शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

संपादक की पत्नी

   संपादक की पत्नी नामक संबंध लेखक समुदाय के लिए बड़ा ही पवित्र है. संपादक महोदय हमारे लिए यदि आदरणीय हैं, तो उनकी पत्नी महोदया हम सबके लिए परम आदरणीया हैं. हम लेखकों को नचाने वाले संपादक नामक खिलौने को कसने की चाभी उन्हीं के पावन हाथों में विराजमान रहती है, जिसका समय-समय पर उनके कोमल दिखनेवाले कठोर हाथों से सदुपयोग होता रहता है.  वो संपादक के जीवन की स्वामिनी हैं. वो उनके सारे सुखों को हरने वाली है और उनका जीवन दुखों से भरने वाली हैं. संपादक जी वैसे तो अपने घर से बाहर शेर हैं, किन्तु घर में पहुँचकर अपनी परम परमेश्वरी पत्नी के सामने कोल्हू का बैल बनकर हो जाते ढेर हैं. कोल्हू का बैल बनना उनकी नियति है. दिन भर दफ्तर में पिरते हैं फिर अपने घर में थके-मांदे अपनी पत्नी के निर्देश पर पिरते-पिरते आहें भरते हैं. उनका घर उनके कठिन परिश्रम से बना हुआ उनकी पत्नी का साम्राज्यिक संसार है और उस साम्राज्य में संपादक की हर साँस पत्नी के आदेश से ही भीतर व बाहर आती और जाती है. संपादक द्वारा अस्वीकारे व दुत्कारे जाने पर हम लेखकों की अंतिम आस हैं संपादक की पत्नी. उन्होंने यदि स्वीकृति दे दी, तो समझो लेखकों का भाग्य जाग गया और यदि उन्होंने भी दुत्कार दिया, तो लेखनी छोड़कर दूसरा कार्य करने में ही भलाई है. इसलिए यदि वो थोड़ी-बहुत बदसूरत भी हैं, तो भी उनकी खूबसूरती की शान में कसीदे पढ़े जा सकते हैं. उनकी आँखों में थोड़ी-बहुत विकृति है या थोड़ा-बहुत भेंगा भी देखती हैं तो क्या हुआ ? हम लेखकों के लिए तो वो मृगनयनी ही हैं. वो चाहे लगड़ाकर चलें या फिर बैसाखी के सहारे पर हमारी दृष्टि में उनकी चाल हिरनी की चाल को भी मात देती है. उनकी कर्कश बोली भी हमारे कानों में रस घोल देती है. चाहे उनकी आवाज सुनते-सुनते हमारा सिर दर्द से फटने लगे, किन्तु फिर भी हमें अपने मुस्कुराते चेहरे संग वाह-वाह करने का धर्म ही निभाना चाहिए. उनके रूखे-सूखे बाल भी काली घटाओं से प्रतीत होते हैं और उनकी छोटी सी चोटी भी काली नागिन का आभास करती प्रतीत होती है.  उनकी बेढंगी स्थूल काया भी मॉडलों की छरहरी काया को मात देती है. उनकी हँसी बेशक औरों को भयानक लगे किन्तु हम लेखकों के लिए वो ऐसी लगती है जैसे फूल झर रहे हों. अनेक कमियाँ होते हुए भी इस धरा पर वो एक संपूर्ण नारी हैं, क्योंकि वो एक पत्नी हैं वह भी किसी ऐरे-गैरे या नत्थू-खैरे की नहीं की नहीं, बल्कि माननीय संपादक महोदय की पत्नी हैं. वो जो कहें वह सत्य है और जो न कहें वह भी सत्य है. वो हम लेखकों को लेखन की वैतरणी पार करवाने वाली खेवा हैं. संपादक द्वारा हम लेखकों पर की गईं ज्यादतियों के लिए उन्हें सबक सिखाने का हमारा अचूक अस्त्र और शस्त्र हैं  संपादक की पत्नी. यदि उनका वरद हस्त हम लेखकों को मिल जाये तो लेखकीय कैरियर बिगड़ते- बिगड़ते बन जाये, अन्यथा संवरते-संवरते बिगड़ जाये. इसलिए आइये हाथ जोड़कर नमन करें इस वसुंधरा पर अवतरित हुई उस महान नारी को, जिसके हाथ में हम लेखकों के भाग्य को बनाने व बिगाड़ने की कुंजी है.
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

आज बुधवार है

  
 ज बुधवार है. आप सबके लिए यह दिन बेशक और दिनों की तरह आम हो सकता है, लेकिन मेरे जीवन में यह दिन विशेष महत्व रखता है. पूरे दिन नौकरी करने के पश्चात शाम को घर पर जब मैं चाय पीकर सुस्ताने की कोशिश करूँगा, तो अचानक माँ की कड़क आवाज़ मुझे हमेशा की तरह याद दिला देगी, कि आज बुधवार है. मैं भी सुस्ती से अंगड़ाई लेते हुए उनसे कहूँगा, कि मुझे मालूम है कि आज बुधवार है और कुछ देर बाद सुस्ताने के बाद माँ को अपनी फटफटिया पर बैठा कर चल दूँगा घर से कुछ दूर पर बुधवार को लगनेवाले सब्जी बाज़ार यानि कि बुध बाज़ार को. बुध बाज़ार के छोर पर पहुँचते ही माँ अपनी साड़ी  के पल्लू को अपनी कमर में कसेंगी और चल पड़ेंगी सब्जियों को अपने हाथ में विराजमान थैलों में कैद करने को. आज भी बड़ी-बड़ी गाड़ियों से उतरते हुए धन्ना सेठों को मैं बुध बाज़ार के किनारे पर एक कोने में बैठे हुए अपने मोबाइल में उलझा हुआ अपनी कनखियों से देखूँगा. धन्ना सेठ आगे बढ़कर सब्जी बेचनेवालों से मोर्चा लेंगे और सब्जी को एक रुपया और सस्ता करवाने की खातिर उन सबसे लड़-लड़ पड़ेंगे. आज मैं बुध बाज़ार के सब्जी दुकानदारों का वही पौरुष फिर से देखूँगा, जिसके बल पर वे सभी उन धन्ना सेठों से जमकर लोहा लेंगे और कुछ पलों के लिए स्वयं को ही धन्ना सेठ समझने लगेंगे. आज फिर से बुध बाज़ार राजनीति का अखाड़ा बन जाएगा. लोग सब्जियां खरीदते-खरीदते उनके बढ़ते दामों के लिए सरकार को गरियाते हुए उसकी ऐसी-तैसी करेंगे. इस काम में सब्जी दुकानदार भी अपने ग्राहकों का संग देंगे. और इस प्रकार कुछ देर के लिए दुकानदारों व ग्राहकों में भाईचारा स्थापित हो जाएगा. फिर कुछ देर बाद भाव गिराने को लेकर होनेवाली जोरदार बहस से कुछ समय पहले बना यह भाईचारा एक क्षण में खंड-खंड हो जाएगा. आज फिर सरकार द्वारा महंगाई से आम आदमी की कटी हुई जेब को फिर से काटने की फ़िराक में कुछ सद्चरित्र भले मानस बुध बाज़ार में ताक लगाकर घूमेंगे. या तो वे अपने कार्य में सफलता प्राप्त करेंगे या फिर असफल होने पर पुलिसवालों की मार खाते हुए उनके लट्ठों पर जमी हुई धूल को साफ़ करेंगे. बहती गंगा में हाथ धोने को तत्पर कुछ अति भले मानवों द्वारा भी उनका शरीर लात व घूंसों से धुना जाएगा. महिलाएँ बुध बाज़ार में आज फिर से एक चलती-फिरती चुगल गोष्ठी का आयोजन करेंगी और अपने-अपने मोहल्ले में एक नए संघर्ष को जन्म देने का शुभारंभ करेंगी. आज फिर से आधुनिकता की उपज युवा कन्यायें नारी स्वतंत्रता का विचार अपने हृदय में बसाये अपने तंग कपड़ों में बुध बाज़ार में कैटवाक करती मिलेंगी और बुध बाज़ार में उपस्थित छिछोरों, जिन्हें आधुनिक भाषा में कूल ड्यूड नाम से सुशोभित किया जाता है, के अश्लील इशारों व मधुर सीटियों का रसास्वादन करेंगी. मैं इन सभी घटनाओं को घटित होते हुए देखकर विचार मग्न होने को तैयार ही होऊँगा, कि तभी माँ अपने दोनों थैलों में सब्जियों कैद करके थकी-मांदी विजयी मुद्रा में फिर से खड़ी हो जाएँगी मेरे सामने और मैं उन्हें अपनी फटफटिया पर बिठाकर चल दूँगा घर की ओर फिर से अगले बुधवार को बुध बाज़ार आने के विषय में सोच-विचार करते हुए.   

सुमित प्रताप सिंह 


इटावा, नई दिल्ली, भारत 

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...