रविवार, 24 अप्रैल 2016

व्यंग्य : भेड़िया आया


    पुलिस कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए जिले अपने सहकर्मी नफे से बोला, "भाई नफे! वो औरत कौन सी थी जो आए दिन झूठी कॉल करके हम पुलिसवालों का जीना हराम किए हुए थी?"
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अरे भाई जिले! तूने भी सुबह-सवेरे किस मनहूस का जिक्र छेड़ दिया। उस औरत ने तो 100 नंबर को गॉसिप करने वाला नंबर बना लिया था। सुबह-शाम जब जी करे फोन मिला देती थी।" नफे ने नाराजगी से कहा।
जिले ने समझाया, "भाई शायद उसके दिमाग में कोई दिक्कत रही होगी?"
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मुझे तो वो सनकी और पागल ही लगती है। कभी-कभी तो वो हम पुलिसवालों को इतनी गन्दी और भद्दी गालियाँ बकती है कि किसी को बताने में भी शर्म आती है।" नफे गुस्से में बोला।
जिले ने चाय का आखिरी घूँट सुड़कते हुए कहा, "भाई वो औरत ही क्यों पब्लिक में बहुत से ऐसे सिरफिरे हैं जो किसी न किसी बहाने 100 नंबर मिलाकर पुलिस की माँ-बहन एक करने से गुरेज नहीं करते हैं। जैसे कि हम उनकी भैंस चुराकर ले आए हों। इन सिरफिरों को ऐसा लगता है जैसे कि सारे ऐब हम पुलिसवालों में ही भरे हुए हैं और ये तो साक्षात् संत के रूप में ही इस धरती पर उतरें हैं। भाई अगर 100 नंबर पर कॉल करने के पैसे कटने लगें तो इनका एक भी फोन न आए।"
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सही कहा भाई। और यही बात परसों मैंने उसको बोली भी थी कि मैडम फ्री की कॉल है इसलिए तुम भी मजे ले रही हो। कभी इस बारे में सोचना कि जब तुम्हें वाकई में पुलिस की जरुरत पड़ेगी न तब पुलिस ये सोचकर तुम्हारी मदद को नहीं आएगी कि ये औरत तो झूठी कॉल करके फिरकी लेती है। और हाँ मैंने उसे बचपन में सुनी भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने वाले झूठे बच्चे की कहानी भी सुनाई थी और उस कहानी से उसको सबक लेने को कहा था।" नफे ने बताया।
जिले ने गंभीर हो पूछा, “तो भाई उस औरत ने उस झूठे लड़के की कहानी से सबक लिया या नहीं?”
नफे मंद-मंद मुस्कुराया, "सबक! भाई ये शब्द किसी जमाने में हमारे शब्दकोष में हुआ करता था, लेकिन अब तो इस शब्द से शायद इस युग के प्राणियों ने दुश्मनी मोल ले ली है और खासकर इस शहर के लोगों ने।“
जिले ने झल्लाते हुए कहा, “भाई मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये लोग हमसे ऐसा व्यवहार करते क्यों है?"
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भाई इन लोगों ने अपने दिमाग में एक ही बात भर रखी है कि पुलिसवाले ठीक नहीं होते। देखा जाए तो हर विभाग में अच्छे और बुरे लोग मौजूद हैं। इसमें पुलिस ही अपवाद नहीं हैं।" नफे शिकायती लहजे में बोला।
जिले बोला, "भाई बात तो तेरी ठीक है। इन लोगों का पुलिस के प्रति ये उदासीन रवैया अपराधियों के हौसले बुलंद किए हुए है। अपराधी इन लोगों की आड़ में पुलिसवालों के साथ मारपीट तक करने से बाज नहीं आते।"
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और जब अपराधियों के साथ पुलिस कड़ी कार्यवाही करे तो ये लोग ही उनके रक्षक बनकर खड़े हो जाते हैं।" नफे ने कहा।
जिले नफे की बात का समर्थन करते हुए, "फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब ये अपराधी ही अपने रक्षक बने इन लोगों की ऐसी-तैसी करने से बाज नहीं आते।"
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तब ये भले लोग ही अपनी छाती पीटते हुए शिकायत करते हैं कि पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती है। अब ये और बात है कि जनता में मौजूद ये भले लोग ही ही पुलिस के हाथ बाँधने के लिए उत्तरदायी है।" नफे खिलखिलाया।
जिले बोला, "अब ये बात इन भले लोगों को भला कौन समझाए?"
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भाई वक़्त की मार कभी न कभी अपने आप समझा देगी।" नफे ने घोषणा की।
जिले ने पूछा, "खैर छोड़ इस बात को। तू ये बता कि कल रात को उस औरत का फिर से फोन आया था या नहीं?"
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आया था। भाई कुत्ते की पूछ कभी सीधी हुई है? कल वो खूब फोन मिलाती रही पर मैंने उसका फोन उठाया ही नहीं। परसों उसने गालियों की इतनी खेप दे दी थी कि कई दिनों का कोटा पूरा हो गया था। और यार वैसे भी कल मेरा जन्मदिन था और अपने जन्मदिन पर उस पागल औरत की भद्दी गालियाँ काहे को सुनता?" नफे ने बेफिक्री से कहा।
जिले बोला, "भाई तेरी बात सही निकली। कल वाकई में भेड़िया आ गया।"
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मैं तेरी बात का मतलब नहीं समझा।" नफे ने हैरान हो कहा।
जिले ने गंभीर हो बताया, "कल रात उस औरत के घर में घुसकर कुछ लोगों ने लूटपाट की और उसे जान से मार दिया। ये देख अख़बार में उस औरत के घर हुई लूटपाट की खबर छपी हुई है।"
यह सुन नफे ने जिले से हड़बड़ाहट में अख़बार लिया और बेचैनी से अख़बार में छपी उस खबर को पढ़ने लगा।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर हैजितना अनोखा इस पुस्तक का नाम है, उतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहीं, अपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूं, जब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंग, मुसीबतो की रेनिंगप्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया है, उसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर हैको पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविता, कहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर हैमें भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया है, जिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी है, जो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती है, साथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा है, लेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर हैके जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए
तू लड़की झकास, अपुन लड़का बिंदास,
तेरी आंखें कुछ खास, अपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोली, तुझे देख नीयत डोली,
मेरे दिल की खाली खोली, आ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ा, तेरे वेट में कबसे खड़ा,
तेरे वास्ते सबसे लड़ा, तुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, संभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर हो, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकी, अपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापनकविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,
मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,
आ आ मुझे काट,
जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,
तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,
इलाके में हो गया है दंगा,
सेना ने कस लिया शिंकजा,
मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,
यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,
उसने अपने बचपन के यार,
सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,
सूरज के बेटे ने आकर,
गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,
हम इन इंसानों से अच्छे हैं,
इनसे कई गुना सच्चे हैं,
कभी कोई बकरा या मुर्गा,
किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटता, लूटता या जलाता नहीं,
आज मुझे हुआ यह अहसास है,
मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैं, लेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपननामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय है, क्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?
लालाजी कुछ कहिए,
सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,
इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,
जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?
मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,
जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार है, जो हमारा मनोरंजन तो करती है, साथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी है, जो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशी, रोहिणी, दिल्ली।


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