रविवार, 28 जनवरी 2018

व्यंग्य : भांडगीरी चालू आहे


- भाई नफे!

- हाँ बोल भाई जिले!

- ये टकटकी लगाकर इतनी देर से क्या देख रहा है?

- भाई भारतीय संस्कृति की जलती हुई चिता को देख रहा हूँ।

- भला वो कौन दुष्ट है जिसने भारतीय संस्कृति की चिता को जलाने का दुस्साहस किया?

- भाई मध्यकाल में ये काम तुर्की और मुग़ल आतताइयों ने किया, आधुनिक काल में ये काम अंग्रेजों ने संभाला और देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद अंग्रेजों की अवैध संतानों और मार्क्स के वामपंथी सपूतों ने इस जिम्मेवारी को बखूबी निभाया और इन दिनों फ़िल्मी भांड और उनके टुकड़ों पर पलनेवाले मीडिया समूह व कथित बुद्धिजीवी इस कार्य को बखूबी से अंजाम दे रहे हैं।

- भाई इसमें कुछ न कुछ कमी तो हमारी भी होगी।

- हाँ बिलकुल कमी है। हम सबने ने ही इन्हें पाल-पोसकर इस लायक बनने में सहायता की कि ये हमारी सनातन संस्कृति धूमिल करने का दुस्साहस करने लगे और उन्हें संरक्षण देने के लिए हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों और बिकाऊ मीडिया ने कमान संभाल ली।

- भाई जहाँ तक मैंने जो थोड़ा-बहुत इतिहास पढ़ा है उसमें बताया है कि भारत पर हमला करनेवाली लुटेरे मुहम्मद गौरी की सेना में एक टुकड़ी हिंदुओं की भी थी जिसका नेतृत्व तिलक नामक हिंदू सेनापति किया था।

- बिलकुल सही पढ़ा है और ये हिंदू होकर भी हिंदुओं की परम्पराओं और संस्कृति का अंध विरोध करनेवाले व्यक्तियों के पुरखे शायद तिलक और उसके सैनिक ही रहे होंगे।

- हा हा हा भाई वैसे तेरी बात में दम है। अच्छा भाई मेरे एक प्रश्न का उत्तर देगा?

- हाँ पूछ!

- ये फ़िल्मी भांड की परिभाषा क्या है?

- भांड से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो चंद रुपयों के लिए अपने मान-सम्मान को खूँटी पर टांगकर दूसरों का मनोरंजन कर उन्हें खुश करता है। फ़िल्मी भांड उसका विकसित रूप है। फ़िल्मी भांड धन की खातिर अपनी माँ-बहन और बेटियों को भी फ़िल्मी पर्दे पर दर्शकों के सामने उनका मनोरंजन करते हुए उन्हें खुश करने के लिए नंगा नचवाने का भी जिगर रखते हैं। फिर औरों के परिवार की स्त्रियों के मान-सम्मान की इनसे भला उम्मीद ही कैसे कर सकते हैं?

- हा हा हा भाई क्या जिगर पाया है फ़िल्मी भांडों ने। भाई मतलब ये है कि आत्म-सम्मान और फ़िल्मी भांड उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की माफिक हैं जिनका कभी भी मिलन नहीं हो सकता।

- और इन फ़िल्मी भांडों को संरक्षण देने के लिए न्यायालय, सरकार, कथित बुद्धिजीवी गैंग और मीडिया विशेष रूप से उत्सुक और लालायित रहते हैं।

- भाई इन्हें सुधारने का तरीका क्या है?

- तरीका सिर्फ एक है। जब तक हमारे हिंदू समाज के लोग जाति-पाति का भेद छोड़ इस बात पर मिलकर विचार नहीं करेंगे कि आज यदि किसी जाति के महापुरुष का फ़िल्मी भांडों द्वारा मानमर्दन करने पर बाकी जातियों के बंधु शांत रहे या फिर उन्होंने इस उपहास का विषय बनाया तो अगला नंबर उनकी जाति के महापुरुष अथवा सम्मानीय व्यक्ति का भी आ सकता है। इसलिए आपसी एकता समय की मांग है।

- भाई फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा?

- भाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस बात की अनुमति नहीं देती कि किसी जाति, समुदाय अथवा धर्म के प्रतीकों, परंपराओं व महापुरुषों का अपमान किया जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब किधर चली जाती है जब पुस्तक के माध्यम से अपने धर्म की कुरीतियों को दुनिया के सामने लानेवाली पड़ोसी देश की एक लेखिका को अपने देश में रहने अथवा कोई भी कार्यक्रम करने को मना किया जाता है? या फिर हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म पर कुछ लिखने या फिर कुछ दर्शित करने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जाने कहाँ लापता हो जाती है?

- उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लघुशंका व दीर्घशंका के माध्यम से इनके पतलून अथवा पायजामे में लीन हो जाती है।

- हा हा हा अब आया न लाइन पर।

- वैसे भाई इस भांडगीरी के बंद होने के आसार हैं या फिर ये यूँ ही चलती रहेगी।

- अभी हिंदू समाज ने हल्की-हल्की पलकें खोलीं हैं। जब हिंदू समाज की आँखें पूर्ण रूप से खुल जायेंगीं तब न तो फ़िल्मी भांड रहेंगे और न उनकी भांडगीरी। तब तक ये भांडगीरी चालू आहे।

- आता माझी सटकली। अब लगता है कि इस भांडगीरी को बंद करने के लिए हम सभी को जागना ही पड़ेगा।

- जागोगे तो ही सवेरा होगा। वरना ये अंधकार गहराता ही जाएगा।

- भाई ये अंधकार छंटेगा और उसके बाद होनेवाले उजियारे से भारतीय संस्कृति के बैरियों की आँखे चुंधिया जायेगी।

- मेरी भी ईश्वर से कामना है कि काश ऐसा ही हो।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली


शनिवार, 23 दिसंबर 2017

व्यंग्य : शकी नफे का यकीनी शक


- भाई नफे!

- हाँ बोल भाई जिले!

- आज कैसे शकी अंदाज में बैठा हुआ है?

- अरे नहीं भाई ऐसा कुछ नहीं है। तू बिना बात में शक कर रहा है।

- शक नहीं है बल्कि यकीन के साथ कह रहा हूँ कुछ न कुछ बात है जिसे तू छिपा रहा है।

- भाई कोई खास बात नहीं है।

- तो जो भी बात है उसे कह डाल।

- भाई दरअसल आज मैं नेहरू प्लेस गया था। वहाँ पेन ड्राइव और मोबाइल पावर बैंक लेने के बाद जीभ में पानी आया तो मोमो खाने लगा। वहीं एक बूढ़ी अम्मा मोमो की दुकान पर खड़े मोमो प्रेमियों से रुपये माँगने लगीं।

- तो तूने उन्हें रुपये दिए?

- बिलकुल नहीं दिए। मैं भिक्षावृत्ति के सख्त खिलाफ हूँ।

- तूने बिलकुल ठीक किया। ये भिखारी लोग भीख के सहारे जीने के आदी हो गए हैं। विदेशी पर्यटकों के आगे तो ये हमारी ऐसी बेइज्जती कराते हैं कि पूछ मत। इन्हें देखकर विदेशी भी शक करने लगते हैं कि कहीं भारत इनका ही तो देश नहीं है।

- हाँ भाई ये बात तो है। पर तुझे नहीं लगता कि इसमें हम भारतीयों की भी गलती है।

- वो कैसे?

- कोई भी भिखारी भीख माँगने पास नहीं कि हम दानवीर कर्ण की भूमिका में आकर बिना ये जाने कि वाकई में वो इंसान जरूरतमंद है भी कि नहीं उसे भीख के रूप में रुपया-पैसा अर्पण कर डालते हैं।

- ठीक कहा भाई! और इसी कारण कामचोर और निठल्ले लोगों के लिए भीख माँगने का धंधा सबसे आसान और उपयुक्त लगता है। अब तो बाकायदा भीख माँगने वाले गिरोह सक्रिय हैं जो छोटे-छोटे बच्चों से जबरन भीख मँगवाते हैं।

- हाँ भाई और ये सब जानते हुए लोग उन भिखारियों को भीख देकर कथित पुण्य की प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं। खैर छोड़ अब तू ये बता कि आगे क्या हुआ?

- मैंने उन बूढ़ी अम्मा से पूछा कि उन्हें रुपये किसलिए चाहिये तो वो बोलीं कि उन्हें भूख लगी है।

- फिर तूने क्या किया?

- मैंने उनसे कहा कि मैं उन्हें भोजन करवाऊंगा पर रुपये नहीं दूँगा।

- तो अम्मा इस बात पर राजी हुयीं?

- पहले तो वो रुपये देने के लिए ही मिन्नत करती रहीं, फिर थक-हारकर भोजन करने को राजी हो गयीं।

- अच्छा फिर तूने उन्हें क्या खिलाया?

- मैं एक दुकान से फ्राइड राइस लेकर आया और उनको खाने के लिए दिए।

- और फिर अम्मा ने फ्राइड राइस से अपने भूखे पेट को भरा।

- नहीं अम्मा ने उनको खाने से साफ इंकार कर दिया।

- वो क्यों भला?

- वो शक करते हुए कहने लगीं कि उनमें माँस मिला हुआ है और मैं उनका धर्म नष्ट करने पर तुला हुआ हूँ।

- ये तो  हद हो गयी। अम्मा तो बड़ी शकी निकलीं। पर तुझे समझाना तो था कि जैसा वो सोच  रही थीं वैसा कुछ नहीं था क्योंकि तू भी उस हिन्दू धर्म का अनुयायी है जो अन्य कथित धर्मों की भाँति किसी धर्म, पंथ अथवा संप्रदाय का अनादर अथवा उसकी भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करता।

- भाई समझाया और एक बार नहीं बल्कि कई बार समझाया, पर वो नहीं मानी।

- फिर फ्राइड राइस का क्या हुआ?

- फ्राइड राइस को वहीं भटक रहे एक गरीब बच्चे रफ़ीक़ ने चटखारे लेते हुए खाया।



- और अम्मा का क्या रहा?

- अम्मा मुझे कोसते हुए और मेरे शक को मजबूती प्रदान करते हुए आगे बढ़ गयीं।

- मैं कुछ समझा नहीं भाई।

- भाई बूढ़ी अम्मा ने खुद को भूख से तड़पती हुयी  दुखियारी महिला बताया था, जबकि मुझे शक था कि वो प्रोफेशनल भिखारिन हैं। और जब वो मुझे छोड़कर एक दूसरे व्यक्ति से रुपये देने के लिए गिड़गिड़ायीं तो मेरा शक यकीन में बदल गया।

- मतलब कि तेरा शक ठीक निकला। पर तेरे शक ने एक गरीब बच्चे को एक वक्त का भोजन नसीब करवा दिया।

- हाँ भाई और इस बहाने जाने-अनजाने मुझसे हुए मेरे पाप भी धुल गए।

- हा हा हा भाई तू भी पक्का शकी है। अब अपनी नेकनीयती पर भी शक करने लगा।

- क्या करूँ भाई आदत से मजबूर जो ठहरा।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...