की लड़कियों की हो रही है तो दिल्ली शहर में हर देशहर प्रान्त एवं हर जाति और सम्प्रदाय के लोग पाए जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दिल्ली शहर में एक लघु भारत बसता है। इस लघु भारत में रहते-रहते यहाँ के निवासी खुले दिल के स्वामी हो जाते हैं तथा किसी भी कार्य को पूर्णता प्रदान करने में औरों से अधिक सिद्धहस्त भी होते हैं और उनके शब्दकोश से भेदभाव और असंभव शब्द धीमे-धीमे मिट जाते हैं। किसी के साथ दो पल हँसकर बात करने को बिगड़ा हुआ होना कहा जाए तो शायद दिल्ली का हर निवासी बिगड़ा हुआ है। अन्य शहरों की भाँति दिल्ली की लड़कियों का भी एक परिवार होता है जिसमें सभ्यता एवं संस्कृति वास करती हैं। यहाँ की लड़कियाँ भी अपने परिवार के सम्मान की परवाह करती हैं और मर्यादा का पालन करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर होती हैं। जिन लड़कियों को देखकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ेपन का तमगा प्रदान किया जाता है असल में वो उन लड़कियों का 10-12 प्रतिशत होता है जो विभिन्न शहरों या कसबों से दिल्ली में शिक्षा प्राप्त करने या नौकरी करने के उद्देश्य से आती हैं और अपने माँ-बाप के विश्वास का राम नाम सत्य करके यहाँ स्वच्छंदता की सारी हदें पार कर डालती हैं और उन्हीं लड़कियों को दिल्ली की लड़कियों का प्रतिनिधि मानकर दिल्ली की लड़कियों को बिगड़ा घोषित कर दिया जाता है। इसलिए यदि कभी कोई आपसे कहे कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी होती हैं तो उससे कहिएगा कि दिल्ली की लड़कियाँ बिगड़ी हुई नहीं हैंबल्कि ऐसा सोचनेवाले उस व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही बिगड़ा हुआ है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
www.sumitpratapsingh.com

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