शुक्रवार, 16 जून 2023

अंग्रेजी का टैस्ट


   अंग्रेजी भाषा का हमारे देश में बहुत महत्त्व है। ये महत्त्व कुछ वैसा ही जैसा प्राचीन काल में संस्कृत और मध्यकाल में फारसी का था। एक कहावत भी तो है ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या।’ हालाँकि आधुनिक समय में ये कहावत सिर्फ कहने को ही रह गयी है, क्योंकि अब हर कथित पढ़ा-लिखा फारसी नहीं, बल्कि अंग्रेजी का ज्ञान लेना अधिक उचित समझता है। हम भारतीयों में निरंतर जागरूकता आ रही है और हम पुरानी पहचान का सफाया करने में जुटे हुए हैं, सो हो सकता है कि किसी दिन हम उपरोक्त कहावत में से फारसी को संशोधित कर उसके स्थान पर अंग्रेजी को ससम्मान बिठा दें। बहरहाल अंग्रेजी से अपना मिलन कक्षा पांचवीं में हुआ था। अपन ग्राउंड फ्लोर के सरकारी फ्लैट के बाहर खड़े हुए थे कि ऊपर के किसी फ्लोर से एक पुस्तक नीचे आकर गिरी। पुस्तक प्रेमी होने के कारण अपन ने उसे उठाया और उसकी धूल झाड़कर उसके पन्ने पलटते हुए उसकी जाँच-पड़ताल करने लगे। पुस्तक अंग्रेजी का बेसिक ज्ञान सिखाने वाली थी। अपन ने उसका अध्ययन करके कुछ दिनों में अंग्रेजी में नाम लिखने सीख लिए। फिर एक अंग्रेजी बोलना सिखाने वाली पुस्तक मिल गयी। अपन ने उसके भी रट्टे मारने शुरू कर दिए। सरकारी स्कूल में अपने दोस्तों के बीच अंग्रेजी के दो-चार रटे हुए शब्दों की बदौलत अपन पढ़े-लिखे छात्रों की श्रेणी में आने लगे।

कुछ दिन बाद अपन का परिवार संग गाँव में जाना हुआ। एक दिन अपन गाँव के बच्चों संग एक खेत की मेंढ पर पर बैठे हुए थे। अपन को चारों ओर से गाँव के बच्चों ने घेर रखा था। 

तभी एक बच्चा बोला, "काय भैया, तुम तो सहर में पढ़त हौगे। तौ तुम्हें अंग्रेजी तो आतई हुइए।" 

अपन ने कहा, "हाँ थोड़ी बहुत आती है।" ये इसलिए कहना पड़ा क्योंकि अगर अपन मना करते तो गाँव के बच्चे अपन का मजाक उड़ाते। उनके अनुसार शहर में पढ़ते हो तो अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए। 

तभी एक दूसरा बच्चा आगे आया और बोला, "तुम्हें अंग्रेजी आत है तो हमाए एक सवाल को जबाब देओ?" 

अपन ने गंभीर हो कहा, "पूछो!" 

बच्चे ने अकड़कर पूछा, "वाट डू यू वांट?" 

अपन ने झट से अपने राम जी को याद किया और आँखें बंद कर उस पुस्तक के पन्नों को टटोलने लगे जिनका रट्टा मार-मार कर अपन अपनी क्लास के दोस्तों पर अंग्रेजी के शब्दों को फैंकते रहते थे। अपने राम जी ने अपनी मदद की और उस अंग्रेजी बोलना सिखानेवाली पुस्तक का वो पन्ना आँखों के सामने आ गया जिसमें गाँव के बच्चे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिखा हुआ था। अपन ने झट से आँखें खोलीं और इठलाते हुए उत्तर दिया, "आई वांट ए गिलास ऑफ़ वाटर।" 

ये सुनकर वहाँ मौजूद सारे बच्चे एक साथ खुश होते हुए बोले,"अरे, जाको तौ अंग्रेजी आत है।" 

और इस तरह इस सरकारी स्कूल के छात्र की इज्जत बाल-बाल बच गई।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शुक्रवार, 24 मार्च 2023

विसंगतियों को सोटा लगाते हलीम आईना

 


     राजस्थान के कोटा शहर के हलीमा आईना पिछले चार दशकों से लेखन कर्म में जुटे हुए हैं। अब तक इनके तीन व्यंग्य कविता संग्रह क्रमशः 'हंसो भी, हंसाओ भी', 'हंसो मत हंसो' एवं 'आईना बोलता है' प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी रचनाएं देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा अब तक ये कई पुरस्कार व सम्मानों से अपनी झोली को भर चुके हैं। सदैव की भांति हलीम आईना अपने एक हाथ में व्यंग्य कविता का सोटा और दूसरे हाथ में आईना लिए चहलकदमी करते हुए समाज में फैली हुईं विसंगतियों को पहले तो कस कर सोटा लगाते हैं फिर उसके बाद उनके विद्रूप चेहरे को आईना दिखाने का कार्य करते है। हमने कुछ प्रश्नों के माध्यम से इनकी साहित्यिक यात्रा के विषय में जानने का लघु प्रयास किया है।

आपको लेखन का रोग कब और कैसे लगा?

हलीम आईना - देखिए सुमितजी! मैं कविता लेखन को रोग नहीं मानता, यह तो ईश्वर प्रदत्त अति संवेदनशील मनोस्थिति से उपजता है जो दिल की आवाज बनकर लोगों के दिलों में उतर जाता है तथा मनोरंजन के साथ मार्गदर्शन भी करता है। यदि आप व्यंग्य की भाषा में इसे रोग माने तो मुझे ये रोग आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही लग गया था। हमारे हिन्दी के गुरूजी कहानियाँ लिखते थे तथा हमें अपनी कहानियों के समाचारपत्रो में प्रकाशित होने तथा आकाशवाणी में प्रसारित होने के विषय में समय-समय पर सूचित किया करते थे। इसके साथ ही साथ हमारे कोटा शहर के दहशरे मेले में जब मैं काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, शैल चतुर्वेदी व मणिक वर्मा जैसे हास्य व्यंग्य कवियों को सुनता था तो मेरे मन में आता था कि यार ऐसा तो अपन भी लिख सकते हैं। यही सोचकर पहले कुछ कहानियाँ लिखीं फिर सोचा कि किसी एक विधा में ही अपनी पहचान बनानी चाहिए और फिर मैने हास्य व्यंग्य कविता को चुना। मेरी पहली रचना राष्ट्रदूत (साप्ताहिक ) में छपी उसके बाद विभिन्न मंचों पर मेरे काव्य पाठ का सिलसिला भी शुरू हो गया।

लेखन से आप पर कौन -सा अच्छा अथवा बुरा प्रभाव पड़ा?

हलीम आईना - सुमित भाई! कविता लेखन से मुझ पर अच्छा ही प्रभाव पड़ा है। बुराईयों से बचे रहने के संस्कार तो सूफ़ी परिवार में जन्म लेने से जन्मजात थे ही, लेखन ने मुझे एक अच्छा पाठक भी बना दिया। मैं निरंतर अच्छा से अच्छा पढ़ने लगा। ईश्वर की कृपा से समय सीमा में काम करने, शुद्ध लेखन और सामाजिक सरोकार से जुड़े लेखन की तमीज मुझमें धीरे-धीरे विकसित होती चली गयी।

क्या आपको लगता है लेखन समाज में कुछ बदलाव ला सकता है?

हलीम आईना - सुमितजी! जिस कवि या लेखक की कथनी और करनी में अन्तर न हो और मानवता का हित उसके लेखन का उद्देश्य हो तो उसका लेखन निश्चित रूप से समाज में बदलाव लाने का काम करता है। सूफ़ी और संत कवियों ने यह काम किया भी है। इस बात का इतिहास गवाह है। आज भी कुछ लोग हैं जो इस कार्य में जुटे हुए हैं।

आपकी सबसे प्रिय रचना कौनसी है और क्यों?

हलीम आईना - मूलत : मैं हास्य व्यंग्य कवि हूँ या नहीं यह तो आप सब जानते ही होंगे। कवि या लेखक को अपनी हर रचना प्रिय होती है फिर भी आप पूछते हैं तो बता देता हूँ कि 'माँ ' पर लिखा मेरा एक दोहा है जिसे मैंने अपनी माँ के स्वर्गवास के बाद लिखा था मुझे सर्वाधिक प्रिय है -

माँ है मन्दिर का कलश, मस्जिद की मीनार।

ममता माँ का धर्म है, और इबादत प्यार।।

आप अपने लेखन से समाज को क्या सन्देश देना चाहते हैं?

हलीम आईना - सुमितजी! प्रश्न बहुत अच्छा है। मैं अल्प दृष्टि का नाचीज कवि बस इतना सा कहना चाहता हूँ कि कविता विश्व समुदाय को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। हम भी इसे जोड़ने का ही काम करें। विश्व में प्रेम, शान्ति, सद्भावना, समता, भाईचारा कायम करें। हर हाल में जीवन की चुनौतियों से डटकर मुकाबला करते रहें। सारे गमों को भूल कर हँसते, मुस्कुराते रहें और आनन्द की नदी में डुबकी लगाते रहें।

साक्षात्कारकर्ता - सुमित प्रताप सिंह 

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