शोध-आलेख
ज्ञान चतुर्वेदी के
व्यंग्य उपन्यासों का समग्र विश्लेषण
शोधार्थी - सुमित
प्रताप सिंह
शोध निर्देशक – डॉ.
देशमित्र त्यागी
श्री वेंकटेश्वर
विश्वविद्यालय,
गजरौला, उत्तर प्रदेश
हिंदी व्यंग्य–साहित्य के समकालीन परिदृश्य में डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी एक ऐसे
रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं, जिन्होंने व्यंग्य को केवल
लघु–आलेख या तात्कालिक टिप्पणी तक सीमित न रखकर उसे उपन्यास जैसी बृहद् विधा में
सशक्त रूप से प्रतिष्ठित किया है। यह शोध–आलेख उनके सात उपन्यासों — नरक यात्रा, बारामासी, मरीचिका, हम न मरब, पागलखाना, स्वांग तथा एक तानाशाह की प्रेमकथा का समीक्षात्मक परिचय प्रस्तुत करता है और उनकी उपन्यास–यात्रा के स्वरूप,
व्यंग्य–दृष्टि, शिल्प–प्रयोग, सामाजिक–यथार्थ तथा भाषा–वैविध्य का विश्लेषण करता है।
समकालीन हिंदी व्यंग्य–परिदृश्य में डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का नाम एक ऐसे
साहित्यकार के रूप में सम्मानित है, जिन्होंने व्यंग्य को
सामयिक टिप्पणियों और स्तम्भ-लेखन के दायरे से मुक्त कर उपन्यास के व्यापक कैनवास
पर प्रतिष्ठित किया। आज जहाँ अनेक व्यंग्यकार समाचारपत्रों की शब्द–सीमा और
तात्कालिक विषयों तक सिमटकर रह गए हैं, वहीं डॉ. चतुर्वेदी ने
व्यंग्य को गंभीर विमर्श, कथा–विस्तार और
शिल्प–प्रयोग के साथ एक नई ऊँचाई प्रदान की है। वे हिंदी में उन कुछ विरल
व्यंग्यकारों में हैं जो लगातार उपन्यास जैसी विधा में प्रयोग करते हुए सामाजिक,
राजनीतिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को तीक्ष्ण, हास्य–रस से ओतप्रोत, किंतु करुणा से संपृक्त
दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं।
जीवन–परिचय और साहित्यिक
संस्कार
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का जन्म 2 अगस्त, 1952 को उत्तर प्रदेश के झाँसी ज़िले के मऊरानीपुर में हुआ। पारिवारिक वातावरण में
साहित्यिक संस्कार सहज रूप से उपलब्ध हुए। नाना ओरछा राज्य के राजकवि थे और मामा
भी प्रतिष्ठित कवि। बचपन में ननिहाल के पुस्तकालय से प्रारम्भ हुई उनकी
साहित्य–यात्रा विद्यालय–काल में ही कविता–प्रकाशन तक पहुँच गई। परंतु जासूसी
साहित्य, परसाई और शरद जोशी की व्यंग्य–परंपरा तथा अमेरिकी व्यंग्यकारों के अध्ययन ने
उनके भीतर व्यंग्यकार का बीज रोपा।
पेशे से वे हृदय रोग विशेषज्ञ रहे और भारत सरकार के बी.एच.ई.एल. चिकित्सालय
में तीन दशक से अधिक सेवा प्रदान की। चिकित्सा–क्षेत्र का गहन अनुभव और साहित्यिक
रुचि, इन दोनों के समन्वय ने उनके लेखन में विशिष्ट दृष्टि और सृजनात्मकता का आधार
निर्मित किया। उनके मित्र डॉ. अंजनी चौहान के आग्रह पर डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा संपादित धर्मयुग पत्रिका में भेजा गया उनका पहला व्यंग्य (सत्तर का दशक) उनके विधिवत
लेखन–युगारंभ का प्रतीक बन गया। तभी से अब तक वे एक हजार से अधिक व्यंग्य–रचनाएँ
लिख चुके हैं।
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का
उपन्यास–लेखन : एक समग्र दृष्टि
डॉ. चतुर्वेदी के सातों उपन्यास— नरक यात्रा (1994), बारामासी (1999), मरीचिका (2007), हम न मरब (2014), पागलखाना (2018), स्वांग (2024), एक तानाशाह की प्रेमकथा (2024) सामग्री, कथ्य, शैली और भाषा की दृष्टि से एक–दूसरे से भिन्न हैं। वे हर उपन्यास में नया
शिल्प चुनते हैं, कहीं यथार्थ को फैंटेसी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, कहीं बुंदेलखंडी बोली में जीवन की व्यथा–हँसी उकेरते हैं, तो कहीं प्रेम जैसी पावन अनुभूति को तानाशाही के व्यंग्यात्मक रूपक में बदल
देते हैं। नीचे उनके सातों उपन्यासों का विश्लेषण प्रस्तुत है।
1. नरक यात्रा :
चिकित्सा–तंत्र की कटु यथार्थ–गाथा
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास ‘नरक यात्रा’ हिंदी व्यंग्य साहित्य में संस्थागत यथार्थ को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण
कृति के रूप में स्थापित होता है। यह केवल अस्पताल की अव्यवस्था का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उस सामाजिक-मानसिक
संरचना की पड़ताल भी है जिसके कारण अस्पताल जैसा ‘पवित्र’ माने जाने वाला
सार्वजनिक संस्थान अंततः ‘नरक’ में बदल जाता है। उपन्यास का आरंभ ही इस गहन यथार्थ
को तीक्ष्णता से स्थापित करता है, जहाँ लेखक अस्पताल को ‘लाक्षागृह’ की उपमा देते हैं— “इस उपन्यास में वर्णित अस्पताल आम मरीजों के लिए सरकार द्वारा तैयार किया 'लाक्षागृह' जैसा था… इस अस्पताल में
ऐसी कोई सुरंग नहीं थी जहाँ से आम जन भाग पाता।”1 यह उद्धरण न केवल व्यवस्था
के क्रूर चेहरे को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि आधुनिक संस्थान मिथकीय भय को भी पीछे छोड़ देते हैं, क्योंकि यहाँ पीड़ित के लिए
किसी भी प्रकार का बचाव-पथ नहीं बचता।
ज्ञान चतुर्वेदी अस्पताल की अराजकता को केवल वर्णनात्मक शैली में नहीं, बल्कि गहरी मनोवैज्ञानिक
समझ के साथ प्रस्तुत करते हैं। ऑपरेशन थिएटर की अव्यवस्था, रसोईघर की गंदगी, वार्ड बॉय और डॉक्टरों के
अनैतिक आचरण, इन सबके माध्यम से वे यह बताते हैं कि भ्रष्टाचार केवल संरचनात्मक समस्या नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लालच और
नैतिक पतन का सम्मिलित परिणाम है। उनकी लेखन शैली की विशेषता यह है कि वे इस गलीज
यथार्थ को “मीठी छुरी-सी पैनी” भाषा से उजागर करते हैं, जिसमें लोकबोली, हास्य और कटाक्ष का ऐसा
मिश्रण है जो हँसी और भय दोनों का एकसाथ अनुभव कराता है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार अंजनी चौहान का यह कथन उपन्यास की विशिष्टता को बहुत सटीक रूप से पकड़ता है— “नरक यात्रा की विशिष्ट शैली, विषय, भाषा कौशल तथा फैन्टेसी का अद्वितीय प्रयोग इसे राग दरबारी से सूक्ष्म किन्तु
अलग किस्म का रचना अनुभव बनाते हैं।”2 इस टिप्पणी में ‘नरक यात्रा’ की साहित्यिक महत्ता की स्पष्ट पहचान है। जहाँ
‘राग दरबारी’ ग्रामीण प्रशासनिक विफलता को व्यंग्य का आधार बनाता है, वहीं ‘नरक यात्रा’
चिकित्सा-संस्थान जैसे अपेक्षाकृत कम स्पर्श किए गए क्षेत्र को केंद्र में लाकर
व्यंग्य साहित्य की परिधि को विस्तार देती है। फैंटेसी का प्रयोग इस उपन्यास की एक
अतिरिक्त विशेषता है, जो इसे रूढ़ि-निर्मित यथार्थवाद से अलग हटाकर एक नए व्यंग्य-प्रकार की ओर ले
जाता है।
इस प्रकार, ‘नरक यात्रा’ न सिर्फ चिकित्सा जगत की अराजकता का ईमानदार चित्रण है, बल्कि उस मानसिक और नैतिक
पतन की आलोचनात्मक समीक्षा भी है जिसने भारतीय संस्थानों को भीतर तक खोखला कर दिया
है। उपन्यास अपने व्यंग्य, भाषा-प्रवाह और विषय-वस्तु की साहसिकता के कारण हिंदी व्यंग्य साहित्य में एक
विशिष्ट और स्थायी स्थान पाने में सफल होता है।
2. बारामासी : बुंदेलखंडी जीवन
और सपनों की विडंबना
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का दूसरा उपन्यास ‘बारामासी’ हिंदी व्यंग्य-उपन्यास परंपरा में ग्रामीण जीवन, सपनों और विडंबनाओं की विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत करता है। उपन्यास के नामकरण
के संबंध में लेखक लिखते हैं— ‘बारामासी’ ऐसा फूल है, जो हर मौसम में उसी शिद्दत
से खिल सकता है। मेरे इस उपन्यास के पात्रों के जीवन-चरित्र को इससे बेहतर और किस
नाम से पुकारा जा सकता था?"3 यह कथन प्रतीकात्मक स्तर पर
उपन्यास की मूल आत्मा को सामने रख देता है। अलीपुरा गाँव के पात्र भी ऐसे ही
“बारामासी” फूल हैं, हर मौसम में सपने देखते हुए, टूटते हुए, फिर नये सपने पनपाते हुए। यही चक्र उपन्यास को गहरे व्यंग्यात्मक यथार्थ का
स्वर प्रदान करता है।
उपन्यास की कथा-संरचना परिवार-केंद्रित होते हुए भी पूरे ग्रामीण समाज के
चरित्र को उभारती है। जिज्जी और उनके बच्चों के अलग-अलग सपने एक ओर मध्यमवर्गीय
अभिलाषाओं की विडंबनाओं को प्रकट करते हैं, तो दूसरी ओर भारतीय ग्रामीण मानस की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का चित्रण भी
करते हैं- सपने बड़े देखने की उत्कंठा और उन्हें हासिल करने की धुँधली राह। गुच्चन
का सरकारी नौकरी का सपना, छुट्टन का प्रेम, चंदू का डॉक्टर बनने का संकल्प और लल्लन का ताकतवर बनने की चाह, ये सब मिलकर उस सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भारतीय गाँवों
में बहुस्तरीय सामाजिक संरचना निर्मित करती है। परंतु इन सपनों का बार-बार टूटना
यह दिखाता है कि गाँव की व्यवस्था, संसाधनों की कमी और सामाजिक विघटन किस तरह व्यक्तिगत आकांक्षाओं को बार-बार
पराजित कर देता है।
उपन्यास का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष उसकी भाषा और किस्सागोई है। बुंदेलखंडी
बोली की लचक, मुहावरे, व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति और लोकगाथा जैसे कथानक-तत्व ‘बारामासी’ को
क्षेत्रीयता की शक्ति प्रदान करते हैं। लल्लन मामा द्वारा कही गई लोककथाएँ ग्रामीण
मनोविज्ञान और संस्कृति की गहराई को सामने लाती हैं। यह शैली उपन्यास को न केवल
लोकधर्मी बनाती है, बल्कि पाठक को अलीपुरा के संसार में पूरी तरह डुबो देती है।
वरिष्ठ आलोचक अजय अनुरागी का मत उपन्यास की साहित्यिक महत्ता को और स्पष्ट करता है— “‘राग दरबारी’ को व्यंग्य का 'महाकाव्य' माना जाए तो 'बारामासी' को व्यंग्य का 'खंडकाव्य' कहा जा सकता है।”4 यह टिप्पणी अत्यंत सारगर्भित है। जहाँ ‘राग दरबारी’ समाज से व्यक्ति तक जाता है, वहीं ‘बारामासी’ व्यक्ति और परिवार से होते हुए समाज की विडंबनाओं को उभारता है। इस प्रकार
ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य परंपरा में एक नया मार्ग प्रस्तुत करते हैं, परिवार कथा के भीतर सामाजिक
रूपक की स्थापना।
अजय अनुरागी आगे लिखते हैं— “जिस तरह 'राग दरबारी' को पढ़ते हुए हम शिवपालगंज से जुड़ जाते हैं, उसी तरह 'बारामासी' को पढ़ते हुए अलीपुरा के
होकर रह जाते हैं।”5 यह उपन्यास की कथात्मक शक्ति और सामाजिक प्रामाणिकता का प्रमाण है।
सारांशतः, ‘बारामासी’ ग्रामीण जीवन का यथार्थ,
उसके भीतर छिपी हास्य-विनोदपूर्ण त्रासदी और सपनों की दारुण यात्रा को अत्यंत
प्रभावी व्यंग्यात्मक शैली में चित्रित करता है। यह उपन्यास व्यक्ति, परिवार और समाज के
त्रिकोणीय संबंधों को एक नए आलोचनात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने में सफल होता
है।
3. मरीचिका : पौराणिक फैंटेसी
में समकालीन राजनीति
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का तीसरा उपन्यास ‘मरीचिका’ उनकी रचनात्मक यात्रा का वह
मोड़ है जहाँ वे यथार्थवादी व्यंग्य से आगे बढ़कर पौराणिक फैंटेसी की जटिल विधा को
साधने का साहसिक प्रयास करते हैं। स्वयं लेखक इस साहस और उसके जोखिम को स्वीकार
करते हुए भूमिका में लिखते हैं— “मेरा पापी, मूरख मन तो इसे ‘पौराणिक
व्यंग्य उपन्यास’ की संज्ञा देने को कर रहा है… जंगल के अपने नियम होते हैं और
वहां किसी तर्क का कोई स्थान होता नहीं।”6 यह कथन न केवल लेखक के आत्म-चिंतन का परिचायक है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि ‘मरीचिका’ साधारण व्यंग्य-उपन्यास नहीं, बल्कि शैलीगत और वैचारिक स्तर पर एक नया प्रयोग है।
उपन्यास की केंद्रीय संरचना पादुका-राज की पौराणिक कल्पना पर
आधारित है, जिसे लेखक ने समकालीन सत्ता-व्यवस्था के रूपक के रूप में प्रस्तुत किया है।
पादुका-राज के माध्यम से वे उस निरंकुश शासन, भ्रष्ट नौकरशाही, पाखंडी साधुओं और
बुद्धिजीवियों की आलोचना करते हैं जो जनता के नाम पर सत्ता का शोषण करते हैं।
प्रजा वर्षों से रामराज्य की प्रतीक्षा में है, लेकिन जो उनके सामने मौजूद है वह मात्र अत्याचार, भ्रम और राजनीतिक छल यानी वास्तविकता का ‘मरीचिका’ रूप है।
उपन्यास में संस्कृतनिष्ठ भाषा और पौराणिक संदर्भों का प्रयोग एक नये
सौंदर्य-विधान की सृष्टि करता है। यह भाषा न केवल कथा की पौराणिकता को पुष्ट करती
है, बल्कि व्यंग्य की धार भी तीखी बनाती है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के भीतर छिपी फूहड़ता
और हास्य की सूक्ष्म टंकार पाठक को चौंकाती भी है और हँसाती भी। आलोचनात्मक दृष्टि
से यह कहा जा सकता है कि भाषा-शैली ‘मरीचिका’ की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक
है। यह उपन्यास को व्यंग्य, रूपक और फैंटेसी- तीनों
स्तरों पर समृद्ध बनाती है।
सामाजिक विडंबना का चित्रण भी अत्यंत सशक्त है। लेखक दरिद्र जनों की विवशता को
भावुकता में नहीं बदलते, बल्कि व्यंग्य की सटीकता से
उनकी मानसिक स्थिति का खुलासा करते हैं, कैसे लोग वर्षों से एक काल्पनिक ‘रामराज्य’ की प्रतीक्षा में पादुका-राज के
दमन को सहन करते आ रहे हैं। यह प्रतीक्षा ही उनका भ्रम, उनकी ‘मरीचिका’ बन जाती है।
वरिष्ठ साहित्यकार मधुरेश इस उपन्यास के मौलिक प्रयोग
की पुष्टि करते हुए लिखते हैं— “उपन्यासकार ज्ञान चतुर्वेदी… रामराज के पौराणिक मिथक को अपने वर्तमान में
उतारने और घटित करने को एक कठिन चुनौती से अपनी रचना यात्रा शुरू करते हैं…
मंत्रियों और नौकरशाही के इस गठजोड़ ने अयोध्या को हमारी वर्तमान व्यवस्था में ढाल
दिया है।”7 यह टिप्पणी उपन्यास की
अंतर्धारा को अत्यंत सटीक रूप से रेखांकित करती है। अर्थात् यह उपन्यास पौराणिक मिथक को समकालीन राजनीतिक व्यंग्य में रूपांतरित करता है।
आलोचनात्मक रूप से कहा जाए तो ‘मरीचिका’ व्यंग्य-उपन्यास की परंपरा में एक नया
मोड़ है। यह न तो पूर्ण रूप से पौराणिक आख्यान है और न ही केवल राजनीतिक व्यंग्य, यह दोनों की संधि-भूमि पर
खड़ा एक प्रयोगधर्मी उपन्यास है जो सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं की गहरी समीक्षा
प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, ‘मरीचिका’ न केवल चतुर्वेदी
की उपन्यास यात्रा का विशिष्ट पड़ाव है, बल्कि हिंदी व्यंग्य
साहित्य को एक नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण योगदान भी है।
4. हम न मरब : मृत्यु के बहाने
जीवन का विवेक
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास ‘हम न मरब’ उनकी रचनाशीलता का वह अनोखा पड़ाव है जहाँ वे मनुष्य के जीवन-मरण के सनातन
प्रश्न को व्यंग्य, लोकभाषा और दार्शनिक दृष्टि के साथ जोड़कर एक विशिष्ट आख्यान रचते हैं। कथ्य
की दृष्टि से यह उपन्यास अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हिंदी उपन्यास परंपरा में मृत्यु को केंद्र में रखकर पूरी कथा रचना
बहुत कम देखने को मिलती है। लेखक इस चुनौती को पूरी स्वाभाविकता से स्वीकार करते
हुए आरंभ में ही लिखते हैं— “हर जिंदगी का एक किस्सा
होता है… क्या यह किस्सा मौत पर भी वास्तव में खत्म हो पाता है?… यह किस्सा बब्बा की मौत से
शुरू होता है।”8 यह उद्घाटन उपन्यास की दार्शनिक जमीन को तुरंत स्पष्ट कर देता है- मृत्यु अंत
नहीं, बल्कि जीवन की नई व्याख्या का अवसर है।
उपन्यास की कथा लुगासी गाँव और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर आधारित
है। बब्बा की मृत्यु यहाँ मात्र घटना नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की मानसिकता, मान्यताओं और हास्यास्पदता को उजागर करने का प्रवेश-द्वार है। बब्बा की पत्नी
से लेकर बूढ़ी नानी, महंत जी, रिश्तेदारों और गाँव वालों तक, हर चरित्र मृत्यु के प्रसंग से होकर गुजरता है, लेकिन किसी ग़मगीन शोक-दृश्य की तरह नहीं बल्कि सामाजिक विडंबनाओं के तमाशे की
तरह। आलोचनात्मक रूप से देखें तो यह चतुर्वेदी की विशिष्ट कला है- मौत जैसे गंभीर
विषय को हास्य और करुणा के मिश्रण से जीवंत करना ताकि पाठक एक साथ विचलित भी हो और
मुस्कुराए भी।
यह उपन्यास बार-बार इस विचार की पुष्टि करता है कि “ज़िन्दगी एक चुतियाचंदन वाली
दौड़ है और यह कभी खत्म नहीं होती क्योंकि सुख बस एक अफ़वाह है।”9 यह कथन भले लोकभाषा की चुटीली शैली में हो, परंतु इसके भीतर छिपा दार्शनिक सत्य गहरा है। लेखक आधुनिक जीवन की निरर्थकता, मनुष्य की अंतहीन लालसाओं
और सामाजिक दिखावे को इस वाक्य में अद्भुत संक्षेप में बाँध देते हैं।
भाषिक दृष्टि से उपन्यास अत्यंत सशक्त है। बुंदेलखंडी भाषा का स्वाद, देसी मुहावरों की टनक, और ग्रामीण परिवेश की
जीवंतता पूरे कथानक को मौलिकता और ऊर्जा प्रदान करती है। व्यंग्य यहाँ सतही
चुटकुले नहीं, बल्कि जीवन के अनिवार्य यथार्थ से उपजा हुआ है, इसलिए वह हृदय में उतरता है।
वरिष्ठ आलोचक कैलाश मंडलेकर उपन्यास के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखते हैं— “हम न मरब हमारे विस्मृत अतीत और दारुण वर्तमान के बीच सेतु निर्मित करने का
महा आख्यान है… ज्ञान चतुर्वेदी जिस मेधा से नामालूम सी स्थितियों में व्यंग्य के
गहरे सूत्र ढूँढ निकालते हैं उसकी भनक व्यंग्य के वैश्विक धरातल तक दस्तक देती
है।”10 यह टिप्पणी बिल्कुल सही बैठती है, क्योंकि उपन्यास मृत्यु के बहाने समाज, परंपराओं, जीवन की निरर्थक आकांक्षाओं और वर्तमान की हड़बड़ी आदि सबका बहुआयामी विश्लेषण
करता है।
आलोचनात्मक रूप से कहा जाए तो ‘हम न मरब’ चतुर्वेदी के व्यंग्य का सबसे परिपक्व रूप है, जहाँ हास्य, करुणा, दार्शनिकता और ग्रामीण मानव-मन की गहराई सहज रूप में एक साथ प्रकट होते हैं।
यह उपन्यास मृत्यु को केंद्र बना कर भी जीवन का महत्त्व समझाता है और यही इसकी
रचनात्मक उपलब्धि है।
5. पागलखाना : बाजारवाद की
फैंटेसी और यथार्थ
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास ‘पागलखाना’ समकालीन भारतीय समाज के उस अंतर्विरोध को पकड़ता है, जहाँ वास्तविकता इतनी अनोखी, अनियंत्रित और विचित्र हो
चुकी है कि वह स्वयं फैंटेसी का रूप ले लेती है। उपन्यास की भूमिका में लेखक का
कथन— “फैंटेसी-सा यथार्थ हो गया
है… कब फैंटेसी रचते-रचते यथार्थ के पाले में पाँव धर देता था”11 इस रचना की मूल संवेदनात्मक
धरा को स्पष्ट करता है। यह कथन केवल एक शैलीगत टिप्पणी नहीं, बल्कि उपन्यास की संरचना और
उसकी दृष्टि-कोण का केंद्र है। आज का समाज, विशेषतः बाजारवाद के दौर में, जिस तरह कृत्रिमता, छल और उपभोक्तावादी पागलपन से संचालित हो रहा है, उसे वर्णित करने के लिए
फैंटेसी ही सबसे उपयुक्त माध्यम बनती है और चतुर्वेदी इसे अत्यंत प्रभावी ढंग से
साधते हैं।
कथानक की दृष्टि से ‘पागलखाना’ का सबसे बड़ा व्यंग्यात्मक कौशल यह है कि समाज
जिन लोगों को ‘पागल’ कहकर पागलखानों में बंद कर देता है, वही पात्र उपन्यास में सबसे
तर्कपूर्ण, संवेदनशील और सत्य बोलने वाले सिद्ध होते हैं। यह व्यवस्था पर निर्मम कटाक्ष
है। लेखक यहाँ यह स्थापित करते हैं कि वास्तविक पागल पागलखानों में नहीं, बल्कि पागलखानों के बाहर, तथाकथित ‘सही’ समाज में
अधिक है, जहाँ लोग बाज़ारवाद, लालच, दिखावे, उपभोक्तावाद और मानसिक प्रदूषण के वशीभूत होकर अपनी संवेदनशीलता खो चुके हैं।
उपन्यास का चिकित्सक पात्र स्वयं में एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। वह ‘पागलों’ का
इलाज करता है, पर लेखक संकेत करते हैं कि वह स्वयं एक गहरे मानसिक असंतुलन और अस्तित्वगत
शंकाओं का शिकार है। यह चरित्र उन पेशेवर विशेषज्ञों पर व्यंग्य है, जो मानसिक या सामाजिक
बीमारियों का उपचार करते हुए भी स्वयं अपने भीतर की जटिलताओं को नहीं समझ पाते। यह
व्यंग्य बहुत सूक्ष्म होकर भी अत्यंत प्रभावशाली है।
प्रभु जोशी की टिप्पणी— “ज्ञान चतुर्वेदी… अपनी भाषा
और अभिव्यक्ति की भंगिमा में… स्वयं की एक विशिष्ट सृजनात्मक पहचान बना ली है…
‘पागलखाना’ समकाल के यथार्थ की अभिव्यक्ति को अमोघ बनाने के लिए फैंटेसी के शिल्प
में प्रस्तुत किया गया है।”12 इस उपन्यास की रचनात्मक महत्ता को रेखांकित करती है। वास्तव में, चतुर्वेदी इस उपन्यास में
अपने पूर्ववर्ती व्यंग्य-कौशल को एक नए स्तर पर ले जाते हैं, जहाँ फैंटेसी केवल मनोरंजन
नहीं, बल्कि सामाजिक विश्लेषण का औज़ार बन जाती है।
भाषिक दृष्टि से भी ‘पागलखाना’ समृद्ध है। इसमें व्यंग्य, हास्य, तर्क और संवेदना— चारों का
संतुलित संगम है। कई दृश्य चुटीले हैं,
कई अत्यंत मार्मिक, और कई इतने कटु कि पाठक को भीतर तक झकझोर देते हैं।
आलोचनात्मक रूप से कहा जाए तो यह उपन्यास बाजारवाद के भीतरी अमानवीय तंत्र, मनुष्य की मानसिक टूटन और सभ्यता के उलझे हुए
नैतिक संदर्भों की पड़ताल है। ‘पागलखाना’ यह विचार स्थापित करता है, कि पागलपन का
वास्तविक केंद्र व्यक्ति नहीं, बल्कि वो समाज है जिसने अपनी मानवीयता को बाजार के आगे गिरवी रख दिया है। यह
उपन्यास समकालीन हिंदी व्यंग्य में एक सशक्त और आवश्यक हस्तक्षेप के रूप में खड़ा
होता है।
6. स्वांग : भारतीय समाज की
नकली होती संरचना
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का छठा उपन्यास ‘स्वांग’ बुंदेलखंड के ग्राम्य समाज को केंद्र में रखकर रचा गया एक गहन व्यंग्यात्मक
आख्यान है, जिसकी जड़ें भारतीय सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं तक फैली हुई हैं। उपन्यास
की भूमिका में लेखक का कथन— “‘स्वाँग’ को बुंदेलखंड पर
मेरे लिखे उपन्यासों की एक ट्रायोलॉजी बनाने का श्रेय दिया जा सकता है… ऐसा मोहिनी
रूप कि फिर उसे कहे बिना रहा न जा सके।”13 रचना के आत्मपरक तथा भावात्मक स्रोत को स्पष्ट करता है। यह वक्तव्य केवल
प्रेरणा का विवरण नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि ‘स्वांग’ लेखक के भीतर वर्षों से पनप रही उस कथात्मक
बेचैनी का रूपांतरण है जो बुंदेलखंड की वास्तविक जीवनचर्या, उसकी विडंबनाओं और उसके
सामाजिक टूटन को कथा में रूपायित करना चाहती थी।
‘स्वांग’ का मूल हथियार है— व्यंग्य।
पर यह व्यंग्य सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की बदलती संरचना का तीखा विश्लेषण है। उपन्यास इस विचार को केंद्र
में रखता है कि समाज में हर ओर राजनीति, न्याय, सत्ता, नैतिकता और रोज़मर्रा के व्यवहार में एक गहरा स्वांग चल रहा है। जीवन की
वास्तविकता और समाज का नकली आडंबर इस प्रकार घुलमिल गए हैं कि सच और स्वांग के बीच
की रेखा लगभग मिट चुकी है। इस अर्थ में ‘स्वांग’ आधुनिक भारतीय समाज की विसंगतियों
को ग्रामीण परिवेश के माध्यम से एक सार्वभौमिक व्यंग्य में बदल देता है।
हरिशंकर राढ़ी की टिप्पणी— “लेखक ने देशी बीज, देशी खाद और पानी मिलाकर
ऐसी ऑर्गेनिक फसल उगाई है… दृश्य इतने वास्तविक हैं कि वह इन्हें झुठला भी नहीं
सकता… अंततः अवचेतन तक पहुँच जाता है।”14 उपन्यास की प्रभावशीलता को बेहद सटीक रूप में सामने लाती है। ‘ऑर्गेनिक फसल’
का यह रूपक बताता है कि उपन्यास की भाषा, उसके पात्र और उसकी घटनाएँ कृत्रिम नहीं, बल्कि असल मिट्टी से उपजे हुए हैं। यही असलपन पाठक को गहरे झकझोरने की क्षमता
रखता है।
उपन्यास में जिस तरह सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी ढाँचों को ‘स्वांग’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह इस रचना की सबसे बड़ी
आलोचनात्मक उपलब्धि है। यह मानो पाठक के सामने आईना रख देता है कि समाज अपनी ही
कपटपूर्ण परंपराओं, खोखले आदर्शों और भ्रष्ट संरचनाओं में किस प्रकार फँसकर स्वयं एक स्वांग बन
गया है।
भाषा की दृष्टि से ‘स्वांग’ चतुर्वेदी की लेखकीय क्षमता का श्रेष्ठ प्रमाण है।
उनका बुंदेलखंडी मुहावरा, स्थानीय बिंबों का प्रयोग, बोलचाल की सजीव लय, इन सभी से उपन्यास में प्रांतीयता नहीं, बल्कि कथ्य की व्यापकता उभरकर आती है।
कुल मिलाकर, ‘स्वांग’ सामाजिक यथार्थ का एक तीखा और अनिवार्य पाठ है, जो हँसाता भी है, चुभता भी है और अंततः पाठक
को उस ‘विचित्र शून्य’ में छोड़ देता है, जहाँ पाठक को यह सोचना पड़ता है कि यह स्वांग केवल उपन्यास का नहीं, बल्कि हमारे पूरे देश का
यथार्थ है।
7. एक तानाशाह की प्रेमकथा :
प्रेम का राजनीतिक रूपक
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का सातवाँ उपन्यास ‘एक तानाशाह की प्रेमकथा’ उनकी रचनात्मक यात्रा में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आता
है। व्यंग्य के लिए पहचाने जाने वाले लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है, कि प्रेमकथा
लिखना उनके लिए सहज नहीं था। भूमिका में उनका यह कथन— “कभी अपने जीवन में प्रेम कथा लिखने की हिम्मत भी जुटा सकूँगा मैं, ऐसा सोचा न था… पर मन था कि
मैं एक प्रेमकथा लिखूँ।”15 उपन्यास की रचनात्मक बेचैनी
और आत्म-संघर्ष दोनों का संकेत है। यह वक्तव्य केवल एक स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि उपन्यास के मूल अभिप्राय
की कुंजी भी है, क्योंकि यहाँ प्रेम को रूमानी कल्पना नहीं, बल्कि सत्ता, वर्चस्व और मानवीय मनोविज्ञान की जटिलताओं के रूप में देखा गया है।
उपन्यास में प्रस्तुत प्रेम के पाँच तानाशाहों में चार तानाशाह वस्तुतः प्रेम
के चार चेहरों या चार विकृत रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चार तानाशाह प्रेम के
बहाने वर्चस्व स्थापित करते हैं- कहीं हिंसा, कहीं नैतिकता, कहीं भावनात्मक शोषण और कहीं देशप्रेम के राजनीतिक खेल के माध्यम से। यह
बहुपरत संरचना उपन्यास को केवल ‘प्रेमकथा’ नहीं रहने देती; बल्कि इसे मानवीय संबंधों
की सत्ता-चेतना का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन बना देती है।
पहला तानाशाह प्रेम को हिंसा के सहारे नियंत्रित करता है। यह प्रेम के भीतर
छिपे पितृसत्तात्मक दंभ की ओर संकेत करता है। दूसरा नैतिकता का तानाशाह
प्रेमिका/पत्नी पर संदेह और मर्यादा के नाम पर नियंत्रण स्थापित करता है। यह वह
रूप है जिसमें प्रेम घुटकर अधिकार में बदल जाता है। तीसरी तानाशाह स्त्री है, जो भावनात्मक शोषण के
माध्यम से प्रेम को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है। यह दर्शाता है कि सत्ता का खेल
केवल पुरुषों का नहीं। चौथा तानाशाह देशप्रेम का है, जहाँ प्रेम व राष्ट्रवाद का विकृत सम्मिश्रण तानाशाही का औजार बनता है। इन
चारों रूपों के माध्यम से लेखक प्रेम की जोखिमों, उसके भीतर छिपी हिंसाओं और सत्ता की सूक्ष्म राजनीति को उजागर करते हैं।
इसके विपरीत पाँचवाँ तानाशाह— प्रेम का तानाशाह, उपन्यास का आध्यात्मिक और भावनात्मक केंद्र है। इसके दो प्रतिनिधि सूरज प्रकाश
और नायाब जान, प्रेम के उस रूप को दर्शाते हैं जो निर्बंध, पवित्र और वायवी है। यह प्रेम किसी पर वर्चस्व नहीं चाहता, बल्कि प्रेमियों के हृदय
में निवास कर स्वयं को तानाशाह कहने का अधिकार अर्जित करता है। यहाँ लेखक प्रेम को
उसकी सर्वोच्च मानवीय गरिमा में स्थापित करते हैं।
उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रेम को सरल भावनात्मक स्थिति न
मानकर सत्ता, हिंसा, मर्यादा, राजनीति और आध्यात्मिकता के बीच चलने वाली एक बहुस्तरीय लड़ाई के रूप में
प्रस्तुत करता है। यह प्रयोगात्मकता इसे आधुनिक हिन्दी उपन्यास परंपरा में विशिष्ट
स्थान देती है।
कुल मिलाकर ‘एक तानाशाह की प्रेमकथा’ प्रेम की जटिलताओं का तीखा, व्यंग्यात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण है, जो प्रेम को उसके झूठे और सच्चे दोनों रूपों में पहचानने हेतु पाठक को विवश
करता है।
निष्कर्ष
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी हिंदी व्यंग्य–उपन्यास के सबसे सक्रिय, सशक्त और प्रयोगधर्मी रचनाकारों में अग्रणी हैं। उनके उपन्यास सामाजिक,
राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक विसंगतियों
की गहरी पड़ताल करते हैं, तथा भाषा, शिल्प और कथ्य—तीनों स्तरों पर निरंतर नवीनता प्रस्तुत करते हैं। नरक यात्रा में चिकित्सा–प्रणाली की
अराजकता, बारामासी में ग्रामीण जीवन के
अवसाद–हँसी, मरीचिका में पौराणिक फैंटेसी के
सहारे वर्तमान राजनीति, हम न मरब में मृत्यु–दर्शन, पागलखाना में बाजारवाद की सोची-समझी पागलपन–सृष्टि, स्वांग में समाज का नकली चेहरा और एक तानाशाह की प्रेमकथा में प्रेम का वैचारिक विवेचन— ये सभी उपन्यास उनके साहित्यिक वैभव और सामाजिक
प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं।
उनकी उपन्यास–यात्रा यह सिद्ध करती है कि व्यंग्य केवल हँसी का साधन नहीं,
बल्कि समाज को आईना दिखाने का दार्शनिक, साहित्यिक और संवेदनशील माध्यम भी है।
संदर्भ–सूची
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- अजय अनुरागी, व्यंग्य
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- वही
- डॉ.ज्ञान चतुर्वेदी, मरीचिका, राजकमल
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- मधुरेश, अक्षरा
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- डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, हम न मरब, राजकमल
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- कैलाश मंडलेकर, हिन्दी व्यंग्य की प्रवृत्तियां और परिवेश, शिवना प्रकाशन, म.प्र., 2023, पृष्ठ–74
- डॉ.ज्ञान चतुर्वेदी, पागलखाना, राजकमल
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- प्रभु जोशी, व्यंग्य-उपन्यास
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दिल्ली, 2021, पृष्ठ–137
- डॉ.ज्ञान चतुर्वेदी, स्वांग, राजकमल
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- हरिशंकर राढ़ी, अक्षरा
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- डॉ.ज्ञान चतुर्वेदी, एक तानाशाह की प्रेमकथा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2024, पृष्ठ–11
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