बुधवार, 11 मई 2016

पुस्तक समीक्षा : सावधान रहें अब पुलिस मंच पर है


 सुमित मानव मूल्यों के सप्तरंगी कवि हैं। उनके मूल्यों के विषय लोक व्यवहार के हैं, मानवीय प्रवृत्तियों के हैं, लोकाचार के हैं, भारतीय परिवेश के है। उनका कविता संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों, विषमताओं एवं विगलती होती परिस्थितियों पर प्रहार कर उन्हें रेखांकित करता है । कविता संग्रह भावनाओं और यथार्थ का समिश्रण है जिसकी कवितायें संवेदनाओं में बहकर प्रस्फुटित हो रही हैं। सुमित समय सचेत हैं। उन्होंने छोटी-छोटी बातों पर दृष्टि डालकर और उन्हें सहज संवेदनाओं में पिरोकर चिंतन के लिए कविता संग्रह में प्रस्तुत किया है ।
सुमित ने अपने इस काव्य संग्रह में आम आदमी की परेशानियों को समाज के साथ-साथ पुलिस विभाग से जोड़कर मुखरित किया प्रतीत होता है लेकिन हकीकत में बात यह है कि पुलिस भी इंसान होती है, पर लोग उसे पुलिस ही मानते हैं इंसान नहीं और समय आने पर उससे जनता दोयम दर्जे का व्यवहार करती है । एक सिपाही की कहानीपुराना सिपाहीमें ही देखिए । सुमित के अभिव्यक्त-कथन में यह पीड़ा उभरकर सामने आती है । सुमित के स्वर में जो उच्छवास प्रकट होता है वह सृजनशीलता की अकुलाहट-व्याकुलता है । वे एक स्वस्थ्य परिवेश को देखना चाहते हैं।
उनकी शीर्षक कविता सावधान! पुलिस मंच पर हैविशुद्ध व्यंग्य कविता है, जो मंचीय लोगों द्वारा किए जा रहे कारनामों पर खुलकर प्रहार कर उन्हें आईना दिखा रही है। विनती सुन लो भगवान’ ’तुम नागनाथ हम साँपनाथकविताओं में व्यंग्य की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि व्यंग्य के दर्शन भी कविता संग्रह में हो रहे हैं। एक बात और सुमित के लेखन हेतु कहना चाहूँगा कि वे सहजता से गंभीर बात कह जाते हैं और हमें चिंतन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है यह उनकी लेखनी की सार्थकता है। ऐसा ही ‘गुलाम’, ‘भेड़ों की चिंता, ‘थू’ आओ जलाएं रावणपन आदि कविताओं में परिलक्षित हो रहा है।
जहाँ मंच पर कवियों के गिरते स्तर को उन्होंने अपनी लेखनी में सम्मिलित किया है तो वहीं वय उमर के चलतू प्रेम तू लड़की है झकास, अपुन लड़का बिंदास’ ’तेरी चाहत में बना देवदासआदि समय के प्रभाव की रचना है, लेकिन बकरे का इंतजारऔर अच्छा है बकरापन‘धंधेवाली’ ’वो बच्ची‘खूनी दरवाजालेखक के चिन्तन की पूर्ण परिपक्व रचनायें कहीं जा सकती हैं, जिनके द्वारा वे समाज पर सटीक प्रहार करते हुए गंभीर चिन्तन के लिए प्रेरित करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। इन कविताओं को राष्ट्रीय फलक पर रखा जा सकता है। लेखक वर्तमान परिस्थितियों से मनाएँ पन्द्रह अगस्त’ ‘बन जा भारत का किसानमें भी रूबरू होता है । आज लोगों ने गिरगिट को भी मात कर दिया है इसीलिए तो ऐसे छली और प्रपंची लोगों का जमावड़ा समाज में है जो अपने स्वार्थ के लिए समाज में भ्रम फैला रहे हैं। ऐसे लोगों एव ऐसी परिस्थितियों को केन्द्र कें रखकर सुमित का रचनाकर्म सार्थक उॅचाईयों को छू रहा है। भाषा भी स्थानीय, सहज और आम बोलचाल की है इसीलिए पाठक इस कविता संग्रह को सहजता से आत्मसात कर सकेंगे।

पुस्तक - सावधान ! पुलिस मंच पर है
लेखक - सुमित प्रताप सिंहनई दिल्ली
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपए
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकारजबलपुर, मध्य प्रदेश  

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

व्यंग्य : उनके जन्मदिवस पर


    ज हमारी सांसद का जन्मदिवस है। अब आप सोचेंगे कि मैं बहुत जागरूक मतदाता हूँ जो अपनी सांसद के जन्म की तिथि तक याद रखता है। ऐसा कुछ भी सोचकर आप सिर्फ और सिर्फ अपने मस्तिष्क की ऊर्जा ही नष्ट करेंगे। मैं भी उसी अधिकांशतः भारतीय जनता का एक अंश हूँ जिसके बाप-दादाओं ने जागरूक शब्द से शायद जानबूझकर दुश्मनी रखी। जिसका फल ये मिला कि दुनिया के बाकी देश तरक्की कर गए और हमारा देश तरक्की की खोज में अब तक घूम रहा है।
अच्छा अब आपको बातों में अधिक न उलझाकर सीधे-सीधे बता ही दूँ कि मुझे अपनी सांसद के जन्मदिन की तिथि कैसे मालूम हुई। असल में मैं अपने संसदीय क्षेत्र में बहुत दिनों बाद चहलकदमी करने गया था तो मुझे जगह-जगह सांसद महोदया को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए पोस्टर मुस्कुराते हुए मिले। उन पोस्टरों में हमारी सांसद महोदया का मुस्कुराता हुआ एक विशाल सा चित्र था और उन्हीं के ठीक नीचे उन पोस्टरों को संसदीय क्षेत्र की जनता तक पहुँचाने का पावन कार्य करनेवाले सांसद महोदया के दल के कुछ भले सेवकों के चित्र भी मुस्कुरा और खिलखिला रहे थे। मैं उन पोस्टरों को देखकर मुस्कुरा दिया। पोस्टर भी मुझे देखकर मुस्कुरा दिए। मुझे लगा कि शायद पोस्टर कहना चाह रहे थे कि हे मतदाता अपने सांसद के अपने संसदीय क्षेत्र में न दिखाई देने की शिकायत दूर कर और पोस्टर के माध्यम से उनके दिव्य दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त कर। और मैंने झट से पोस्टर के माध्यम से अपने क्षेत्र में प्रकट हुईं सांसद महोदया को नमन करते हुए जन्मदिन की शुभकामनायें दे डालीं।
वैसे मैंने अपने क्षेत्र के निवासियों की भाँति अपने विधायक को भी तस्वीरों में ही देखा है। विधायक जी सांसद महोदया के विरोधी दल के हैं, लेकिन उन दोनों में एक बात सामान्य है। वो दोनों ही अपने-अपने कर्मक्षेत्र से दूर रहने का आनंद उठाते रहते हैं। हमारे एक निगम पार्षद भी हैं। उनका दल सांसद व विधायक के दल का घोर विरोधी है और उनके दल का शीर्ष नेतृत्व पानी पी-पीकर सांसद व विधायक के दलों को दिन-रात कोसता रहता है और राजनीतिक तूफ़ान में खंडहर हुए अपने महल की दिन-रात मरम्मत करता रहता है। हमारे पार्षद जी हमारी सांसद और हमारे विधायक से थोड़ा हटकर हैं। वो अक्सर दिखते रहते हैं। हमारे क्षेत्र की झोपड़पट्टी में तो वो आए दिन समय-असमय प्रकट होते रहते हैं। बाकी जगह वो कभी-कभार ही जाते हैं। बात ये है कि वोट रुपी धन का अकूत भंडार झोपड़पट्टी में ही मिल सकता है इसलिए वो यहाँ हाजिरी लगाना कभी नहीं भूलते। उनकी नियमित हाजिरी का सबूत देती हुईं यहाँ कुछ वर्षों में अचानक से बढ़ी झुग्गियों की संख्या व फुटपाथ की छाती पर मूँग दलती हुईं सैकड़ों रेहड़ियाँ मिल जाती हैं। पार्षद जी के मतानुसार  झोपड़पट्टी का वोट रुपी खजाना उनके दल का पारंपरिक खजाना है। जबकि समय के फेर ने इस खजाने के मालिकों का दिमाग भी लोमड़ी सा कर दिया है और हो सकता है कि आनेवाले समय में ये पारंपरिक खजाना जाने किसके हाथों स्वयं ही लुट जाए और लुटते हुए बेशर्मी से खिलखिलाए?
                                         
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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