शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

व्यंग्य : चिट्ठी आई है



    चिट्ठी आई है। किसी के घर में नहीं बल्कि मीडिया में आई है। किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा के महानायक ने इसे लिखा है। इसलिए ये चिट्ठी स्वतः ही चिट्ठियों की महानायिका बन गई और मीडिया ने इसे हाथों-हाथ ले लिया। इसमें वास्तविक जीवन में नाना-दादा का डबल रोल कर रहे महानायक की भावनाओं का समंदर भरा हुआ है। एक जमाना था जब नाना और दादा के रूप में बुजुर्गों को नाती-पोते निष्ठा और आदर से सुनते थे पर अब इतना समय नाती-पोतों के पास है ही कहाँ जो वो अपने खूसट नाना या दादा की फालतू बातें सुन सकें। और यहाँ तो खुद नाना/दादा ही महाव्यस्त हैं। हालाँकि महानायक अपने अति व्यस्त समय में से कुछ पल निकालकर अपनी नातिन व पोती को बिना चिट्ठी लिखे भी जीवन के फलसफे समझा सकते थे, लेकिन वो महानायक जो ठहरे। सो कोई भी कार्य करेंगे भी तो महानायकीय अंदाज में। इसलिए उन्होंने चिट्ठी लिखकर समझाने का फैसला किया। पर उन्होंने चिट्ठी लिखकर सीधे नातिन और पोती को क्यों नहीं दी? कहीं उन्हें ये अंदेशा तो नहीं था कि वो दोनों चिट्ठी का हवाई जहाज बनाकर हवा-हवाई न कर दें। सोचिए ऐसा होने से महानायक के दिल को कितनी ठेस पहुँचती? इसीलिए शायद उन्होंने ये रिस्क नहीं उठाया। वैसे भी बड़े और चर्चित व्यक्ति कोई कार्य करें और दुनिया को पता न चले तो धिक्कार है उनके बड़े और चर्चित होने पर। जैसे घर की मुर्गी दाल बराबर होती है वैसे ही ऐसा भी हो सकता था कि ‘घर की चिट्ठी बेकार पर्ची बराबर’ जैसा कोई नया मुहावरा ईजाद हो जाता और चिट्ठी अपनी बेकद्री पर आँसू बहाती रहती। इसलिए शायद चिट्ठी ने ही अपने रचयिता के सम्मान में ये फैसला लिया हो कि नातिन या पोती के पास जाने से पहले दुनिया की सैर कर ली जाए और अपने रचयिता के महानायकीय सम्मान में थोड़ी और वृद्धि कर ली जाए। इधर चिट्ठी घुमक्कड़ बन मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर घूमने-फिरने में मस्त है और उधर बेचारी नातिन और पोती पलकें बिछाए चिट्ठी के आने की राह तक रही हैं। महानायक भी सोच रहे हैं कि चिट्ठी को तब तक व्यस्त रहने दो जब तक कि इसे दुनिया की हर नातिन और पोती न पढ़ ले। अपनी नातिन और पोती का क्या है उनके लिए कोई दूसरी चिट्ठी लिख दी जाएगी। पर क्या वास्तव में नातिन और पोती उस चिट्ठी को पढ़ना चाहेंगीं? फ़िलहाल तो यह एक यक्ष प्रश्न है।   

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

एक पत्र शहीद सिपाही आनंद सिंह के नाम



प्यारे भाई आनंद सिंह 
सादर दिवंगतस्ते!
बहुत ही दुखी और उदास मन से तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ कलम चलते-चलते अचानक रुक सी जाती है, लेकिन तुम जैसे बहादुर पुलिस के सिपाही को पत्र लिखने में ये कलम भी गौरव का अनुभव करते हुए रुक-रूककर एकदम से चल पड़ती है कुछ रोज पहले तुम अद्भुत शौर्य दिखाते हुए एक गरीब रेहड़ीवाली महिला को लुटने से बचाते हुए उन तीन बदमाशों से जाकर भिड़ गए और बदमाश की गोली खाकर भी तुमने तब तक उनका पीछा किया जब तक कि तुम निढाल होकर धरती पर गिर नहीं पड़े आसपास मौजूद कथित बहादुर जनता ने ये सब देखा, लेकिन उसकी कथित बहादुरी ने उसे उन बदमाशों को रोकने को प्रेरित नहीं किया, फलस्वरूप तुम्हें इस संसार को छोड़कर विदा होना पड़ा वैसे तुम तो इस बात को भली-भांति जानते और समझते थे कि देश का दिल कहे जानेवाले इस महानगर दिल्ली का माहौल कितना ख़राब हो रखा है और यहाँ लोगों के दिलों में दिल जैसी कोई चीज अब सलामत ही नहीं रही है ये तुम कैसे भूल गए कि यह महानगर अराजकता के शिकंजे में किस कदर जकड चुका है क्या तुम बीते दिनों की उन घटनाओं को भूल गए थे कि कैसे सरेआम जनता के वेश में छिपे अपराधियों द्वारा पुलिसकर्मियों को समय-समय पर सरेआम पीटा गया, जरा-जरा सी बात पर पुलिस थानों और चौकियों को घेरकर नारेबाजी और पत्थरबाजी करते हुए उन्हें जलाने तक कोशिश की गई और जाने कितने पुलिसकर्मियों को बिना गलती और बिना सुनवाई के जेल में ठूँस दिया गया कम से कम तुम्हें इतनी सावधानी तो बरतनी ही चाहिए थी कि अपने साथ सुरक्षा के लिए सरकारी पिस्तौल ही रखते पर फिर एक बार को ख्याल आता है कि सरकारी पिस्तौल को रखने का फायदा भी क्या होता? अगर तुम्हारी सरकारी पिस्तौल से कोई बदमाश मारा भी जाता तो जाने कितने संगठन तुम्हारे खिलाफ मोर्चा लेने को खड़े हो जाते तथा मानवाधिकार की दुहाई देते हुए तुम्हारे पुतले फूँक रहे होते और तुम्हें बिना समय गँवाए जेल में डाल दिया जाता समाचार चैनलों पर कथित बुद्धिजीवी तुम्हारे हाथों मारे गए अपराधी को संत घोषित करते हुए तुम्हें रावण या कंस का अवतार सिद्ध कर रहे होते और कलियुग के राजा हरीश चंद्र मारे गए अपराधी को शौर्य पदक देने की सिफारिश करते हुए उसके परिवार को गोद लेने की तैयारी में अब तक लग चुके होते पर चूँकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और किसी लुच्चे-बदमाश की बजाय एक पुलिस का जवान मारा गया इसलिए अख़बारों ने भी इस खबर को पहले पन्ने पर स्थान देने में भी शर्म महसूस की मानवाधिकार प्रेमी शांत हैं और किसी दानव के मारे जाने पर सक्रिय होने के लिए वचनबद्ध हैं तथा कथित बुद्धिजीवी अपनी बुद्धि को धार लगते हुए उचित अवसर की ताक में हैं कम से कम इस बात की संतुष्टि है कि तुम्हें शहीद का दर्जा है दिया गया है और तुम्हारे परिवार को नौकरी और एक करोड़ रुपए देने की घोषणा कर दी गई हैहालाँकि इन सबसे शायद ही तुम्हारी भरपाई हो सके अंत में हम सभी पुलिस के भाई-बंधु तुम्हारे परिवार संग तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए इस उम्मीद के साथ प्रार्थना करते हैं कि हृदयविहीन इस महानगर के हालात सुधरें और फिर कोई आनंद कुमार यूँ बेमौत न मारा जाए

तुम्हें अंतिम विदाई देते हुए वीरतामय नमस्कार

तुम्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देता हुआ

तुम्हारा एक विभागीय भाई     

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

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